टीम इंडिया ने आख़िर वह कर दिख़ाया जिसकी मुझे पूरी उम्मीद थी, वो आख़िरकार दक्षिण अफ़्रीका से हार गई। और हारी भी तो कैसे? 10 विकेट से!! पहले तो स्कोर नहीं बनाया, केवल 188 रन पर सिमट गए और उसके बाद तो कमाल ही हो गया, दक्षिण अफ़्रीका ने बिना एक भी विकेट गंवाए भारतीय रणबाँकुरों का मुँह काला कर दिया!! यानि कि बल्लेबाज़ नाकाम, गेंदबाज़ नाकाम और क्षेत्ररक्षण में तो टीम इंडिया की कोई सानी है ही नहीं!!
तो अब तक जो जिह्वाएँ स्टार कोच और अँबुजा सीमेंट के मज़बूत जोड़ से बने ” द वॉल ” की मज़बूत कप्तानी पर पुष्प वर्षा करते नहीं थक रहीं थी, क्या अब इस शर्मनाक हार के बाद उन्हीं जिह्वाओं से प्रतिवाद का स्वर निकलेगा?
नहीं, मैं नहीं समझता कि ऐसा होगा, होना भी नहीं चाहिए, पर लोगों में कम से कम इतनी अक्ल तो आनी चाहिए कि कोई एक ही रात में तोप नहीं हो जाता और हमारे विश्व-कप विजेता कप्तान कपिल देव भी यही कहते हैं, कि नए कोच और नए कप्तान की योग्यता को परख़नें में जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए, वे कितने काबिल हैं यह कुछ समय बाद ही पता चल पाएगा।
मेरे अनुसार भारतीय ख़िलाड़ियों को अब अपना ध्यान अठ्ठाईस(2
तारीख़ को मुम्बई में होने वाले आख़िरी मुकाबले पर देते हुए कमर कस लेनी चाहिए, श्रृंख़ला तो अब जीत नहीं सकते, कम से कम हारना तो नहीं चाहिए। जहाँ तक मेरा अनुमान है, मुम्बई की पिच बल्लेबाज़ों के पक्ष में होगी, तो इस लिए आवश्यक हो जाता है कि टीम इंडिया जमकर अफ़्रीकी गेंदबाज़ों की पिटाई करे और एक अच्छा स्कोर खड़ा करे जिसका हमारे गेंदबाज़ ठीक से बचाव कर सकें और श्रृंख़ला को बराबर कर दें। जाहिर सी बात है कि मेरे कहने का अर्थ है कि भारतीय रणबाँकुरों को पहले बल्लेबाज़ी करनी चाहिए और जहाँ तक मैं समझता हूँ, दक्षिण अफ़्रीकी कप्तान स्मिथ कोई मूर्ख़ नहीं है, तो आवश्यक है कि द्रविड़ टॉस भी जीतें, लेकिन इस पर उनका कोई ज़ोर नहीं, तो इस लिए अपनी किस्मत पर भरोसा रख़ें और जहाँ ज़ोर चल सकता है(बल्लेबाज़ी, गेंदबाज़ी और क्षेत्ररक्षण) वहाँ ज़ोर चलाएँ।


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