अंग्रेज़ चले गए लेकिन अपनी विरासत के रूप में अपनी प्रसिद्ध नीति छोड़ गए, जिसने उन्हें पूरे भारतवर्ष की अलग अलग ६०० से अधिक रियासतों पर राज करवाया। अब पाकिस्तानी मीडिया और पूर्व क्रिकेटर आदि भी शायद इसी नीति का प्रयोग कर भारतीय खेमे में गर्मी पैदा करने के चक्कर में हैं।
कल हुए एक दिवसीय मैच में पाकिस्तान के कप्तान इंज़माम के आऊट होने पर भी एक विवाद सा खड़ा हो गया है, और पाकिस्तान के पूर्व कप्तान और विकेटकीपर बल्लेबाज़ मोईन खान का कहना है कि द्रविड़ को ऐसा नहीं करना चाहिए था। उनका इशारा उस वाक्ये की ओर है जब इंज़माम के एक शॉट को फ़ील्ड करके सुरेश रैना ने इंज़माम को क्रीज़ से बाहर पाकर गेंद विकेट की ओर उन्हें आऊट करने के इरादे से फ़ेंकी और इंज़माम ने क्रीज़ से काफ़ी बाहर होते हुए भी, विकेट की ओर जाती गेंद को अपने बल्ले से रोक दिया। ऐसा करना खेल के नियमों के विरूद्ध है और रैना के साथ साथ कप्तान द्रविड़ ने भी अंपायर से इंज़माम को आऊट देने की अपील की, जिसे कि अंपायर ने मान लिया और इंज़माम को आऊट दे दिया। अब मोईन खान साहब को यह खुजली है कि द्रविड़ जैसे अनुभवी खिलाड़ी को इस मामूली से वाक्ये को अनदेखा कर देना चाहिए था, जैसे कि सौरव गांगुली कर देते यदि वे कप्तान होते!! खान साहब का कहना है कि क्रिकेट सज्जन लोगों का खेल है(gentleman’s game) और द्रविड़ को गांगुली के अनुभवों से सीखना चाहिए। भारतीय टीम को जीतने की ऐसी धुन सवार है कि वे किसी भी कीमत पर जीतना चाहते हैं, या तो सीधे तरीके से या फ़िर टेढ़े तरीके से!! तो मेरा कहना है कि खान साहेब, यदि क्रिकेट सज्जन लोगों का खेल है तो फ़िर इंज़ी ने विकेट पर जाती गेंद को अपने बल्ले से रोक कर अपनी मूर्खता का प्रदर्शन क्यों किया? और नियमों के विरूद्ध होते हुए भी आप कह रहें हैं कि भारतीय खिलाड़ियों को अपील नहीं करनी चाहिए थी? क्या यह पाकिस्तानी कप्तान की मूर्खता पर परदा करने का असफल प्रयास नहीं है? क्योंकि इंज़माम ने बाद में यह स्वीकार किया कि उन्हें इस नियम के बारे में नहीं पता था और वापस पैवेलियन लौटने के बाद ही उन्हें इस बारे में पता चला।
तो अब हमें यह प्रश्न उठाना चाहिए कि क्या ऐसे खिलाड़ी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलने की अनुमति मिलनी चाहिए जिसे खेल के नियम भी नहीं मालूम? कप्तान बनना तो दूर की बात है, ऐसे लोगों का तो चयन करने से पहले कुछ शिक्षा-दीक्षा देनी चाहिए। वरना कल को खान साहब या उनके जैसा ही कोई मूर्ख मसखरी करेगा कि कैच आदि की भी अपील नहीं करनी चाहिए, सज्जनों की तरह खेलना चाहिए, बिलकुल मोईन खान की तरह जिन पर भूतकाल में अत्यधिक अपील करने के कारण जुर्माना ठोका जा चुका है!!


3 responses so far ↓
आशीष // February 9, 2006 at 9:16 am
अपना तो ऐसा मानना है क्रिकेट समय और पैसो की बर्बादी के आलावा और कुछ नही है. ऐसे भी इस खेल को ब्रिटेन और उसके भूतपुर्व गुलाम देशो के अलावा और कोई नही खेलता.
एक भी खेल महाशक्ति(अमरीका/रूस/चीन/जापान) इस खेल को नही खेलती.
Pankaj // February 9, 2006 at 11:54 am
मोइनखान की बात मे दम नही है. यह सिर्फ अपने पक्ष पर अडे रहने की बात हुई. खेल भी सिरियस होना चाहिए. हर कोई जीतने के लिए खेलता है. पाकिस्तान ने भी तो दकवर्थ नियम का फायदा उठाया ही था ना. तब खेल भावना कँहा चली गई थी.
Amit // February 9, 2006 at 3:28 pm
आशीष भाई, आपका यह कहना सही है कि क्रिकेट अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर केवल ब्रिटेन और उसकी भूतपूर्व कालोनियाँ ही खेलती हैं, परन्तु यह नहीं कह सकते कि अमेरिका में यह नहीं खेला जाता। वहाँ कई जगहों पर गली-मोहल्ले के स्तर पर यह खेला जाता है, २० वीं शताब्दी के आरम्भ में जब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर केवल ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया और वैस्ट-इंडीज़ खेलते थे, तो टीमें कैरिबियन की ओर जाते समय अमेरिका होती जाती थी और वहाँ की लोकल टीमों के साथ भी खेलती थी। यदि कभी ध्यान दिया हो, तो बेसबॉल का खेल क्रिकेट से ही निकला हुआ लगता है।
और फ़िर बात यह है कि कोई भी खेल मन की स्फ़ूर्ती और निज आनंद के लिए खेला जाता है, कोई और उसे खेलता है कि नहीं, इस बात से कोई मतलब नहीं होना चाहिए, जिसे खेलना हो वह खेले, जिसे नहीं खेलना हो वह न खेले। फ़ुटबॉल के बाद क्रिकेट ही आज विश्व का दूसरा सबसे अधिक लोकप्रिय खेल है।
हा हा हा, सही कह रिये हो पंकज भाई, मोईन खान का यह कहना तो वही बात हुई कि अपनी इस शर्मनाक मूर्खता पर परदा डालने के लिए दोष दूसरे बन्दे के सिर मढ़ दिया!!
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