दुनिया मेरी नज़र से - world from my eyes!!

अच्छा तो अब हम चलते हैं

March 2, 2008 · Comments Off

जी, अब समय आ गया है कि ये दुकान भी बढ़ जानी चाहिए, बहुत हो गया, बर्दाश्त की भी कोई हद होती है!!

कोई सवा दो वर्ष पहले, अक्तूबर 2005 में, मैंने वर्डप्रैस.कॉम पर यह ब्लॉग उस समय रजिस्टर किया था जब यह बाज़ार में आई नई सेवा थी और उस समय की अन्य नई सेवाओं की भांति बिना न्योते के इस पर भी खाता नहीं बनाया जा सकता था। तब मैंने भी अपना ईमेल पता यहाँ कतार में लगाया था और कुछ समय बाद मुझे वह गोल्डन टिकिट मिला था जिससे मैंने यहाँ यह ब्लॉग बनाया था। उस समय इरादा तो इस पर कुछ करने का नहीं था सिवाय कुछ टैस्टिंग आदि करने के कि देखें यह क्या बला है और कितना अच्छा है। लेकिन फिर देवेन्द्र पारिख के हिन्दी राइटर का पता चला तो मैंने सोचा कि चलो एक ब्लॉग हिन्दी में बना लें, हिन्दी लिखने का अभ्यास जो दसवीं कक्षा के बाद छूट गया था वह वापस आ जाएगा, और यह सोच मैंने एक माह बाद अपना यह प्रथम हिन्दी ब्लॉग आरंभ किया।

इस तरह पता ही नहीं चला कैसे ये सवा दो साल बीत गए और मैं यहाँ पर लिखता रहा, हिन्दी ब्लॉगरों की बिरादरी का हिस्सा बना, साथी ब्लॉगरों का स्नेह भी मिला और गालियाँ भी मिली। :)

इस ब्लॉग पर मेरी यह 209वीं पोस्ट है और इससे पहले की 208 पोस्टों पर अभी तक 1750 से अधिक टिप्पणियाँ आ चुकी हैं। अब काफ़ी सोच विचार के बाद निर्णय लिया है कि यह दुकान बढ़ा दी जाए। जितना चला उतना अच्छा था, उसमें मज़ा आया, विचार तो मैं काफ़ी समय से कर रहा था पर आज मन बना ही लिया है।

 

 

 

अरे रुकिए, जाते कहाँ हैं? मैं ब्लॉगिंग नहीं छोड़ रहा ना ही लोगों को अपनी नज़र से दुनिया दिखाने का ख्याल तजा है!! बस यह निर्णय लिया है कि इस ब्लॉग को वर्डप्रैस.कॉम के फोकटी ठिकाने से आखिरकार अपने डोमेन पर स्थानांतरित कर दिया जाए। :)

तो अब से मेरी नज़र से दुनिया देखिए इस पते पर - http://hindi.amitgupta.in/
जिन लोगों ने इस ब्लॉग की फीडबर्नर वाली फीड को सब्सक्राइब किया हुआ है या ईमेल द्वारा सब्सक्रिप्शन लिया हुआ है उनको इस बदलाव से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, बाकी सभी से गुज़ारिश है कि अपने-२ बुकमार्क आदि अपडेट कर लें और नए अड्डे पर तशरीफ़ ले जाएँ। :)

Comments OffCategories: blogging · mindless rants · ब्लॉगिंग · फ़ालतू बड़बड़

जोधा-अक़बर सिर्फ़ एक फिल्म है

February 27, 2008 · 7 Comments

अभी हाल ही में रिलीज़ हुई रितिक और ऐश्वर्य की फ़िल्म जोधा अक़बर को लेकर काफ़ी हल्ला हो चुका है। बहुतों का कहना है कि जोधा वास्तव में मुग़ल बादशाह अक़बर की शरीक-ए-हयात न थी वरन्‌ उनके साहिबज़ादे और अगले मुग़ल बादशाह जहाँगीर की बेग़म थी। और ये कुछ लोग इसलिए आशुतोष गोवारिकर से खफ़ा हैं कि खामखा पुत्रवधु को ससुर की लुगाई करार दिया जा रहा है और इतिहास की वाट लगाई जा रही है।

मुझे यह सोच उन लोगों पर हंसी आ रही है कि खामखा अपना समय वे लोग एक बेकार के मुद्दे पर हल्ला कर व्यर्थ कर रहे हैं। फ़िल्में कब से सच्चाई का आईना हो गईं? अधिकतर फ़िल्में मनोरंजन के लिए बनाई जाती हैं और जोधा-अक़बर भी एक कमर्शियल फ़िल्म है जिसका उद्देश्य भी मनोरंजन ही है न कि लोगों का ज्ञानवर्धन करना। तो कुछ हल्ला मचाने वाले लोग यह कह रहे हैं कि जिस तरह जन्नतनशीन फिल्म निर्देशक के.आसिफ़ द्वारा बनाई गई दिलीप कुमार तथा मधुबाला की फ़िल्म मुग़ल-ए-आज़म ने जोधा का अक़बर की बेग़म होने की भ्रांति फैलाई थी उसी प्रकार फ़िल्म जोधा-अक़बर भी उसी भ्रांति को कायम रखे है।

पर बात वही है कि फ़िल्में कब से सच्ची घटनाओं को जस-का-तस देखने का आईना हो गईं? जिन अत्यधिक पढ़े-लिखे महानुभावों को यह पता है कि जोधा वास्तव में अक़बर की बेग़म न होकर जहाँगीर की बीवी थी उन पढ़े-लिखे महानुभावों को यह न दिखा कि फ़िल्म जोधा-अक़बर के आरंभ में कथा बाँचते हुए अमिताभ बच्चन कहते हैं:

हिन्दुस्तान…..
इतिहास गवाह है कि इस ज़मीन पर खून की खुराक से ही सल्तनतें पनपती रही हैं। सन्‌ 1011 से कितनों ने ही वक्त-२ इसे लूटकर इस फूल को अपने कदमों तले रौंदा है। और फिर….. सन्‌ 1450 में कदम रखा मुग़लों ने; जिन्होंने इसे अपना घर बनाया, इसे प्यार दिया और इसे नवाज़ा। बादशाह बाबर से शुरु हुई मुग़लिया हुकूमत हुमायूँ से होती हुई अक़बर तक पहुँची जिसे मुग़लिया दौर में सबसे ऊँचा दर्जा हासिल हुआ।

फ़िल्म वालों की तो क्या कहें पर इन पढ़े-लिखे विद्वानों और इतिहासकारों पर अवश्य आश्चर्य हो रहा है कि इन्होंने इस बात पर हल्ला नहीं मचाया कि फ़िल्म में कहा गया है कि मुग़ल सन्‌ 1450 में आए थे। अब यह तो फ़िल्म में सही कहा गया है कि मुग़लिया सल्तनत की नींव बादशाह बाबर ने रखी थी पर यह मुझे समझ नहीं आता कि मुग़ल सन्‌ 1450 में भारत कैसे आ गए थे क्योंकि मुग़ल सल्तनत की नींव बाबर ने सन्‌ 1504 के आसपास रखी थी जब उसने काबुल और खोरासन के पूर्वी भागों और सिंध पर कब्ज़ा किया था। और तो और, उसे छोड़िए, बाबर का जन्म सन्‌ 1483 में हुआ था तो वह कैसे सन्‌ 1450 में भारत आकर मुग़लिया सल्तनत की शुरुआत कर सका यह वाकई चर्चा का विषय है। क्या कोई समय में यात्रा कर सकने वाला उपकरण उस काल में मौजूद था या भविष्य से कोई वहाँ जाएगा यह करने के लिए? ;)

फ़िल्म में यह बात तो सही दिखाई है कि सन्‌ 1555 में बादशाह हुमायूँ की अकस्मात मृत्यु से लफ़ड़ा हो गया था और हेमचन्द्र विक्रमादित्य भार्गव उर्फ़ हेमु ने दिल्ली और आगरा पर अपना कब्ज़ा जमा अपने को सम्राट घोषित कर दिया था और फिर बैरम खाँ की कमान में चलती फौज ने पानीपत की दूसरी लड़ाई में हेमु की अपने से दोगुणी फ़ौज से लोहा लिया था और हेमु आँख में तीर लगने से ज़ख्मी हो गिर पड़ा था जिसका बैरम खाँ ने तब सिर कलम कर दिया था जब अक़बर ने ऐसा करने से मना किया था। यानि कि पूर्णतया झूठ नहीं दिखाया है फ़िल्म में, कुछ-२ जगह पर सही इतिहास फ़िल्माया गया है।

पर बात यह नहीं है कि क्या सही फ़िल्माया है, बात यह है कि इन हल्ला करने वाले विद्वानों को सन्‌ 1450 वाली त्रुटि क्यों न दिखी? जोधा का अक़बर की बीवी न होने का गूढ़ राज़ मालूम है जो कि अभी भी विवादास्पद है क्योंकि इस बारे में कोई ठोस प्रमाण नहीं हैं पर तारीख का नहीं मालूम जिसके बारे में पक्के ठोस प्रमाण हैं और जो दर्ज इतिहास है?

ज़ाती तौर पर मेरा मानना है कि फ़िल्म मनोरंजन के लिए होती हैं, इतनी टेन्शन न ही लो तो बेहतर होता है। तकरीबन दो वर्ष पहले आई हॉलीवुड की फ़िल्म 300 का ही उदाहरण लें जो कि थरमॉपली की प्रसिद्ध लड़ाई पर बनी थी जिसमें कथित 300 स्पॉर्टा के सैनिकों ने हज़ारों-लाखों की पर्शिया की फौज से लोहा लिया था, परन्तु उसमें दिखाया गया कि अंत में सिर्फ़ स्पॉर्टा के ही सैनिक रह गए जो मारे गए परंतु इतिहास तो कुछ और ही कहता है। दर्ज इतिहास के अनुसार उन 300 स्पॉर्टा के सैनिकों के साथ तकरीबन 700 थेस्पिया के सैनिकों ने भी अंत तक ज़र्कसीस की सागर सी विशाल फौज से लोहा लेते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया था। तो इस बारंबार दोहराए जाने वाले गूफ़-अप(Goof Up) को क्या कहेंगे कि जब भी थरमॉपली की प्रसिद्ध लड़ाई का ज़िक्र आता है तो सिर्फ़ उन 300 स्पॉर्टा के सैनिकों तथा उनके राजा लियोनाईडस की वाह वाही होती है जबकि उनके साथ आखिरी साँस तक लड़ते हुए शहीद हुए 700 गुमनाम थेस्पियन सैनिक अपने हिस्से की वाह-वाही से वंचित रह जाते हैं!!

तो बात यह भी नहीं है कि फ़िल्म जोधा-अक़बर में बताई गई गलत तारीख को हल्ला करने वाले इतिहास के विद्वानों ने अनदेखा कर दिया; बात यह है कि फ़िल्म को फ़िल्म की तरह ही लो यानि कि काल्पनिक कहानी के रूप में। यदि यह कहा जाता है कि फ़िल्म सच्ची घटनाओं पर बनी है और फिर उसमें कोई बात गलत दिखाई जाती है तो उसका विरोध लाज़मी है।

और जो हल्ला करने वाले लोग यह कहते हैं कि इस तरह की गलतियों से लोगों को गलत ज्ञान मिलता है तो भई जो व्यक्ति ठोस दर्ज किताबी ज्ञान लेने की जगह फ़िल्म देख यह ज्ञान लेता है कि अक़बर कब बादशाह बना और उसकी बीवी का क्या नाम था तो उस व्यक्ति और उसकी बुद्धि पर तरस ही आ सकता है!! ;)

→ 7 CommentsCategories: mindless rants · movies · फ़ालतू बड़बड़ · फ़िल्में
Tagged: , , , , , , , , , , ,

बेक़रार करके हमें यूँ न जाईये …..

February 19, 2008 · 2 Comments

पिछला जो गाना अपने मोबाइल की रिंग बैक टोन/कॉलर ट्यून के रूप में सैट किया था वो माता जी को पसंद नहीं आया, बोलीं कि क्या रोता सा गाना लगा रखा है कुछ अच्छा सा खुशनुमा गीत लगाऊँ। तो मैं भी सोच में पड़ गया कि गाना तो बढ़िया है परन्तु जंच नहीं रहा, ऐसा एकाध मित्र ने भी कहा। तो अपन पुनः पहुँचे एमटीएनएल की प्लेट्यून्स वेबसाइट पर और लगा पुनः तलाशने किसी ढंग के गाने को। आजकल के जो नए गाने उसमें उपलब्ध हैं वो कुछ खास पसंद न आए तो पुराने गाने सुनने लगा। मन्ना डे, हेमंत कुमार और किशोर कुमार के कई गाने सुनने के बाद आखिरकार एक गाना पसंद आया हेमन्त कुमार का गाया हुआ सन्‌ 1969 में आई फिल्म खामोशी का - तुम पुकार लो

तुम ऽऽऽ पुकार लो, तुम्हारा इंतज़ार है,
तुम ऽऽऽ पुकार लो।
ख़्वाब चुन रही है रात बेक़रार है,
तुम्हारा ऽऽ इंतज़ार है,
तुम ऽऽऽ पुकार लो।

होंठ पे लिए हुए दिल की बात हम,
जागते रहेंगे और कितनी रात हम। - २
मुक़्तसर सी बात है तुम से प्यार है
तुम्हारा ऽऽ इंतज़ार है,
तुम ऽऽऽ पुकार लो।

दिल बहल तो जाएगा इस ख्याल से,
हाल मिल गया तुम्हारा अपने हाल से। - २
रात ये क़रार की बेक़रार है,
तुम्हारा ऽऽ इंतज़ार है।

गुलज़ार साहब का लिखा हुआ यह गीत बहुत सुंदर है। उनके लिखे गए जो गीत मैंने अभी तक सुने हैं उनमें एक बात देखी है, बोल अधिक नहीं होते हैं और गीत छोटा ही होता है, जिस भी फिल्म के लिए लिखते हैं तो अधिक नहीं लिखते हैं लेकिन गीत सारे एक से बढ़कर एक बढ़िया और सुन्दर होते हैं - गोया मतलब यह है कि वे मात्रा से अधिक गुणवत्ता पर ध्यान देते हैं। :) इस गाने का वीडियो आप यहाँ देख सकते हैं

खैर, पंगा यह कि गाना यह भी खुशनुमा नहीं, तो इसलिए तलाशते हुए दूसरे गाने पर निगाह और कान गए, यह था सन्‌ 1962 में आई विश्वजीत और वहीदा रहमान की फिल्म बीस साल बाद के गीत “हमको बेक़रार करके यूँ न जाईये” जो कि पुनः हेमन्त कुमार द्वारा गाया एक खूबसूरत गीत है जिसको शकील बदायुनी ने लिखा था।

बेक़रार करके हमें यूँ न जाईये,
आपको हमारी कसम लौट आईये। - २

देखिए वो काली काली बदलियाँ,
ज़ुल्फ़ की घटा चुरा न लें कहीं,
चोरी चोरी आ के शोख बिजलियाँ,
आपकी अदा चुरा न लें कहीं,
यूँ कदम अकेले न आगे बढ़ाईये,
आपको हमारी कसम लौट आईये।

बेक़रार करके हमें यूँ न जाईये,
आपको हमारी कसम लौट आईये।

देखिए गुलाब की वो डालियाँ,
बढ़के चूम लें न आपके कदम। - २
खोए खोए भंवरें भी हैं बाग़ में,
कोई आपको बना न ले सनम,
बहकी बहकी नज़रों से खुद को बचाईये,
आपको हमारी कसम लौट आईये।

बेक़रार करके हमें यूँ न जाईये,
आपको हमारी कसम लौट आईये।

ज़िंदगी के रास्ते अजीब हैं,
इनमें इस तरह चला न कीजिए,
खैर है इसी में आपकी हुज़ूर,
अपना कोई साथी ढूँढ लीजिए,
सुन के दिल की बात न मुस्कुराईये,
आपको हमारी कसम लौट आईये।

बेक़रार करके हमें यूँ न जाईये,
आपको हमारी कसम लौट आईये। - २

कॉलर ट्यून में इस गाने का सैम्पल सुनने के बाद ये इतना पसंद आया कि यूट्यूब पर इसका वीडियो खोजा और पूरा गाना सुना और देखा। ये गाना अपने को बहुत सही लगा, खुशनुमा का खुशनुमा भी है, तो इसको अब अपनी कॉलर ट्यून के रूप में सैट कर लिया। :D आप इस गाने का वीडियो यहाँ देख सकते हैं

→ 2 CommentsCategories: music · संगीत
Tagged: , , , , , , , , , , , , , , , ,

लग गया जी लग गया

February 18, 2008 · 12 Comments

भई लोगन के इंटरव्यू छपे रहते हैं ईयहाँ वहाँ तो हम भी सोचा करते कि हमार नंबर कभी लगेगा। आखिरकार हमार नंबर भी लग गया तो हम काहे पीछे रहे ढोल पीटन से। वैसे तो हम अपनी बड़ाई स्वयं नाही करते पर सोचे कि ई दफ़ा करे लेते हैं। ;) कहाँ छपा? अरे भईया ऐसन वैसन जगह नाही, अंतर्राष्ट्रीय मंच पर छपा है!! :D

भला हो ग्लोबल वॉयसिस की पाउला का जो हमार साक्षात्कार….. अरे भई इंटरव्यू…. अब इतनी तो अंग्रेज़ी आनी चाहिए जमाना कितना गला-काट प्रतियोगिता का हो गया है! हाँ तो जैसा हम कहे रहे थे, भला हो ग्लोबल वॉयसिस की पाउला का जो हमार साक्षात्कार लिए और छापे दिए। तो आप सब लोगन भी पढ़ लीजिए हमार साक्षात्कार;)

→ 12 CommentsCategories: mindless rants · फ़ालतू बड़बड़
Tagged: , , , ,

आज पुरानी राहों से …..

February 12, 2008 · 5 Comments

कल रात यूँ ही एमटीएनएल (MTNL) प्लेट्यून वेबसाइट देख रहा था कि कोई ढंग का गाना वहाँ आ गया हो तो उसको अपनी रिंग बैक टोन (Ring Back Tone) के तौर पर सैट कर लूँ। रिंग बैक टोन वह होती है जो आपको तब सुनाई देती है जब आप किसी फोन नंबर को डायल करते हैं और कॉल मिलाए गए नंबर से कनेक्ट होती है। यह टोन फोन मिलाने वाले को अपने रिसीवर में तब तक सुनाई देती है जब तक दूसरे छोर पर फोन रिसीव नहीं किया जाता। अब मोबाइल ऑपरेटर आदि काफ़ी समय से डिफॉल्ट टोन की जगह गाना आदि सैट करने की सुविधा दे रहे हैं। मुझे कुछ ही समय पहले पता चला था कि मेरे मोबाइल सेवा प्रदाता, एमटीएनएल (MTNL), ने भी यह सेवा चालू कर दी है तो मैंने भी उस समय उपलब्ध सीमित सूचि में पसंद आए ओम शांति ओम के गाने “आँखों में तेरी अजब सी अजब सी अदाएँ हैं” सैट कर लिया था।

हाँ तो अब कल रात मैं देख रहा था कि कोई ढंग के गाने उपलब्ध हुए हैं कि नहीं तो सुनते-२ दो गाने ढंग के दिखे; स्व. किशोर कुमार द्वारा गाया “हम बेवफ़ा हरगिज़ न थे” और स्व. मो.रफ़ी द्वारा गाया “आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज़ न दे”। गाने तो दोनों ही बढ़िया, किशोर कुमार द्वारा गाया गीत तो मैंने पहले भी कई बार सुना हुआ है लेकिन रफ़ी साहब द्वारा गाए गाने के जब मैंने बोल सुने तो मैं मोहित हो गया। हालांकि एमटीएनएल (MTNL) की वेबसाइट पर इस गाने की टोन सिर्फ़ एक मिनट की थी लेकिन वो गाने के मुखड़े ने ही मोह लिया। उसको तो खैर मैंने अपने मोबाइल के लिए सैट कर लिया कि अब कोई मुझे फोन मिलाएगा तो उसको यह गाना सुनाई दे, और मैं खोजने लगा कि यह पूरा गाना कहीं सुनने को मिल जाए तो आखिरकार यह गाना मिल गया। जब इस गाने को पूरा सुना तो शकील बदायुनी के लिखे इस गीत पर मुँह से अपने आप ही वाह-वाह निकल गया। पूरा गाना इसलिए यहाँ लिख रहा हूँ:

आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज़ न दे,
दर्द में डूबे गीत न दे, ग़म का सिसकता साज़ न दे। - २

बीते दिनों की याद थी जिनमें, मैं वो तराने भूल चुका,
आज नई मंज़िल है मेरी, कल के ठिकाने भूल चुका,
ना वो दिल ना सनम,
ना वो दीन धरम,
अब दूर हूँ सारे गुनाहों से।

आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज़ न दे…..

टूट चुके सब प्यार के बंधन, आज कोई ज़ंजीर नहीं,
शीशा-ए-दिल में अरमानों की आज कोई तस्वीर नहीं,
अब शाद हूँ मैं आज़ाद हूँ मैं, कुछ काम नहीं है आहों से।

आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज़ न दे,
दर्द में डूबे गीत न दे, ग़म का सिसकता साज़ न दे।

जीवन बदला दुनिया बदली,
मन को अनोखा ज्ञान मिला,
आज मुझे अपने ही दिल में एक नया इंसान मिला,
पहुँचा हूँ वहाँ नहीं दूर जहाँ, भगवान भी मेरी निगाहों से।

आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज़ न दे…..

बहुत खूबसूरत गीत लिखा था और रफ़ी साहब ने गीत की पूरी इज़्ज़त रखते हुए उतनी ही खूबसूरती के साथ इसको गाया था। यह गाना सन्‌ 1968 में आई दिलीप कुमार की फिल्म आदमी का है।

यदि आप यह गीत सुनना चाहते हैं तो इसे आप यहाँ सुन सकते हैं:) इसका वीडियो यूट्यूब पर यहाँ उपलब्ध है परन्तु लगता है कि यह वीडियो बीच में से कटा हुआ है या फिर हो सकता है कि इतना ही गाना फिल्माया गया हो और मूल गीत में से बीच के दो पैरा न फिल्माए गए हों। खैर, अब यह फिल्म सेवन्टीएमएम पर अपनी कतार में लगा दी है, जब आएगी तो देख के ही पता चलेगा कि फिल्म में पूरा गीत है कि नहीं। :)

→ 5 CommentsCategories: music · संगीत
Tagged: , , , , , ,

ब्लॉग - समाज के लिए उनका क्या महत्व है?

February 8, 2008 · 2 Comments

पिछले माह, 12 जनवरी 2008 को, हुई दिल्ली ब्लॉग एण्ड न्यू मीडिया सोसायटी (Delhi Blog and New Media Society aka DBNMS) द्वारा आयोजित प्रथम ब्लॉगर भेंटवार्ता काफ़ी सफ़ल रही। बहुत से लोगों ने यह भी हमें बताया कि वह भेंटवार्ता उनके लिए काफ़ी ज्ञानवर्धक रही, उनको कई बातों की जानकारी मिली और अन्य ब्लॉगरों से मिलने का अवसर तो मिला ही। दिल्ली ब्लॉग एण्ड न्यू मीडिया सोसायटी (Delhi Blog and New Media Society) के पीछे एक उद्देश्य यह भी है कि ब्लॉगर भेंट सिर्फ़ चाय-कॉफी और गपशप तक ही न सीमित रहें बल्कि हम ब्लॉगर लोग जब मिलें तो अलग-२ विषयों पर कुछ सार्थक चर्चा भी करें और एक दूसरे से सीखें भी, इसलिए Be Relevant का नारा लगाया गया था। :)

तो इसी प्रयास को आगे बढ़ाते हुए इस माह, 14 फरवरी 2008 को, एक और ब्लॉगर भेंटवार्ता आयोजित की जा रही है। यह पिछली बार की तरह लंबा चौड़ा कार्यक्रम न होगा, मात्र दो घंटे का कार्यकरम सांयकाल में होगा जिस पर ब्लॉगों और समाज के लिए उनके महत्व पर चर्चा की जाएगी। सिलसिलेवार जानकारी निम्न है:

चर्चा का विषय: ब्लॉग और समाज के लिए उनका महत्व
स्थान: गुलमोहर हॉल, इंडिया हैबिटाट सैन्टर (India Habitat Center), लोधी रोड, नई दिल्ली
तिथि: 14 फरवरी 2008
समय: सांयकाल 6:30 से 8:30
रूपरेखा: ब्लॉगर्स/चिट्ठाकारों ने विश्व भर में अपनी एक पहचान कायम की है और भारत में भी यह हो रहा है जैसा कि हालिया पिछले समयकाल में विदित हुआ है। अब इसी पर आगे बढ़ते हुए ब्लॉगर/चिट्ठाकार नागरिक पत्रकार(citizen journalists) की अपनी भूमिका निभाने के लिए क्या कर सकते हैं? इसी पर चर्चा की जाएगी एक संवादात्मक सत्र में जिसको निम्न भागों में विभाजित किया गया है:

  1. उन वाकयों के उदाहरण जहाँ ब्लॉगर्स/चिट्ठाकारों के कारण बदलाव आए हैं
  2. पत्रकारिता के श्रेष्ठ सिद्धांत जिनका ब्लॉगर्स/चिट्ठाकारों पालन कर सकें
  3. कैसे ब्लॉगर/चिट्ठाकार इस सब पर एक साथ कार्य कर सकते हैं

आमंत्रित: इस भेंटवार्ता में सभी आमंत्रित हैं, वे भी जो मौजूदा ब्लॉगर/चिट्ठाकार हैं और वे भी जो ब्लॉगर/चिट्ठाकार बनना चाहते हों और वे भी जो ब्लॉग पाठक हैं।

इस भेंटवार्ता और सभा में भाग लेने का कोई शुल्क नहीं है, केवल आपको समय निकाल इसमें पधारना मात्र है और चर्चा में भाग लेना है क्योंकि यह आपकी अपनी भेंटवार्ता है और अपनी चर्चा है।

यदि अपने आने की पुष्टि/कन्फर्मेशन यहाँ टिप्पणी के रूप में दे देंगे तो हम लोगों को भी अंदाज़ा रहेगा कि कितने साथी लोग शिरकत करने वाले हैं। यदि कन्फर्मेशन नहीं भी देंगे तो भी आपका स्वागत है, इस भेंटवार्ता में शिरकत करने और भाग लेने के लिए कन्फर्मेशन देना अनिवार्य नहीं है। :)

तो मिलेंगे 14 फरवरी 2008 को सांयकाल साढ़े छह बजे लोधी रोड(नई दिल्ली) स्थित इंडिया हैबिटाट सैन्टर (India Habitat Center) के गुलमोहर हॉल में। :)

 
अधिक जानकारी के लिए यहाँ देखें
 

→ 2 CommentsCategories: Blogger Meetups · blogging · delhi · india · internet · इंटरनेट · दिल्ली · ब्लॉगिंग · भारत
Tagged: , , , , , , ,

ब्लॉगर भेंटवार्ता टेलीविजन पर …..

February 7, 2008 · 5 Comments

पिछले माह, 12 जनवरी 2008, हुई दिल्ली ब्लॉग एण्ड न्यू मीडिया सोसायटी (Delhi Blog and New Media Society aka DBNMS) द्वारा आयोजित प्रथम ब्लॉगर भेंटवार्ता काफ़ी सफ़ल रही। बहुत से साथी ब्लॉगरों और ब्लॉग इच्छुकों और उत्सुकों ने इसमें भाग लेकर इस भेंट को सफ़ल बनाया। अपने हिन्दी ब्लॉगजगत से भी कई बंधुओं ने शिरकत कर मेरी इस सोच को मज़बूत किया कि ब्लॉगर चाहे कैसा हो और चाहे किसी भी भाषा में लिखता हो परन्तु होता वह ब्लॉगर ही है इसलिए हम इस ब्लॉगजगत में क्षेत्र अथवा भाषा के मापदंड पर बंटवारा नहीं करेंगे। :)

मीडिया में भी इस ब्लॉगर भेंटवार्ता को काफ़ी कवरेज मिली और ब्लॉगजगत तथा ब्लॉगरों के बारे में खबर दूर-२ तक पहुँची। इससे अपेक्षित है कि ब्लॉगिंग का मर्ज़ बहुतों को अपनी चपेट में लेगा। :)

भेंटवार्ता से एक दिन पहले अंग्रेज़ी के हिन्दुस्तान टाइम्स की अनुपूरक पत्रिका एचटी सिटी(HT City) के मुख्यपृष्ठ पर भेंटवार्ता संबन्धित यह लेख छपा था। हालांकि इसमें पत्रकार/लेखिका से एक त्रुटि हो गई और अंत में वेबसाइट के पते में वो delhi लगाना भूल गई, असल वेबसाइट www.delhibloggers.in है। एनडीटीवी (NDTV) ने इस पूरी भेंटवार्ता को कवर किया था और पत्रकार गरिमा दत्त ने एनडीटीवी (NDTV) की वेबसाइट पर भेंटवार्ता के अगले दिन यह लेख छापा। सिर्फ़ छापे वाले मीडिया में ही नहीं, टेलीविजन पर भी इसकी कवरेज दिखाई गई।

एनडीटीवी 24×7 (NDTV 24×7) पर दिखाई गई न्यूज़ बाइट

यूट्यूब पर इस वीडियो को यहाँ देखें। वीडियो को FLV रूप में यहाँ डाउनलोड करें

एनडीटीवी मेट्रोनेशन (NDTV Metronation) पर दिखाई गई न्यूज़ बाइट

यूट्यूब पर इस वीडियो को यहाँ देखें। वीडियो को FLV रूप में यहाँ डाउनलोड करें

एनडीटीवी मेट्रोनेशन (NDTV Metronation) पर दिखाई गई विस्तृत कवरेज

यूट्यूब पर इस वीडियो को यहाँ देखें। वीडियो को FLV रूप में यहाँ डाउनलोड करें

मीडिया में इस कवरेज का लाभ सीधे ही दिखा। जहाँ कई लोग हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले दिन छपे लेख के कारण भेंटवार्ता में आए वहीं कुछ लोग बाद में एनडीटीवी (NDTV) पर इसकी कवरेज देख कर समूह से जुड़े और अपने ब्लॉग बनाए। भेंटवार्ता के अगले ही दिन एनडीटीवी (NDTV) पर प्रसारित बर्खा दत्त के We The People कार्यक्रम का मुद्दा भी ब्लॉग ही थे। मतलब साफ़ है, मीडिया भी अब खुले रूप से ब्लॉगों पर ध्यान दे रहा है, और यह अच्छा भी है क्योंकि इससे जल्द ही यह भ्रम(जो कि बहुत लोग पाले हुए हैं) टूटेगा कि ब्लॉग मुख्यधारा मीडिया की जगह ले सकते हैं, दोनों एक दूसरे के सहायक/पूरक हो सकते हैं लेकिन दोनों की अपनी-२ पहचान और स्थान है।

→ 5 CommentsCategories: Blogger Meetups · blogging · delhi · india · internet · media · इंटरनेट · दिल्ली · ब्लॉगिंग · भारत · मीडिया
Tagged: , , , , , ,

तेरा क्या होगा रे याहू??

February 2, 2008 · 4 Comments

भईये टैम बोत खराब है! हाँ यदि आपने याहू (Yahoo!) के शेयर खरीद रखे हैं या फिर आप याहू के कर्मचारी हैं तो वाकई आपके लिए खराब टैम है। क्यों? अरे भांग खा के कहीं सो रहे थे का भई? याहू अपनी विश्वव्यापी 14300 कर्मचारियों की फौज में से लगभग 1000 कर्मचारियों को सेवा-निवृत्त करने की सोच रिया है ताकि अपने घटते मुनाफ़े में कुछ जोड़ सके। कैसे? अरे इस तरह इतनी बड़ी सेवा-निवृत्ति से याहू के सालाना खर्च में 10 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक की कमी आएगी और इस समय तो एक-एक डॉलर उसके लिए कीमती है क्योंकि मुनाफ़ा लगातार नीचे जाने वाली लिफ्ट पर सवार है। (अंग्रेज़ी में खबर यहाँ पढ़ें)

तो अब ऐसी हालत होने पर अनुमान लगाया जा रहा है कि याहू के पास दो ही रास्ते बचते हैं; या तो बिक जाए या फिर अपनी सर्च सुविधा को किनारे लगा गूगल की सर्च का हाथ थामे और उसके ज़रिए विज्ञापनों द्वारा डॉलर कमाए तथा अपनी हाल ही में खरीदी जायदादों को डॉलर बनाने की मशीनों में कन्वर्ट करे। अब पहले रास्ते को अपनाने से याहू के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स की सिरदर्दी तो खत्म हो जाएगी(खरीदने वाली कंपनी को बतौर बोनस में दे देंगे ना) और यदि दूसरे रास्ते को अपनाता है तो काफ़ी मेहनत करनी होगी, बहुत ज़्यादा मेहनत!!

खैर, ऐसे माहौल में अटकलों का बाज़ार पुनः गर्म हो गया है। यह मान के चला जा रहा है कि याहू तो बिकेगा ही बिकेगा, उसके पास और कोई रास्ता नहीं। ऐसे में अनुमान लगाए जा रहे हैं कि कौन आखिरकार बोलेगा या ऽऽऽऽ हू ऽऽऽऽऽ (शम्मी कपूर साहब नहीं, उनका तो टैम निकल गया, जब बोलना था तब बोल लिए, आजकल तो ईश्वर भजन में लगे रहते हैं, टैम जो आ रहा है मीटिंग का)। माइक्रोसॉफ़्ट को सबसे बड़ा दावेदार माना जा रहा है, बल्कि खबर यहाँ तक है कि माइक्रोसॉफ़्ट की ओर से 44.6 अरब अमेरिकी डॉलर में याहू को खरीदने की पेशकश हुई है। (अंग्रेज़ी में खबर यहाँ पढ़ें)

गौरतलब है कि कुछ समय पहले माइक्रोसॉफ़्ट ने याहू को 40 अरब अमेरिकी डॉलर में खरीदने की पेशकश की थी जिस पर याहू के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने 80 अरब अमेरिकी डॉलर की माँग की थी, यानि कि अन्य शब्दों में बिकने से मना कर दिया था। वैसे कुछ लोग गूगल को भी याहू की खरीद का एक प्रबल दावेदार मान रहे हैं। वैसे भी मुख्य दो खिलाड़ी यही दोनों हैं, तीसरा तो कोई दिखाई नहीं देता जिसकी इतने डॉलर अदा कर खरीदने की औकात हो!! गूगल के हाल भी कोई बहुत ज़्यादा अच्छे नहीं हैं, इसलिए हो सकता है कि वो याहू की खरीद में उस कारण या किसी अन्य कारण रुचि न दिखाए। परन्तु यदि माइक्रोसॉफ़्ट याहू को खरीदने में सफ़ल होता है तो यह माइक्रोसॉफ़्ट के लिए अभी तक का सबसे बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकता है क्योंकि माइक्रोसॉफ़्ट की भी इंटरनेट के बाज़ार में बैन्ड बजी हुई है और वह येन-केन-प्रकारेण अरबों डॉलर के इस केक में अपना बड़ा सा हिस्सा पाने की यथा संभव कोशिश में है। तकनीकी के बाज़ार में भी यह अभी तक की सबसे बड़ी बिक्री होगी, इससे पहले अभी तक की सबसे बड़ी बिक्री सन्‌ 2002 में हुई थी जब हेवलेट्ट पैकर्ड ने कंप्यूटर बनाने वाली कंपनी कॉम्पैक को 25 अरब अमेरिकी डॉलर में खरीदा था।

तो अब देखना यह है कि याहू इस संकट से पहले की भांति येन-केन-प्रकारेण बच निकलता है या इस बार वाकई कोई उसकी गिल्ली खरीद लेगा। ;)

→ 4 CommentsCategories: here and there · internet · technology · इंटरनेट · इधर उधर की · टेक्नॉलोजी
Tagged: , , , , , , , , , , ,

लो अपनी पोस्ट भी चोरी हो गई…..

January 31, 2008 · 10 Comments

कई जगह पढ़ा है और कई लोगों ने बताया है कि यदि आपका माल चोरी होता है तो इसका अर्थ है कि वह अच्छा है क्योंकि घटिया चीज़ को कोई क्यों चुराएगा!! भूतकाल में मेरी फोटुओं की चोरी ने इस बात की ओर तो मेरा ध्यान कर ही दिया कि मैं ठीक-ठाक फोटो लेता हूँ तभी किसी ने चोरी के लायक समझा। अब जब मेरी पोस्ट भी चोरी हो गई तो पता चलता है कि अपन लिखते भी ठीक-ठाक ही हैं तभी किसी ने चोरी की। पिछले वर्ष 2007 में 13 मार्च को मैंने एक पोस्ट छापी थी, समाज के सर्वज्ञ, जिसको कि अजमेरा इंस्टीट्यूट ऑफ़ मीडिया स्टडीज़ नाम के ब्लॉग पर चोरी करके यहाँ छापा गया है

चोरी करने वाला भी कोई ऐरा गैरा नहीं है। चोरी करने वाले साहब अपने को रवि बहार कहते हैं और पेशे से अपने को कॉलेज अध्यापक, पत्रकार और लेखक बताते हैं, यानि कि ऊँचे दर्जे के चोर हैं। :roll:

रवि बहार - एक चोर

जब एक अध्यापक जो कि पत्रकार भी हो और लेखक भी तथा वह आपका माल चोरी करे तो आपका सीना गर्व से नहीं फूलेगा? मेरा सीना गर्व से तो नहीं फूला खैर लेकिन तरस अवश्य आया इन साहब पर। लगता है कि ये लेखक चोरी करके ही बने हैं, दूसरों की रचनाओं को बिना अनुमति के चुरा कर अपने नाम से छापने वाले लेखक हैं!! :roll: और अपने विद्यार्थियों को क्या पढ़ाते होंगे? शायद दूसरों का माल कैसे चोरी किया जाता है और उसको कैसे अपने नाम से आगे बेचा जाता है!! तौबा…..!!

आप भी देख लें कि इस हाई-फाई चोर लेखक ने कहीं आपकी पोस्ट आदि भी तो नहीं चुरा ली!!

अपडेट (2008-02-04): अभी देखने पर पता चला है कि इन साहब ने अपने उक्त ब्लॉग पर चोरी कर छापी गई मेरी पोस्ट तो हटा ही दी है और साथ ही उस ब्लॉग पर से तमाम अन्य पोस्ट भी हटा दी हैं।

→ 10 CommentsCategories: blogging · ब्लॉगिंग
Tagged: , , , , , , ,

लीगल डोमेन माफ़िया

January 29, 2008 · 11 Comments

आपने काला-बाज़ार के बारे में तो सुना ही होगा कि कैसे किसी वस्तु की माँग बढ़ती दिखती है तो साहूकार अपने गोदाम भर लेते हैं और जब बाज़ार में माल मिलना बंद हो जाता है तो वे मन-माफ़िक दामों पर बेचते हैं। साथ ही दो नंबर वाले प्रॉपर्टी डीलरों के बारे में भी सुना होगा जो कि उस प्रॉपर्टी पर आपसे पहले कब्ज़ा कर लेते हैं जिस पर आपकी निगाह होती है और फिर आपको ऊँचे दाम पर बेचने की पेशकश करते हैं।

इंटरनेट की वर्चुअल दुनिया में एक ही प्रकार की प्रापर्टी होगी है, डोमेन नाम। यह ठीक वैसे ही है जैसे आपने किसी शहर-गाँव में कोई ज़मीन खरीद ली या लंबी अवधि के लिए किराए पर ले ली। डोमेन नाम को आप खरीदते नहीं हैं वरन्‌ सालाना लीज़(lease) पर लेते हैं जिसके तहत आप प्रति वर्ष उसका भाड़ा चुकाते हैं ताकि वह डोमेन आपके पास बना रहे और आप उसका जैसे चाहें वैसे प्रयोग करते रहें। डोमेन नाम एक भू-खंड की तरह है और जो आप उस पर वेबसाइट बनाते हैं वह किसी इमारत की तरह जिसमें चाहे तो आप स्वयं रहें या उस इमारत को होटल या ऑफिस आदि में बदल उससे नोट कमाएँ।

ज़मीन खरीदने से पहले आप देखते हैं कि आपको कहाँ ज़मीन लेनी है, कौन सी जगह लेना सही रहेगा, कहाँ सस्ती और अच्छी मिलेगी। और फिर आप या तो सीधे ज़मीन के मालिक से खरीदते/किराए पर लेते हैं अथवा किसी दलाल के द्वारा। डोमेन लेने में भी कुछ-२ ऐसा ही होता है, आप ढूँढते हैं कि आपके मनपसंद नाम वाला डोमेन उपलब्ध है कि नहीं; यदि उपलब्ध है तो आप किसी एक दलाल(रजिस्ट्रार - registrar) से उसको किराए पर ले लेते हैं और यदि डोमेन उपलब्ध नहीं तो उसके मौजूदा मालिक से संपर्क कर उसको पाने का प्रयास करते हैं। यहाँ तक तो ठीक है, यह सामान्य प्रक्रिया है। यदि आपका वांछित डोमेन उपलब्ध है तो आप किसी भी रजिस्ट्रार से उसको ले सकते हैं और कोई बंदिश नहीं कि आपने जिस रजिस्ट्रार के द्वारा डोमेन ढूँढा उसी से आपको लेना होगा, परन्तु यदि जिस रजिस्ट्रार के द्वारा आपने डोमेन ढूँढा वह आपके ढूँढते ही उस डोमेन पर कब्ज़ा कर ले तो आपके पास फिर सिर्फ़ उसी रजिस्ट्रार से डोमेन लेने का विकल्प होगा। और इस बात की कोई गारंटी नहीं कि आपने यदि तुरंत डोमेन नहीं लिया और एकाध दिन बाद लेने आए तो वह रजिस्ट्रार उस डोमेन के आपसे ज़्यादा पैसे नहीं माँगेगा।

डोमेन नाम बेचने के धंधे में वैसे भी रजिस्ट्रारों यानि कि दलालों की उतनी कमाई नहीं रह गई है जितनी पहले हुआ करती थी। आज बहुत की कम मार्जिन पर रजिस्ट्रार डोमेन आगे ग्राहकों को दे रहे हैं क्योंकि गला-काट प्रतियोगिता है बाज़ार में। इसी के चलते ऐसे बहुत से रजिस्ट्रार हैं जो पहले बाज़ार के बड़े खिलाड़ी होते थे और आज जिनको पूछने वाला कोई नहीं क्योंकि उन्होंने अपने को बाज़ार में बनाए रखने के लिए अपने दाम कम नहीं करे हैं और पहले जैसे ही ऊँचे दाम बनाए रखे हैं। ऐसे ही गिरते रजिस्ट्रारों में से एक है नेटवर्क सॉल्यूशन्स जो कि शुरुआती दिनों में बहुत बड़ा फन्ने खाँ हुआ करता था लेकिन आज इसको कोई नहीं पूछता। क्यों? अरे जब दुनिया भर के रजिस्ट्रार पाँच-पाँच सौ रूपए में डोमेन दे रहे हैं तो कोई इससे तीन गुणा से अधिक दाम पर क्यों लेगा? आप कहेंगे कि सर्विस क्वालिटी तो जनाब इससे काफ़ी बेहतर सर्विस देने वाले रजिस्ट्रार इसके दाम के एक-तिहाई में डोमेन दे रहे हैं!! यह रजिस्ट्रार बाकी रजिस्ट्रारों की तरह आपको पाँच सौ रूपए प्रति वर्ष का भाव तब देगा जब आप इससे सौ वर्षों का अनुबंध करेंगे और पूरा भुगतान एडवांस में करेंगे। यदि आंकड़े कुछ कहते हैं तो यह देखिए:

निम्न है सूचि जो दर्शाती है अभी तक सबसे अधिक डोमेन बेचने वाले रजिस्ट्रार

इसमें नेटवर्क सॉल्यूशन्स तीसरे नंबर पर सिर्फ़ इसलिए बना हुआ है क्योंकि यह सबसे पुराने रजिस्ट्रारों में से एक है और शुरुआती दिनों में इसके द्वारा बहुतों ने डोमेन लिए थे। लेकिन अन्य कुछ आंकड़े तस्वीर साफ़ करेंगे।

निम्न सूचि दर्शाती है आज के समय के तेज़ी से बढ़ते शीर्ष 15 रजिस्ट्रार और उनके लाभ और हानि को

अब यह सूचि में आपको गोडैडी और इनोम रजिस्ट्रार शीर्ष पर ही दिखेंगे क्योंकि ये बाज़ार के साथ चलते हैं और सेवा की गुणवत्ता के साथ-२ अपने दाम भी बाज़ार के अनुसार रखते हैं इसलिए लोग इनसे लेना पसंद करते हैं। गोडैडी सीधे ग्राहक को बेचने में यकीन रखता है जबकि इनोम से आप सीधे खरीदें तो महँगा पड़ेगा लेकिन इसके विक्रेता दुनिया भर में हैं जिनसे आप काफ़ी सस्ते में खरीद सकते हैं। नेटवर्क सॉल्यूशन्स की खामी यह है कि उससे सीधी खरीद तो महँगी है ही, उसके विक्रेता भी उतने ही महँगे हैं क्योंकि वह विक्रेताओं को इतना मार्जिन नहीं देता कि विक्रेता खुद उसके रेट से कम में बेच सकें। अब यदि नेटवर्क सॉल्यूशन्स का हाल इस सूचि में देखना है तो वह निम्न है।

853वें स्थान पर मौजूद नेटवर्क सॉल्यूशन्स घाटे में है, यानि कि बाज़ार में उसका हिस्सा कम होता जा रहा है और उसके द्वारा रजिस्टर हुए डोमेन संख्या में कम होते जा रहे हैं। अधिक जानकारी हमको निम्न सूचि देती है।

इस आखिरी सूचि से अंदाज़ा होता है इस गिरते हुए रजिस्ट्रार के हाल का।

तो अब आप सोचेंगे कि यहाँ तक तो ठीक है, ऊपर-नीचे तो धंधे में लगा ही रहता है लेकिन इसका काला-बाज़ारी आदि से क्या लेना देना जिसका ज़िक्र मैंने पोस्ट के शुरु में किया था!! है, उसका ही संबन्ध लगता है अपने को तो। हर आईकान(ICANN) द्वारा सर्टिफाईड रजिस्ट्रार किसी भी डोमेन नाम को फोकट में अपने पास 3-4 दिन रख सकता है। वह चाहे तो इस अवधि के पश्चात डोमेन पर अपना हक छोड़ सकता है और इस तरह उसको कोई पैसे नहीं देने होंगे परन्तु यदि इस अवधि के बाद भी वह डोमेन नहीं छोड़ता तो डोमेन रजिस्ट्री को उसे उस डोमेन का शुल्क देना होगा। तो नेटवर्क सॉल्यूशन्स गेम यह खेल रहा है कि यदि आप कोई डोमेन नाम उसके पास ढूँढते हैं तो यदि वह उपलब्ध है तो नेटवर्क सॉल्यूशन्स उसको पकड़ लेता है जिस स्थिति में यदि आपको ढूँढे हुए नामों में से कोई नाम चाहिए तो वह आपको नेटवर्क सॉल्यूशन्स से ही लेना होगा और अन्य किसी रजिस्ट्रार से नहीं ले सकते!! यह नाम नेटवर्क सॉल्यूशन्स पूरे चार दिन तक पकड़ के बैठेगा और उसके बाद छोड़ देगा। और यदि आप एकाध दिन बाद ढूँढे गए नामों में से किसी को रजिस्टर कराने पहुँचते हैं तो यह इस बात का संकेत है कि वह डोमेन आपके लिए महत्वपूर्ण है, इसलिए नेटवर्क सॉल्यूशन्स उसके ऊँचे दाम भी माँग सकता है। साथ ही इस बात की कोई गारंटी नहीं कि वह इस तरह पकड़े गए नामों की सूचि आदि आगे किसी को नहीं बेच रहा।

डोमेन नामों की स्पेक्यूलेशन आदि और पकड़ के खरीद-फरोख्त करोड़ों रुपए सालाना का बाज़ार है। यह ठीक वैसा है जैसे भूमि व्यापार या कह लीजिए शेयर बाज़ार जहाँ आप अंदाज़ा लगाते हैं कि कौन सी जगह पर कौन सा भूमिखंड अथवा कौन सी कंपनी का शेयर ऊँचा उठेगा और कितना उठेगा और उसके अनुसार आप खरीद-फरोख्त करते हैं ताकि दाम ऊँचा होने पर बेच सकें। डोमेन का व्यापार भी कुछ ऐसा ही है, डोमेन व्यापारी दम-खम रखने वाले अच्छे नामों को खोजते हैं और उनको रजिस्टर कर लेते हैं और फिर उनको ऊँचे दामों में बेचते हैं और जब-तक अपने पास रखते हैं तब तक उनसे विज्ञापनों आदि द्वारा कमाई भी करते हैं।

अभी तक नेटवर्क सॉल्यूशन्स पर सिर्फ़ शक जा रहा था कि वह अपने यहाँ ढूँढे गए नामों को पकड़ के बैठ रहा है लेकिन अब साफ़ हो गया है जब वह सीधे ही सीना ठोक के हामी भरता है कि वह ऐसा कर रहा है (अंग्रेज़ी में खबर यहाँ पढ़ें)। इस तरह 4-5 दिन के लिए डोमेन पर कब्ज़ा करने के बारे में आईकान(ICANN) की फिलहाल कोई स्पष्ट नीति नहीं है जो इस रजिस्ट्रार को या ऐसे किसी अन्य रजिस्ट्रार को रोक सके। कहने को तो इस विषय पर नेटवर्क सॉल्यूशन्स के नीति बनाने वाली समिति के उप-अधिपति(Vice President of Policy), जॉनथन नेवेट्ट, ने कहा कि उनका इरादा सिर्फ़ इतना है कि यदि कोई ग्राहक अपने लिए डोमेन खोजता है और एकाध दिन बाद आकर उसको पाने की कोशिश करे तो उसको वह प्राप्त हो सके और कोई अन्य उसको न ले उड़े (अंग्रेज़ी में खबर यहाँ पढ़ें) लेकिन यह महज़ एक बकवास के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। डोमेन रजिस्ट्रेशन पहले आया पहले ले गया (First Come First Served) की तर्ज पर होता है, यदि आपके किसी ट्रेडमार्क का डोमेन नहीं है तो आपके खोजने भर से ही आपका उस पर हक नहीं हो जाता कि कोई और न ले सके। और नेटवर्क सॉलूशन्स की ओर से यह बकवास ही है कि वे अपने ग्राहक के लिए डोमेन सुरक्षित कर रहे हैं ताकि दोबारा आने पर उनको मिल सके, क्योंकि कोई गारंटी नहीं है कि कोई अन्य व्यक्ति आकर उनसे डोमेन नहीं ले जाएगा!! वे सिर्फ़ अनैतिक तरीके से अपनी दलाली सुरक्षित करने का प्रयास कर रहे हैं; डोमेन चाहे कोई ले जाए लेकिन उन्हीं से लेकर जाए और रोकड़ा उनकी जेब में ही आए!!

यह तो सीधे-२ अपनी ताकत का गलत लाभ उठा बाज़ार में अपनी दलाली जबरन हासिल करने का एक टुच्चा तरीका है जो कि एक तरह से इस ओर लोगों का विश्वास मज़बूत ही करता है कि नेटवर्क सॉल्यूशन्स वाकई तेज़ी से नीचे जा रहा है और इसी के चलते तरह-२ के हथकंडे अपनाने से परहेज़ नहीं करेगा। साथ ही वह ग्राहकों पर से अपना विश्वास समाप्त कर रहा है, इस बात की क्या गारंटी रह जाएगी कि कल को वह किसी के डोमेन में घपला नहीं कर देगा? आईकान(ICANN) की नीतियों में बहुत लफ़ड़े हैं बहुत झोल हैं और कोई भी समझदार उनके दाएँ-बाएँ जाकर अपना उल्लू सीधा कर सकता है। और जो एक बार गलत कार्य कर सकता है वह पुनः भी कर सकता है, नेटवर्क सॉल्यूशन्स ने यह तो दिखा ही दिया कि वह एक गलत कार्य कर रहा है और सीना ठोक के कर रहा है क्योंकि कानूनी रूप से उसको फिलहाल कोई रोक नहीं सकता!!

→ 11 CommentsCategories: domains · here and there · internet · technology · इंटरनेट · इधर उधर की · टेक्नॉलोजी · डोमेन
Tagged: , , , , , ,