अस्वीकरण:-
इस लेख में आलोचना भी है और एकाध जगह पर कुछ अधिक ही हो गई है, पर वे वही भाव हैं जो मेरे हृदय से अंकुरित हुए हैं। इसलिए सावधान, आपको इसे पढ़ने के लिए कोई बाध्य नहीं कर रहा है, पढ़ना हो तो पढ़ें वरना राम नाम जपें(और मुझे माफ़ करें)। मैं एक बेवकूफ़ हूँ, यह मुझे पता है, इसलिए यह बताने का कष्ट करने की बजाय यहाँ से कट लें!!
तो इस बार की अनुगूँज(क्रमांक १८) का आयोजन तीर-कमान की छाया में हो रहा है, मेरा मतबल कि तरकश के बड़े तीर जोगलिखी वाले संजय भाई ने किया है। विषय भी कोई ऐसा वैसा नहीं, बल्कि रामबाण सा अचूक लाए हैं, “मेरे जीवन में धर्म का महत्व“, और ऐसा हो भी क्यों न, भई आखिर तीर-कमान वाले हैं!!
हाँ तो बच्चों, बताओ धर्म क्या है? धर्म जी तो बॉलीवुड के रैम्बो धर्मेन्द्र को कहा जाता है, या यूँ कहें कि उन्हें “धर्म पाजी” के नाम से सम्बोधित किया जाता है। तो क्या धर्म वे हैं? नहीं, यह कोई आवश्यक नहीं कि धर्मेन्द्र नाम होने से कोई धर्म का इन्द्र हो जाता है, भई कलयुग है, धोखाधड़ी का ज़माना है!!
पर भई, जीवन में धर्म के महत्व को जानने या बताने से पहले यह तो बतलाओ कि धर्म है क्या? वास्तव में बात यह है कि धर्म की परिभाषा कोई नहीं जानता, जानता होता तो इतना भ्रमित न होता वह सामाजिक पशु जो मनुष्य के नाम से जाना जाता है। यही कारण है कि प्रत्येक व्यक्ति, समुदाय आदि ने धर्म की अपनी अपनी परिभाषाएँ रच ली हैं, और इस प्रकार उन अनेकों समुदायों की उत्पत्ति हुई जिन्हें मुसीबत से बचने के लिए हम धर्म कहे देते हैं। पर इतने सारे धर्म? कौन सा सही है? क्या हिन्दु धर्म या इस्लाम? सिख धर्म या ईसाई धर्म? जैन धर्म या बौद्ध धर्म? कहाँ जाएँ? किसे मानें, किसे न मानें? तौबा!!
मेरा मानना है कि यह व्यक्ति का अपना स्वतंत्र निर्णय होना चाहिए कि वह किसे मानता है। मनुष्य का कर्म ही उसका धर्म है, यह मेरा मानना है। धर्म इसके अतिरिक्त कुछ नहीं है। मेरा जन्म एक हिन्दु अग्रवाल परिवार में हुआ है। अन्य बालकों की तरह मैं भी हिन्दु धर्म की महानता का बखान और रामायण आदि सुनते हुए बड़ा हुआ, पर जैसे जैसे मेरी बुद्धि ने सोचना समझना आरम्भ किया और जैसे जैसे मैं हिन्दु धर्म के ग्रन्थ आदि पढ़ता गया, ज्ञान का प्रकाश उज्जवल होता गया और मैं तथाकथित धर्म की काली छाया से दूर होता गया। मेरी आरम्भिक शिक्षा दीक्षा आर्य-समाजी स्कूल में हुई पर १२-१३ वर्ष की आयु तक पहुँचते पहुँचते मुझे काफ़ी अधिक ज्ञान मिल चुका था, उतना नहीं जितना गौतम बुद्ध को बोधी वृक्ष के नीचे मिला था(अब भई मैं उस वृक्ष के नीचे नहीं बैठा था इसलिए मुझे उतना नहीं मिला), परन्तु फ़िर भी उस समय के लिए काम चलाऊ था, इसलिए मैंने हिन्दु धर्म को तथा किसी भी तथाकथित अन्य धर्म को मानना छोड़ दिया। आमतौर पर मैं प्रत्यक्ष में किसी धर्म की आलोचना नहीं करता, भई जिसको मानना है माने, जिसको नहीं मानना वह न माने, कोई गुण्डागर्दी थोड़े ही है, पर जब कोई किसी धर्म का प्रचार अपना उल्लू सीधा करने के लिए या लोगों को बरगलाने के लिए करता है तो खून खौल जाता है।
अब ऐसा ही वाक्या कल सांय काल हुआ। विक्रमी संवत् के नव वर्ष के आरम्भ के उपलक्ष्य में हमारे घर के पास हिन्दु सभा का आयोजन हुआ था, हमें भी निमंत्रण मिला आने का। मेरा तो मन नहीं था जाने का, परन्तु माताश्री बोलीं कि चले चलो तो मैं उनको लेकर चल दिया। जब हम पहुँचे तो कार्यक्रम ज़रा गर्मी पर था, आरम्भ हुए समय हो गया था, और एक साहब(जो कदाचित् विश्व हिन्दु परिशद के अखिल भारतीय सचिव थे) प्रवचन दे रहे थे। प्रवचन क्या, वे भारत और हिन्दु धर्म की महानता का बखान कर रहे थे। महाशय की बात पर थोड़ा ध्यान दिया तो पता चला कि वे सभासदों से प्रश्न कर रहे थे कि भारत को, जिसकी सभ्यता का इतिहास सबसे पुराना है, उसे आज क्या हो गया है? फ़िर वे बात करने लगे उस समय की जब अलेक्ज़ान्डर(यानि सिकन्दर महान) ने भारत पर हमला किया था। अफ़ग़ानिस्तान और खैबर पास के रास्ते भारत में घुसे सिकन्दर को उन साहब के अनुसार वीर भारतीय सेनानियों ने मार भगाया था, और मारा भी ऐसा था कि २५ वर्ष की अल्प आयु का वह विश्व विजेता वापस अपने देश यूनान जीवित न पहुँच पाया था। अब उन महाशय को मैंने सही तथ्य बताना अपने समय की बर्बादी समझा वरना उन्हें मैं बताता कि सिकन्दर को भारतीय सेनानियों ने नहीं मार भगाया था, बल्कि उसके बीमार पड़ जाने और सेना में विद्रोह हो जाने के कारण उसे वापसी करनी पड़ी थी और उसकी (जहाँ तक मैंने पढ़ा है) पीलिया के कारण मृत्यु हो गई थी। दूसरी बात, उस समय यूनान एक देश न था बल्कि अलग अलग राज्यों में बँटा हुआ था(ठीक हमारे भारत की तरह) और सिकन्दर का देश इसलिए मेसेडोनिया था जो कि आज मेसेडोनिया गणराज्य है!!
परन्तु तथ्यों से अन्जान वे साहब अपना प्रवचन ज़ारी रखे हुए थे कि उस समय भारत अजेय था क्योंकि वीर हिन्दु बसते थे और हिन्दु धर्म का प्रकाश फ़ैला हुआ था। पर आज़ादी के बाद धर्मनिर्पेक्षता के नाम पर वोट बटोरने की खातिर हिन्दु धर्म को कुचला गया, उसकी महिमा कम करने की कोशिश की गई। अरे, मैं उन साहबान से पूछना भूल गया कि ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से वे सीधे ही ढाई हज़ार वर्ष बाद के समय में क्यों आ गए, बीच के हज़ार-डेढ़ हज़ार वर्ष के मुस्लिम और अंग्रेजी शासन को क्यों कर अनदेखा कर गए। कुतुबुद्दीन-ऐबक से लेकर महारानी ऐलिज़ाबेथ तक, वीर हिन्दु सेनानी काहे नींद मारते रहे भाई, क्या हिन्दुत्व उस समय सो गया था!!
जिन्होंने उस सिकन्दर को मार भगाया था जिसने अपने कुछ चालीस हज़ार की सेना से पर्सिया की दो-ढाई लाख़ की सेना को मार भगाया था और लगभग पूरा ज्ञात विश्व जीत लिया था, उन लोगों का हज़ार वर्ष तक ग़ुलामी में रहना, और अन्त में मात्र कुछ मुट्ठीभर अंग्रेज़ों के ज़ुल्म सहना, बात कुछ हज़म नहीं होती भई, शायद हाजमोला ले जानी चाहिए थी(अब वे ही तो अपने विज्ञापन में कहते हैं, हज़म सब चाहो जब)!!
अभी नीन्द आने ही लगी थी मुझे कि एहसास हुआ कि जो लोग बोर से कुर्सियों पर बैठे थे अचानक उठ कर बाहर जाने लगे थे। अब भई उन साहब का प्रवचन इतना भी बोर नहीं था कि लोग उठ कर जाने लगें। सो कारण जानने के लिए मैं भी बाहर ही लपक लिया। बाहर जाकर पता चला कि भोजन लगना आरम्भ हो गया था इसलिए सभी भुक्कड़ बाहर भागे जा रहे थे, भई फ़ोकट का खाना खाने ही तो सभी आए थे।
पर प्लेट लेने की मारामारी देख मैं सकते में आ गया। अभी तक संभ्रात से दिखने वाले लोग असभ्य भुक्कड़ों की तरह प्लेटें लेने के लिए मरे जा रहे थे, क्योंकि वे आयोजन समिति के समझदार लोगों के सुरक्षित हाथों में थी। और तो और, पास ही मन्दिर के बाहर बैठे भिखारी आदि भी फ़ोकट के खाने का मज़ा लेने आ गए थे। इतनी मारा-मारी थी कि बस पूछो ही मत!! और अन्दर वो साहब पूछ रहे थे कि हमारे भारत को क्या हो गया है। मन तो किया कि उनको बाहर लाऊँ और दिखाऊँ कि भारत को क्या हो गया है, पर पुनः मन की इच्छा मन ही में दबी रह गई!!
माताश्री आईं और बोली कि हमे भी खा पी लेना चाहिए, तो मैंने पूछा कि कहाँ खाएँ पिएँ, यहाँ तो मारा मारी मची हुई है!! तो अन्त में फ़िर एक रेस्तरां में गए और वहाँ पेट पूजा की!!
तो भई जिस तरह यह एक उदाहरण था एक धर्म का, उसी तरह सभी धर्मों के सैकड़ों अन्य उदाहरण हैं। ये तथाकथित धर्म मेरी नज़र में मात्र एक बकवास हैं, ये तभी अच्छे थे जब अपने आरम्भिक समय में ये मानवता तथा कर्म की शिक्षा देते थे। परन्तु अपने सदियों के सफ़र के दौरान ये बिगड़ते गए हैं और आज जो हम देखते हैं वह उनका अति विकृत रूप है।
मेरे अनुसार, मनुष्य का कर्म ही उसका धर्म है, उसे ही ईमानदारी से निभाते रहो, वही धर्म पालन है। आलस्य, कर्म न करना ही अधर्म है, और यदि मेरी स्मरणशक्ति धोखा नहीं दे रही है तो महाभारत में युधिष्ठिर ने यक्ष को भी यही उत्तर दिया था, तथा गीता में भी यही लिखा है कि मनुष्य को कर्म करना चाहिए, बाकी सबकी चिन्ता छोड़ देनी चाहिए।
लोगों की सबसे बड़ी मूर्खता का परिचय यही है कि वे धर्म ग्रन्थों में लिखी बातों का व्यवहारिक अर्थ लेने की बजाय आक्षरिक अर्थ ले लेते हैं। तो किसी भी धर्म से अधिक दोष उसे मानने वालों का है। जहाँ तक मेरा ज्ञान कहता है, किसी धर्म में नहीं लिखा कि भक्तजनों को आँख मूँद कर हर बात मान लेनी चाहिए, प्रश्न करना मनुष्य का स्वभाव है और उसे नहीं बदलना चाहिए, क्योंकि जिस मनुष्य में प्रश्न करने की क्षमता नहीं होती उसका ज्ञान भी सीमित ही होता है। परन्तु आमतौर पर लोग करते यही हैं, धर्म के प्रवचनों का आँख मूँद पालन करते हैं।
अब जैसे कि गीता में लिखा है:
यदा यदा हि धर्मस्य, ग्लानिर् भवती भारत:
अभ्युथानम् अधर्मस्य, तदातमानम् सृजाम्यहम्,
परित्राणाय साधूनाम्, विनाशाए च् दुष्कृत:,
धर्म संस्थापनार्थाय, सम्भवामी युगे युगे।
अब इसका लोग व्यवहारिक भाव नहीं लेते, वरन् इसका आक्षरिक अर्थ ले लेते हैं और वहीं से सारी समस्या आरम्भ हो जाती है, क्योंकि इसे पढ़ने या सुनने के बाद लोग श्रीकृष्ण की मूर्ति के सामने माथा टेकते हैं और धूप बत्ती जला देते हैं, ज्यादा हुआ तो मन्दिर में जाकर पैसे आदि चढ़ा आते हैं!!
कुछ वर्ष पहले अफ़वाह उड़ी थी कि गणेश जी की मूर्तियाँ दूध पी रही हैं, मेरी माताश्री, जो कि एक बड़ी भक्तिन हैं, दूध लेकर मन्दिर चल दी गणेश जी को पिलाने। कौतुहूलवश मैं भी चल दिया तमाशा देखने। वहाँ जाकर देखा कि ढेरों भक्त दूध पिलाने में लगे हुए हैं। अब कौन उन्हें समझाए कि एक ही दिन में इतना दूध नहीं पिलाना चाहिए, भगवन् को बदहज़मी हो जाएगी, बीमार भी हो सकते हैं। तभी मन्दिर में शोर मचा कि बाकि मूर्तियाँ भी दूध ग्रहण कर रही हैं, कदाचित उन्हें भी भूख लग आई होगी या फ़िर गणेशजी की दुर्दशा उनसे देखी न जा रही होगी। तो जो गणेशजी के पास न जा पा रहे थे, वे दूसरे देवों की मूर्तियों से ही काम चलाने लगे। परन्तु जो मैंने देखा वह किसी और भक्त ने न देखा, क्योंकि सभी अन्धे जो थे(अक्ल से, आँखों से नहीं, वरना दूध कैसे पिलाते)!! और जो मैंने देखा वह वाकई हास्यप्रद था, क्योंकि जिस दूध को भक्त जन समझ रहे थे कि देव पी रहे हैं, वह तो उनकी मूर्तियों से बहता पास बनी मोरी में जा रहा था। उस समय मुझे सभी की मूर्खता पर क्रोध आ रहा था, पर क्रोध से अधिक हँसी आ रही थी(अब अधिक क्रोध तो दिखा नहीं सकता था न, बच्चा था और माताश्री ने मेरी पिटाई कर देनी थी)। तो क्या हमारा धर्म यह कहता है? पुनः, जहाँ तक मेरा ज्ञान कहता है, नहीं, धर्म यह नहीं कहता।
वो कहावत सुनी है न, करता कोई है और भरता कोई है। ठीक वैसा यहाँ है, धर्म इतना भी बुरा नहीं है, पर लोगों के आचरण और धर्म की उनकी विक्षिप्त व्याख्या ने उसे बुरा बना दिया है। और दोषियों में सबसे आगे हैं पंडे पुरोहित आदि। पूरे मानव इतिहास में इनसे बड़ा कमीना कदाचित् ही कोई हुआ होगा। अपना उल्लू सीधा करने के लिए हर जायज़-नाजायज़ बात को धर्म का कपड़ा ओढ़ा देना इनका सदियों से कार्य रहा है, हराम की खाने के लिए इन्होंने तरह तरह के दानों की व्याख्या कर दी जो कि इनको दिया जाना चाहिए, सबसे बड़े अधर्मी तो ये ही लोग होते हैं क्योंकि ये कर्म नहीं करते, क्योंकि चौबीसों घंटे माला फ़ेरते रहने को कर्म नहीं कहते। इस पर कबीर जी का एक दोहा भी है जो कि कुछ ऐसा ही कहता है कि माला फ़ेरते युग बीते पर मन का मनका नहीं फ़िरा, मन का मनका फ़ेरना ही सच्ची अराधना है।
इस विषय पर बकबक करने के लिए बहुत सामग्री है, पर मैं और अधिक बकवास कर अपना और आपका समय व्यर्थ नहीं करना चाहता, पहले ही तीन घंटे से ऊपर का समय लग चुका है इसमें!!
तो अन्त में यही कहूँगा कि मेरे अनुसार
कर्म ही धर्म है, कर्मभूमि है धर्मक्षेत्र,
कर्मयोगी ही सच्चा भक्त है, और कर्म करना ही है मोक्ष का मार्ग।
जो कर्म न करे वही अधर्मी है, अन्धकार का प्रतीक है, इसलिए करो उसका नाश।
इसी सोच पर अब तक चलता आया हूँ और आगे भी इसी पर चलूँगा। कोई पूछे तो उसको अपने विचार अवश्य बता सकता हूँ, पर उन्हें ग्रहण करने के लिए बाध्य नहीं करता, जो माने उसका भला, जो न माने उसका(यदि मेरे कहने से हो सकता है तो उसका) भी भला।

28 responses so far ↓
युगल मेहरा // March 31, 2006 at 9:04 am
भइये इतनी फालतु बड बड ना किया कर।
मानता हूँ कि हर धर्म में कुछ खामियां रहती है। परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि तु इसकी सारे जग में बुराई करता फिरे।
हमारे हिंदू धर्म की सबसे बडी बुराई तो ये है कि इसमें तेरे जेसे लोग जन्म ले लेते है, जो अपने ही धर्म की बुराई करते रहते हैं। अबे एक मुसलमान बता दे जो अपने धर्म की बुराई कर रहा हो।
एक विश्व हिन्दु परिषद के फर्जी नेता के कारण तु पुरे धर्म को बकवास बता रहा है।
कर्म ही धर्म है यह सही है पर भाई तेरे को यह अधिकार किसने दिया कि तु उन करोडो कि भावनाओं को चोट पहुंचाए जो अपने धर्म में श्रद्धा रखते हैं।
मानता हूँ कि धर्म में खामियां होती है, पर एक बात तु भी जान ले कि इन धार्मिक संस्कारों में ही तेरा पालन पोषण हुआ है।
पंडे पुरोहित धर्म के ठेकेदार नहीं है जो तु इनके कार्यकलापों से प्रभावित होकर धर्म को ही बकवास मान ले।
कुछ समझ भाई।
धर्म तो मानव को शिक्षा देता है,
धर्मांध होना गलत है पर धर्म को नकार कर सिर्फ जन्तु ही जीवन यापन करते हैं।
Readers-cafe // March 31, 2006 at 9:52 am
सही बोले हो धर्म के लिये अब ज्यादा यहाँ क्या लिखूँ वही लिखूँगा थोड़ा निठल्ला चिंतन करके।
रवि कामदार // March 31, 2006 at 10:30 am
क्या बात है सबसे पहले अनुगूँज में लिख डाला। बहुत अछ्छे। वेसे मेरे भी ज्यादातर यही विचार है, पर जहा आपके विचार रूके है या आपने उन विचारो को रोका है (जेसे कर्म पर) वहा मैं कुछ आगे लिखना चाहूंगा। मुज़े उम्मीद है की सारे ब्लोगर के विचार एसे ही, एक जेसे हो। मैं थोडा बहुत अपने ब्लोग में पहले लिख चूका हूं लेकिन फिर भी मै यह अनुगूँज मे पहली दफा शरीक होउंगा।
sanjay | joglikhi // March 31, 2006 at 11:20 am
“कर्म ही धर्म है”
चोरी करना चोर का कर्म हैं तो क्या वह धर्म कर रहा हैं?
रवि // March 31, 2006 at 11:34 am
सच्चे मन से निकली सच्ची बात सच्चे शब्दों में आपने कही है. सच को सच रूप में रखने की हिम्मत की दाद देनी होगी.
मेरे विचार में धर्म को धर्मांधता की हद तक ये लोग मानते हैं –
अज्ञानी, ढोंगी और चालबाज (धर्म की आड़ में लूटने वाले).
Pratik Pandey // March 31, 2006 at 3:44 pm
आपने जितने भी दोष गिनाए, वह सारे ‘धर्म’ के दोष न हो कर धर्म के नाम पर किए जाने वाले आडम्बरों के दोष ज़्यादा लगते हैं। ये सभी आडम्बर लोकाचार हैं, न कि यथार्थ धर्म।
समस्या यह है कि ज़्यादातर लोगों को धर्म और लोकाचार एक ही चीज़ लगती हैं और इसका कारण है धर्म के विषय में पर्याप्त जानकारी का अभाव होना। अगर कोई वेद और गीता इत्यादि का अध्ययन करे, तो धर्म अधिक समझ सकता है। इन ग्रन्थों में आडम्बरों का कहीं भी ज़िक्र नहीं है।
लेकिन इसके अलावा एक बात यह भी है कि जनता वही करना चाहती है, जो करने में सरल होता है। वास्तविक धर्म बहुत ही कठिन है, लेकिन थोड़ा-बहुत पूजा-पाठ और मन्दिर में घण्टी हिला लेना ख़ासा आसान है। कितने लोग हैं, जो गीता में कहे गए पूर्ण नि:स्वार्थ भाव को जीवन में परिणत करने के लिये प्रयत्नशील हैं। जो अपनी देह से ऊपर उठ कर मनुष्य मात्र के लिए अपने प्राण दे सकते हैं। कितने हैं जो बुद्ध की तरह एक मेमने के लिए खुद की बलि देने को उद्यत हों।
धर्म जितना आचरण में उतरे और ये आडम्बर जितने दूर हों, उतना ही बेहतर है।
sanjay | joglikhi // March 31, 2006 at 4:02 pm
क्षमा चाहुंगा, यह लिखना अमित का हक्क था पर मुझसे रहा नहीं गया. मान्यवर युगल मेहराजी आप धार्मिक हो कर कैसी ‘तु-ता’ वाली भाषा का प्रयोग कर रहे हैं? आपको आघात लगा हैं तो आपभी अपनी बात तर्क सहीत अपने ब्लोग पर रख कर प्रतिकार कर सकते हैं. अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता का सम्मान करे.
मुझे उम्मीद हैं आप अपने विचारों को अपने ब्लोग के माध्यम से हमें अवगत करायेंगे. अनुगूंज में आपका स्वागत हैं.
आशीष // March 31, 2006 at 5:15 pm
अमित जी,
ये मैने रवि के चिठ्ठे पर भी लिखा था, यहां भी लिख रहा हूं. कृपया धर्म और आडंबर के अंतर को समझें.
आप को आडंबर से नफरत है धर्म से नही.
आशीष
Mayank // March 31, 2006 at 6:11 pm
Ye mara tir nishne per horeeeeeee
Pankaj Bengani // March 31, 2006 at 7:07 pm
धर्म का जन्म मानव ने ही दिया. चाहे अपनी सुविधा के लिए दिया हो या समाज को सही राह पर चलाने कि लिए या डराने के लिए. जो भी हो यह एक व्यक्तिगत मामला है. कोई चाहे तो इन धार्मिक विधि विधानो मे विश्वास कर सकता है, कोई चाहे तो विरोध कर सकता है. धर्म उन बहुत थोडे से सवेंदनशील मसलो से है जिनपर कभी ना खत्म होने वाली बहस हो सकती है.
और मेहराभाई, ऐसी भाषा का प्रयोग आपको शोभा नही देता. विरोध करने का भी एक तरीका होता है. अपने ब्लोग पर विरोध को प्रदर्शीत करने के लिए पोस्ट लिखीए ना! मेरे और अमित के बीच मे भी तनातनी हुई थी, पर कभी हम तु-ता पर नही उतरे!!!!
रजनीश मंगला // March 31, 2006 at 11:51 pm
हम भले ही धर्म का अध्धयन करें न करें, मानें न मानें, लेकिन जीना तो इसी दुनिया में है। जिन लोगों से आपका लेना देना है, वो अगर धर्म को बीच में लाते हैं तो आप प्रभावित होंगे ही। कैसे प्रभावित होना है, ये आपकी समझदारी है और इसी को कहते हैं धर्म को मानना या ना मानना।
Amit // April 1, 2006 at 12:43 am
युगल साहब, मैंने तो पहले ही अस्वीकरण लिख दिया था कि मुझे बेवकूफ़ बताने की जगह यहाँ से कट लेना ही आप जैसे लोगों को शोभा देता है, पर कदाचित् आपने उसे पढ़ा नहीं।
पहले तो लगा कि आपकी टिप्पणी को स्वीकृत न करूँ(वर्डप्रैस को भी वह अच्छी न लगी थी), पर सोचा क्यों नहीं, आपके जैसी संकीर्ण मानसिकता वाला व्यक्ति मैं नहीं हूँ जो अन्य व्यक्ति की सोच अपने जैसी न पाकर उसे भला बुरा कहना आरम्भ कर देता है!!
ब्लॉग मेरा है, जिव्हा मेरी है, सोच मेरी है, जितनी चाहे उतनी बड़ बड़ करूँ, मेरी मर्ज़ी। आप अपने ब्लॉग पर जो वाहियात बकवास करते हैं उसका क्या? पर मैं आपसे ऐसा कुछ नहीं कहूँगा, क्योंकि आपकी तरह अल्प बुद्धि व संकीर्ण मानसिकता का नहीं हूँ।
आगे पढ़ते रहिए, आपकी टिप्पणी का उत्तर दिया है, पर आपकी तरह असभ्य होकर “तू तड़ाक” वाली भाषा में नहीं।
और आप जैसे लोग सम्पूर्ण मानवता पर एक गन्दा धब्बा हैं। मेरे से यदि कोई पूछे कि मैं हिन्दू या मनुष्य में से कौन हूँ तो मेरा उत्तर होता है कि मैं मनुष्य हूँ। यदि कोई मेरे से पूछता है कि मैं हिन्दु और भारतीय में से कौन हूँ तो मेरा उत्तर होता है कि मैं भारतीय हूँ। पर जानते हो दोनो बार आप जैसे बुद्धिजीवी क्या उत्तर देते, यही कि वे हिन्दु हैं!!
हिन्दु धर्म का नाम भजते रहते हो, क्या जानते हो हिन्दु धर्म के बारे में? मैंने रामायण पढ़ी है, महाभारत भी पढ़ी है और गीता भी, विष्णु पुराण भी पढ़ा है और शिव पुराण भी। मैं मन्दिर भी गया हूँ और मस्जिद भी, गुरूद्वारे भी गया हूँ और गिरिजाघर भी, अब भी यदा कदा उस धर्म को मानने वाले अपने किसी मित्र के साथ चला जाता हूँ, पर उन धर्मों में विश्वास नहीं रखता और जहाँ तक मैं जानता हूँ, इनमें से किसी जगह पर जाने के लिए उस धर्म में आस्था रखना कोई अनिवार्य भी नहीं है!!
आप आयु में अवश्य मुझसे बड़े हैं, पर ज्ञान में आप मेरे समक्ष किसी नासमझ बालक के समान ही हैं। धर्मों को रूढ़िवादी सोच रखने वाले आप जैसे अल्पबुद्धि के बुढ़ऊ लोगों ने ही बदनाम किया है। और हिन्दु धर्म ही क्यों, सभी धर्मों का बँटाधार करने में आप जैसे महान लोगों का बड़ा हाथ है। और अपने ज्ञान की बातें मैंने बड़बोलेपन में नहीं कहीं, मात्र उस बात का उत्तर दिया है जो आपने अपने ब्लॉग पर मुझे “आजकल का नासमझ नौजवान” बता कर की है!!
यदि मैं गलत नहीं हूँ(और मुझे विश्वास है कि मैं गलत नहीं हूँ) तो जिन साहबान का ज़िक्र मैंने किया है वे विश्व हिन्दु परिशद के अखिल भारतीय सचिव हैं। मुझे तो वे बिलकुल असली लग रहे थे, हाँ पर मैंने उनसे अपनी पहचान सिद्ध करने के लिए किसी प्रमाण की माँग नहीं की, कदाचित् आप होते तो ऐसी दानिशमंदी आप ही दिखा सकते थे!!
भई यदि धर्म में विश्वास है तो वो किसी के कुछ कहने से क्योंकर आहत हो जाता है, विश्वास न हुआ मखमली गुड़िया हो गई जो हवा के झोंके से भी आहत हो जाए!!
और रही बात मेरे अधिकार की, तो भई मुझे अधिकार दिया है मेरे देश भारत के संविधान ने जो प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्र रूप से अपनी बात कहने का अधिकार देता है। पर शायद आप उससे वाकिफ़ नहीं हैं, क्योंकि आप न तो मनुष्य हैं और न ही भारतीय, आप तो मात्र हिन्दु हैं!!
धर्म में इस तरह की खामियाँ नहीं होती। खामियाँ तो आप जैसे लोगों में होती है जो कि अक्ल के अंधे होते हैं। और रही बात मेरे पालन पोषण की, तो एक बात बताईये, मनुष्य पहले आया कि धर्म? कदाचित् आपका उत्तर होगा कि धर्म पहले आया!!
कौन सी गुफ़ा में धतूरा खा के पड़े रहते हो? पंडे पुरोहित हिन्दु धर्म के ठेकेदार ही होते हैं, जिस तरह मौलवी इस्लाम के और पादरी ईसाई धर्म के ठेकेदार होते हैं। और इनको ठेकेदार बनाया भी आप जैसे महाजीवियों ने था!!
धर्म मानव को अवश्य शिक्षा देता है, पर कदाचित् आपको और आप जैसे हज़ारों लाखों कूढ़ मग़ज़ों को न पढ़ा पाया।
और जहाँ तक मेरा ज्ञान कहता है, हिन्दु धर्म में यह कहीं नहीं लिखा कि किसी मनुष्य को अपनी बात कहने और अपने विचार प्रकट करने से रोका जाना चाहिए!! पर ऐसी बात आप जैसे बुद्धिजीवी तो तभी जानते न जब आप हिन्दु धर्म के बारे में ज्ञान रखते!! 
Amit // April 1, 2006 at 1:21 am
अब क्या करें भई, बाद में समय मिले या न मिले, और हिन्दु सभा में होकर आने के बाद मूड कुछ अधिक ही बन गया था, सो इसलिए लिख डाला।
संजय भाई, परीक्षा ले रहे हो या मसखरी कर रहे हो?
और रहा आपके प्रश्न का उत्तर, तो हाँ, चोरी करना ही उस समय चोर का धर्म है। धर्म और मानव कल्याण को सदैव ही पर्यायवाची शब्दों के रूप में देखा जाता रहा है, पर ऐसा नहीं है। धर्म का सम्बंध व्यक्ति से होता है और मानव कल्याण ज़ाहिर है समूची मानव जाति से वास्ता रखता है। महाभारत में आचार्य द्रोण से देवेन्द्र तथा ब्रह्मा जी ने यह पूछा था कि वे अधर्म का साथ क्यों दे रहे हैं तो उन्होंने भी यही कहा था कि वे अपने धर्म के मार्ग पर हैं और पांडव अपने धर्म के मार्ग पर। ध्यान देने लायक बात यह है कि हम यहाँ व्यक्ति के धर्म की बात कर रहे हैं, मानव धर्म की नहीं। महाभारत का युद्ध आरम्भ होने से पहले दुर्योधन ने भी भीष्म पितामह से प्रश्न किया था कि यदि पितामह समझते थे कि धर्म पांडवों के साथ है तो फ़िर वे दुर्योधन के साथ क्यों हैं, तो पितामह ने भी यही कहा था कि वह व्यक्तिगत निर्णय की घड़ी है, क्योंकि धर्म का सम्बंध व्यक्ति से होता है।
धन्यवाद रवि भाई।
प्रतीक जी, मैंने गीता भी पढ़ी है, और थोड़ा बहुत ॠगवेद भी पढ़ा है। गीता में दी गई शिक्षा को मैं काफ़ी हद तक सही भी मानता हूँ, क्योंकि उसमें वास्तविक धर्म, यानि कर्म करने की शिक्षा दी गई है। और यदि आपने ध्यान दिया हो, तो ऊपर मैंने गीता की कुछ पंक्तियों को भी लिखा है, और साथ ही यह भी लिखा है कि लोग इसका व्यवहारिक अर्थ न लेकर आक्षरिक अर्थ(यानि कि literal meaning) ले लेते हैं, और सारी समस्या की जड़, धर्म को बदनाम करने का कार्य वहीं से आरम्भ हो जाता है!!
Amit // April 1, 2006 at 1:41 am
संजय भाई, होता है, कोई बात नहीं। “धर्म तो मानव को शिक्षा देता है”, वस्तुतः यह भजने वाले व्यक्ति को कदाचित् उनके धर्म ने विनम्र होना नहीं सिखाया। दूसरे व्यक्ति के विचारों को धैर्य से समझना नहीं सिखाया। तो मैं सोचता हूँ कि “धर्म” ने इनको सिखाया क्या है?
वो तो इन्होंने कर दिया है, तुरत फ़ुरत अपने ब्लॉग पर एक वाहियात पोस्ट में मुझे “आजकल का नासमझ” नौजवान, जिन्होने धर्म को गाली देना फ़ैशन बना रखा है, बताने में एक क्षण भी न गंवाया।
मैं धर्म और आडंबर के अंतर को समझता हूँ। वर्षों तक आर्य समाजी स्कूल में पढ़ने के बाद इतना तो समझ आ ही जाता है।
पर प्रश्न है कि आडंबर कहाँ से उत्पन्न होते हैं?
गूढ़ बात है आशीष भाई, पर सत्य भी है। परन्तु आज जो धर्म का विकृत रूप है, उसमें आडंबरों का समावेश है। धर्म आज वह नहीं जो उस समय थे जिस समय वे बनाए गए थे। इसलिए उनमें मेरा विश्वास नहीं है। मेरे लिए मेरा कर्म ही धर्म है, वही ईश्वर भी है, और कर्म करना पूजा। इसलिए जो धर्म मुझे किसी अन्य ईश्वर की पूजा करने को कहता है वह मुझे स्वीकार नहीं है।
पंकज भाई, शिष्टाचार विरासत में नहीं मिलता!!
सांसारिक सत्य है रजनीश भाई। इसलिए मैं ऐसे विवादों में नहीं पड़ता, क्योंकि संसार में मूर्ख अधिक हैं और सोचने समझने की शक्ति रखने वाले कम। इसलिए ऐसे विवाद मेरे अनुसार समय की बर्बादी ही हैं। विवाद तभी सही और स्वस्थ होता है जब दोनों ओर के लोग शांतिपूर्वक और बचकानी हरकतें किए बिना एक दूसरे की बात सुनते व समझते हैं। पर जहाँ लोग अपना आपा खो देते हैं, वहाँ विवाद स्वस्थ नहीं रह पाता।
प्रभात टन्डन // April 1, 2006 at 4:42 am
अमित जी,
आप्के ब्लाग को पढते हुये बिल्कुल ऐसा लग रहा हे कि जेसे कि यह मेरे अपने ही विचार हों, युग्ल जी का कहना कि ‘ अबे एक मुसलमान बता दे जो अपने धर्म की बुराई कर रहा हो। ‘ के बारे में मे इतना ही कहना ही चाहूगां कि अगर गदगी अपने घ्रर में हो तो लोग सफ़ाई करने दूस्ररे के घ्रर नही जाते।
प्रभात टन्डन
युगल मेहरा // April 1, 2006 at 2:16 pm
मान्यवर
अमित गुप्ता जी
मेरी कठोर प्रतिक्रिया द्वारा आपको जो ठेस पहूंची है उसके लिये मैं क्षमा प्रार्थी हूँ।
Amit // April 1, 2006 at 6:42 pm
हाँ तो भई, क्षमा उसे किया जाता है जो वाकई शर्मिन्दा हो। पर जो अनाप शनाप बकना जारी रखे उसे क्षमा कैसी? तो युगल महोदय, आपकी वाहियात बाते बहुत सुन लीं, अब आपके द्वारा की गई हर टिप्पणी अब से मैं अपने प्रत्येक ब्लॉग से मिटा दिया करूँगा, इसलिए अब से अपने वाहियात विचारों से मेरे किसी भी ब्लॉग को दूषित करने के प्रयत्न से बचें।
आप जैसी तीसरे दर्जे की सोच वाले लोग ही कारण हैं हमारे समाज और देश के पिछड़ेपन का। दूसरों को तो कुछ भी अंट शंट बकते रहो, पर यदि कोई उसका प्रतिउत्तर देता है तो आप जैसों के मिर्ची लग जाती है!!
जब बकने की हिम्मत है तो सुनने का भी जिगरा रखो, अन्यथा अपना मुँह बन्द रखो। किसी की कही बात को तोड़ मरोड़ कर अपनी अल्प बुद्धि के अनुसार गलत रूप से पेश करना तो कोई आप से सीखे!!
कभी किसी ढ़ंग के स्कूल गए होगे तो यह अवश्य पढ़ा होगा:
वैसे तो जहाँ तक मैं समझता हूँ, तीसरे दर्जे के सरकारी स्कूलों में भी कम से कम यह तो पढ़ा ही देते हैं, पर यह तो आप ही बता सकते हैं, क्यों कि इतनी उम्र होने के बाद भी बालपन नहीं गया, वही छोटे बच्चों की तरह व्यंग्य करना और तंज कसना जारी है!!
यदि मुझे आपकी कोई परवाह होती तो आपके भविष्य को लेकर वाकई मैं बड़ा चिन्तित होता, पर मेरी बला से, तेल लो!!
जीतू // April 2, 2006 at 10:44 am
यहाँ तो भीषण महासंग्राम चल रहा है। सबसे पहले तो अमित को बधाई कि सबसे पहले लिख कर क्लास मे पहले पहले पहुँचा। ब्लॉग हमारे विचारों को अभिव्यक्ति है, इस अभिव्यक्ति से हमे कोई नही रोक सकता। ना तो हम ईरान मे है और ना ही चीन में जहाँ ब्लॉगरो को ढूंढ ढूंढ कर हड़काया जा रहा है। धर्म से सम्बंधित विचार मै अपने ब्लॉग पर ही लिखूंगा।
युगल भाई, सबसे पहले तो मै आपकी टिप्पणी के लिए कहना चाहूंगा, कि आप भी स्वतन्त्र है, लेकिन आपने ब्लॉग शायद बीच से पढना चालू किया था, और पूरा भी नही पढा, लेकिन दन्न से टिप्पणी दे मारी।आप अमित के विचारों से सहमत हो या ना हो, लेकिन अपनी असहमति को शिष्ट भाषा मे व्यक्त करिये, हो सके तो अमित के विचारों पर अपने विचार प्रकट कीजिए, लेकिन अपने ब्लॉग पर।
और अमित भाई, यदि युगल ने क्षमा मांगी है तो उसे क्षमादान देने मे काहे पंगा कर रहे हो। आखिर वो भी हमारा ब्लॉगर भाई है।इसलिये बीती बात बिसार के आगे की सुध लेई, अपना अपना लेखन चालू रखे। ये सिर फ़ुट्टवल तो होती रहेगी, लेकिन सिर्फ़ विचारों मे ही तो अच्छा रहेगा। आपस मे मत भिड़ो। ॐ शान्ति शान्ति शान्ति।
Amit // April 2, 2006 at 3:14 pm
जीतू भाई, वह अल्प बुद्धि का बुढ़ऊ क्षमा नहीं माँग रहा वरन् मुझ पर सीधे सीधे तंज कस रहा है, व्यंग्य कर रहा है, और अपने को घणा श्याना समझ रहा है। यकीन न हो तो अपनी पिछली टिप्पणी में मैंने जो अनाप शनाप को लिंक किया है, उसे पढ़ लो।
निठल्ला चिन्तन » धर्म बोले तो……. // April 4, 2006 at 8:59 am
[...] इस बार काफी दिनों बाद अनुगूँज का आयोजन किया गया और इसकी गूँज इधर उधर सुनायी भी गई। इस बार का विषय है - मेरे जीवन में धर्म का महत्व। वैसे अगर देखा जाय तो हेमामालिनी जी भी काफी कुछ इसमें लिख सकती हैं लेकिन उनको कहे कौन। उनके धर्म पे ज्यादा जोर ना दे कर हम थोड़ा अपने धर्म की बात कर लेते हैं। [...]
रा च मिश्र // April 5, 2006 at 10:12 pm
अरे अमित, आपने किसी को बुढऊ बना दिया।
अब वो परेशान है ये साबित करने मे कि…।
है न मज़ेदार!
Amit // April 6, 2006 at 5:23 am
मिश्र जी, उन साहब को बुढ़ऊ उनके अपने शब्दों ने कहलवाया है। अब आप ही बताएँ, जो मुझे “आजकल का नौजवान” कहकर व्यंग्य करे वो कौन होगा?
अब चूंकि मैं “आजकल का नौजवान” हूँ तो इसलिए किसी दूसरे “आजकल के नौजवान” पर व्यंग्य करूँगा तो उसे “आजकल का नौजवान” कहकर तो नहीं करूँगा न, क्योंकि मैं स्वयं भी वही हूँ। 
जगदीश // April 19, 2006 at 10:04 pm
अमित जी,
किसी भी धर्म का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि बदलते समय के साथ अपने को बदल सके, हर युग को अपना सा लगे और युवाओं को अपना भविष्य उस में नजर आए. हर मौसम में नए पत्ते आएंगे और पुराने सूख कर गिर जाएंगे. संकीर्णताओं में बंधा धर्म या तो बदलेगा या समाप्त हो जाएगा. एक जगह रुकने से तो पानी भी सड़ने लगता है. जब हम सवाल पूछते हैं तो इन रुके हुए पानियों पर पत्थर पड़ता है और जमी हुई काई हटती है. ये पोंगे लोग जो जरा जरा सी बात पर (गत्ते की) तलवारें निकाल लेते हैं यही धर्म की हानि करते हैं.
अवलोकन : अनुगूजँ 18- मेरे जीवन में धर्म का महत्व at अक्षरग्राम // April 24, 2006 at 10:55 am
[...] पहला लेख अमित ने लिखा हैं, जिसमें धर्म के ठेकेदारों पर जम कर प्रहार किये हैं. वे इसे स्वीकारते भी हैं- “इस लेख में आलोचना भी है और एकाध जगह पर कुछ अधिक ही हो गई है” नहीं भई यह आपका कर्म हैं किये जाओ क्योंकि आपके अनुसार- ”मनुष्य का कर्म ही उसका धर्म है, यह मेरा मानना है। धर्म इसके अतिरिक्त कुछ नहीं है। “ अमित आगे लिखते हैं- “लोगों की सबसे बड़ी मूर्खता का परिचय यही है कि वे धर्म ग्रन्थों में लिखी बातों का व्यवहारिक अर्थ लेने की बजाय आक्षरिक अर्थ ले लेते हैं। तो किसी भी धर्म से अधिक दोष उसे मानने वालों का है।“ धर्म के ठेकेदारों पर- “अपना उल्लू सीधा करने के लिए हर जायज़-नाजायज़ बात को धर्म का कपड़ा ओढ़ा देना पंडे पुरोहित आदि का सदियों से कार्य रहा है, हराम की खाने के लिए इन्होंने तरह तरह के दानों की व्याख्या कर दी जो कि इनको दिया जाना चाहिए, सबसे बड़े अधर्मी तो ये ही लोग होते हैं क्योंकि ये कर्म नहीं करते, क्योंकि चौबीसों घंटे माला फ़ेरते रहने को कर्म नहीं कहते।“ कुल मिला कर कर्म ही धर्म हैं. [...]
prabhu // June 3, 2006 at 2:28 am
by god kya ho raha hai yanha bhai logo !!
Rachana // August 24, 2006 at 2:44 pm
the first and foremost lesson of any religion is “respect” and “tolerence”.. both are missing badly today!!!
Amit // August 24, 2006 at 7:24 pm
सही कहा रचना जी, परन्तु ये दोनों चीज़े तो पहले भी नहीं थी, इतिहास इस बात का गवाह है। और कुछ धर्मों की तो नींव ही इन दोनों के शवों पर रखी गई है, उन धर्मों को शुरु करने वाले महात्माओं की शिक्षाओं के प्रतिकूल।
rajeev // August 16, 2007 at 10:33 pm
WHAT EVER YOU HAVE WRITTEN I LIKE BECAUSE YOU WRITE EVERY WORD WRITE
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