दुनिया मेरी नज़र से - world from my eyes!!

प्रवासी या परमेश्वर?

January 9, 2006 · 10 Comments

हैदराबाद में चल रहे चौथे प्रवासी भारतीय दिवस का समापन निकट है, और पधारे हुए प्रवासी भारतीयों का असंतोष साफ़ तौर पर देखा जा सकता है!! और ऐसा हो भी क्यों न, आखिर ये प्रवासी भारतीय हज़ारों डॉलर ख़र्च करके यहाँ हमारे ख़ड़ूस नेताओं का भाषण सुनने तो नहीं आए हैं!! न ही वे यहाँ कोई नाच-गाने के कार्यक्रम देखने आए हैं। जैसा कि एक असंतुष्ट वसुधा सोंधी, एच.आर.एच. होटल समूह की उपाध्यक्ष का कहना है

यहाँ कुछ खास नहीं हो रहा है, हैदराबाद में भारतीय प्रवासी दिवस का आयोजन करना ही नहीं चाहिए था। मेरे अनुसार प्रचालन तंत्र इत्यादि के लिहाज़ से मुम्बई इस आयोजन के लिए बेहतर होता। व्यापार और खरीददार-व्यापारी की भेंटवार्ता की जगह मैं तो लोगों को सिर्फ़ इधर उधर घूमता देख रही हूँ। यह सही है कि खूब काम करना चाहिए और खूब मज़ा करना चाहिए पर यहाँ यदि कुछ पूर्व निर्धारित नियोजन होना चाहिए था। शुक्र है कि मुझे अंतिम दिन को नहीं सहन करना पड़ेगा क्योंकि मैंने चले जाने का निर्णय लिया है। यह बहुत खेदजनक बात है कि लोग पैसे खर्च करके आते हैं और उन्हे ऐसा कुछ नहीं मिलता जिससे लगे कि उनके पैसे की वसूली हुई है!!

तो मैं वसुधा जी से कहना चाहूँगा कि यह कोई व्यापार सम्मेलन नहीं है जहाँ खरीददार-व्यापारी की बैठकें हों और व्यापारियों को कार्यनीतिक संबन्ध बनाने का अवसर मिले। एक अंतर्राष्ट्रीय होटल समूह की उपाध्यक्ष को यह पता होना चाहिए कि ऐसे सामाजिक सम्मेलनों के अनऔपचारिक वातावरण में बड़ी आसानी से दूसरे व्यापारियों से कार्यनीतिक संबन्ध बनाए जा सकते हैं, परन्तु उसके लिए बुद्धि का उपस्थित होना अति आवश्यक है!! ;) यदि वे भारतीय प्रवासी दिवस को एक व्यापार सम्मेलन समझ कर आई थी तो मैं केवल उनकी बुद्धि पर खेद ही प्रकट कर सकता हूँ, उनके असंतोष से मुझे कोई सहानुभूति नहीं है!! :roll:

एक और असंतुष्ट प्रवासी भारतीय, ताईवान के पवन कुमार कौशिक का कहना है

हम प्रवासी हैं और हम ही बोल नहीं सकते!! विदेशी कार्यभार मंत्रालय समझता है कि वे ईश्वर हैं। यदि वे हमसे प्रतिपुष्टि की माँग कर रहे हैं तो यह सातवें आश्चर्य जैसा है। ये मंत्री हमारे नौकर हैं और इन्हे आलोचना सही मायने में लेनी चाहिए!!

तो श्रीमान पवन से मैं यह कहना चाहूँगा कि पहली बात तो यह है कि सात आश्चर्य विश्व में पहले से ही हैं, शायद आप आठवें आश्चर्य की बात कर रहे थे!! ;) दूसरी बात, आप प्रवासी हैं, खुदा नहीं, आपको वीआईपी सेवा मिले, ऐसा क्योंकर हो? यदि आप बोलना चाहते हैं तो बोलिए, जब तक आप अपने विचार अधिकारियों तक नहीं पहुँचाएँगे तो कैसे उन्हें आपके विचारों का ज्ञान होगा, भई आखिर वे साधारण मनुष्य मात्र ही हैं जिनके पास टेलीपैथी जैसी शक्तियाँ नहीं हैं!! तीसरी बात, क्या आप किसी मंत्री के सामने उसके मुख पर यह कह सकते हैं कि वह आपका नौकर है? माना कि आप इस बारे में गलत नहीं हैं, मंत्री आदि सभी जनता के सेवक होते हैं, परन्तु आजकल इन अर्थों का कोई मूल्य नहीं है, यह बात उन्हे पता होनी चाहिए, और यदि नहीं पता तो वे भारतीय होने के हक को जताने के अधिकारी नहीं हैं।

बकवास और नुक्ताचीनी करना बहुत आसान है, परन्तु कार्यवाही करना उतना ही अधिक कठिन है। ये हमारे वे प्रवासी भारतीय हैं जो कि देश छोड़कर विदेश में जाके बस गए और माँग ऐसी करते हैं कि जैसे यहीं रहते हों। क्या कभी इन्होने देश के लिए कुछ किया? ये तो वोट देकर सरकार बनाने में कोई योगदान भी नहीं देते जिसको देने के लिए कोई पैसा नहीं खर्च करना पड़ता। और किस असंतोष की ये बात कर रहे हैं? बॉलीवुड के सितारों द्वारा प्रस्तुत किए गए कार्यक्रमों को तो ये लोग दांत फ़ाड़ कर देख रहे थे, और फ़िर बाहर आकर पत्रकारों के समक्ष उन्ही कार्यक्रमों की निन्दा करते हुए असंतोष प्रकट कर दिया!! ये लोग विदेश में जाकर बस गए, वहाँ अपना काफ़ी बड़ा व्यापार खड़ा किया, पैसा कमाया, और यहाँ आकर सोचते हैं कि जैसे वे भारतीय ईश्वर हो गए जिनके साथ यहाँ वीआईपी बर्ताव किया जाना चाहिए, चाहे विदेश में वे बेशक एक आम नागरिक की तरह रहते हों। आखिर ये लोग आते ही क्यों हैं यहाँ? क्या किसी ने इन्हे मजबूर किया कि वे 25000 डॉलर खर्च करके यहाँ इस प्रवासी भारतीय दिवस में भाग लेने आएँ? हमें इनकी कोई आवश्यकता नहीं है, इन्हे चाहिए कि ये अपनी प्रभुता वाली मानसिकता लेकर कहीं और जाएँ।

मैं यह मानता हूँ कि थोड़ी बहुत गलती आयोजकों की भी है कि प्रवासी भारतीय दिवस को नेताओं के भाषणों और नाच-गाने के कार्यक्रमों से नहीं पाटना चाहिए पर सुधार तभी हो सकता है जब भाग ले रहे प्रवासी भारतीय पत्र्कारों की अपेक्षा आयोजकों को अपने विचार और सुझाव दें। मुझे प्रवासी भारतीयों से कोई चिढ़ नहीं है, परन्तु जो रईस(और बड़े व्यापारी) प्रवासी भारतीय यह समझते हों कि वे तोप हैं और यहाँ उनके साथ ईश्वरीय व्यवहार होना चाहिए, उन पर तो मैं थूकना भी नहीं चाहूँगा, क्योंकि वे तीसरे दर्जे की थकी हुई मानसिकता वाले बीमार हैं जिन्हे भारतीय कहना समस्त भारतीयों का घोर अपमान है!! :roll:

Categories: mindless rants · फ़ालतू बड़बड़

ये दिल माँगे मोर!!

January 9, 2006 · 2 Comments

अभी तक जीवन की (छोटी)यात्रा के मेरे जो अनुभव रहे हैं, उनका निचोड़ यह कहता है कि यदि आज के समय में भगवा वस्त्र पहने किसी व्यक्ति को खुद को साधु, संत या सन्यासी बताते हुए देख लो तो उस पर कतई विश्वास न करो क्यों कि आजकल तो भिख़ारी और ढ़ोंगी भी भगवा वस्त्र पहनते हैं। साथ ही मेरे अनुभवानुसार, आयुर्वेदिक चिकित्सा महज एक बकवास है क्यों कि जितने भी आयुर्वेद से चिकित्सा करने वाले हैं, उनमें से निन्यानवें प्रतिशत तो ढ़ोंगी और ठग हैं, और बाकी एक प्रतिशत आपको मिलेंगे नहीं!! मैंने बहुत से आयुर्वेद से चिकित्सा करने वालों के बारे में सुना, बहुत से लोग मिले जो कि शपथ उठा के कहते थे कि उन्हे लाभ हुआ है, पर अंत में जाके यही निकलता था कि वे सब ठग-बदमाश होते थे। इसलिए मेरा इस चिकित्सा पद्धति से विश्वास उठ गया है, और ऐसा ही होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति के साथ भी है। मैं तो केवल यह जानता व मानता हूँ कि एलॉपथी से चिकित्सा कराओ और झट-पट आराम पाओ!! ;)

अब यह स्वामी रामदेव को ही लीजिए, अभी इनका एक विवाद ठंडा नहीं हुआ, कि वे एक नई सनसनी फ़ैलाने को तैयार हैं। मौके(मिलती लोक प्रसिद्धि) का पूरा लाभ उठाते हुए उन्होने कुछ नई बातें कही हैं। पहले तो उन्होने यह घोषणा की कि उनके औषधालय में बनने वाली हर औषधि पर अब उसको बनाने में प्रयोग हुए तत्वों का पूरा ब्यौरा लिखा होगा, जोकि वैसे तो कानूनी रूप से आवश्यक तो नहीं है, परन्तु वे ऐसी पहल करेंगे(और पारदर्शीता लाएँगे)!!

दूसरी बात फ़िर उन्होने उठाई आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति और भारत में उसकी दुर्दशा की। उन्होने कहा कि केन्द्रिय बजट में एलॉपथी चिकित्सा के लिए 97 प्रतिशत और आयुर्वेद तथा अन्य भारतीय चिकित्सा पद्धतियों के लिए मात्र 3 प्रतिशत धनराशी दी जाती है। और उन्होने माँग की कि यह उलट के, आयुर्वेदिक चिकित्सा के लिए 97 प्रतिशत और एलॉपथी के लिए 3 प्रतिशत धनराशी दी जानी चाहिए।

मैं इस बात का शुक्र मनाता हूँ कि स्वामी रामदेव वित्त मंत्री के सलाहकार आदि नहीं हैं वरना देश की जनता, जो कि वैसे भी मर रही है, वह और तेज़ी से मरना शुरु कर देती!! आयुर्वेद एलॉपथी के आने से पहले भी था, पहले भी लोग बुखार में नीम के पत्तों को उबाल के पीते थे, सोने-चाँदी इत्यादि से औषधियाँ बनती थी, परन्तु एलॉपथी का आविष्कार क्यों कर हुआ? सिर्फ़ इसलिए क्योंकि एलॉपथी से रोगी को लाभ जल्दी होता था और सस्ते में होता था। जिस मर्ज़ की दवा में सोने-चाँदी आदि का प्रयोग होता है, उसी मर्ज़ की दवा कुछ रसायनों से बनाई जाती है(जो कि सस्ते होते हैं) और आयुर्वेदिक दवा की अपेक्षा आम आदमी की पहुँच में होती है!! यदि स्वामी जी का वश चले तो वे हम सभी को धोती में लपेट दें और काढ़ा-सत्तू पर जीवन व्यतीत कराएँ!!

मैं यह नहीं जानता कि स्वामी रामदेव कितने सही हैं और कितने गलत, लेकिन मैं इतना जानता हूँ कि अर्थशास्त्र की उन्हे समझ नहीं है और जीवन का सामान्य ज्ञान यह है कि मनुष्य को जिस विषय की जानकारी न हो, उस विषय में उसे अपनी टाँग नहीं अड़ानी चाहिए। इसलिए स्वामी जी को चाहिए कि वे अपना मायाजाल बुनें और एक समझदार ख़िलाड़ी की तरह उन विषयों के बारे में टिप्पणी न करें जो उनकी पहुँच से बाहर हैं!!

और स्वामी रामदेव के जो अनुयायी यह समझ रहे हों कि मैं उनकी निन्दा कर रहा हूँ तो वे यह जान लें कि मैं ऐसा बिलकुल नहीं कर रहा हूँ और यदि वे अपने विचार प्रकट करना चाहें तो शांतिपूर्ण ढ़ंग से सभ्य भाषा में कर सकते हैं, अन्यथा उनकी टिप्पणियाँ मिटा दी जाएँगी और स्वामी जी से उनकी शिकायत कर दी जाएगी क्योंकि स्वामी जी ने अपने समर्थकों से शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने को कहा है!! ;)

Categories: mindless rants · फ़ालतू बड़बड़