बुराई, अनाचार, अधर्म, अज्ञानता आदि सभी ऐसे भाव हैं जिन्हें कोई व्यक्ति अपने आसपास नहीं फ़टकने देना चाहता। परन्तु फ़िर भी इनका समावेश प्रत्येक व्यक्ति में है!! हर कोई इनका नामोनिशान मिटा देना चाहता है, परन्तु आजतक सफ़ल कोई न हो सका, और वह दिन बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण होगा जिस दिन इनका नाश हो जाएगा!!
क्यों? क्या आश्चर्य हो रहा है कि मैं अब धर्म की आलोचना के बाद बुराई की वकालत क्यों कर रहा हूँ?
नहीं, मैं शैतान या इबलीस का उपासक नहीं बन गया हूँ। इस वकालत के पीछे भी एक कारण है, बहुत गूढ़ कारण है, और दुर्भाग्यवश बहुत से लोगों को इसका ज्ञान नहीं है।
पहली बात तो यह कि “शैतान” या “इबलीस” क्या है? यह बुराई का प्रतीक है, आम भाषा में कहा जाए तो यह सभी बुरे कर्म करने वालों का स्वामी है, ईश्वर का प्रतिद्वन्द्वी है, उसकी विपरीत शक्ति है। जिस तरह ईश्वर के उपासक सद्कर्मों में अपना समय लगाते हैं, वहीं शैतान के उपासक बुरे कर्मों में अपना समय और ऊर्जा व्यतीत करते हैं।
पर क्या कभी सोचा है कि यह शैतान कहाँ से आया? इसकी उत्पत्ति कैसे हुई? कई विद्वानों का मानना है कि इसकी उत्पत्ति नहीं हुई, यह भी ईश्वर की तरह ही अनश्वर और अनंत है, तो कुछ अन्य विद्वानों का मानना है कि ईश्वर ने ही शैतान की उत्पत्ति की थी। हिन्दु पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि सुर और असुर एक ही पिता की सन्तानें थीं, जो सदाचार की ओर मुड़ गए वे सुर(देवता) कहलाए, जिन्होंने अनाचार को अपना लिया वे असुर कहलाए।
पर प्रश्न है कि बुराई कभी समाप्त क्यों नहीं होती, क्यों नहीं शैतान खत्म होता और क्यों नहीं सभी ईश्वर के उपासक बन सदाचार की ओर मुड़ते?
इसका उत्तर सरल भी है और पेचीदा भी। एक पल के लिए कल्पना कीजिए कि बुराई का अन्त हो जाता है, शैतान तथा दुष्कर्म समाप्त हो जाते हैं, चारों ओर सच्चाई का बोलबाला है। यदि ऐसा हो जाता है तो क्या कोई सच्चाई को पहचान पाएगा? क्या उसका कोई मूल्य रह जाएगा? नहीं, क्योंकि उस समय हमें सच्चाई की कोई आवश्यकता नहीं रह जाएगी, ईश्वर की शरण में कोई नहीं जाएगा, क्योंकि बुराई तो है नहीं, झूठ कोई बोलता नहीं। यह ठीक वैसा ही है जिस तरह कोई भी एक सा भोजन सदैव नहीं कर सकता, क्योंकि कुछ समय बाद वह ऊब जाता है।
इसी तरह अज्ञानता भी कभी समाप्त नहीं हो सकती, प्रत्येक व्यक्ति ज्ञानी नहीं हो सकता। सम्पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति किसी को नहीं हो सकती, कुछ न कुछ तो ऐसा रह ही जाता है। अज्ञानता के कारण ही हमें ज्ञान की कद्र है, उससे लगाव है तथा उसे पाने का प्रयत्न करते हैं।
हम दोषहीन अथवा “परफ़ेक्ट” संसार में नहीं रहते। जिस दिन ऐसा हो गया, उस दिन जीवन का अर्थ समाप्त हो जाएगा, विकास रूक जाएगा और मनुष्य की जीवन के प्रति रूचि समाप्त हो जाएगी।
अच्छाई और बुराई एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, एक के बिना दूसरा निरर्थक है। इन दोनों का ही प्रभाव कम ज्यादा अवश्य हो सकता है परन्तु नाश किसी का नहीं हो सकता। ये हमेशा से ही हाथ में हाथ डाले साथ चलती आई हैं, और सदैव ही चलती रहेंगी। मनुष्य भी कोई अच्छा या बुरा नहीं होता। व्यक्ति के अन्दर अच्छाई और बुराई, दोनों का ही समावेश होता है, बात सिर्फ़ यह होती है कि इनमें से किसी एक का प्रभाव उस पर दूसरे से अधिक होता है, जिसके कारण व्यक्ति अच्छे या बुरे कर्म करता है।
तो जो लोग बुराई का नाश करने का नारा लगाते हैं, उन्होंने अज्ञान की चादर ओढ़ रखी है, वे नहीं जानते कि वे क्या कह रहे हैं और वह सम्भव है भी या नहीं!!


7 responses so far ↓
समीर लाल // April 6, 2006 at 6:59 am
अमित भई
बहुत जबरस्त सोच है आपकी…अच्छा लगता है आपके विचारों को सुन कर.
बधाई
समीर लाल
आशीष // April 6, 2006 at 9:13 am
जी हां ये तो वैसा ही है जैसे
१. बिमारीया ना हो तो इलाज कैसा(डाक्टर वैध सब भूखे मर जायेंगे)
२.वायरस ना हो तो ऎंटी वायरस का क्या मतलब
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रवि कामदार // April 6, 2006 at 11:03 am
कोइ गेंग चालू करने का इरादा है क्या? “डेविल कंपनी”?
Amit // April 6, 2006 at 1:51 pm
किससे सुनते हैं मेरे विचार?
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आशीष भाई, ज़रा एक पल के लिए सोच कर तो देखो कि जो मैंने कहा(लिखा) है वह सही है कि नहीं। अगर वाकई ध्यान से सोचोगे तो मेरी बात सही लगेगी। नहीं लगने पर तो मैं यही कहूँगा कि ध्यान से नहीं सोचा!!
गांधी जी सप्ताह में एक दिन उपवास करते थे। अब वे यह उपवास किसी देवी-देवता को प्रसन्न करने के लिए नहीं करते थे, उनका कहना था कि भूखे को ही भोजन की कद्र होती है, इसलिए सभी को कभी कभी उपवास रखना चाहिए ताकि अन्न का महत्व उन्हें सदा याद रहे और वे कभी उसका अनादर न करें।
मेरा यह मानना है कि पुरातन काल से जो व्रत आदि रखने की परंपरा चली आ रही है, वह इसी कारण आरम्भ की गई होगी, कि लोगों को अन्न की कद्र हो। लोग इस नियम का पालन करें और नियमित रूप से उपवास रखें इसके लिए इसे धर्म आदि से जोड़ दिया गया होगा क्योंकि इस कारण तो लोग इसे मान लेते अन्यथा नहीं, और देख लो, आज भी चाहे धर्म के नाम पर ही पर लोग इस नियम का पालन करते हैं, चाहे वे हिन्दु हों या मुसलमान।
ऐसा करके क्या लाभ, पहले से ही बहुत से ऐसे गैंग मौजूद हैं!!
कुछ नई फ़ीचर आदि सोच कर शायद ऐसा गैंग बनाएँ जो कंपीटीशन को धंधे से बाहर कर दे!! 
जीतू // April 6, 2006 at 2:11 pm
ये तो प्रकृति का नियम है। अच्छाई बुराई साथ साथ चलती है। यदि बुराई ना होती तो अच्छाई की कद्र ना होती। क्योंकि तब हम अच्छाई को कम्पेयर किस से करते?
बाकी अमित तुम गैंग बनाओ, मुखिया तुमको बना देंगे।
Shrish // July 16, 2007 at 11:38 pm
त्यक्तेन भुंजीथा
“त्याग के साथ भोग करो” शास्त्र ने कहा है। अर्थात भोग का महत्व त्याग करके ही समझा जा सकता है। (ये ऊपर गांधी जी वाली बात के संदर्भ में)
बाकी बुराई का अस्तित्व सिरे से खत्म नहीं हो सकता लेकिन उसको कम करने के प्रयास तो होने ही चाहिए।
Amit // July 17, 2007 at 12:55 am
सही बात है, ठीक वैसे ही जैसे रोटी का महत्व भूखे से अधिक कोई नहीं जानता और पैसे की कीमत निर्धन से अधिक कोई नहीं समझता।
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