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चोली के पीछे क्या है?

March 29, 2006 · 12 Comments

नहीं भई नहीं, मैं यहाँ किसी अश्लील बात आदि नहीं पर नहीं चर्चा करने वाला, परन्तु आज की मेरी यह बकवास अश्लीलता के काफ़ी नज़दीक अवश्य है। इसलिए यदि आप अपने को असुखद महसूस करें या आप १८ वर्ष की आयु से कम के हैं तो कहीं और जाईये, इससे आगे पढ़ने पर आप किसी भी परिणाम के स्वयं उत्तरदायी होंगे। :)

बात अश्लीलता से ही शुरू होती है, या कहें वेश्यावृत्ति से। वेश्यावृत्ति कोई नई चीज़ नहीं है, यह सदियों पुराना धंधा है और कदाचित् मानव इतिहास के सबसे पहले व्यापारों में से एक है। और अन्य व्यापारों की तरह ही इसकी उत्पत्ति का कारण भी मनुष्य आवश्यकता है। अब इसको अपने शब्दों में मेरे एक परिचित ने कहा:

पेट को खाना चाहिए, और पेट के नीचे वाले को जुगाड़ चाहिए

इन शब्दों में पूरे भाव का समावेश है। पुरातन काल से ही कुछ लोग सेक्स को मात्र जीवन उत्पत्ति का माध्यम मानते आ रहे हैं जबकि कुछ समझदार लोग इसे जीवन उत्पत्ति के माध्यम से अधिक मानते हैं। क्योंकि पुरातन काल से ही समाज पुरूष प्रधान अधिक रहा है, इसलिए पुरूषों की कामुकता पूरी करने के लिए वेश्यालय होते थे। महिलाओं के लिए ऐसे “जुगाड़” खुले आम उपलब्ध नहीं थे इसलिए लोक लाज का लिहाज़ करते हुए उन्हें या तो अपनी इच्छाओं का गला घोट देना पड़ता था या फ़िर अपनी इच्छा पूर्ती के लिए चोरी छुपे कोई “जुगाड़” करना पड़ता था। परन्तु अन्त पन्त बात यह है कि पुरातन काल में वेश्यालय सार्वजनिक थे और कोई पाबन्दी नहीं थी।

अब यदि सदियों के सफ़र के बाद हम आज के समाज में आते हैं, तो हाल यह है कि वेश्यालय तो आज भी हैं, पर पाबन्दी रिक्त नहीं हैं। कुछ देशों की सरकारों ने अक्ल से काम लिया है और वेश्यावृत्ति को कानूनी रूप से पाबन्दियों से मुक्त कर दिया है बशर्ते वे कुछ नियमों का पालन करें। कानूनी मान्यता को पाने और बनाए रखने के लिए इनके ठेकेदारों ने उन नियमों को स्वीकार भी किया है। पर फ़िर भी बहुत से समाज ऐसे हैं जो कि इसे एक अभिशाप के रूप में देखते हैं, और ढ़ोंग की चादर ओढ़े हुए हैं, जैसे हमारा भारतीय समाज!! रात के अन्धेरे में बन्द दरवाज़ों के पीछे लोग जिस आनन्द की प्राप्ति करते हैं, दिन के उजाले में वही लोग महात्मा बने इन कृत्यों का विरोध करते हैं!!

सबसे हास्यप्रद है हमारे मीडिया का दृष्टिकोण। प्रतिदिन समाचार पत्रों में “मसाज पार्लर”, “ऐस्कॉर्ट सेवा” आदि के रंगीन विज्ञापन छपते हैं जिसमें लगभग खुलेआम इनकी वास्तविक सेवा(यानि कि वेश्यावृत्ति) के बारे में बताया गया होता है। अब कोई निहायत ही बेअक्ल जन्म से मूर्ख व्यक्ति ही होगा जो इन विज्ञापनों और इनकी सेवाओं का अर्थ न जानता हो, परन्तु ये विज्ञापन खुलेआम अखबारों में छपते हैं, चाहे वह टाईम्स आफ़ इंडिया हो या हिन्दुस्तान टाईम्स, या कोई अन्य छोटा-बड़ा अखबार, पाठक की तबीयत रंगीन कर देने का दावा करने वाले इस तरह के रंगीन विज्ञापन लगभग पूरे पूरे पृष्ठ पर होते हैं। पर समय आने पर ये ही लोग बढ़ती वेश्यावृत्ति और प्रशासन की उसको रोकने में असमर्थता पर लम्बे लम्बे लेख लिख डालते हैं। अरे भई, यह तो निरा दोगलापन हुआ न, एक तरफ़ तो वेश्यावृत्ति का प्रचार करों और दूसरी ओर उसको रोक पाने में प्रशासन की नाकामयाबी पर व्यंग कसो!!

जहाँ तक मुझे ज्ञात है, वेश्यावृत्ति भारत में कानूनी रूप से मान्य नहीं है। पर उसके गैरकानूनी होने से क्या लाभ है? क्या वह कम हो गई है? क्या दिल्ली की जी.बी. रोड और मुम्बई के कमाठीपुरा इलाके के बारे में सरकार अन्जान है? बिलकुल नहीं। तो फ़िर क्यों नहीं इस देश के सर्वेसर्वा वेश्यावृत्ति को कानूनी रूप से मान्यता देकर उस पर नियंत्रण रखने का प्रयास करती?

Categories: mindless rants · फ़ालतू बड़बड़

12 responses so far ↓

  • रा च मिश्र // March 29, 2006 at 3:14 am

    ये भी होगा, ज़रा धीरज रखिये!
    समय बदल रहा है,सब कुछ बदलेगा।

  • Readers-cafe // March 29, 2006 at 8:56 am

    अखबारों के लिये सही कहा है और ये टाइम्‍स आफ इंडिया क्‍या कोई न्‍यूज पेपर है, मुझे तो विज्ञापन की कोई मंडी लगता है। सबसे ज्‍यादा गंद ये ही दिखाता है.

  • पंकज बेंगानी // March 29, 2006 at 10:04 am

    यह इतना आसान नही होगा. राजनिती की रोटीयाँ सेकने वाले लोग जब जरा जरा सी बात पर धरना प्रदर्शन कर देते हैं, तो यह तो बहुत संवेदनशील मामला है.

    आप को वापस लिखता देख अच्छा लगा. कहाँ गुम हो गए थे?

  • जीतू // March 29, 2006 at 10:05 am

    वाह वाह! क्या विषय उठाया है। इस पर तो विस्तार मे लिखना पड़ेगा।दरअसल हम बहुत ही दोगली(इस शब्द के लिये क्षमा) किस्म की कौम है।कहते कुछ और है, सोचते कुछ और है, करते कुछ और है। यदि नही करते तो दूसरे को भी कुछ करने नही देते और यदि कुछ दूसरा करता है तो हम खूब हल्ला मचाते है। अगर नतीजा बुरा होता है तो कहते है, देखो हमने तो पहले ही हल्ला मचाया था, और यदि नतीजा अच्छा होता है तो हम और हल्ला मचाते है और राष्ट्रीय चर्चा करते है कि हमने पहले क्यों नही किया।

    बाकी का लेख हमारे ब्लॉग पर पढियेगा, थोड़ा धैर्य रखिए।

  • Amit // March 29, 2006 at 12:26 pm

    आप को वापस लिखता देख अच्छा लगा. कहाँ गुम हो गए थे?

    अरे कहीं गुम नहीं हुए थे पंकज भाई, बस कुछ अधिक व्यस्त हो गया था, व्यस्त तो अभी भी कम नहीं हूँ पर कुछ अधिक ही खुरक मची थी इस विषय पर लिखने की, सो अपने को रोक न सका!! ;)

    वाह वाह! क्या विषय उठाया है। इस पर तो विस्तार मे लिखना पड़ेगा।

    धन्यवाद। और आपके लेख की प्रतीक्षा है!! :)

    दरअसल हम बहुत ही दोगली(इस शब्द के लिये क्षमा) किस्म की कौम है।कहते कुछ और है, सोचते कुछ और है, करते कुछ और है। यदि नही करते तो दूसरे को भी कुछ करने नही देते और यदि कुछ दूसरा करता है तो हम खूब हल्ला मचाते है। अगर नतीजा बुरा होता है तो कहते है, देखो हमने तो पहले ही हल्ला मचाया था, और यदि नतीजा अच्छा होता है तो हम और हल्ला मचाते है और राष्ट्रीय चर्चा करते है कि हमने पहले क्यों नही किया।

    बात दरअसल यह है कि हम ही क्या, साधारण मनुष्य स्वभाव ही दोगला है, फ़िर चाहे वे किसी भी कौम, नस्ल के हों, भारतीय भी ऐसे हैं और अमरीकी भी, ईसाई भी ऐसे हैं और मुसलमान भी, हमाम में सभी नंगे हैं। दूसरी बात यह कि जो समाज जितनी पिछड़ी सोच और मानसिकता की चादर ओढ़े है वह उतना अधिक दोगला है इन मामलों में।

  • Mayank // March 29, 2006 at 6:02 pm

    Hi

    This is great thing that you can write in hindi. Can you tell me that how it enabled?

    Mayank

  • SHUAIB // March 29, 2006 at 6:34 pm

    वाह बहुत खूब लिखा है। मैं तो दुबई में रहता हूं और यहीं की बात तो बता दूं, जुमा की नमाज़ पढ कर अकसर लोग वहीं जाते हैं जिसे हम सबसे बडा पाप कहते हैं।

  • Tarun // March 30, 2006 at 1:43 am

    जीतू भाई,
    आपने कहा….हम बहुत ही दोगली(इस शब्द के लिये क्षमा) किस्म की कौम है। कहते कुछ और है, सोचते कुछ और है, करते कुछ

    दोगली कहाँ हुए, ये तो तीगली किस्‍म के हो गये ना… ;)
    कहते कुछ और है - 1, सोचते कुछ और है - 2, करते कुछ - 3

  • Amit // March 30, 2006 at 1:47 am

    मयंक, यदि आप हिन्दी लिखने के इच्छुक हैं, तो आप यहाँ पढ़िए

    शोएब भाई, बात दरअसल यह है कि धर्म मात्र एक ढकोसला बन के रह गया है। इस पर मेरी बकवास बहुत जल्द आ रही है, प्रतीक्षा कीजिए।

  • Amit // March 30, 2006 at 1:48 am

    दोगली कहाँ हुए, ये तो तीगली किस्‍म के हो गये ना… ;)
    कहते कुछ और है - 1, सोचते कुछ और है - 2, करते कुछ - 3

    . ;) :D

  • sanjay | joglikhi // March 30, 2006 at 9:55 am

    टाईटल से लेख कहीं ज्यादा अच्छा लिखा हैं, लगता चिट्ठा जगत में फिर नई बहस शुरू होने वाली हैं. धर्म पर लिखते समय इस बार कि अनुगूंज को ध्यान में रखना.
    जब ऐसा लिख सकते हो तो नितमीत लिखा करो मियां. नये विषयों पर सोचने से कुछ दिमागी कसरत भी हो जायेगी हमारी.

  • Amit // March 30, 2006 at 11:20 pm

    टाईटल से लेख कहीं ज्यादा अच्छा लिखा हैं

    बहुत धन्यवाद!! :)

    लगता चिट्ठा जगत में फिर नई बहस शुरू होने वाली हैं. धर्म पर लिखते समय इस बार कि अनुगूंज को ध्यान में रखना.

    हाँ हाँ, कैसे न याद रखूँ!! ;) उस पर भी एक लंबी चौड़ी पोस्ट लिखी है, अभी आधी ही समाप्त हुई है, आशा है कि आज रात समाप्त हो जाएगी, तो उसे भी छाप देंगे। अब यदि आप पहली पोस्ट लिखना चाहते हैं तो जल्दी कीजिए, वरना मेरी पोस्ट पहली हो जाएगी। ;)

    जब ऐसा लिख सकते हो तो नितमीत लिखा करो मियां. नये विषयों पर सोचने से कुछ दिमागी कसरत भी हो जायेगी हमारी.

    प्रतिदिन माल-पानी नहीं खाना चाहिए संजय भाई, हाज़मा खराब हो जाएगा!! ;) इसलिए कभी कभार ऐसे लिखने से ही असली तारीफ़ होती है!! :D

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