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क्यों ना भागें पैसे के पीछे!!

June 20, 2006 · 21 Comments

जब कोई व्यक्ति यह कह किसी पर तंज कसता है कि फ़लाना बन्दा पैसों के पीछे भाग रहा है तो मुझे उस व्यक्ति की सोच और बोल पर तरस भी आता है और गुस्सा भी आता है। अरे भई, पैसों के पीछे कौन नहीं भाग रहा? क्या पैसों के बिना गुजर बसर संभव है? हर कोई यह चाहता है कि वह अच्छे मकान में रहे, अच्छा खाए, अच्छा पहने, बढ़िया जगहों पर घूमने फ़िरने जाए, थोड़ा अपने आने वाले कल के लिए बचा के रखे, अपने बच्चों को अच्छी परवरिश दे, अपने माता पिता के बुढ़ापे को सुखमयी बनाए। तो क्या यह सोचना और इस सोच को साकार करना बुरा है? और कोई क्यों ना पैसे कमाए? किसी दूसरे के पैसे कमाने से लोगों को क्यों चिढ़ होती है? क्या उन्हें पैसे कमाना बुरा लगता है? क्या वे फ़ोकट में नौकरी आदि करते हैं? अरे यदि आपको पैसे कमाना अच्छा लगता है तो क्यों नहीं आप समय का सदुपयोग कर अपना समय पैसे कमाने में लगाते बजाय दूसरे व्यक्ति से कुढ़ने और उसपर तंज कसने के?

अब यहाँ मैं स्पष्ट करना चाहूँगा कि मैं किसी व्यक्ति पर कोई व्यंग्य नहीं कर रहा ना ही कुछ भला बुरा कह रहा हूँ। मैं एक आम संदर्भ में बात कह रहा हूँ क्योंकि फ़लाना बन्दा पैसे के पीछे भाग रहा है कह तंज कसने वाले बहुत हैं, भूतकाल में मुझे भी “पैसे के पीछे भागने वाला” के संबोधन से अलंकरित किया गया है, और वह भी उन व्यक्तियों द्वारा जो सोते जागते केवल पैसे बनाने के बारे में सोचते हैं, जो स्वयं तो बिना पैसे लिए एक काम नहीं करते और मुझ पर तंज कसा करते थे कि मैं पैसे के पीछे भागता हूँ, मात्र इसलिए कि मैं उन लोगों के साथ किसी मौके को हाथ से नहीं छोड़ता था और बिना अपना जायज़ मेहनताना लिए एक काम न करके देता था।

अभी परिचर्चा पर नीरज जी ने एक थ्रेड चालू किया, महेश भट्ट - भटका फ़िल्मकार। अब वह भटका है कि नहीं यह तो मैं नहीं जानता, परन्तु एक विषय जो वहाँ पर उठाया गया है उसके मैं विरोध में हूँ। जैसे कि नीरज जी ने थ्रेड की आरम्भिक पोस्ट में कहा:

महेश भट्ट एक निष्णात फ़िल्मकार हैं. जनम, सारांश, अर्थ, ज़ख़्म जैसी बेहतरीन फ़िल्में देने वाले भट्ट पिछले दस सालों में बेतुकी फ़िल्में बना रहे हैं. वे कहते हैं कि मैं वहीं महेश भट्ट हूं जिन्होंने सारांश और अर्थ जैसी फ़िल्में बनाईं लेकिन मुझे क्या मिला. एक नेशनल अवार्ड और साठ हज़ार रूपए. अब यह फ़िल्मकार पैसों के पीछे भाग रहा है.

इस पर सागर जी ने टिप्पणी दी:

मेरा भी यही मानना है कि एक रचनाकार चंद रुपयों के लिये अपनी प्रतिभा के साथ अपनी फ़िल्मों के लाखों चाहकों, प्रशंषकों के साथ अन्याय कर रहा है, भट्ट साहब की फ़िल्में तो पहले भी हिट होती थी रुपये तो पहले भी मिला करते थे; और क्या रुपये इस तरह की घटिया फ़िल्मों से ही मिलेंगे?

पीछे नहीं रहे प्रतीक भाई भी, उन्होंने भी टिप्पणी दन दना दी:

महेश भट्ट बहुत ही उम्दा निर्देशक हैं। उनकी इस माध्यम पर ग़ज़ब की पकड़ है। लेकिन बहुत से दूसरे निर्देशकों की ही तरह उन्होनें भी सामाजिक सरोकारों को एक तरफ़ कर पैसा कमाने की राह पकड़ ली है।

तो मेरा कहना है बन्धुओं, क्या पैसा कमाना बुरा है यदि वह गैरकानूनी रूप से ना कमाया जाए? सागर जी कहते हैं कि क्या जिस्म, मर्डर, कलयुग जैसी फ़िल्मों से ही पैसा बनाया जा सकता है? तो मैं कहूँगा कि नहीं, सिर्फ़ इन जैसी फ़िल्मों से ही पैसा नहीं कमाया जा सकता, और फ़िल्में भी पैसा कमाती हैं, पर यह फ़िल्में भी चलती हैं, और खूब चलती हैं। क्यों? यह तो आप देखने वालों से पूछो जिन्होंने एक नहीं दो नहीं वरन्‌ कई कई बार यह फ़िल्में चाव से देखी हैं। बाज़ार का सदियों से आवश्यकता-आपूर्ति का उसूल रहा है। यदि खरीददार हैं तो ही माल बाज़ार में आता है। अब ड्रग डीलरों की तरह फ़िल्म निर्माताओं ने तो इस तरह की फ़िल्में लोगों को फ़ोकट में दिखा इनका आदि नहीं ना बनाया। और इससे भी अधिक गहन फ़िल्में या कह लो पॉर्नोग्राफ़िक फ़िल्में बाज़ार में उपलब्ध हैं, तो फ़िर इस तरह की फ़िल्मों पर हल्ला क्यों? समस्या यही है कि मनुष्य सदैव से ही पाखंडी(hypocrite) रहा है, जहाँ एक चीज़ को वह नकारता है वहीं चोरी छुपे उसी चीज़ का उपयोग करता है।

मैं भारतीय संस्कृति का ढोल पीटने और उन तथाकथित सामाजिक पुलिस से पूछना चाहूँगा कि क्या औरतों को पर्दे में रखना, सेक्स आदि की बात करने का वर्जित(taboo) होना आदि, क्या यह वास्तव में भारतीय संस्कृति है?? क्या हम उसी भारतीय समाज के उत्तराधिकारी हैं जहाँ कन्याएँ अपनी पसंद का वर चुनती थीं? क्या हम उसी भारतीय संस्कृति के उत्तराधिकारी हैं जिसने कामसूत्र की रचना की, जिसने अजंता और खजुराहो की गुफ़ाओं की दीवारों पर अपनी हस्तकला द्वारा अपने ज्ञान और सोच की छाप छोड़ी? क्या मर्डर जैसी फ़िल्म आज के समाज की तस्वीर नहीं दिखाती?

बहरहाल, बात पैसे के पीछे भागने की हो रही थी और मैं संस्कृति के मुद्दे पर पहुँच गया। लोग कहते हैं कि बहुत बुरा लगता है कि फ़लाना कलाकार चंद पैसों के लिए अपनी कला के चाहने वालों के साथ अन्याय करता है, उसे बेच देता है आदि आदि। क्या चाहने वालों की गिनती से ही कलाकार की आर्थिक आवश्यकताएँ पूरी हो जाएँगी? पिकासो को मान सम्मान उनके मरने के बाद मिला, जीवन आर्थिक कठिनाईयों में प्रेमचन्द ने भी काटा जो आज पिछली शताब्दी के हिन्दी साहित्य के एक मज़बूत स्तंभ माने जाते हैं। क्या मिला ऐसे कलाकारों को? जीते जी तो कुछ हासिल हुआ नहीं, मरने के बाद किसने देखा है कि क्या पाया और क्या खोया? क्या एक कलाकार होना अभिशाप है? क्या एक कलाकार होने के अर्थ यह है कि वह व्यक्ति जीवन के भौतिक सुखों से वंचित रहे? और केवल कलाकार ही क्यों, यह बात तो हर व्यक्ति विशेष पर लागू होती है। मैं नहीं समझता कि किसी भी व्यक्ति को किसी अन्य पर यह तंज कसना शोभा देता है कि वह पैसे के पीछे भाग रहा है, यदि वह व्यक्ति कोई गैरकानूनी कार्य नहीं कर रहा तो।

मुझे अब कोई कहता है तो मेरा उत्तर यही होता है कि हाँ, मैं पैसे के पीछे भाग रहा हूँ, पर तुम उन बदनसीबों में से हो जो यह दौड़ नहीं लगा सकते, आखिर हर कोई तो पैसे के पीछे नहीं भाग सकता और बहुत कम होते हैं जो उसे पकड़ पाते हैं। यह उत्तर ठीक वैसा ही है जैसा महाभारत में हस्तिनापुर के बंटवारे से पहले श्रीकृष्ण ने द्रोणाचार्य से कहा था जब द्रोणाचार्य ने पूछा कि पांडवों का यह कैसा दुर्भाग्य है, तो श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि किसी नए नगर के निर्माण का अवसर मिलना दुर्भाग्य कहाँ है, यह तो प्रगति का मार्ग है, दुर्भाग्य तो यह दुर्योधन का है क्योंकि वह यह प्रगति की यात्रा नहीं कर सकता।

तो जो लोग सामाजिक दायित्वों और ज़िम्मेदारियों का भी प्रश्न उठाते हैं, उनसे भी मैं यह कहना चाहूँगा कि पैसे के बिना कोई कार्य नहीं हो सकता, चाहे वह निज उद्धार का हो या समाज के उद्धार का। भूखा नंगा व्यक्ति जिसके पास अपने खाने के लिए कुछ नहीं है, वह समाज का क्या उद्धार करेगा? बिल गेट्स आज विश्व के सबसे बड़े लोकोपकारी व्यक्तियों में से एक हैं जो करोड़ों डॉलर चन्दा देते हैं लोकोपकारी कार्यों के लिए। क्या यह संभव हो पाता यदि वह धनाढ्य व्यक्ति ना होते?

Categories: some thoughts · कुछ विचार

21 responses so far ↓

  • Jagdish // June 20, 2006 at 7:03 pm

    अमित भाई, एक बहुत ही बारीक रेखा होती है कला और बाजार में। एक कलाकार की कला पूरे समाज की धरोहर होती है। जैसे माँ अपने बच्चे का मार्गदर्शन बिना किसी लालच के करती है उसी प्रकार एक कलाकार समाज का मार्गदर्शन करता है। हम अर्थ और साराँश के महेश भट्ट की तुलना बिल गेट्स से नहीं कर सकते। चिट्ठाकारों को जन्म, अर्थ, साराँश और डैडी बहुत पसंद आयीं थीं और चिट्ठाकारों की परेशानी यह है कि वैसी फ़िल्में और क्यों नहीं बनाते महेश भट्ट?

  • रवि // June 20, 2006 at 9:31 pm

    पैसे के पीछे तो, वो साधु और वो संत और वो धार्मिक प्रवचन देने वाला भी भागता है जो अपने भक्तों को संतोष और मोह माया छोड़ने का प्रवचन देता है.

    पैसे के पीछे भागने में कोई बुराई नहीं. बुराई है पैसे के पीछे भागते हुए गलत रास्ते को चुनने में.

  • सागर चन्द नाहर // June 20, 2006 at 10:03 pm

    भाई साहब
    मैं अब भी आप से सहमत नहीं हुँ
    अगर पैसा कमाना ही सब कुछ है तो वेश्या के व्यवसाय ( जिसके लिये चाहे तूफ़ान हो या बाढ़ हो उसे अपने व्यवसाय की चिन्ता रहती है) में और इस तरह की फ़िल्म बनाकर पैसा कमाने में फ़र्क ही क्या रहा?
    पैसा कमाना कतई बुरा नहीं है ना ही पैसे की चाह रखना बुरा है परन्तु जायज- नाजायज के लिये हमारा हमारे देश, समाज के लिये क्या उत्तरदायित्व क्या है यह नहीं भूलना चाहिये।
    मेरे साईबर कॉफ़े में किसी को पोर्न साईट नहीं खोलने नहीं देता, चाहे मेरे व्यापार पर असर क्यों ना पड़े, अगर आप इसे बेवकूफ़ी समझते है तो मुझे यह उपाधि सहर्ष स्वीकार है।

  • सागर चन्द नाहर // June 20, 2006 at 10:05 pm

    वैसे डैडी और ज़ख्म फ़िल्म में लगभग २० बार देख चुका हुँ।

  • Amit // June 20, 2006 at 10:52 pm

    पैसे के पीछे भागने में कोई बुराई नहीं. बुराई है पैसे के पीछे भागते हुए गलत रास्ते को चुनने में.

    सही कहा रवि जी, परन्तु सही और गलत का निर्णय कौन लेता है? “सही” अथवा “गलत” महज एक दृष्टिकोण है, और प्रत्येक व्यक्ति का दृष्टिकोण समान हो यह संभव नहीं। इसलिए समाज की स्थापना हुई, कानून बनाए गए और न्यायाधीश नियुक्त किए गए।

    अगर पैसा कमाना ही सब कुछ है तो वेश्या के व्यवसाय ( जिसके लिये चाहे तूफ़ान हो या बाढ़ हो उसे अपने व्यवसाय की चिन्ता रहती है) में और इस तरह की फ़िल्म बनाकर पैसा कमाने में फ़र्क ही क्या रहा?

    वेश्यावृत्ति तथा इस प्रकार की फ़िल्में एक नहीं हैं। यह कहना बहस से बचने का एक ज़रिया मात्र हो सकता है। आप इस बात को नहीं नकार सकते कि मर्डर जैसी फ़िल्म में आज के समाज की सच्चाई प्रतिबिंबित होती है। वेश्यावृत्ति भारत में गैरकानूनी है, पर इन फ़िल्मों में ऐसा कुछ दिखाया नहीं जा रहा, ग्राफ़िक डीटेल देखने वाले की समझ पर छोड़ दी गई है।

    मेरे साईबर कॉफ़े में किसी को पोर्न साईट नहीं खोलने नहीं देता, चाहे मेरे व्यापार पर असर क्यों ना पड़े, अगर आप इसे बेवकूफ़ी समझते है तो मुझे यह उपाधि सहर्ष स्वीकार है।

    मैं आपको बेवकूफ़ नहीं कहूँगा और ना ही आप गलत हैं। पोर्न भारत में गैरकानूनी है, और यदि आप मेरी पोस्ट ध्यान से पढ़ने का कष्ट करेंगे तो आप पढ़ेंगे कि मैंने बार बार कहा है कि यदि पैसे कमाने का तरीका गैर-कानूनी नहीं है तो उसमें हानि क्या है? ध्यान दें कि इसी कारण मैं स्मगलिंग, ड्र्ग पेडलिंग आदि कार्यों का समर्थन नहीं कर रहा अन्यथा ये तो सबसे अधिक कमाऊ कार्य हैं।

    समस्या यह है कि आप लोग बात को गलत नज़रिए से देख रहे हैं। वेश्यावृत्ति से इस बात का कोई लेना देना नहीं है। यदि है तो आपको पोर्न साईटों और फ़िल्मों का विरोध करना चाहिए जो कि आप नहीं कर रहे, वरन्‌ इन हल्की फ़ुल्की फ़िल्मों पर अपना रोष प्रकट कर रहे हैं। तो भटक कौन गया है बन्धुओं? :)

  • अनूप शुक्ला // June 21, 2006 at 6:49 am

    लगभग सभी लोग इस बात पर सहमत हैं कि वैध कमाई करना पाप नहीं है। लेकिन लफड़ा तब होता है जब कमाई सांठ-गांठ से होती है। यह बात धूमिल की कविता में देखी जाय-

    और बाबूजी! असल बात तो यह है कि ज़िन्दा रहने के पीछे
    अगर सही तर्क नहीं है
    तो रामनामी बेंचकर या रण्डियों की
    दलाली करके रोज़ी कमाने में
    कोई फर्क नहीं है

  • Amit // June 21, 2006 at 11:15 am

    सही कै रिये हो अनूप जी। पर यहाँ जिस तरह कमाई की बात हो रही है, उसे सांठ-गांठ तो नहीं कहा जा सकता ना? या कहा जा सकता है?

  • सृजन शिल्पी // June 21, 2006 at 3:56 pm

    कला और कारोबार के बीच अंतर दृष्टिकोण का ही है। कला की दुनिया में सबसे अधिक दु:ख और आँसुओं का कारोबार होता है।

    हर श्रेष्ठ कलाकार अपनी कला को सार्थकता प्रदान करने के साथ-साथ कला के कारोबार में सफलता भी हासिल करना चाहता है। सिनेमा की दुनिया में अपने अस्तित्व को बरकरार रखने के लिए महेश भट्ट जैसे निर्देशकों के लिए सार्थक सिनेमा के साथ-साथ व्यावसायिक सिनेमा की तरफ ध्यान देना जरूरी है। मुझे तो ‘कलियुग’ एक सार्थक और सशक्त फिल्म लगी।

    जहाँ तक पैसे के पीछे भागने की बात है तो हमारे शास्त्रों में कहा गया है, ‘धनात् धर्म: तत: सुखम्’ अर्थात् धन से ही धर्म होता है और जहाँ धर्म है वहीं सुख है। जो व्यक्ति अर्थ के प्रति उदासीन है वह चाहे जितना प्रतिभावान और महान हो, उसे दु:ख झेलना पड़ता है। लेकिन अर्थ-प्राप्ति हो या कोई अन्य उद्यम, संतुलन, विवेक और नैतिकता को छोड़कर हासिल की गई सफलता क्षणिक होती है।

  • नीरज दीवान // June 21, 2006 at 6:47 pm

    महेश भट्ट जी पर परिचर्चा में थ्रेड चालू आहे. आपके विचार आमंत्रित हैं. वहां सभी बंधु महेश भट्ट जी की पैसा जुगाड़ू कलाकारी पर चर्चा कर सकते हैं. बाक़ियों के लिए यह तर्क ठीक है- पैसा कमाना बुरी बात नहीं किंतु ध्यान रखा जाए कि ग़लत तरीक़े से ना कमाया जाए. यहां इतनी टिप्पणियां देखकर लगता है कि महेश भट्ट पर चर्चा अधूरी है. क्यों ना वहां निपटाया जाए मामला?

  • Amit // June 21, 2006 at 7:43 pm

    सही कहा सृजनशिल्पि जी, अर्थ के बिना जीवन अधूरा है, क्योंकि जब तक व्यक्ति की भौतिक आवश्यकताएँ पूरी नहीं होती, वह लोककल्याण के विषय में सोच ही नहीं सकता क्योंकि अधिकतर मामलों में इससे व्यक्ति की भौतिक आवश्यकताएँ पूरी नहीं होती।

    यहां इतनी टिप्पणियां देखकर लगता है कि महेश भट्ट पर चर्चा अधूरी है. क्यों ना वहां निपटाया जाए मामला?

    नीरज जी, जो मैंने यहाँ कहा वह परिचर्चा में भी कह सकता था [रोक भी कोई नहीं सकता, भला किसकी हिम्मत ;)] पर काफ़ी दिनों से किसी ब्लॉग पर कुछ लिखा नहीं था और सोचा दिल की भड़ास निकालने का यह अच्छा अवसर है, इसलिए यहाँ पोस्ट कर दिया[इसी के साथ यहाँ वर्डप्रैस पर हिन्दी के टॉप ब्लॉग की सूची में पहले नंबर पर अपना ब्लॉग आ गया :D]। ;) मैंने जो कहना था वह मैं कह चुका हूँ, आप आगे की चर्चा परिचर्चा में ज़ारी रख सकते हैं और मेरी इस पोस्ट का लिंक दे जो मैंने कहा उस पर बहस करना चाहें तो वह भी कर सकते हैं। :)

  • Kalyani // June 22, 2006 at 1:14 am

    Wow! Nice job writing in hindi!

    Anyway, its not running after money which is wrong, its ignoring other things during its pursuit (something which happens quite often).

  • Amit // June 22, 2006 at 1:13 pm

    Wow! Nice job writing in hindi!

    धन्यवाद। :)

    Anyway, its not running after money which is wrong, its ignoring other things during its pursuit (something which happens quite often).

    वे अन्य चीज़ें क्या हैं यह भी बताने का कष्ट करें। :)

  • Kalyani // June 22, 2006 at 3:27 pm

    Responsibilities as a citizen, moral values (required for smooth functioning of the society), domestic duties.

    In case of Mahesh Bhatt, for example, his movies subtly destabilise our system, by presenting the basic instincts present in us through a ‘liberal’ paradigm… The very concept of civilisation is based on the curbing of such instincts so as to get bigger benefits, or else there would be no difference between Homo sapiens and other species.

  • Amit // June 23, 2006 at 4:23 pm

    यह आवश्यक नहीं है कि किसी चीज़ को नकारात्मक स्वरूप में ही लिया जाए। महेश भट्ट की फ़िल्मों को सकारात्मक रूप में भी लिया जा सकता है। अन्य फ़िल्मों की मैं नहीं कहता परन्तु मर्डर और कलयुग मैंने देखीं हैं। मुझे पसंद नहीं आई वह बात अलग है परन्तु इस बात को नकारना कि वे आज के समाज की छवि दिखाती हैं बिलकुल ऐसा होगा जैसे शत्रु को निकट आता देख शतुर्मुर्ग रेत में अपना सिर छुपा और आँखें बन्द कर यह सोचता है कि अब उसका शत्रु उसे देख नहीं सकता।

    कुछ कुछ होता है, हम तुम आदि प्रेम कहानी वाली फ़िल्में देख हम अपना मन ही बहला सकते हैं, एकता कपूर के वाहियात सास बहू की नौटंकियाँ जिनमें शादी के बाहर के सम्बन्ध दिखाए जाते हैं और एक से अधिक पति/पत्नियाँ दिखाई जाती हैं उन्हें देख खुश हो सकते हैं और इस कल्पना में जी सकते हैं कि हमारे आसपास सब कुछ ठीक ठाक है!! बात यहाँ यह हो रही है कि महेश भट्ट का ऐसी फ़िल्में बनाना सही है या गलत। और मैं नहीं मानता कि यह गलत है। कम से कम अभी तक तो कोई ऐसी दलील नहीं प्रस्तुत की गई है जिसमें कोई दम हो।

    यदि किसी को अच्छा बनाने के लिए केवल अच्छी बातें ही बताईं जाएँ और उसे बुरी बातों से दूर रखा जाए तो फ़िर वो अच्छे और बुरे में अंतर करना कैसे जानेगा? छोटे बच्चों को खसरे आदि से बचाने के लिए टीका लगाया जाता है जिससे बुखार चढ़ता है, मेडिकल की विद्यार्थी होने के कारण आपको यह तो मालूम ही होगा कि उसमें खसरे के कीटाणु भी होते हैं जो कि बच्चे में प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न करते हैं!! बुराई भी आवश्यक है

  • Kalyani // June 23, 2006 at 6:19 pm

    I am not saying that we shouldnt admit that such things exist. In fact, its necessary that we do so, as u say. What I am saying is that we cannot accept them coz as I said before, civilisation is un-natural, against what our natural tendencies are. Accepting these tendencies will lead to its breakdown. Sad, but since we have chosen the ‘civilised’ path, we have no option but to stick with it coz it has provided us with certain things we cannot now do without.

  • Amit // June 24, 2006 at 6:01 pm

    बात घूम फ़िर कर पुनः वहीं आ जाती है। सभ्यता क्या है? वह भी मात्र एक दृष्टिकोण है, एक नज़रिया है। हर जोड़ी आँख को वह अलग नज़र आएगा। दूसरी बात यह है कि एक ही ढर्रे पर लकीरबद्ध हो चलने को सभ्यता कैसे कहा जा सकता है? हम मनुष्य हैं मशीन नहीं, हमारी अपनी सोचने समझने की शक्ति है तो क्यों उसका प्रयोग ना किया जाए। बात यह भी है कि समाज और सभ्यता आदि मनुष्य के लिए बने हैं, मनुष्य उनके लिए नहीं बना है। समय के साथ साथ हर चीज़ बदलती है, इसलिए यह सोच भी बदलनी चाहिए। 100 साल पहले के या 1000 साल पहले के नियमों और दृष्टिकोण को आज के मनुष्य पर बिना सोचे समझे और बिना तर्क-वितर्क के लागू करना मूर्खता है और पतन की राह है। इसलिए समय के साथ दृष्टिकोण भी बदलना चाहिए। एक अंग्रेज़ी में कथन है, मेरा ही है, वह है,

    Only the flexible ages gracefully, the brittle just breaks & is forgotten long before it can age.

  • Alka // June 25, 2006 at 4:58 am

    AGREE with you fully, Amit. And I strongly believe that people making money by unfair means ultimately suffer. Call me old fashioned. :-)

  • Kalyani // June 25, 2006 at 1:53 pm

    Exactly. The downside to civilisation stems from the fact that we are humans, not machines. And so its tough to follow that which is unnatural.
    Changing meanings and varied perspectives… finer details may change but the essence remains constant. Organisation, order, and benefit to the maximum people: thats what civilisation is all about. As for using our own thinking abilities…. humans are not very far-sighted, and sometimes, for short term gains we let go of long-term ones… this is the reason why God is so important to society. God gives a reason to something we can not otherwise comprehend, and this way we are able to make use of the whole of the experience of human race…

  • Nidhi // June 29, 2006 at 1:14 pm

    Hi Amit

    Good issue to talk about. Personally I do feel that earning high, doing savings is not bad. That’s what we call growth of an individual. At the same time, I do feel that we shouldn’t think too much about money. Some people really don’t want to spend a single penny. The people around them can think that for him the priority is money not the relations. Thats why ppl remark “paise ke beepche bhagta hai”

    Regarding the example of Mr. Bhatt, its unnecessary to argue. These ppl are from different world. They make movies for money, be it Daddy or Murder. In personal life, they have n number of relations. So you cann’t expect them to always make clean films.

  • Amit // June 30, 2006 at 4:44 pm

    At the same time, I do feel that we shouldn’t think too much about money. Some people really don’t want to spend a single penny. The people around them can think that for him the priority is money not the relations. Thats why ppl remark “paise ke beepche bhagta hai”

    अब यह तो गलत बात है ना!! अब कोई व्यक्ति हर समय पैसा-पैसा सोचता है तो यह उसकी समस्या है, भई आखिर “सोच” कर-मुक्त(tax free) है, सोचने पर कोई कर थोड़े ही लगता है!! ;) दूसरी बात, यह व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह अपने कमाए पैसे को खर्च करता है कि नहीं, और कैसे खर्च करता है(जब तक वह कानून की हदों में है)। मैं नहीं समझता कि इसमें किसी और व्यक्ति को बोलने या अपनी राय प्रकट करने का कोई अधिकार है!! अभिव्यक्ति की आज़ादी होने का यह अर्थ तो नहीं है ना कि आप किसी अन्य व्यक्ति को उपदेश दें कि उसे अपना पैसा कैसे व्यय करना चाहिए, जब तक वह व्यक्ति आपसे राय नहीं माँगता।

    Regarding the example of Mr. Bhatt, its unnecessary to argue. These ppl are from different world. They make movies for money, be it Daddy or Murder. In personal life, they have n number of relations. So you cann’t expect them to always make clean films.

    बात फ़िर निज जीवन की स्वतंत्रता की आ जाती है निधि। अपने निजी जीवन में व्यक्ति क्या करता है उससे उन लोगों को कोई सरोकार नहीं होना चाहिए जो उस व्यक्ति से संबन्धित नहीं हैं। संबन्धित व्यक्तियों को भी एक हद तक ही सरोकार होना चाहिए। हमाम में सभी नंगे होते हैं, आप अपने निजी जीवन में क्या करती हैं या मैं अपने निजी जीवन में क्या करता हूँ, इस बारे में यदि कोई अन्य अन्जान व्यक्ति खोदना आरम्भ करे या हमें उपदेश देने लगे, तो आपके बारे में तो विश्वास के साथ नहीं कह सकता पर मैं अवश्य उस व्यक्ति को अपने काम से मतलब रखने और मेरे निजी जीवन से दूर रहने की सलाह दूँगा क्योंकि इस तरह किसी के निजी जीवन में ताँक झाँक करना नैतिकता और कानून की दृष्टि के अनुरूप अनुचित है।

    मुझे यह समझ नहीं आता कि “सेक्स” एक ऐसा शब्द है जिसका लगभग प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में एक अर्थ है, जो अभी बच्चे हैं उनके जीवन में कल इसके मायने होंगे। इसमें कुछ गलत नहीं है, यह प्राकृतिक है, जीवन प्रक्रिया है, फ़िर लोग(खासतौर से हम भारतीय) इसके नाम से दूर क्यों भागते हैं। बन्द कमरे में जिससे ऐतराज़ नहीं, खुले में उसे ऐसे नकारते हैं जैसे कोई गंदगी हो, वाहियात चीज़ हो। ऐसा पाखंड क्यों? और मैं फ़िर कहूँगा, नैतिकता के नाम पर महेश भट्ट की हल्की फ़ुल्की फ़िल्मों को लताड़ा जा रहा है, परन्तु छोटे मोटे सिनेमाओं पर चलने वाली सी ग्रेड की ‘A’ फ़िल्मों पर कोई विरोध नहीं जिनमें इससे अधिक दिखाया जाता है, 100-100 रूपये डीवीडी/वीसीडी पर बिकने वाली उन पॉर्न फ़िल्मों पर कुछ नहीं कहा जा रहा जिनमें सब कुछ दिखाया जाता है। तो इस तरह के नैतिकता के उपदेश को क्या कहा जाए?

  • Tarun // July 7, 2006 at 8:46 am

    वैसे तो तिया पाँच हो ही गया है लेकिन मैं अमित के विचारों से ज्यादा सहमत हूँ।

  • Amit // July 7, 2006 at 7:15 pm

    आपकी सहमति टिका ली है तरूण भाई!! :)

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