दुनिया मेरी नज़र से - world from my eyes!!

Entries from February 2006

तौबा ये लैंगिकवाद?

February 28, 2006 · 5 Comments

यह कोई आज का विवाद नहीं है, यह बरसों शताब्दियों पुराना विवाद है। लड़कियां बढ़िया हैं या लड़के महान हैं, इस विवाद का कोई अंत नहीं।

ऐसे समय पर बहुत खीज होती है। मन में आता है कि पुरूष-स्त्री की जगह ब्रह्मा जी को फ़ीनिक्स बनाने चाहिए थे जिससे कि लैंगिकवाद का सारा पचड़ा ही समाप्त हो जाता, क्योंकि फ़ीनिक्स में कोई लिंग की समस्या नहीं होती तथा वह स्वयंमेव ही अपने आप को उत्पन्न करता है।

लड़कियों में प्रशंसा की क्षुधा होती हैं, वे चाहती हैं कि वे कोई भी कार्य करें, विपरीत लिंग को उसकी प्रशंसा अवश्य करनी चाहिए, चाहे जो कार्य किया गया है वह करना उनका कर्तव्य हो। परन्तु पुरूषों में इसकी लालसा नहीं होती, वे नहीं कहते कि उनके किए किसी कार्य के लिए स्त्रियों को उनकी प्रशंसा करनी चाहिए, विवाद तब खड़ा होता है जब स्त्रियाँ अपने द्वारा सम्पन्न कार्य गिनाना आरम्भ करती हैं। क्यों भई, अपना कर्म करने के उपरांत प्रशंसा की लालसा कैसी? क्या कोई भी कार्य प्रशंसा प्राप्ति के लिए किया जाता है? बस इसी के साथ आरम्भ हो जाता है “कौन है सर्वश्रेष्ठ” महा विवाद। वे यह नहीं समझती कि अपने आप में न तो स्त्रियाँ सम्पूर्ण हैं और न ही पुरूष। दोनो को ही एक दूसरे ही आवश्यकता पड़ती है क्योंकि वे दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं, यही प्रकृति का नियम है।

अब मैं और कुछ नहीं लिखता, यह विषय बहुत ही शीघ्रग्राही है!! ;)

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ये तेरी पार्किंग ये मेरी पार्किंग!!

February 25, 2006 · 5 Comments

कुछ समय पहले टेलीविजन पर एक फ़िल्म देखी थी, “ये तेरा घर ये मेरा घर” जिसमें सुनील शेट्टी मकान मालिक होतें हैं जिन्हे मकान बेचना होता है परन्तु किराएदार महिमा चौधरी और उनके घर वाले मकान खाली करने को तैयार नहीं होते और पूरी फ़िल्म में सुनील-महिमा लड़ते रहते हैं।

बहरहाल वह तो मामला ही अलग था, उसमें तो सुनील का मकान पर अधिकार था और वे अपनी जगह सही थे। परन्तु आजकल कुछ ऐसा ही असल जीवन में भी देखने को मिल जाता है। ज्यादा दूर की नहीं, अपनी नानीजी की हाऊसिंग सोसाईटी का ही किस्सा है। वहाँ मामाजी के एक घर के सामने सबसे ऊपर एक परिवार रहता है। परिवार में माँ-बाप और बेटा-बहु, यानि कुल चार प्राणी। अब इन लोगों के पास एक फ़िएट पालिओ पहले से थी, फ़िर इन्होनें एक सेन्ट्रो भी ले ली। लड़के की शादी हुई और चमचमाती शेवरलेट ओप्ट्रा भी मिल गई(भई वाह)। अब समस्या है कि खड़ी कहाँ करें, हाऊसिंग सोसाईटी में अब पार्किंग की पर्याप्त जगह नहीं बची है क्योंकि लगभग हर घर में एक गाड़ी तो है ही, किसी किसी के पास इन लोगों की तरह तीन-चार गाड़ियाँ भी हैं। तो इन लोगों के बाजू में एक प्रकार की गली सी है जिसमें गाड़ियाँ खड़ी होती हैं। अब जिस ब्लॉक में इनका घर है उसमें ११ अन्य फ़्लैट भी हैं, इनकी वाली साईड पर इनको मिला ६ हैं। तो भई और लोग बाग भी अपने घर के आगे गाड़ी खड़ी करना चाहते हैं। वैसे तो उस गली में चार गाड़ियाँ आराम से आ सकती हैं परन्तु खड़ी केवल तीन ही होती हैं। अब एक गाड़ी तो इनके पड़ोसियों की खड़ी होती है, बाकी दो इन लोगों की(तीसरी अन्य जगह खड़ी करते हैं)।

यहाँ तक तो सब ठीक है, परन्तु गड़बड़ आगे होती है। इन लोगों की तीन में से एक बार में एक ही गाड़ी प्रयोग होती है, तो बाकी दो खड़ी रहती हैं। अभी कुछ दिन पहले इनकी शेवरलेट गई हुई थी(जो सबसे अधिक जगह घेरती है)। तो जगह खाली देख उसी ब्लॉक में रहने वाले एक साहब ने अपनी गाड़ी खड़ी कर दी। देर रात जवान लड़का अपनी पत्नी समेत शेवरलेट में लौटा और अपनी पार्किंग को खाली न पाकर खून खौल उठा। जिन साहब की गाड़ी खड़ी थी उन्हें बाहर बुलाकर जो उसने बवाल मचाया, तौबा। कहा कि वह पार्किंग उसकी है तो साहब ने अपनी गाड़ी क्योंकर खड़ी की। अब उसे समझाया गया कि पार्किंग पर उसका नाम नहीं लिखा और वह सुरक्षित भी नहीं है, कोई भी खड़ी कर सकता है, और वह क्यों न अपने घर के आगे खड़ी करें, क्या वह पूरी गली उसकी बपौती है आदि आदि!! लड़के का दिमाग सनक गया, अपने पड़ोसी से तो गाड़ी हटाने की कहने की तो उसकी हिम्मत नहीं तो निश्चय किया कि इन साहब से ही बदला लिया जाए। अपनी शेवरलेट ठीक उनकी गाड़ी के आगे खड़ी कर चलता बना, गाड़ी आधी से अधिक बाहर निकलती हुई सोसाईटी के अंदर जाने वाली सड़क पर आ रही थी, पर क्या फ़र्क पड़ता है!! सुबह वह लड़का तो अपनी दूसरी गाड़ी ले चलता बना पर इन साहब की बन आई, उनकी गाड़ी उस लड़के की दो गाड़ियों के बीच फ़ंसी पड़ी थी। ;) बाद में मामला किसी तरह सुलटा।

एक अन्य घटना में, मेरे पड़ोस में ऊपर की तरफ़ एक लड़का रहता है जो कि अपनी मोटरसाईकिल कुछ आगे की ओर खड़ी करता है। अब मैं अधिकतर रोज़ सांय काल अपनी मोटरसाईकिल पर थोड़ी देर हवाखोरी के लिए निकलता हूँ और एकाध घंटे में लौट आता हूँ। अब एक दिन उस लड़के को न जाने क्या खुरक मची, मेरे जाने के तुरन्त बाद अपनी मोटरसाईकिल मेरे घर के आगे जहाँ मैं खड़ी करता हूँ, खड़ी कर दी। जब मैं लौटा तो अपनी जगह रूकी पाकर आश्चर्य हुआ क्योंकि कोई वहाँ नहीं खड़ी करता, हमारे ऊपर रहने वाले भी आजू-बाजू खड़ी कर लेते हैं पर घर के द्वार पर तो मेरी मोटरसाईकिल ही खड़ी होती है। एकाध बार की बात मान मैंने अनदेखा कर दिया और अपनी मोटरसाईकिल थोड़ा आगे खड़ी कर दी। परन्तु अगले दिन सांयकाल भी यही वाक्या हुआ, मेरे जाने के बाद उस लड़के ने पुन: अपनी मोटरसाईकिल मेरी जगह पर खड़ी कर दी। उस बार भी मैंने यह सोच अनदेखा कर दिया कि अब यदि कल ऐसा हुआ तो फ़िर बात करनी ही पड़ेगी कि क्या खुजली मची है उस लड़के को, क्योंकि जहाँ वह खड़ी करता था वह जगह रात्रि उसके आने के बाद तक खाली पड़ी होती है, तो इसलिए वह ये सब जानबूझकर पंगा लेने के लिए ही कर रहा है। अगली सांय भी जैसी कि आशा थी, पुन: वही हुआ। तो उसके अगले दिन सुबह सवेरे जब वह आफ़िस जाने के लिए मोटरसाईकिल साफ़ करने आता है तो उसे पकड़ लिया और बस हो गया झगड़ा। अंत में उसे उसकी मोटरसाईकिल समेत तोड़ कर बाहर फ़ेंक देने की चेतावनी दी जिससे वह किलस गया और लड़ने को तैयार हो गया। मैं भी कमर कस तैयार हो गया, वैसे भी बहुत दिन हो गए थे हाथ साफ़ किए, खुजली सी हो रही थी। ;) परन्तु हमारे ऊपर के फ़्लैट में रहने वाला एक लड़का आ गया और उसे चुप रह चलता किया। वह दिन है और आज का दिन है, उसने अपनी मोटरसाईकिल कभी हमारे घर के द्वार पर नहीं बाँधी।

तो इस सब बकवास का क्या अर्थ है? वह यह कि आजकल बढ़ती गाड़ियों के कारण पार्किंग की समस्या बहुत अधिक होती जा रही है, लोग किसी डकैत की भांति आपकी पार्किंग को हड़पने के चक्कर में रहते हैं। कहीं भी जाकर अपनी गाड़ी खड़ी करो, तुरन्त एक लड़का हाथ में एक पर्ची लिए पार्किंग के पैसे लेने आ जाता है, चाहे वह जगह अधिकृत पार्किंग न हो, पर पार्किंग माफ़िया हर जगह है और इस तरह जबरन पार्किंग शुल्क वसूल कर रोज़ के लाखों कमाता है। कनॉट प्लेस में भी पार्किंग की समस्या विकट है(जैसा कि ऐसी जगह से अपेक्षित होता है)। अभी कुछ समय पहले नगर निगम द्वारा पाया गया था कि पालिका भूमिगत पार्किंग में कुछ गाड़ियाँ तो दो-तीन वर्ष से खड़ी आराम कर रहीं हैं जिन्हें नगर निगम ने लावारिस घोषित कर नीलाम कर दिया था(कदाचित् वे चोरी की हुई गाड़ियाँ थी)।

और जैसे हालात दिख रहे हैं, निकट भविष्य में यह समस्या और भी अधिक विकट हो जाएगी, शॉपिंग कॉमप्लेक्स तो बनते जा रहे हैं पर पार्किंग की कोई यथेष्ट सुविधा नहीं है। दिल्ली सरकार को यह अभी से ध्यान में लेना आरम्भ कर देना चाहिए कि यातायात के साथ साथ पार्किंग की समस्या भी बड़ी है जो कि पुल आदि बनने से नहीं दूर होगी, सो इसलिए यदि भूमि के ऊपर जगह नहीं है तो भूमिगत पार्किंग बनाने के बारे में विचार करना चाहिए।

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एक और शाम, ब्लॉग बंधुओं के नाम!!

February 21, 2006 · 8 Comments

तो रविवार १९ फरवरी २००६ को एक और ब्लॉगर भेंटवार्ता थी, या यूँ कहें कि फ़्लॉगर भेंटवार्ता थी। ;) सुबह सवेरे समय में यात्रा करने जाने के कारण मैं वैसे ही नहीं सोया था, क्योंकि रात सोने में देर हो गई थी और फ़िर २-३ घंटे सोकर क्या करता, ठीक समय पर उठ न पाता!! वापस आकर भी भारत-पाकिस्तान का मैच देखने का लोभ सोने न दे। आखिरकार सोचा कि थोड़ी नींद ले ली जाए, क्योंकि सांय ब्लॉगर भेंटवार्ता के लिए कनॉट प्लेस जाना था और नींद के अभाव से पीड़ित आँखों के संग ड्राईविंग करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। शाम भी हो गई और निश्चित समय पर मेरी घड़ियों में अलार्म भी बज उठा। फ़टाफ़ट तैयार हो मैं कनॉट प्लेस के निकट स्थित जंतर मंतर की ओर चल दिया।

यह भेंटवार्ता उसी समूह की थी जिनकी एक भेंटवार्ता पिछले महीने २९ तारीख को भी थी जिसमें मैं गया तो था, परन्तु इन साहबान के ऐन मौके पर स्थान बदल देने के कारण अपनी उपस्थिति नहीं लगा पाया था। तो इस बार सोचा कि इससे पहले इस बार भी स्थान बदल जाए, मुझे निश्चित स्थान पर समय पर पहुँच जाना चाहिए!! ;) पर हुआ कुछ अलग ही, मैं सांयकाल के ठीक ४:४५ बजे और निश्चित समय से पूरे १५ मिनट पहले जंतर मंतर के प्रवेश द्वार के बाहर खड़ा उन असंदिग्ध चेहरों को तलाश रहा था जो ब्लॉगर होने की चुगली करते हों। ;)

परन्तु ऐसा कोई न मिला, मैं ही सबसे पहले पहुँचा था, सो इसलिए उस संध्या के आतित्थेय अमित केन्डुरकर को मैंने यह पूछने के लिए फ़ोन लगाया कि वह कब तक आ रहें हैं। उत्तर मिला १०-१५ मिनट, सो मैं प्रतीक्षा करने लगा। कुछ ५ ही मिनट बीते होंगे कि कुर्ता धारी एक साहब पास आए और पूछा कि क्या मैं किसी की प्रतीक्षा कर रहा हूँ!! अब मैं कोई कन्या होता तो कदाचित् इस प्रश्न का कुछ अलग ही अर्थ निकलता और उसका परिणाम भी भिन्न होता। ;) परन्तु मेरी खुराफ़ाती बुद्धि ने ताड़ लिया कि यह साहब ब्लॉगर भेंटवार्ता के लिए ही आए हैं, सो मैंने ऐसा कहा, और परिचय का आदान प्रदान हुआ। पता चला कि वे स्टिंग आपरेशन करने वाले पत्रकारों के समूह डीआईजी के मेम्बर मायाभूषण हैं, वही जिनकी दिल्लीब्लॉगर याहू समुदाय में प्रेषित कल्पित प्रमोशनल ईमेलों के कारण मैंने कुछ उग्र प्रतिक्रिया की थी, परन्तु मामला बाद में बर्फ़ के नीचे दबा दिया गया। :) बहरहाल, ५ बज गए थे, और मैंने यह सोच राहत की श्वास ली कि अकेले प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। अभी हम लोग बतिया ही रहे थे कि एक आकर्षक कन्या ने हम दोनों के पास आकर पूछा कि क्या हम लोग ब्लॉगर भेंटवार्ता के लिए आए हैं। हमारे सहमति में सिर हिलाने पर उन्होंने बताया कि वे भी इसी शुभ काज के लिए पधारी हैं। परिचय का आदान-प्रदान हुआ और पता चला कि उनका नाम स्मिता है और वे भी एक पत्रकार हैं। मैं यह सोचने पर विवश हो गया कि क्या दिल्ली में अधिकतर ब्लॉगर पत्रकार ही हैं? क्योंकि जिस पिछली ब्लॉगर भेंटवार्ता में मैं गया था वहाँ भी लगभग सभी ब्लॉगर पत्रकार ही थे!! फ़िर मैंने सोचा कि कदाचित् दोष मुझ जैसे लोगों का ही है, यदि मेरे जैसे लोग ब्लॉग जैसी तकनीकी चीज़ों को प्रयोग करना इतना आसान नहीं बना देते तो यह न होता!! ;)

बहरहाल अपनी इस आत्मग्लानि को अपने भीतर ही दबा, उन दोनो पत्रकार ब्लॉगरों से बतियाने लगा!! ;) लगभग ५:१७ पर मेज़बान महोदय का फ़ोन आया यह पूछने के लिए कि हम लोग कहाँ पर हैं। अब मज़ेदार बात यह है कि वे मुझसे ३-४ कदम की दूरी पर खड़े ही यह पूछ रहे थे, सो मैंने हाथ हिला अपनी ओर उनका ध्यान आकर्षित किया। परिचय के बाद हमने तय किया कि हमें जंतर मंतर के अंदर चल देना चाहिए और वहाँ प्रतीक्षा करनी चाहिए। तो हम चारों ने अपनी अपनी जेबें ५-५ रूपये से ढीली करी और अंदर चल दिए जहाँ पर बहुत से देसी-विदेशी पर्यटक टहल रहे थे और कुछेक अपने कैमरों द्वारा छायाचित्र भी ले रहे थे। अब कैमरा तो मेरे पास भी था, परन्तु उसे निकाल कर फ़ोटो लेने में आलस्य सा लगा, तो इसलिए यह विचार अपने आप ही मन से रफ़ूचक्कर हो लिया। एक जगह खड़े हो हम लोग बातें करने लगे। कोई विषय नहीं था, जो मन में आ रहा था वह बोले जा रहे थे। गूगल की बात भी हुई और उसकी बदलती विचारधारा तथा हाल ही में उसके द्वारा अपनी चीनी वेबसाईट पर संषोधित खोज परिणाम दिखाने की स्वीकृति पर मेरे और स्मिता के बीच एक प्रकार की छोटी सी बहस भी हुई। समय बीता और जब लगभग ६:१५ पर सांझपरी का अमित को फ़ोन आया कि प्रवेशद्वार पर बैठे चौकीदार उन्हें अंदर नहीं आने दे रहे तो हम लोगों ने ही बाहर चलने का निर्णय लिया। ;) बाहर सांझपरी के साथ एक और बंधु उपस्थित थे, परिचय के पश्चात पता चला कि उनका नाम पुनीत है और वे पहले ब्लॉगर हुआ करते थे परन्तु अब काफ़ी समय से जिन्होंने ब्लॉगिंग को ठन्डे बस्ते में डाल रखा है।

चूँकि जन्तर-मन्तर बंद हो चुका था, इसलिए हमने पास के किसी रेस्तरां आदि में चलने का निर्णय लिया, वैसे भी वहाँ बाहर खड़े रहकर शाम खोटी करने का कम से कम मेरा तो कोई इरादा नहीं था। तो मैंने सुझाव दिया कि यदि कोई दारू वगैरह मारनी है तो पास ही में dv8 है, अन्यथा कॉफ़ी इत्यादि के लिए बरिस्ता चलते हैं। बरिस्ता का नाम सुनते ही सांझपरी बोली कि वहाँ बहुत शोरगुल होता है और वह बहुत भरा रहता है, सो मैंने उत्तर दिया कि यदि शोरगुल से दूर किसी एकांत स्थान पर ही जाना था तो कनॉट प्लेस आने की क्या आवश्यकता थी, क्योंकि यहाँ तो शोरगुल आदि ही मिलेगा। तो हम सर्वसम्मति से बरिस्ता की ओर बढ़ चले। परन्तु आगे निकल गए अमित और मायाभूषण कैफ़े कॉफ़ी डे में प्रवेश कर गए, तो मैंने सोचा कि कहीं तो जाना ही है, यहीं सही। :) पहली मंज़िल पर पीछे एक कोने में एक बड़ी सी कॉफ़ी टेबल और सोफ़े दिखाई दिए और हम वहीं जा कर पसर गए। कुछ देर बाद अजय भी उपस्थित हो गए।

बातें चल पड़ी और कुछ देर बाद मैं, अमित और अजय, पेय पदार्थ लेने नीचे पहुँच गए। तापमान अधिक था, गर्मी लग रही थी, सो कॉफ़ी लेने का तो प्रश्न ही नहीं था। अमित अपना और अन्य इच्छुक व्यक्तियों का आर्डर देकर चले गए, मैं और अजय मीनू हाथ में लिए अनिश्चित से खड़े रहे। मैंने करौंदे की स्मूदी लेने का निश्चय किया, तो अजय ने भी एक अन्य स्वाद की स्मूदी ही ली। वापस ऊपर आए अभी अधिक देर नहीं हुई थी कि हम लोगों के पेय आ गए। करौंदे की स्मूदी जो मैंने ली थी, गर्म माहौल में बर्फ़ के चूरे से अटी पड़ी वह बहुत ही बढ़िया लग रही थी। :D बातें चलती रहीं और समय व्यतीत होता रहा। जल्द ही स्मिता ने विदा ली। उसके बाद हम बैठे बतिया रहे थे। सांझपरी ने कोई शीतल अथवा गर्म पेय नहीं लिया था, उन्हें जीवन अमृत यानि कि पानी की तलब लग रही थी। वेटर से पूछा तो पता चला कि पानी तो उपलब्ध नहीं है, मिनरल वॉटर उपलब्ध है जिसकी बोतल नीचे से खरीदी जा सकती है!! थोड़ी देर बाद एक वेटर आकर हमें फोकट में कैडबरी के बॉईट्स नामक छोटे चॉकलेट क्रिस्प के छोटे पैकेट दे गया, प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक। सभी ग्राहकों को यह बाँटे जा रहे थे, शायद उस दिन रेस्तरां वालों की कमाई अधिक हुई थी या फ़िर कदाचित् मैनेजर की बीवी का जन्मदिन था, जो भी हो, कारण नहीं पूछा, दिमाग खपाने की क्या आवश्यकता, कुछ दे ही रहा था न, ले थोड़े ही रहा था!! ;)

बातें चलती रही और हम लोग बतियाते रहे। कोई विशेष विषय नहीं था, बस यूँ ही बतिया रहे थे, तो इसलिए मैंने Ctrl-Alt-Del दबा अपने दिमाग का आपरेटिंग सिस्टम को “हाईबरनेट” करा दिया, क्योंकि सोचने की तो इस माहौल में कोई आबश्यकता ही नहीं थी इसलिए छोटी काम चलाऊ मेमोरी ही पर्याप्त थी। ;) कुछ समय बाद सभी उठ खड़े हुए, तो मैं भी उठ खड़ा हुआ और सबके साथ बाहर की ओर चल दिया(अकेला बैठा क्या करता अंदर??)। वापस जंतर मंतर की ओर चल दिए क्योंकि सभी की गाड़ियाँ आदि वहीं खड़ी थी सिवाय अजय के। जीवन भारती की इमारत के बाजू में पहुँच हम खड़े हो गए और पुनः बतियाने लगे। विषय ब्लॉगों का था, तो इस पर सांझपरी ने पूछ कि जब हम लोग अंदर कैफ़े कॉफ़ी डे में बैठे थे तो तब क्यों न यह चर्चा हुई और सड़क पर खड़े रह यह सब करने की क्या तुक बनी। परन्तु उस टिप्पणी को लगभग अनदेखा कर हम लोग लगे रहे, मुझे तो अब याद भी नहीं कि क्या बात कर रहे थे!! ;)

कुछ मिनट बाद सब ने एक दूसरे से विदा ली, अजय वापस एन ब्लॉक की ओर बढ़ गए, शायद उन्होंने कैफ़े कॉफ़ी डे के सामने की ओर वाली पार्किंग में अपनी गाड़ी खड़ी की थी। मैंने डॉ लाल पैथ लैब के निकट अपनी मोटरसाईकिल खड़ी की थी, तो इसलिए जंतर मंतर की ओर जाते उन लोगों से विदा ली और अपनी मोटरसाईकिल की ओर बढ़ गया। रात्रि घिर आई थी और लगभग सवा ९ बजे मैं घर पहुँच गया, और तब मैंने देखा कि पूरे दिन में १०० किलोमीटर से अधिक मोटरसाईकिल चल ली थी, सुबह “हिस्ट्री वाल्क” के लिए महरौली गया था और सांय ब्लॉगर भेंटवार्ता के लिए कनॉट प्लेस। आजकल मेरे लिए एक दिन में ५० किलोमीटर मोटरसाईकिल चलाना भी बड़ी बात है तो इसलिए कुछ अचरज अवश्य हुआ!! :)

इस संध्या का अमित द्वारा लिखित अंग्रेज़ी संस्करण यहाँ उपलब्ध है

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समय के गलियारे से

February 20, 2006 · 7 Comments

तिथि: १९ फरवरी २००६
समय: सुबह के लगभग साढ़े ७ बजे
स्थान: दिल्ली की रिंग रोड, नारायणा के आगे

एक लाल रंग की एलएमएल ग्रैपटर मोटरसाईकिल लगभग ८५ कि.मी. प्रति घंटे की रफ़्तार से खाली पड़ी सड़क पर दम साधे उड़ी जा रही थी, उसको मैं चला रहा था। प्रश्न है कि मैं इतनी सुबह वहाँ क्या कर रहा था। भई मैं अपने गंतव्य की ओर बढ़ा चला जा रहा था। रविवार की सुबह थी, हल्का धुंध या धुँए का कोहरा भी था, पर सड़क अपेक्षा अनुसार खाली पड़ी थी, कोई इक्का-दुक्का वाहन ही दिखाई दे रहा था। पर सड़क खाली होने के बावजूद मैं अधिक गति से नहीं जा रहा था, क्योंकि मैं इतनी सुबह ताज़ी हवा में मोटरसाईकिल चलाने का पूरा आनंद लेने में व्यस्त था, गति का कोई महत्व नहीं था। अखिल भारतीय चिकित्सा संस्थान(aiims) आने पर एक घुमावदार मोड़ लेकर मैं भारतीय टेक्नॉलोजी संस्थान(IIT) की ओर मुड़ गया। अब दिल्ली के इस भाग में मैं पहले कभी नहीं आया था, पापा से रास्ता पूछ लिया था सो उनके निर्देशानुसार सीधे ही निकल लिया। थोड़ा आगे जाने पर एक सरदारजी से पूछा और आखिरकार, निश्चित समय से १५ मिनट पहले, ७:४५ पर मैं पहुँच ही गया, मेहरौली-गुड़गाँव सड़क पर स्थित फूल बाज़ार के मुहाने पर, जहाँ “हिस्ट्री वाल्क” के लिए आए सभी श्रद्धालुओं को एकत्र होना था।

यह “हिस्ट्री वाल्क” इंडिया हैबिटैट सेन्टर द्वारा आयोजित की गई थी। अब क्योंकि मैं पहली बार आया था, इसलिए मैं किसी को जानता पहचानता नहीं था। सो मैंने निश्चय किया कि जो भी व्यक्ति कैमरे के साथ दिखाई पड़ेगा, उससे ही पूछ लेंगे, क्योंकि बहुत अधिक संभावना है कि कोई कैमरे वाला इतनी सुबह वहाँ है तो वह भी मेरी तरह “हिस्ट्री वाल्क” के लिए आया है। कुछ ही पल में मुझे एक महिला दिखाई दीं कैमरे के साथ, मैंने उनसे पूछा कि क्या वें “हिस्ट्री वाल्क” के लिए आईं हैं। तो पता चला कि वे इंडिया हैबिटैट सेन्टर से है और उनका नाम रेणु है। मन ही मन सोचा कि वाह भई, मजे आ गए, अधिक देर प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। तभी रेणु को “हिस्ट्री वाल्क” के गाईड, श्री विकास हरीश दिखाई दे गए जो कि कदाचित् उसी समय पहुँचे थे। विकास से परिचय हुआ और इतने में और लोग भी आ गए। विकास ने कहा कि क्योंकि फूल बाज़ार के दो प्रवेश द्वार हैं, तो इस कारण कुछ उलझन थी कि कहाँ पर एकत्र होना है, इसलिए कुछ लोग दूसरे प्रवेश द्वार पर प्रतीक्षा कर रहे थे। रेणु उनको बुलाने चली गईं और विकास से बातों बातों में ही पता चला कि वे फ़्रांस की राजधानी पेरिस में रहते हैं और साल में लगभग तीन सप्ताह के लिए ही भारत आते हैं। वहाँ वे विश्वविद्यालयों आदि के साथ भारतीय इतिहास से सम्बन्धित कार्य करते हैं। अभी आजकल वे न्यू यार्क की किसी कलाकार की प्रदर्शिनी के कारण दिल्ली आए हुए हैं, जोकि ८ मार्च से शुरू हो रही है।

रेणु बाकी के लोगों को दूसरे प्रवेश द्वार से ले आईं और हम लोगों ने उद्यान में प्रवेश किया। विकास ने बताया कि यह उद्यान अभी हाल ही में बना है, अन्यथा पहले यहाँ कुछ नहीं था। तो हमने जमाली कमाली मस्जिद की राह पकड़ी। रास्ते में दाईं ओर पेड़ों के पीछे से कुतुब मीनार दिखाई दे रही थी, दृश्य बड़ा ही अच्छा लग रहा था, सो कैमरे में बंद कर लिया। :)

जमाली कमाली मस्जिद पहुँचने पर सभी लोग विकास को घेर खड़े हो गए, और विकास बताने लगे, कि यह मस्जिद लगभग १५२६ ईसवी में आखिरी लोधी बादशाह के समय में बननी शुरू हुई थी और तकरीबन १५४५ ईसवी में हुमायुँ के शासनकाल में बनकर तैयार हुई। उस समय की वास्तुकला आदि के बारे में भी विकास ने बहुत कुछ बताया, जो कि मैं यहाँ लिखना नहीं चाहता। :)

अन्दर से भी मस्जिद को देखा, आलों आदि में बहुत अच्छी नक्काशी है, जो कि देखते ही बनती है और उस समय की शिल्प कला की खूबसूरती की गवाह है। विकास ने हमें गलियारे के एक सिरे पर खड़े होकर पूरे गलियारे को देखने को कहा। और जो हमने देखा, वह नज़ारा देखते ही बनता था।

फ़िर हम जमाली और कमाली के मकबरे की ओर चल दिए, जो कि शिल्प कला का एक सुन्दर नमूना है, बाहरी दीवार के ऊपरी भाग में अभी भी उस समय की टाईलें लगी हुईं है। विकास फ़िर हमें जमाली और कमाली की कहानी बताने लगे।

तत्पश्चात हम चल दिए राजों की बावली की ओर। यह बावली बड़ी अच्छी बनी हुई है, अन्य बावलियों की तरह इसे भी बारिश का पानी एकत्र करने के लिए बनाया गया था।

यह राजाओं आदि के प्रयोग के लिए नहीं थी, बल्कि राजगीरों के लिए थी, जिन्हें संगतराश भी कहा जाता है। इसके बारे में भी विकास ने बहुत अच्छे से विस्तार से बताया।

तत्पश्चात हम लोग बावली की छत पर चढ़ गए। जिन लोगों को ऊँचाई से डर नहीं लगता और जो छोटे बच्चों के साथ नहीं थे(एक जोड़ा दो छोटे बच्चों के साथ भी आया था) उन्हें विकास ने छत पर मौजूद कुएँ में झाँककर देखने के लिए आमंत्रित किया। यह कुँआ फ़िलहाल सूखा पड़ा है और बहुत गहरा है, जिसे बावली की दीवार में ऊपर से नीचे तक बनाया गया था। फ़िर हम छत पर मौजूद एक गुम्बद की नक्काशी देखने लगे जिसके नीचे एक कब्र बनी हुई है। विकास के अनुसार यह इस बावली के रखवाले की रही होगी। बमय विकास इस जगह पर जो आखिरी तारीख़ मिली है वह हिज्र कैलेन्डर के अनुसार सन् १५०६ की है जो कि इसी गुम्बद पर कहीं लिखी हुई है।

विकास ने हमारा ध्यान एक झरोखे की ओर आकर्शित किया और उस पर मौजूद नक्काशी की ओर हमारा ध्यान ले गए, जो कि इस्लामी वास्तुकला न होकर राजस्थानी वास्तुकला का नमूना है। इस बारें थोड़ा और विस्तार से बताने के बाद विकास ने समापन की घोषणा कर दी और हम सभी वापस अपने समय में लौट आए। :) लगभग दो घंटे हो चुके थे, अन्यथा विकास का इरादा पास ही मौजूद गंधक बावली की ओर भी ले जाने का था, बमय विकास जिसके पानी में गंधक प्रचुर मात्रा में उपस्थित है, जिस कारण उस बावली का नाम गंधक बावली है।

कुछ लोग अब जा रहे थे, कुछ विकास को घेरे प्रश्नों की बौछार कर रहे थे। मैंने कुछ और छायाचित्र लेना बेहतर समझा।

इंडिया हैबिटैट सेन्टर की रेणु उन लोगों के ईमेल एक पुस्तिका में लिख रही थी जो आने वाली “हिस्ट्री वाल्क” आदि के बारे में सूचित किया जाना चाहते थे। तो मैंने भी अपना ईमेल दर्ज करा दिया और फ़िर हम सब वापस हो लिए। जगह यदि बढ़िया होगी तो “हिस्ट्री वाल्क” पर मैं पुन: जाऊँगा, बढ़िया छायाचित्र लेने का मौका तो मिलता ही है, साथ ही बहुत सी जानकारी प्राप्त कर दिमाग तरोताज़ा हो जाता है। :D

इस “हिस्ट्री वाल्क” पर लिए गए मेरे सारे छायाचित्र यहाँ उपलब्ध हैं

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मैं, वो और वेलेन्टाईन!!

February 15, 2006 · 22 Comments

कल वेलेन्टाईन डे था(मध्यरात्रि बीत चुकी है और तारीख़ बदल गई है) और मैं सदैव की तरह तन्हा बैठा कुछ सोच रहा था। हिन्दी चिट्ठा जगत में सभी कविता अधिक करते हैं बाकी कुछ और कम। कविताओं में मुझे कोई विशेष रूचि नहीं रही कभी, पर मैंने सुना है कि प्यार का इज़हार एक सुन्दर कविता से बढ़िया कोई नहीं कर सकता। तो मैंने सोचा कि क्यों न आज के दिन कविताओं के प्रति अपनी अरूचि को भूल मैं भी एक कविता लिख डालूँ!! ;)

तो प्रस्तुत है एक कविता जो कि मेरे मन में जैसे आई मैंने वैसे लिख डाली। अब इसे पढ़कर ऐसा वैसा मतलब न निकाले कोई, क्योंकि हम नहीं गिरे हैं अभी इतना नीचे, कि लगने लगें मजनूँ और लोग कहें हमें दीवाना!! ;) :D

वेलेन्टाईन डे के दिन मैं अकेला बैठा सोचता हूँ,
यदि हम उससे इतना दूर न होते
तो हम भी कान से कान तक मुस्कुराते,
आँखों में उसके लिए ढेर सा प्यार,
मिल जाते किसी रेस्तरां में पिज्ज़ा खाते।

वह देखती हमारी ओर और हम उसकी ओर,
नज़रें चार होती हमारी और हम दुनिया को भूल जाते,
प्रतीत होता ऐसा जैसे बीच में हम और आसपास खेत हैं लहलहाते,
खामोश इशारों से होती दिल की बातें,
हर पल के साथ युग बीतते जाते,
कुछ वह कहती अपने दिल की, कुछ हम कहते,
बिना होंठ हिलाए ही सब कुछ बयान कर जाते।

यूँ ही अनंत काल तक रहता वह समां बंधा,
न करता जब तक आकर वेटर भंग मेरी तंद्रा,
बिल देकर देखता वह मेरी ओर,
जैसे भूल की हो मैंने कोई घनघोर,
सस्ते में ही काम लिया निबटा,
दिन अवसर न सही, हमने तो उसका भी ख्याल न किया!!
मुस्कुराकर उसकी(किसकी?) ओर भरता मैं बिल,
सोच मन ही मन में, कि चलो बच गया डूबते डूबते ये दिल।

बहरहाल फ़िलहाल हम छूट गए सस्ते में,
अब आगे न जाने कैसे कैसे भुगतान करने पड़ेंगे,
सुलटा भी पाएँगे या लेने के देने पड़ेंगे।
कर्म किया है तो फल की भी आशा करते हैं,
पर मन माफ़िक मिलेगा या फ़िर रहेंगे हम तरसते?

इसी उधेड़बुन में बैठा, रहा था दिमाग खपा,
तभी खुले मेरे ज्ञान चक्षु, गूँजी मेरे कर्णों में गीता,
कर्म है मनुष्य के हाथ में, नहीं है फल का चुनाव,
जैसा कर्म किया है वैसा ही तो फल मिलेगा!!

अच्छा था सपना वह जो अचानक ही टूट गया,
पाया कि कमबख्त मोबाईल था बज रहा,
फ़िर मन ही मन में मुस्कुरा मैंने सोचा,
अच्छा ही है जो नहीं है वो यहाँ,
वरना हम भी डूब गए होते उसके सागर से भी गहरे नयनों में,
खोज रहे होते हर जगह हमारे घर वाले,
और मित्र गण सोच कर दुखिया रहे होते,
कि एक और भाई को निगल गए इश्क के कातिल कोहरे।

मैं कोई कवि नहीं हूँ और जहाँ तक मुझे ज्ञात है, यह मेरी पहली कविता है और मैं जानता हूँ कि कदाचित् यह एक बहुत बकवास-बेहूदा कविता है जिसे यदि किसी कवि को पढ़ा दिया जाए तो वह हृदयाघात से मर जाए!! :) परन्तु फ़िर भी, यह मेरा चिट्ठा है, क्या फ़र्क पड़ता है, चाहे जो करूँ। ;)

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नौकरी न मिलने के निश्चित कारण!!

February 14, 2006 · 3 Comments

आज के समय में नौकरी पाना बहुत कठिन कार्य हो गया है, और अच्छी नौकरी पाना और भी कठिन। कई कंपनियाँ अच्छे शिक्षण संस्थानों से बढ़िया छात्रों की अपने यहाँ सीधे भरती कर लेती हैं। पर उनका क्या जिनके यहाँ ऐसा नहीं होता? या फ़िर वे लोग जो अपनी मौजूदा नौकरी छोड़कर नई और अधिक अच्छी नौकरी तलाश करना चाहते हैं? बड़ी मुश्किल से आपको एकाध अच्छी वैकेन्सी के बारे में पता चलता है और आप अपनी अर्ज़ी भी लगा देते हैं, परन्तु यह सुन कर बड़ी झल्लाहट होती है कि आपको साक्षात्कार तक के लिए नहीं बुलाया जाता या फ़िर साक्षात्कार के बाद कहा जाता है कि आपसे बाद में संपर्क किया जाएगा और फ़िर कुछ नहीं होता। मतलब कि इतनी बढ़िया नौकरी हाथ से निकल गई और आप हाथ मलते रह गए। पर क्या आप जानते हैं कि कई बार या अधिकतर ऐसा कुछ उन मामूली त्रुटियों के कारण होता है जिन्हें अनदेखा करने का आपको इतना बड़ा मोल चुकाना पड़ता है? तो क्या हैं वे त्रुटियाँ?

  1. प्रावरण पत्र न भेजना : कई बार लोग यह गलती कर जाते हैं, किसी पद के लिए अर्ज़ी देते समय अपना रिज्यूमे(resumé) तो शान से भेज देते हैं परन्तु प्रावरण पत्र(cover letter) नहीं भेजते। या तो उन्हें मालूम नहीं होता कि प्रावरण पत्र किस चिड़िया का नाम है अथवा वे उसे भेजना भूल जाते हैं। दोनों ही स्थिति में हानि स्वयं उन्हीं की होती है। वैसे प्रावरण पत्र संलग्न करना कोई आवश्यक नहीं है परन्तु न भेजने से बुरा प्रभाव पड़ता है। यदि आप प्रावरण पत्र भेज रहे हैं तो कुछ समय निवेश करके उसमें कुछ लिखिए, जैसे कि क्योंकर आप उस पद के लिए उचित उम्मीदवार हैं जिसके लिए आप आवेदन दे रहे हैं। केवल यह लिखने से कि आप फ़लां पद के लिए आवेदन दे रहे हैं, आपका कोई मकसद हल नहीं होता, क्योंकि यह लिखना और प्रावरण पत्र बिलकुल न भेजना एक समान है।
  2. रिज्यूमे अथवा प्रावरण पत्र में आक्षरिक त्रुटियाँ : लगभग हर कोई अपने रिज्यूमे(resumé) और प्रावरण पत्र(cover letter) को किसी न किसी वर्ड प्रोसेसिंग सॉफ़्टवेयर में टाईप करता है और सभी में “स्पैल चैक” नामक सुविधा उपलब्ध होती है जिसे कि अधिकतर लोग प्रयोग न करके शब्द गलत लिख जाते हैं। इससे रिज्यूमे पढ़ने वाले व्यक्ति पर आपका गलत प्रभाव पड़ता है, साक्षात्कार से पहले ही, तो बाकी की तो आप सोच ही सकते हैं। एक अंग्रेज़ी की कहावत है:

    first impression is the last impression

    जिसका हिन्दी अनुवाद है:

    पहला प्रभाव ही अन्तिम प्रभाव होता है

    अब यदि इसका आक्षरिक अर्थ न लेकर इसे समझने का प्रयत्न करें तो इसका अर्थ यह है कि आपका जो प्रभाव पहले पहल पड़ता है, वही दूसरे व्यक्ति के दिमाग में घर कर जाता है। यदि आपका अच्छा प्रभाव पड़ा है तो उसे गलत प्रभाव में तब्दील करने में तो अधिक समय नहीं लगता परन्तु यदि पहला प्रभाव गलत पड़ा है तो उसे अच्छे प्रभाव में तब्दील करने में बहुत कठिनाई आती है। और फ़िर जहाँ आप नौकरी के लिए आवेदन दे रहे हैं, वहाँ तो आपके पास एक ही अवसर होता है।

  3. गलत शब्दों का प्रयोग : यदि आपने रिज्यूमे अथवा प्रावरण पत्र में सही शब्दों का प्रयोग नहीं किया है तो समझिए कि नौकरी मिलने की बहुत कम संभावना है क्योंकि अभ्यस्त निगाहों को गलत शब्द बहुत शीघ्र दिखाई पड़ जाते हैं। गलत शब्दों से मेरा मतलब किसी ऐसे वैसे शब्द से नहीं वरन् सही आक्षरिक शब्द न होने से है। जैसे यदि आप “नेटवर्क एडमिनिस्ट्रेटर” के पद के लिए आवेदन दे रहे हैं और cache server की जगह cash server लिख दिया तो गड़बड़ तो हो ही जाएगी क्योंकि आपकी इस त्रुटि को “स्पैल चैक” भी न पकड़ पाएगा।
  4. पुरानी कंपनी के नाम में गलती : यदि आप पहले कहीं नौकरी कर चुके हैं तो अवश्य ही इस बात का अपने रिज्यूमे में वर्णन करेंगे। और यदि आपने अपनी पुरानी कंपनी अथवा मालिक के नाम में गलती कर दी तो ….. तो पंगा तो हो ही जाएगा न!!
  5. रिज्यूमे अथवा प्रावरण पत्र में भाषा की त्रुटियाँ : आप यदि अपने रिज्यूमे और प्रावरण पत्र को बोल कर पढ़ेंगे तो यदि उनमें कोई भाषा संबन्धी गलतियाँ हैं तो वे आपके समक्ष उजागर हो जाएँगी ताकि आप उन्हें सुधार सकें। यदि भाषा सही रखी जाए तो साक्षात्कार लेने वाले व्यक्ति पर अच्छा प्रभाव पड़ता है जो कि आपके हित में होता है।
  6. फ़ोन अथवा ईमेल का उत्तर न देना : जिस कंपनी में आपने आवेदन दिया है, यदि वहाँ से आपको फ़ोन आता है और आप उस समय बात करने की स्थिति में नहीं हैं तो यह बात फ़ोन करने वाले व्यक्ति से कह दें। यदि आप फ़ोन करने का वायदा करके फ़ोन नहीं करते या बहुत दिन बाद करते हैं, अथवा यदि आपको उस कंपनी से कोई ईमेल आती है और उसका उत्तर देने में कई दिन लगा देते हैं तो इससे आप अपना बहुत बुरा प्रभाव डाल रहे हैं। यदि आपकी कहीं और नौकरी लग गई है तो भी आपको यह तो बता ही देना चाहिए कि आपने दूसरी कंपनी में पद स्वीकार कर लिया है, ताकि आपकी छवि उस व्यक्ति/कंपनी की नज़रों में अच्छी बनी रहे, क्योंकि यह दुनिया बहुत छोटी जगह है, हो सकता है कुछ समय बाद आप पुन: नौकरी तलाश रहे हों!!
  7. अनुचित स्थान से फ़ोन पर बात करना : जिस कंपनी में आपने आवेदन दिया है, यदि वहाँ से आपको फ़ोन आता है, तो आपको यह निश्चित कर लेना चाहिए कि आपके आसपास शोरगुल अथवा कोई विघ्न डालने वाला न हो। साधारणतया फ़ोन करने वाला आपसे अवश्य पूछता है कि क्या आप उस समय बात कर सकते हैं या नहीं। यदि आप कहीं बाहर हैं, जैसे किसी रेस्तरां, सिनेमा, आफ़िस मीटिंग आदि में या सड़क पर, अथवा बात करने की स्थिति में नहीं हैं तो यह कह देना बेहतर है कि आप उस समय बात नहीं कर सकते, और जिस समय बात कर सकते हैं वह बता दें तो वह व्यक्ति आपको पुन: फ़ोन करेगा। शोरगुल आदि में बात करना या बात करते समय बीच में विघ्न पड़ना असभ्य लगता है और यह यकीनन आपके हित में नहीं है।
  8. लंबे वार्तालाप के लिए मोबाईल का प्रयोग करना : मोबाईल फ़ोन बात करने के लिए ही होता है। परन्तु संभावित कंपनी के फ़ोन करने वाले से यदि संभव हो तो मोबाईल फ़ोन पर बात न करके साधारण फ़ोन पर बात करें, क्योंकि टेक्नॉलोजी चाहे कितनी ही विकसित हो गई हो, नेटवर्क सिग्नल का कम होना अथवा चले जाना आम बात है। दूसरे कई बार मोबाईल फ़ोन से बात करते समय दूसरे व्यक्ति को ठीक से आपकी आवाज़ सुनाई नहीं पड़ने की संभावना को भी नकारा जा सकता। इसलिए यदि संभव हो तो साधारण फ़ोन से बात करें, ताकि वार्तालाप में कोई अनचाहा विघ्न न पड़े। वैसे यह कोई अत्यधिक महत्वपूर्ण बात नहीं है परन्तु फ़िर भी इसका ध्यान रखना आपके हित में ही है।
  9. साक्षात्कार के लिए देरी से पहुँचना अथवा पहुँचना ही नहीं : यदि आप निर्धारित समय पर नहीं पहुँच सकते तो सुसभ्यता का तकाज़ा यही है कि आप फ़ोन कर बता दें कि आपको पहुँचने में देर हो जाएगी या फ़िर आप पहुँच ही नहीं पाएँगे, ताकि दूसरा दिन अथवा समय निर्धारित किया जा सके। साक्षात्कार लेने वाले को प्रतीक्षा कराना निश्चित रूप से आपके पक्ष में नहीं है क्योंकि जितना आप लेट होंगे उतनी ही बुरी छवि आपके प्रति उसके मन में बन जाएगी जिसको सुधारना असंभव हो जाएगा।

यह कुछ बहुत मामूली सी त्रुटियाँ हैं जिनको थोड़ी सी सावधानी बरतने से हटाया जा सकता है, और यदि इन्हें रहने दिया जाता है तो ये छोटी छोटी गलतियाँ ही इस बात का प्रबन्ध कर देती हैं कि योग्य होने पर भी आपको नौकरी नहीं मिलती। तो इसलिए सावधान रहिए कि यही आपके हित में है। :)

ऊपरलिखित सूचि डग हैम्पशायर की इस पोस्ट से प्रेरित है।

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लोकप्रियता की ओर अग्रसर!!

February 10, 2006 · 21 Comments

आज मैंने जैसे ही इस ब्लॉग के नियंत्रण भाग में डैशबोर्ड को खोला तो स्वतः ही मेरी नज़र वर्डप्रैस डॉट कॉम(wordpress.com) के सबसे लोकप्रिय चिट्ठों और तेज़ी से लोकप्रिय होते चिट्ठों की सूचि पर गई और तेज़ी से लोकप्रिय होते चिट्ठों की सूचि में चौथे स्थान पर अपने ब्लॉग को देखकर एक अजीब से आनंद की अनुभूति हुई!! :D

यह ब्लॉग लोकप्रियता की ओर अग्रसर - बड़े चित्र के लिए क्लिक करें

यदि ऊपर प्रदर्शित तस्वीर आपको साफ़ नहीं दिखाई दे रही तो उस पर क्लिक कर बड़ी तस्वीर देखें।

हाल ही में यह ब्लॉग वर्डप्रैस डॉट कॉम पर मौजूद सर्वश्रेष्ठ चिट्ठों की सूचि में भी आया, और वहीं से पता चला कि वर्डप्रैस डॉट कॉम पर हिन्दी में लिखा जाने वाला यह पहला ब्लॉग है(वाह, ऐसा मुझे अंदेशा तो था, परन्तु विश्वास न था)। :) ऐसे ही चलता रहा तो लगता है जल्द ही यह ब्लॉग स्कोबल के बाजू में होगा!! ;)

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आज छुट्टी थी!!

February 9, 2006 · 6 Comments

आज मुहर्रम की छुट्टी थी। वैसे तो यह एक सरकारी छुट्टी होती है, परन्तु निजी क्षेत्र में यह अमूमन नहीं दी जाती, जहाँ तक मैं जानता हूँ, मेरे किसी भी कामकाजी मित्र की छुट्टी नहीं थी। पर मेरी थी, और यही बहुत है!! :D

तो कल जब बॉस मुझे एक प्रोजेक्ट के बारे में बता रहे थे, तो मैंने कहा:-

मैं: बॉस, कल तो छुट्टी है, मजे आ गए!! :D
बॉस: (कैलेंडर में देखने के बाद) कल तो मुस्लिम छुट्टी है, तुमने क्या करना है।
मैं: कुछ भी हो, छुट्टी तो है!! कल मैं सारा दिन नींद लूँगा।
बॉस: क्यों? इतनी थकान का क्या कारण है? अब तो सप्ताहांत की छुट्टी होती है।
मैं: हाँ, होती तो है परन्तु मैंने पिछले शनिवार छुट्टी न लेकर काम किया था और रविवार को भी नींद न ले पाया था। (लेकिन मैंने यह न बताया कि सारा दिन क्रिकेट खेलता रहा)
बॉस: ओह, तो ठीक है, मजे करो, लेकिन हमें यह काम कल तक फ़ाईनल करना है।
मैं: (मन ही मन सोचा) कमब्खत छुट्टी के दिन भी चैन नहीं मिलेगा!! :(

तो आज मैंने वही किया, सारा दिन सोया, और सो ही रहा था कि जब मनहूस मोबाईल की घंटी ने ३ बजके ५५ मिनट पर जगा दिया। फ़ोन यकीनन बॉस का था, साथ ही दो एसएमएस(sms) भी इंतज़ार कर रहे थे। पढ़ा और जाना कि बॉस महोदय आनलाईन प्रतीक्षा कर रहे हैं, सो तुरन्त निद्रा रानी को भगाया और याहू पर लॉग आन किया। और फ़िर कैसे ढाई घंटे से ऊपर बीत गए, पता ही नहीं चला, जब काम समाप्त हुआ, तब घड़ी पर नज़र मारी, और मन ही मन सोचा, लो, मन गई छुट्टी!! ;)

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फ़ूट डालो, राज करो!!

February 9, 2006 · 3 Comments

अंग्रेज़ चले गए लेकिन अपनी विरासत के रूप में अपनी प्रसिद्ध नीति छोड़ गए, जिसने उन्हें पूरे भारतवर्ष की अलग अलग ६०० से अधिक रियासतों पर राज करवाया। अब पाकिस्तानी मीडिया और पूर्व क्रिकेटर आदि भी शायद इसी नीति का प्रयोग कर भारतीय खेमे में गर्मी पैदा करने के चक्कर में हैं।

कल हुए एक दिवसीय मैच में पाकिस्तान के कप्तान इंज़माम के आऊट होने पर भी एक विवाद सा खड़ा हो गया है, और पाकिस्तान के पूर्व कप्तान और विकेटकीपर बल्लेबाज़ मोईन खान का कहना है कि द्रविड़ को ऐसा नहीं करना चाहिए था। उनका इशारा उस वाक्ये की ओर है जब इंज़माम के एक शॉट को फ़ील्ड करके सुरेश रैना ने इंज़माम को क्रीज़ से बाहर पाकर गेंद विकेट की ओर उन्हें आऊट करने के इरादे से फ़ेंकी और इंज़माम ने क्रीज़ से काफ़ी बाहर होते हुए भी, विकेट की ओर जाती गेंद को अपने बल्ले से रोक दिया। ऐसा करना खेल के नियमों के विरूद्ध है और रैना के साथ साथ कप्तान द्रविड़ ने भी अंपायर से इंज़माम को आऊट देने की अपील की, जिसे कि अंपायर ने मान लिया और इंज़माम को आऊट दे दिया। अब मोईन खान साहब को यह खुजली है कि द्रविड़ जैसे अनुभवी खिलाड़ी को इस मामूली से वाक्ये को अनदेखा कर देना चाहिए था, जैसे कि सौरव गांगुली कर देते यदि वे कप्तान होते!! खान साहब का कहना है कि क्रिकेट सज्जन लोगों का खेल है(gentleman’s game) और द्रविड़ को गांगुली के अनुभवों से सीखना चाहिए। भारतीय टीम को जीतने की ऐसी धुन सवार है कि वे किसी भी कीमत पर जीतना चाहते हैं, या तो सीधे तरीके से या फ़िर टेढ़े तरीके से!! तो मेरा कहना है कि खान साहेब, यदि क्रिकेट सज्जन लोगों का खेल है तो फ़िर इंज़ी ने विकेट पर जाती गेंद को अपने बल्ले से रोक कर अपनी मूर्खता का प्रदर्शन क्यों किया? और नियमों के विरूद्ध होते हुए भी आप कह रहें हैं कि भारतीय खिलाड़ियों को अपील नहीं करनी चाहिए थी? क्या यह पाकिस्तानी कप्तान की मूर्खता पर परदा करने का असफल प्रयास नहीं है? क्योंकि इंज़माम ने बाद में यह स्वीकार किया कि उन्हें इस नियम के बारे में नहीं पता था और वापस पैवेलियन लौटने के बाद ही उन्हें इस बारे में पता चला।

तो अब हमें यह प्रश्न उठाना चाहिए कि क्या ऐसे खिलाड़ी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलने की अनुमति मिलनी चाहिए जिसे खेल के नियम भी नहीं मालूम? कप्तान बनना तो दूर की बात है, ऐसे लोगों का तो चयन करने से पहले कुछ शिक्षा-दीक्षा देनी चाहिए। वरना कल को खान साहब या उनके जैसा ही कोई मूर्ख मसखरी करेगा कि कैच आदि की भी अपील नहीं करनी चाहिए, सज्जनों की तरह खेलना चाहिए, बिलकुल मोईन खान की तरह जिन पर भूतकाल में अत्यधिक अपील करने के कारण जुर्माना ठोका जा चुका है!! :roll:

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क्या करें, कन्ट्रोल नहीं होता!!

February 5, 2006 · 3 Comments

ऐसा क्यों होता है कि कुछ चीज़ों पर हम यह जानते बूझते भी काबू नहीं रख पाते कि अति बुरी है। वैसे तो अति हर चीज़ की बुरी होती है, पर यह ज्ञान रखने के बाद भी क्यों हम काबू नहीं रख पाते? यह बहस का मुद्दा है, क्योंकि इसका संबन्ध मनुष्य की इच्छा शक्ति से है, जितना व्यक्ति का मन पर संयम होगा, उतना ही वह ऐसी स्थिति में आने से बचेगा। परन्तु दोषहीन कोई नहीं होता, किसी का भी अपने मन पर पूरा नियंत्रण नहीं होता, यह तो प्रकृति का नियम है। प्रत्येक व्यक्ति की कुछ कमज़ोरियाँ होती हैं जिनके आगे वह विवश हो जाता है। पर यह तो तय है कि इसके पीछे क्या चिंतन है और मन पर संयम कैसे रखा जाए, इसका उत्तर तो कोई महान बुद्धिजीवी ही दे सकता है!! :)

अब यदि मन में प्रश्न उठ रहा हो कि मैं दार्शनिकों की तरह ऐसी गंभीर बकवास क्यों कर रहा हूँ तो उसका भी एक कारण है। मैं अभी अभी घर में घुसा हूँ, सुबह ग्यारह बजे का निकला दोस्तों के साथ क्रिकेट खेला जा रहा था, और सात घंटे ऐसी की तैसी करा के सोचा कि बस बहुत हुआ, अब घर चला जाए!! हाल ऐसे हो रहे हैं कि जैसे बस अभी के अभी गिर पड़ूँगा, फ़िर भी सनक देखो, चिट्ठा लिखने बैठ गया!! :( क्या करें, कन्ट्रोल नहीं होता!!

अब कुछ और चीज़े भी हैं जिन पर नियंत्रण नहीं साधा जाता। जैसे मुझे पूरी-छोले बहुत पसंद हैं, और कढ़ी-चावल, तो इन्हें मैं हमेशा अधिक खा जाता हूँ और फ़िर हाजमोला खा कर ऐसी की तैसी होने से रोकने की कोशिश करता हूँ, तौबा। वैसे तो मुझे प्रत्येक मिठाई पसंद है, चाहे रसमलाई हो या बंगाली रसगुल्ले, संदेश हो या (देसी घी में बनें)बेसन अथवा गोंद के लड्डू, गाजर का हलवा हो या मूँग की दाल का, परन्तु एक मिठाई जो मुझे औरों से अधिक पसंद है वह है गुंजिया और इसे भी मैं कुछ अधिक ही खा लेता हूँ और फ़िर पेट में गड़बड़ हो ही जाती है। :( हर बार ऐसा होने पर सोचता हूँ कि बस अब की बार ऐसा नहीं करूँगा, नियंत्रित मात्रा में ही खाऊँगा, परन्तु क्या करें, सामने आते ही सब कुछ भूल जाता हूँ, नियंत्रण बेचारा एक ओर ही खड़ा रह जाता है!!

वैसे शुक्र है कि कोई ऐब नहीं है, न सुट्टा मारने का और न ही बाटली का, न ही पाऊडर का और न ही लड़की का, नहीं तो पता नहीं क्या होता मेरा, मैं तो जीवन की बहार देखे बिना ही पतली गली से कट लेता।

हाँ, तो अब मन कर रहा है कि बस बिस्तर पर पड़ूँ और गहरी नींद में डूब जाऊँ, पर कमबख्त दिमाग इसकी आज्ञा नहीं देता, कहता है कि छह दिन बाद तो छुट्टी मिली है, कुछ भले काम करो, अपने लिए कुछ कोड वोड लिख डालो!! हाय ये सत्यानाशी दिमाग, जब आज्ञापालन करवाने का समय होता है तब तो कमज़ोर पड़ जाता है, और जब …..

बस अब और नहीं लिख सकता, यह तो अपनी खीज मिटाने के लिए इतना लिख दिया अन्यथा …..

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