जिसे ढ़ूँढ़ता हूँ मैं हर कहीं, जो मिली थी मुझे एक बार कहीं, जिसके प्यार पर है मुझे यकीन, वो लड़की है कहाँ??
नहीं, यह मैं अपने लिए नहीं कह रहा, इसलिए किसी भ्रम में न पड़ें!!
बात तो यह है कि ऐसा यकीनन सोच रहे होंगे कनाडा के मार्क ला चांस जो गए तो थे क्यूबा में छुट्टियाँ मनाने, पर दिल दे बैठे बेल्जियम की सैबाइन को। साथ साथ घूमते हुए छुट्टियाँ तो समाप्त हो गई पर शर्मीले मार्क सैबाइन का पता या फ़ोन नंबर पूछना भूल गए। अब बेल्जियम की टेलीफ़ोन डायरेक्टरी में दर्ज हर सैबाइन नाम की लड़की को चिठ्ठी लिखने वाले हैं कि ताकि उनकी प्रेमिका उन्हें मिल जाए। (स्रोत)
यकीनन आपका कहने का मन करेगा कि “वाह, क्या आशिक है”, परन्तु मैं यह कहने के बजाय मैं यह सोच रहा हूँ कि यदि सैबाइन के घर में लगा फ़ोन उसके नाम से न हुआ तो? भारतीय आशिक ऐसी हरकत करने की गलती नहीं करेंगे क्योंकि यहाँ अमूमन लड़कियाँ अपने घर-परिवार के साथ रहती हैं और फ़ोन उनके नाम से नहीं लगे होते, तो ज़ाहिर है कि टेलीफ़ोन डायरेक्टरी में उसका नाम नहीं होगा। तो यदि मार्क को इस तरह सैबाइन नहीं मिली तो वे क्या करेंगे? घर घर जा कर पता करेंगे?
बहरहाल मैं आशा करता हूँ कि ऐसी नौबत नहीं आएगी और मार्क को उनकी प्रेमिका मिल जाएगी!!
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अमेरिका आखिर अपने को समझता क्या है? कहता है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम के खिलाफ़ वोट दो वरना भारत-अमेरिका के परमाणु समझौते को नमस्ते कह लो!! (स्रोत) मतलब कि भईये यह तो सीधी सीधी धमकी है, कल को कहेंगे कि फ़लां देश पर हमला करना है, ब्रिटेन की तरह हमारे चमचे बन जाओ वरना तुम्हारी फ़लां स्वीकृति पर रोक लगवा देंगे, या कुछ और कर देंगे!! यानि कि यह तो खुलम-खुला दादागिरी है। साथ ही अमेरिका कहता है कि भारत ने अपने सैन्य और असैन्य परमाणु प्रतिष्ठानों में जो अंतर बताएँ हैं वे विश्वसनीय नहीं हैं।
एक भारतीय दिल से पूछा जाए तो वह कहेगा कि भारतीय प्रधानमंत्री को अमेरिका को साफ़ कर देना चाहिए कि चाहे भारत ईरान के खिलाफ़ ही वोट दे पर यह भारत का अपना स्वतंत्र निर्णय होगा क्योंकि भारत एक स्वतंत्र देश है, अमेरिका भारत को ब्रिटेन समझने की भूल न करे जो उसकी हर जायज़-नाजायज़ बात को स्वीकार लेगा, इसलिए अमेरिका भारत को धमकी देने की भूल न करे। और भारत अपने यहाँ जो भी करता है, वह उसका निजी मामला है। अमेरिका कितने हथियार बनाता है, उसकी सैन्य और असैन्य परमाणु शक्ति कैसी और कितनी है, वह यह सबको नहीं बताता फ़िरता, तो इसलिए अपने काम से मतलब रखे और खाली-पीली दूसरों को डंडा देना छोड़ दे। यदि वह भारत-अमेरिका के परमाणु समझौते को तोड़ना चाहता है तो बेशक तोड़ दे, भारत अपने आप कार्य करने में भी सक्षम है और भारतीय रक्षा प्रणाली ने अमेरिकी उच्च तकनीक के हथियारों की पाकिस्तान के साथ हुई 1971 की लड़ाई में खूब धज्जियाँ उड़ाई हैं, क्योंकि बेहतर हथियार कभी कोई लड़ाई नहीं जीतते, लड़ाई जीती जाती है बढ़िया रणकौशल, तेज़ दिमाग और जीतने के बुलंद हौसले द्वारा।
पर यदि इस बात पर एक दिमाग से सलाह ली जाए, तो वह कहता है कि भारत को अमेरिका की बात मान लेनी चाहिए। ईरान भारत का कोई खास हमदर्द भी नहीं है और वहाँ जिन ईस्लामी कट्टरपंथियों की हुकूमत है वे भारत के समर्थन में तो नहीं, विरोध में अवश्य खड़े हो सकते हैं। और वैसे भी इस समय भारत को अपने लाभ की सोच कर अमेरिका का साथ देना चाहिए। जब भारत अमेरिका से अपना मतलब निकाल समर्थ हो जाए, तो तब भारत को उसके आगे झुकने से मना कर देना चाहिए। क्योंकि दिमाग ही कहता है कि
“अपना मतलब निकालने के लिए यदि गधे को भी बाप बनाना पड़े तो बना लेना चाहिए”
और जहाँ तक मैंने पढ़ा है, समझा है और जहाँ तक मेरी बुद्धि कहती है यह सही भी है, और इसी को आजकल दुनियादारी भी कहते हैं। इतिहास इसके उदाहरणों से भरा पड़ा है।
तो अब सोचने वाली बात है कि हमारे प्रधानमंत्री महोदय क्या उत्तर देते हैं!!
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नहीं, न ही मैं पागल हो गया हूँ न ही मैं कोई कहानी नहीं लिख रहा हूँ, अलबत्ता कहानी के बारे में बता अवश्य रहा हूँ!! और कहानी वो जोकि अब फ़िल्म बनकर आ रही है(वैसे तो पिछले दिसम्बर में ही आ चुकी है परन्तु यहाँ भारत में 26 जनवरी को सिनेमा में लग रही है)। मैं बात कर रहा हूँ वाल्ट डिज़नी द्वारा प्रस्तुत, सी.एस.लुईस के लिखे उपन्यास पर बनी फ़िल्म “द क्रानिकल्स आफ़ नारनिया - द लायन, द विच एण्ड द वार्डरोब” की, जो कि एक फ़ैन्टसी फ़िल्म है!!
फ़िल्म की कहानी कुछ इस तरह से है। सन् 1940 में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन की लड़ाई लड़ी जा रही थी जब लुफ़्तवाफ़े(नाज़ी हवाई सेना) ब्रिटेन पर बमबारी कर रही थी, क्योंकि हिटलर ने लंदन को मिटा देने की ठानी थी। तो इस समय कई लोग लंदन छोड़ कर दूर छोटे शहरों और गांवो की ओर जा रहे थे। एक माँ भी अपने चार बच्चों को ऐसे ही लंदन से दूर भेज देती है। जिस घर में वे चार बच्चे पहुँचते हैं, वहाँ उन्हें एक अलमारी मिलती है जिसमें से एक दूसरी दुनिया की ओर जाने का रास्ता है, जिसका नाम है नारनिया!! वह दुनिया जादुई है, वहाँ जानवर बोल सकते हैं और वहाँ कई किंवदन्तियों में प्रसिद्ध काल्पनिक जीव भी हैं जैसे साईक्लोप्स, सेन्टॉर इत्यादि। पर वहाँ कोई मनुष्य नहीं है, क्योंकि वहाँ सफ़ेद जादूगरनी का राज है जिसने नारनिया को अनंत शीतकाल में जकड़ रखा है और भविष्यवाणी थी कि आदम के दो बेटे और ईव की दो बेटियाँ(चार मनुष्य, दो लड़के और दो लड़कियाँ) वहाँ आएँगे और उस सफ़ेद जादूगरनी को हरा कर उस शीत ॠतु को समाप्त करेंगे, और वहाँ का असली राजा असलान(एक शेर) पुनः वहाँ राज करेगा।
कहानी कुछ ज़ोरदार लग रही है और उत्सुकता और भी बढ़ जाती है क्योंकि मैंने यह उपन्यास नहीं पढ़ा!! नारनिया केवल इस एक उपन्यास में ही सीमित नहीं है, इसकी कहानी कुछ अन्य उपन्यासों में भी फ़ैली हुई है, तो आशा कर सकते हैं कि शायद वाल्ट डिज़नी इस पर और भी फ़िल्में बनाए।
फ़िल्म का ट्रेलर यहाँ उपलब्ध है, और इसे देखकर आपका मन भी अवश्य इसको पूरी देखने का करेगा। ट्रेलर देखकर मैं तो कुछ बेचैन सा हो उठा हूँ, जैसा कि हर बार होता है जब मैं किसी चीज़ को लेकर बहुत उत्साहित(और बेसब्र) होता हूँ और मुझे वह चीज़ मिलने से पहले थोड़ी प्रतीक्षा करनी होती है, अब से पहले आखिरी बार मैं “ट्राय” के लिए ऐसा उत्साहित था। (बेसब्री से)प्रतीक्षा है केवल 26 जनवरी की, जब यह भारतीय सिनेमाघरों में लग रही है।
ट्रेलर देखकर और फ़िल्म(तथा कहानी) के बारे में पढ़कर मैं इतना तो कह सकता हूँ कि इसके चलने के आसार तो हैं, परन्तु रिलीज़ का समय सही नहीं लगता, क्योंकि यह फ़िल्म बच्चों को अधिक आकर्षित करेगी, और यह समय स्कूलों में पढ़ाई और वार्षिक परीक्षाओं की तैयारी का है, साथ ही दसवीं और बारहवीं के छात्र भी अपनी बोर्ड की परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। यदि यह फ़िल्म पिछले दिसंबर में ही यहाँ भी रिलीज़ हो जाती तो इसके अच्छा व्यापार करने के अधिक आसार थे। पर कुछ कहा नहीं जा सकता, चलने को फ़िल्म अभी भी चल सकती है।
यह फ़िल्म चले या न चले, परन्तु काफ़ी अच्छी होगी इसमें मुझे कोई शक नहीं। यदि आप यह पढ़ रहे हैं और यदि अभीतक यह फ़िल्म नहीं देखी है तो देखने अवश्य जाएँ, समय बर्बाद नहीं होगा यह मेरा विश्वास है।
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