Entries from December 2005
अंधेर नगरी चौपट राजा, बजा रहा है सबका बाजा!! आतंकवाद का है राज, लोगों का जीना है दुश्वार। कश्मीर में तो आतंकवाद का राज है ही, पंजाब में भी कोई नई बात नहीं है, पूर्वी राज्यों में तो अंधेर है ही, लेकिन इतने पर ही बस कहाँ, अब तो बंगलूर जैसा आधुनिक शहर भी अछूता नहीं रहा!! बंगलूर में हुए आतंक के नंगे नाच का जिम्मेदार चाहे जो भी हो, प्रश्न है कि उन्हे पकड़ने के लिए और सज़ा दिलाने के लिए हमारा उत्कृष्ट प्रशासन क्या कर रहा है? और उससे भी बड़ा प्रश्न है कि क्या हमारी सरकार हमारी रक्षा करने में समर्थ है कि नहीं?
और ये प्रश्न इसलिए उठता है क्योकि यह बात आम हो चुकी है कि सरकार को बंगलूर पर आतंकवादी हमले की खुफ़िया विभाग से पहले ही चेतावनी मिल चुकी थी, पर नतीजा वही रहा जो कि चेतावनी न मिलने पर होता। चेतावनी मिलना तो अलग बात है, सड़ी हुई नाकाम सुरक्षा व्यवस्था की पोल तो वैसे भी खुलनी ही थी, क्योंकि अधिकतर सुरक्षा व्यवस्था तो मंत्रियों आदि के लिए खर्च हो जाती है, जनता का क्या है, उसकी सुरक्षा ज़रूरी थोड़े ही है। बंगलूर में हो रही “ऑपरेशनल रिसर्च सोसायटी ऑफ इंडिया” की बैठक में भारत के कुछ सर्वश्रेष्ठ बुद्धिजीवी भाग ले रहे थे, लेकिन शायद प्रशासन की निगाह में उनके जीवन की कीमत एक पान के मूल्य से अधिक न थी।
बंगलूर, जो कि इस समय भारतीय टेक्नॉलोजी का केन्द्र है, वहाँ पर तो सुरक्षा व्यवस्था भी अधिक और आधुनिक होनी चाहिए, पर ऐसी आशा करना भी “आशा” का अपमान करना है। अब समय बदल रहा है, राजनीतिक नेताओं की जगह अब बड़े व्यवसायी, वैज्ञानिक और टेक्नॉलोजी कम्पनीयों के मालिक-बड़े अधिकारी बनेंगे क्योंकि मौजूदादौर में ये वो लोग हैं जिनके न होने पर अर्थव्यवस्था डगमगा सकती है। लेकिन हमारे नेता तो फ़िर कुछ अलग ही किस्म के जीव होते जो कि सदैव ही यह समझेंगे कि वे ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं, स्वयंमेव जयते!!
अब तो यही हाल है भइये कि सब कुछ राम भरोसे चल रहा है, जो बच गया सो बच गया, जो लुढ़क गया सो लुढ़क गया। सरकार तो निकम्मी है जो कि कुछ कर तो नहीं सकती, सिर्फ़ बकवास कर सकती है और बड़बोलेपन की मारी है!!
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जी हाँ, आज जब मैंने साकेत के ब्लॉग पर यह घोषणा देखी तो मुस्कुराए बिना नहीं रह सका। नए साल 2006 की पहली दिल्ली ब्लॉगर्स भेंट महीने के पहले रविवार की जगह 2 जनवरी(सोमवार) को आयोजित की जाएगी। स्थान होगा नई दिल्ली स्थित कनॉट प्लेस का क़ाफ़ी पब बरिस्ता और दिल्ली के ब्लॉगर्स की इस पाँचवीं मासिक भेंट के आयोजन का जिम्मा संभाला है शिवम विज ने। मुझे इसके बारे में एक-आध महीने पहले ही पता चला था परन्तु मैं कुछ कारणों की वजह से भाग नहीं ले पाया था, पर इस बार मैं अवश्य जा रहा हूँ।
यदि आप 2 जनवरी 2006 को दिल्ली में होंगे तो आपका हार्दिक स्वागत है, भेंट सांय छह बजे से शुरु होगी और यदि आप आने का कष्ट कर पाए तो आप हकदार होंगे इंडिया-अनकट ख्याति प्राप्त भारतीय ब्लॉगर अमित वर्मा से एक यादगार भेंट के!!
और यदि आप किसी और ब्लॉगर बंधु को जानते हों तो उन्हें भी साथ लाना न भूलें।
तो याद रहे, 2 जनवरी 2006, कनॉट प्लेस स्थित बरिस्ता, सांय 6 बजे।
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क्या हमारा भारत एक लोकतंत्र है? कहने को तो भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश भी है परन्तु यहाँ रहने वाले जानते हैं कि यहाँ कितनी धर्मनिरपेक्षता है। परन्तु अब तो प्रश्न भारत के तानाशाही होने या न होने का है, क्योंकि इस प्रश्न के उत्तर से सिद्ध होगा कि यहाँ के नागरिकों को अपना जीवन अपने ढंग से जीने की स्वतंत्रता है कि नहीं। अभी तक हमारे जीवन में बहुत सी ऐसी घटनाएँ घटी होंगी जिससे हमारा लोकतंत्र पर विश्वास डगमगाया होगा या लगभग छूट ही गया होगा, पर हम किसी तरह उस स्वर्ण डोरी को पकड़े रहे। परन्तु हर बात की, विश्वास की, एक सीमा होती है।
क्या हम वाकई स्वतंत्र हैं?
शायद नहीं… !! इस बात को मज़बूत करता है मेरठ पुलिस का शर्मनाक ऑपरेशन मजनू जिसके तहत पुलिसकर्मियों ने मेरठ के गांधी पार्क में घूम रहे युवा जोड़ों की जमकर पिटाई की। वे जोड़े न तो कोई छेड़खानी कर रहे थे न कोई अश्लील हरकत, उनका दोष सिर्फ़ इतना था कि विपरीत लिंग के जोड़ों का साथ घूमना फ़िरना हमारे समाज के तथाकथित ठेकेदारों की नज़र में अनैतिक है!!
और पुलिस ने समाज की इस कथित अनैतिकता को सुधारने की ठानी जबकी चोर लुटेरे जिन्हें पकड़ना पुलिस का कर्तव्य है, छुट्टे सांडों की तरह घूमते हैं(क्योंकि वे हर सप्ताह/माह नज़राना पहुँचाते हैं)।
और तो और, पुलिसवालों ने टीवी चैनलों को इस अपनी इस परपीड़क क्रिया को प्रसारित करने के लिए निमंत्रण भी दे डाला। तो बजरंग दल, भवानी सेना, विश्व-हिन्दु-परिशद आदि नैतिक ठेकेदारों की कमी थी कि अब पुलिस वालों ने भी यह टूटी बीन फ़ूंकनी शुरु कर दी? क्या स्वतंत्रता नाम की कोई चीज़ है कि नहीं? क्या भारतीय संविधान में यह लिखा है कि एक लड़का और लड़की का साथ में घूमना फ़िरना अपराध है? यदि नहीं तो फ़िर उन पुलिसकर्मियों ने उन जोड़ों को पीट कर एक अपराध किया है जिसके लिए उन्हें दण्ड मिलना चाहिए(जो कि नहीं मिलेगा, भारतीय कानून ज़िन्दाबाद)। पर ऐसी कोई आशा रखना बेकार है, क्योंकि जाँच होगी, उसके बाद रिपोर्ट आएगी, फ़िर सरकारी मशीनरी में कोई हरकत होगी। और मज़ेदार बात यह है कि जैसे ही इस घटना का समाचार फ़ैला, मानवाधिकार और महिला अधिकार संगठन अपनी अपनी रोटियाँ सेंकने चले आए!!
यदि इतने पर ही बहुत होता तो गनीमत थी, पर इससे तो आग में घी पड़ गया। इस ऑपरेशन के कुछ दिन बाद हमारे समाज के नैतिक ठेकेदार सड़क पर पुलिस के समर्थन में उतर आए और उन्होने गांधी पार्क में साथ घूम रहे दो जोड़ों की पिटाई कर उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया। इन ठेकेदारों में बजरंग दल, भवानी सेना, विश्व-हिन्दु-परिशद और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता शामिल थे। इन तथाकथित नैतिकता के ठेकेदारों का कहना है कि टीवी चैनल बेवजह इस मामले को तूल दे रहे हैं क्योकि शरारती तत्वों को सबक सिखाने के लिए पुलिस इस तरह की शर्मनाक हरकतें करती रहती है!! तो इसका मतलब यह हुआ कि लड़का-लड़की का साथ घूमना एक अनैतिक और शर्मनाक बात है? नैतिकता का ढोल पीटने वालों के समर्थन में खड़े होने वाले शायद यह न जानते होंगे कि यह ठेकेदार शायद ढके छुपे में स्वयँ भी अश्लील साहित्य और फ़िल्मों का रस लेते होंगे जोकि सर्वदा उचित है क्योंकि वह ढके छुपे हो रहा है और वैसे भी चोर वही होता है जो पकड़ा जाए, जो न पकड़ा गया वह चोर कहाँ हुआ। और यदि अपने को सीना ठोक कर हिन्दु कहने वाले लोग ऐसी सोच रखते हैं तो क्यों पूजते हैं वे देवकी नंदन श्री कृष्ण को जो कि न जाने कितनी गोपियों संग अकेले घूमा फ़िरा करते थे और रास रचाते थे? क्यों राधा-कृष्ण की जोड़ी को पूजा और अमर प्रेम की मिसाल माना जाता है जबकि दोनो का कभी विवाह नहीं हुआ और हमारे नैतिक ठेकेदारों के सिद्धांतों के अनुसार जिनका प्रेम अनैतिक है, पापी है!! और अजंता-ऐल्लोरा की गुफ़ाओं पर नक्काशी तथा कामसूत्र की रचना तो शायद परग्रही कर गए थे!!
क्या हम मध्यकालीन युग में जी रहे हैं या किसी इस्लामी देश में? क्योंकि लड़कियों और औरतों को ढक छुपा कर रख़ने की प्रथा तो वहाँ की है और वे ही लड़का लड़की का साथ घूमना अनैतिक मानते है!!
यदि उन्नति की ओर बढना है तो हमारे समाज को इस संकीर्ण और रूढिवादी सोच को त्यागना होगा!! परन्तु यह सब कहने पढने सुनने से कुछ नहीं होने वाला, क्योंकि इन नैतिकता के ठेकेदारों को अपनी छाती पर मूँग दलने के लिए हमने स्वयँ बिठाया है। ये हमारे कमज़ोर, हीन और रूढिवादी समाज की ही उपज हैं। यदि लोगों में वाकई इस जघन्य ऑपरेशन के प्रति आक्रोश होता, तो उन्होने उन पुलिसकर्मियों और नैतिकता के ठेकेदारों की जमकर पिटाई कर दी होती जिन्होने अपनी संकीर्ण सोचों को दूसरों पर लादने का कष्ट किया था। यदि ऐसा हो जाता तो कदाचित फ़िर कोई नैतिकता की ऐसी ठेकेदारी करने से पहले हज़ार बार सोचता। पर ऐसा हुआ नहीं क्योंकि हर कोई यह सोचता है कि वह लफ़ड़े में क्यों पड़े(सही बात है, आप भी ऐसा सोचते हैं और मैं भी)।
फ़िर भी, ऐसा कभी न कभी तो होगा, इसी सोच के साथ हम जिए जा रहें हैं!!
स्वयंमेव जयते…
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हाँ, आपने सही पढा, मैंने ‘सत्यमेव जयते’ नहीं बल्कि ‘स्वयमेव जयते’ कहा। और क्या अनुचित कहा? और यह कोई नई बात भी नहीं है, सदियों से हम देखते आ रहे हैं कि हमारे तथाकथित नेता अपने निजी स्वार्थ को जनहित से उपर मानते और निभाते आ रहे हैं। चाहे वे किसी राजनैतिक दल के नेता हों या किसी राज्य-रियासत के राजा महाराजा या नवाब, निजी स्वार्थ सदैव सर्वोपरि रहा है। प्रश्न उठता है ‘क्यों’। क्यों वे लोग भूल जाते (थे)हैं कि नेता या राजा ईश्वर का कोई रूप नहीं होता, वह जनसमुदाय का प्रतिनिधी होता है जिसका पहला कर्तव्य उन लोगों की ओर होता है जिनका वह प्रतिनिधित्व कर रहा होता है। परन्तु यह सब किताबी बातें हैं, उन लोगों के दृष्टिकोण के अनुसार वे विशेषाधिकृत होते हैं जिन्हें अपनी इच्छानुसार कुछ भी करने की स्वतंत्रता प्राप्त होती है। और साथ ही सदैव ही से इन लोगों को यह डर सताता रहा है कि कहीं कोई इनका सिंहासन या कुर्सी न छीन ले क्योंकि इनके अंतरमन में इन्हें इस बात का ज्ञान हमेशा रहा है कि वे गलत हैं। अब चाहे वह औरंगज़ेब हो या बहादुरशाह जफ़र, गांधी हो या नेहरू, लालू यादव हो या आज का कोई और नेता।
कोई व्यक्ति नीचता की कितनी ही हदें पार कर ले, उसके अंतरमन में कहीं न कहीं, किसी न किसी कोने में एक ऐसा दीप अवश्य प्रकाशमान होता है कि उसने जो कि उसके द्वारा किए गए सभी सही और गलत कार्यों का हिसाब रख़ता है और व्यक्ति को उसका निरंतर अहसास दिलाता रहता है। अब यह बात अलग है कि व्यक्ति का चरित्र जितना मटमैला होता है, उस दीप का प्रकाश उस तक उतनी ही कठिनता और विलंब से पहुँचता है, और साथ ही व्यक्ति का अपने पर जितना अधिक नियंत्रण होता है उतना ही वह उस प्रकाश को अपने से दूर रख़ने में सफल रह पाता है।
अब जिस तरह सिक्के के दोनो पहलू एक जैसे नहीं होते, उसी प्रकार ये नेता और उनके कर्म भी समान नहीं होते। कुछ थोड़ा नीचे गिरते हैं, कुछ ज्यादा नीचे गिरते हैं और कुछ तो इतना नीचे गिर जाते हैं कि उनका उठना ही नामुमकिन हो जाता है।
लेकिन…..
हाँ, यह ‘लेकिन’ अत्यधिक महत्वपूर्ण है। किसी की निंदा करना बहुत आसान है, और ऐसा करने से कोई भी नहीं चूकता, मैं भी नहीं। परन्तु सत्य यह है कि मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है कि वह पहले अपना हित देख़ता है और फ़िर कुछ और। नेता भी साधारण इंसान ही होते हैं, उनमें भी वही खामियाँ होती हैं जो बाकी इंसानों में होती हैं, और कदाचित कुछ अधिक मात्रा में होती हैं क्योंकि उनके पास ख़ोने के लिए अधिक होता है।
तो हम कैसे किसी नेता को किसी गलत कार्य के लिए दोषी ठहरा सकते हैं जब हमने स्वयं उस गलत कार्य के विरोध में या उसे सुधारने के लिए कुछ नहीं करा हो। एक पुरानी कहावत है कि चोर को जो चोरी करता देख़ कर भी चुप रह जाता है, वह भी उस चोरी में बराबर का भागीदार होता है। तो यदि औरंगज़ेब ने कत्लेआम मचा के तख़्त पे कब्ज़ा कर लिया था तो जिन्होने उसका विरोध किए बगैर उसे अपना बादशाह मान लिया, उन्हें उसकी निंदा करने का कोई अधिकार नहीं। गांधी के शहीदेआज़म भगत सिंह को न बचाने पर तथा स्वतंत्रता के समय भारत का बंटवारा होने पर किसी ने उनका विरोध न किया और उन्हें दोषी मानते हुए उसी क्षण दंड नहीं दिया, तो उनको भला बुरा क्यों कहा जाए? शायद आज मैं नत्थूराम गोडसे के दृष्टिकोण को समझ सकता हूँ कि उन्होंने गांधी की हत्या क्यों की। नेहरू का लोगों ने विरोध नहीं किया, उन्हें समझाने का प्रयत्न नहीं किया कि यदि वे कुर्सी का लोभ न करें तो बहुत बड़ा नरसंहार टल सकता है। जिन्नाह को किसी ने अक्ल से काम लेने को नहीं कहा, किसी ने मुस्लिम लीग के बड़े नेताओं को गोली से नहीं उड़ाया कि ऐसा अगर हो जाता तो हिन्दुस्तान में वो आग न लगती जिसने उसे दो में विभाजित कर दिया और आज भी जो सुलग रही है और न जाने कितने वर्षों तक सुलगती रहेगी। 1947 के दंगों के असली दोषी कौन हैं? पाकिस्तान निर्माण के सहायक कौन हैं? किसने इतनी लंबी दुश्मनी मोल ली जिसकी आग कई पीढियों का लहु पीने के उपरांत भी शांत नहीं हुई है? और आज के भ्रष्ट नेताओं और उनके भ्रष्टाचार का जिम्मेदार कौन है?
हम सभी इसके उत्तरदायी हैं क्योंकि हमने अपने स्वार्थों को अधिक महत्व देते हुए अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया। आम धारणा यह होती है कि यदि दूसरा अपने कर्तव्यों का पालन नहीं कर रहा तो हम क्यों करें और अकेला चना क्या भाड़ फ़ोड़ लेगा!! हम इन प्रश्नों के उत्तर जानते हैं पर स्वीकार नहीं कर पाते। जब हम अपने घर की ही गंदगी साफ़ नहीं कर सकते तो बाहर की कैसे करेंगे। और इस सबका एक ही कारण है, हमारा निजी स्वार्थ आड़े आ जाता है।
स्वयमेव जयते…..
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जीहाँ, यही रवैया है हमारे यहाँ के अधिकतर नवीं कक्षा के छात्रों का जब उन्हें यह निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी जाती है कि वे संस्कृत और हिन्दी में से किसी एक का चुनाव कर सकते हैं जिसकी परीक्षा वे दसवीं के बोर्ड में देना चाहते हैं। ज्यादातर छात्र बेहिचक संस्कृत का चुनाव करते हैं, सिर्फ़ इस लिए कि हिन्दी की तुलना में संस्कृत में अधिक अंक आ जाते हैं। क्या वाकई ऐसा है?
सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता, संस्कृत के अंक हिन्दी के अनुपात में ज्यादा आते हैं, पर क्या यह हिन्दी का दोष है? जहाँ तक मेरा मानना है, संस्कृत के मुकाबले हिन्दी अधिक सरल है, इसमें ज्यादा अंक मिलने चाहिए। लेकिन हमारे ख़ड़ूस हिन्दी के परीक्षक अत्यधिक कंजूसी से अंक देते हैं जबकी संस्कृत के परीक्षकों की उदारता तो अद्वितीय है जो की ऐसे उत्तरों को पूरे अंक देते हैं जो कि पुस्तक की हूबहू नकल होते हैं और जिसे परीक्षार्थी ने समझ कर नहीं वरन मात्र रट कर टीप दिया। व्याकरण में तो पूरे अंक मिलते ही हैं पर लेख़न आदि में भी? क्यों हिन्दी परीक्षक इस सरल भाषा को छात्रों के लिए एक दुःस्वप्न बना रहे हैं? हिन्दी की ऐसी दुर्दशा हो गई है कि हमारी मातृभाषा की औकात हमारे ही देश में एक गली के कुत्ते जैसी होती जा रही है। जब स्कूल में ही बच्चे हिन्दी के प्रति उदासीन हो जाएँगे तो बड़े होकर वे क्या करेंगे? क्या व्याजोक्ति है कि जिस भाषा को बच्चे दिन रात निरंतर बोलते हैं उसी को वे पढना नहीं चाहते!!
यदी बात यहाँ तक ही सीमित रहती तो अलग बात थी, पर हालात यह हैं कि देसी अंग्रेज़ों की ऐसी नई खेप तैयार हो रही है जिसे अपने हिन्दुस्तानी माता-पिता से हिन्दी में बात करने में तकलीफ़ होती है। और तो और, ये देसी अंग्रेज़ बाज़ार में अनपढ सब्ज़ी वाले तक से हिन्दी में बात करने में अपना अपमान समझते हैं और उससे अंग्रेज़ी में बात करते हैं!! जी हाँ, ऐसा हो रहा है और वह भी भारत की राजधानी नई दिल्ली में। अंग्रेज़ चले गए पर अपनी नाजायज़ औलादें छोड़ गए। और इन देसी अंग्रेज़ों की पैदावार के लिए जिम्मेदार कौन है? जाहिर है कि इसमें पहला दोष तो आधुनिक माता-पिताओं का है जो कि अपने बच्चों का हमारी संस्कृती से परिचय कराने की अपेक्षा उसका बलात्कार कर रहे हैं। दूसरे क्रमांक पर दोषी हैं तथाकथित अच्छे विद्यालयों में पढाने वाले असमाजिक शिक्षक जो कि विद्यार्थीयों को प्रेरित करते हैं कि वे विद्यालय के बाहर भी, अपने घर, बाज़ार इत्यादी में भी हिन्दी कि अपेक्षा अंग्रेज़ी का प्रयोग करें। उनका उद्देश्य छात्रों की अंग्रेज़ी बोलने की क्षमता को उन्नत करना होता है, जो कि अच्छी बात है पर इसका तात्पर्य क्या यह है कि हिन्दी का प्रयोग बिलकुल बन्द कर दिया जाए? अभ्यास के अभाव में तो बड़े से बड़े महारथी की योग्यता को जंग लग जाता है और हम तो उन कलियों की बात कर रहे है जिन्हे अभी ख़िलना है।
पर इसके अलावा, देसी अंग्रेज़ों की बहुतायत पैदावार स्वयंमेव हुई है, जिसे अंग्रेज़ी में सेल्फ़-डेवलपमेंट कहा जाता है!!
अब प्रश्न यह है कि यह पैदावार कैसे हुई और इसका कारण क्या है। तो श्रीमान, इसका करण है अहं। जी हाँ अहं, जो कि कम-ज्यादा हर किसी में होता है। यदि हम किसी को अपने आस पास अंग्रेज़ी में बात करता देख़ लेते हैं तो उसकी अंग्रेज़ी हमारे अहं की अग्नि में घी का कार्य करती है और उसे हमारी अंग्रेज़ी ही शीतलता प्रदान कर पाती है। कहने का तात्पर्य है कि अंग्रेज़ी में बोलना पढे-लिख़े होने के पहचानपत्र का कार्य करती है और सामने वाला प्रभावित भी होता है!!
यदी यह कहा जाए कि अंग्रेज़ी ने हमारी हिन्दी को भ्रष्ट कर दिया है तो अतिश्योक्ती न होगा। यदी मेरा ही उदाहरण लिया जाए तो मैं सिर्फ़ यही कहूँगा कि पहले मैं हिन्दी के किसी शब्द का अंग्रेज़ी में अनुवाद ढूँढता था और आजकल अंग्रेज़ी शब्दों का हिन्दी अनुवाद ढूँढता हूँ।
यदि हालात ऐसे ही रहे तो जल्द ही लोग अंग्रेज़ी की जगह हिन्दी बोलने की कोचिंग ले रहे होंगे!!
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