दुनिया मेरी नज़र से - world from my eyes!!

Entries from April 2006

हम हैं इस पल यहाँ …..

April 22, 2006 · 7 Comments

बहुत दिनों बाद कुछ लिख रहा हूँ। क्यों? यूँ ही, खुरक मच रही थी कि काफ़ी दिन हो गए कुछ लिखा नहीं, सो इसलिए कुछ लिख डालते हैं। पिछली बार जब कुछ लिखा था तो हंगामा हो गया था!! विषय कुछ शीघ्रग्राही था, या यूँ कहें कि समाज के एक वर्ग ने इसे ऐसा बना रखा है। बहरहाल अब उस बवाल से उठी धूल बैठ चुकी है। पर इस बीच न लिखने का कारण यह नहीं था। बल्कि कोई एक कारण न होकर कई कारण हैं जिनका थोड़ा थोड़ा योगदान रहा है, जैसे कि एकाएक मेरा कुछ अधिक व्यस्त हो जाना, फ़िर इस सप्ताह के आरम्भ में वर्डप्रैस डॉट कॉम पर हुई समस्या के कारण इस ब्लॉग की ऐसी की तैसी फ़िर जाना(जिसे कि हांलाकि बाद में सुलटा लिया गया था)। साथ ही एक ऊब सी होने लगी थी, मैंने अपने किसी अन्य ब्लॉग पर भी काफ़ी अरसे से कुछ नहीं लिखा है। अगर इतना पर्याप्त नहीं था तो एक बड़ा कारण था कि कुछ अन्य चीज़ों की ओर ध्यान केन्द्रित हो गया था(है) और उस समय ब्लॉग पर कुछ लिखना समय की बर्बादी लगा। मेरे साथ ऐसा अक्सर होता है कि किसी नई चीज़ की ओर आकर्षण बढ़ता है और फ़िर उस पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए किसी मौजूदा क्रिया का बलिदान देना पड़ता है, भई अब समय तो आखिर अपनी अंटी में उतना ही है न, आकर्षण के साथ साथ वो थोड़े ही बढ़ता है!! ;)

इधर लोग बाग़ बराबर अपनी अपनी छतियाने में लगे हुए थे(फ़िलहाल रूक गए, भई आखिर कितना छतियाएँगे)। एकबारगी तो मुझे लगा कि कही यह बर्ड फ़्लू की तरह न फ़ैल जाए, क्योंकि उस हाल में अपने को इसके टलने तक नारद दर्शन के लिए जाना बन्द करना पड़ता, नहीं तो अपने बीमार होने का खतरा होता। वैसे तो अपन इससे पूरी तरह निरापद हैं पर फ़िर भी क्या भरोसा, जाने कब क्या हो जाए!! ;)

बस अब बहुत हुआ, सुबह हो रही है(६ बजने को हैं), सप्ताहांत है(सारा का सारा यहाँ ही थोड़े न बिताना है) और एक लंबी नींद लेने की इच्छा है(इच्छा ही रहेगी), इसलिए अब बक-बक बंद करते हैं। खुरक उतर चुकी है, तो इसलिए अभी कुछ और समय तक नहीं उठने वाली, अभ्यास हो गया है लंबे समय तक दबाने का(खुरक को, और किसे!!), इसलिए न जाने अब फ़िर कब हों हम यहाँ …..

Categories: mindless rants · फ़ालतू बड़बड़

बुराई है आवश्यक …..

April 6, 2006 · 7 Comments

बुराई, अनाचार, अधर्म, अज्ञानता आदि सभी ऐसे भाव हैं जिन्हें कोई व्यक्ति अपने आसपास नहीं फ़टकने देना चाहता। परन्तु फ़िर भी इनका समावेश प्रत्येक व्यक्ति में है!! हर कोई इनका नामोनिशान मिटा देना चाहता है, परन्तु आजतक सफ़ल कोई न हो सका, और वह दिन बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण होगा जिस दिन इनका नाश हो जाएगा!!

क्यों? क्या आश्चर्य हो रहा है कि मैं अब धर्म की आलोचना के बाद बुराई की वकालत क्यों कर रहा हूँ? ;) नहीं, मैं शैतान या इबलीस का उपासक नहीं बन गया हूँ। इस वकालत के पीछे भी एक कारण है, बहुत गूढ़ कारण है, और दुर्भाग्यवश बहुत से लोगों को इसका ज्ञान नहीं है।

पहली बात तो यह कि “शैतान” या “इबलीस” क्या है? यह बुराई का प्रतीक है, आम भाषा में कहा जाए तो यह सभी बुरे कर्म करने वालों का स्वामी है, ईश्वर का प्रतिद्वन्द्वी है, उसकी विपरीत शक्ति है। जिस तरह ईश्वर के उपासक सद्कर्मों में अपना समय लगाते हैं, वहीं शैतान के उपासक बुरे कर्मों में अपना समय और ऊर्जा व्यतीत करते हैं।

पर क्या कभी सोचा है कि यह शैतान कहाँ से आया? इसकी उत्पत्ति कैसे हुई? कई विद्वानों का मानना है कि इसकी उत्पत्ति नहीं हुई, यह भी ईश्वर की तरह ही अनश्वर और अनंत है, तो कुछ अन्य विद्वानों का मानना है कि ईश्वर ने ही शैतान की उत्पत्ति की थी। हिन्दु पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि सुर और असुर एक ही पिता की सन्तानें थीं, जो सदाचार की ओर मुड़ गए वे सुर(देवता) कहलाए, जिन्होंने अनाचार को अपना लिया वे असुर कहलाए।

पर प्रश्न है कि बुराई कभी समाप्त क्यों नहीं होती, क्यों नहीं शैतान खत्म होता और क्यों नहीं सभी ईश्वर के उपासक बन सदाचार की ओर मुड़ते?

इसका उत्तर सरल भी है और पेचीदा भी। एक पल के लिए कल्पना कीजिए कि बुराई का अन्त हो जाता है, शैतान तथा दुष्कर्म समाप्त हो जाते हैं, चारों ओर सच्चाई का बोलबाला है। यदि ऐसा हो जाता है तो क्या कोई सच्चाई को पहचान पाएगा? क्या उसका कोई मूल्य रह जाएगा? नहीं, क्योंकि उस समय हमें सच्चाई की कोई आवश्यकता नहीं रह जाएगी, ईश्वर की शरण में कोई नहीं जाएगा, क्योंकि बुराई तो है नहीं, झूठ कोई बोलता नहीं। यह ठीक वैसा ही है जिस तरह कोई भी एक सा भोजन सदैव नहीं कर सकता, क्योंकि कुछ समय बाद वह ऊब जाता है।

इसी तरह अज्ञानता भी कभी समाप्त नहीं हो सकती, प्रत्येक व्यक्ति ज्ञानी नहीं हो सकता। सम्पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति किसी को नहीं हो सकती, कुछ न कुछ तो ऐसा रह ही जाता है। अज्ञानता के कारण ही हमें ज्ञान की कद्र है, उससे लगाव है तथा उसे पाने का प्रयत्न करते हैं।

हम दोषहीन अथवा “परफ़ेक्ट” संसार में नहीं रहते। जिस दिन ऐसा हो गया, उस दिन जीवन का अर्थ समाप्त हो जाएगा, विकास रूक जाएगा और मनुष्य की जीवन के प्रति रूचि समाप्त हो जाएगी।

अच्छाई और बुराई एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, एक के बिना दूसरा निरर्थक है। इन दोनों का ही प्रभाव कम ज्यादा अवश्य हो सकता है परन्तु नाश किसी का नहीं हो सकता। ये हमेशा से ही हाथ में हाथ डाले साथ चलती आई हैं, और सदैव ही चलती रहेंगी। मनुष्य भी कोई अच्छा या बुरा नहीं होता। व्यक्ति के अन्दर अच्छाई और बुराई, दोनों का ही समावेश होता है, बात सिर्फ़ यह होती है कि इनमें से किसी एक का प्रभाव उस पर दूसरे से अधिक होता है, जिसके कारण व्यक्ति अच्छे या बुरे कर्म करता है।

तो जो लोग बुराई का नाश करने का नारा लगाते हैं, उन्होंने अज्ञान की चादर ओढ़ रखी है, वे नहीं जानते कि वे क्या कह रहे हैं और वह सम्भव है भी या नहीं!!

Categories: some thoughts · कुछ विचार