दुनिया मेरी नज़र से - world from my eyes!!

Entries from October 2006

अक्ल बड़ी या भैंस??

October 31, 2006 · 9 Comments

आज के हिन्दुस्तान टाईम्स में खबर छपी है(अब हमने आदत के विपरीत आज का अखबार पढ़ ही लिया, क्या करें, कुछ और पढ़ने के लिए हाथ में आया ही नहीं) कि कुछ समझदार अधिकारी अपनी समझ का भरपूर उपयोग कर रहे हैं। कैसे? अभी बताते हैं।

उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर के ज़िलाधीश ने कॉर्पोरेशन के चुनाव सही तरीके से करवाने के लिए चुनाव के दिन सुबह 8 बजे से सांय साढ़े पाँच तक के लिए सभी मोबाईल नेटवर्क बंद करवा दिए। चकरा गए? घबराईये नहीं, ये साहब अकेले बेअक्ल नहीं हैं। इनके जोड़ीदार और भी हैं जो सरकारी खर्चे पर ऐश कर रहे हैं। एक और के बारे में जानिए। ये हैं करनाल के पुलिस एसपी साहब। इन्होंने 29 अक्टूबर को हरयाणा स्टेट स्टॉफ़ सेलेक्शन कमीशन के पर्चे के चलते लोक हित में सुबह पौने दस बजे से दोपहर 12 बजे तक सभी परीक्षा भवनों के इलाकों में मोबाईल नेटवर्क बंद करवा दिए।

क्या बात है। इन दोनों समझदार अधिकारियों को तो तुरंत निलंबित कर देना चाहिए। यदि ऐसे अक्ल वाले लोग रहेंगे तो बहुत खतरा है। हमारे प्रशासन तंत्र में दो तरह के साँप हैं। एक वे हैं सुस्त हैं, आलसियों और पुराने फ़र्नीचर की तरह पड़े रहते है और कुछ नहीं करते, इनको अंग्रेज़ी में fixtures कहा जाता है। और साँपों की दूसरी जाती से यकीनन ये दोनों महानुभाव हैं जो बहुत ज़्यादा अक्ल रखते हैं। अब इन दोनों में अधिक खतरनाक को ये दूसरी जाती के साँप हैं क्योंकि इनका ज़हर तेज़ है, और ये आलसी भी कम हैं, अर्थात्‌ काटने के लिए ये आपके पास भी आ सकते हैं और ज़हर तो खैर इनका तेज़ है ही। इसलिए पहले इनका सफ़ाया आवश्यक है, सुस्त साँपों से इतना खतरा नहीं जितना इनसे है।

आगे क्या करेंगे ये लोग? स्कूल/कॉलेज की परीक्षा होगी तो उसमें भी मोबाईल नेटवर्क आदि बंद करवा देंगे। :roll: क्या इनको इतनी अक्ल नहीं कि परीक्षा भवन में अंदर जाने वाले परीक्षार्थी को मोबाईल के साथ ना जाने दिया जाए? या फ़िर उस भवन में mobile frequency jammer लगा दिए जाएँ जिससे वहाँ मोबाईल काम ही ना करें? कम से कम एक पुलिस वाले से तो इतनी समझदारी की उम्मीद नहीं थी। क्या जब किसी अपराधी को पकड़ना होता है तो इलाके के सारे मार्गों पर पहरा लगा प्रत्येक आने-जाने वाले को जाँचते हैं कि सभी का आना-जाना रोक देते हैं कि जब तक कोई पकड़ा नहीं जाता तब तक ना कोई आएगा ना कोई जाएगा?? और उस दूसरे समझदार को जिलाधीश किसने बना दिया, उसमें अक्ल तो चपरासी जितनी है, जो पूरे दिन के लिए पूरे शहर के नेटवर्कों को बंद करवा दिया!!

हद है, इससे अधिक अक्ल तो स्कूल/कॉलेजों के शिक्षकों में होती है जो परीक्षा से पहले सभी विद्यार्थियों के मोबाईल बंद करवा अपने पास रखवा लेते हैं। पर बात फ़िर यह भी है कि जिसके पास जितनी ताकत होती है वह उसी के दायरे में कार्य करता है। अब शिक्षकों के पास तो मोबाईल नेटवर्क बंद करवाने की ताकत नहीं होती न, तो इसलिए जो है उसी से काम चलाते हैं। अब वैसे देखा जाए तो मोबाईल नेटवर्क आदि बंद करवाने की ताकत तो जिलाधीश और एसपी के पास भी नहीं होती, डिपार्टमेन्ट ऑफ़ टेलीकम्यूनिकेशन के अतिरिक्त कोई नहीं बंद करवा सकता। तो इन बुद्धिजीवियों ने न केवल अनुचित हरकत की बल्कि औकात से बढ़कर कार्य भी किया है, इसके लिए तो इनको डबल शाबाशी मिलनी चाहिए, अर्थात्‌ दोगुने समय के लिए निलंबित करना चाहिए!!

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देखो देखो …..इनको भी देखो …..

October 30, 2006 · 9 Comments

तो पिछली यादों से आगे बढ़ते हुए, प्रस्तुत हैं कुछ और यादगार चित्र।

बाकी की यादें अगली कड़ी में जारी …..

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दोबारा देखो ….. बार-बार देखो …..

October 27, 2006 · 5 Comments

पिछली बार से आगे बढ़ते हुए, प्रस्तुत हैं कुछ और यादगार चित्र।

चित्र अभी समाप्त नहीं हुए हैं, अगली कड़ी में जारी …..

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एक बार देखो ….. हज़ार बार देखो …..

October 25, 2006 · 2 Comments

पिछले कुछ महीनों में मैं काफ़ी घूमा फ़िरा हूँ, इतना मैं अभी तक के अपने जीवन में कभी नहीं घूमा। प्रस्तुत हैं कुछ यादगार चित्र उन्हीं यात्राओं से जो मुझे औरों से अधिक पसन्द आए। :)

चित्र अभी और भी हैं, अगली कड़ी में जारी …..

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वर्डप्रैस डॉट कॉम आपके पते पर …..

October 25, 2006 · 3 Comments

अभी थोड़ा समय पहले ही वर्डप्रैस डॉट कॉम वालों ने अपना पहला $$ वाला अपग्रेड निकाला था, जब लोगों की बढ़ती माँग को देख उन्होंने अपनी थीम अपने आप डिजाईन करने वालों के लिए $15 का Edit CSS वाला अपग्रेड उपलब्ध करवाया। लोगों की एक और जबरदस्त माँग, अपना ब्लॉग अपने डोमेन पर डाल सकने की काबिलियत, को भी इन ज़हीन लोगों ने सुन लिया है और अब आप $15 सालाना के खर्च पर वर्डप्रैस डॉट कॉम वालों से डोमेन खरीद अपना वर्डप्रैस डॉट कॉम ब्लॉग उस पर रख सकते हैं अन्यथा यदि आपके पास डोमेन पहले से ही है तो आपको केवल $10 सालाना खर्च देना होगा उस पर अपना वर्डप्रैस डॉट कॉम ब्लॉग डालने के लिए। (आधिकारिक घोषणा)

$10 सालाना में सिर्फ़ ब्लॉग आपके डोमेन पर होगा, वैसे ज़्यादातर के लिए सही भी है, परन्तु इसके अलावा इसमें और कुछ नहीं मिलेगा। और जहाँ तक मुझे पता है, वर्डप्रैस डॉट कॉम के आपके मुफ़्त ब्लॉग पर आपको केवल 25MB की जगह ही उपलब्ध है।

देखते हैं कि लोगों को यह नया अपग्रेड कितना पसंद आता है, अपने को तो लुभावना लगा नहीं। डोमेन और होस्टिंग दोनों ही अपने पास पहले से हैं, अब तो सोच रहा हूँ कि यहाँ से बोरिया-बिस्तर बाँध अपने सर्वर पर ही लौट आऊँ!! ;)

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आश्चर्य क्यों …..

October 20, 2006 · 9 Comments

रवि जी द्वारा पता चला कि देसीपंडित बंद हो रहा है, फ़िर कुछ अन्य चिट्ठों पर भी पढ़ा, उन पर की गई टिप्पणियाँ भी पढ़ी। वैसे तो मुझे यह टिप्पणी रवि जी के ब्लॉग पोस्ट पर करनी चाहिए थी, पर खैर, बहुत समय से मैंने भी नहीं लिखा था यहाँ कुछ तो सोचा यही लिख दिया जाए ताकि लोग बाग़ कहीं यह ना समझ लें कि हमने भी ब्लॉग को अपने तिलांजलि दे डाली!! ;)

देसीपंडित का बंद होना बहुत से लोगों को बेशक एक चौंका देने वाला निर्णय लगे, कईयों को बुरा भी लगा होगा परन्तु यह होना निश्चित था, कभी ना कभी तो होना ही था। और मैं ऐसा क्यों सोचता हूँ? भई मुझे देसीपंडित या उसके चलाने वालों से कोई द्वेष नहीं है, बल्कि मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इससे पहले बहुत से समूह ब्लॉगों का यह हाल मैं देख चुका हूँ जिसमें एक मेरे द्वारा संचालित समूह ब्लॉग भी था। यह कहानी केवल समूह ब्लॉगों की ही नहीं है, बहुत से ब्लॉग भी इस कहानी को दोहरा चुके हैं। मुख्य कारण अधिकतर हर बार वही रहा है, समयाभाव। परन्तु समूह ब्लॉग इसके शिकार जल्दी बनते हैं जिसका कारण यह है कि वे एक से अधिक लोगों द्वारा चलाए जाते हैं। लोगों के निजी और व्यवसायिक कारण आड़े आ जाते हैं जिसके चलते वे ब्लॉग को उतना समय नहीं दे पाते जितना उनको देना चाहिए और एक व्यक्ति गाड़ी खींच नहीं पाता, इसलिए समूह ब्लॉग को ताला लग जाता है। यदि एक व्यक्ति द्वारा चलाया जा रहा निजी ब्लॉग आदि हो तो वह इस दशा में भी चल सकता है, चाहे घिसट घिसट के लंगड़ाता हुआ चले लेकिन चल सकता है, पर समूह ब्लॉग ऐसे नहीं चल सकता, आखिर भरी हुई गाड़ी और लदे हुए ट्रक को धक्का लगाने में ज़मीन आसमान का अंतर है। ;)

अब इसके पीछे भी एक साईकॉलोजी ….. बोले तो मनोविज्ञान है। हम कोई कार्य करते हैं, समझ लीजिए कोई भी कार्य करते हैं तो प्रतिफल की भी आशा करते हैं, ना चाहते हुए भी मन के किसी कोने में इस आशा का उदय होता है। अब इस कारण हम एक कार्य करें जा रहे हैं, एक संस्था चलाए जा रहे हैं परन्तु कब तक एक या कुछ व्यक्ति बोझ ढोए जाएँगे? समय तो मुद्रा से भी अधिक कीमती है क्योंकि समय की कोई कीमत नहीं लगा सकता। महान बुद्धिजीवी चाणक्य ने कहा था कि जीवन का एक क्षण सौ करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ देकर भी नहीं खरीदा जा सकता। तो शुरू शुरू में उत्साह से आरम्भ किया गया प्रयास बाद में साबुन के झाग की तरह बैठने लगता है। और जब पूरी तरह झाग बैठ जाता है तो दुकान बढ़ाने का समय आ जाता है। लेकिन कुछ लोग इस सोच में नुक्स निकालते हुए कई सफ़ल समूह ब्लॉग आदि का उदाहरण देने का प्रयास करेंगे तो उनको मैं यही कहूँगा कि भई पाँचों उंगलियाँ एक समान नहीं होती। जीव अपना जीवनकाल समाप्त कर मृत्यु को प्राप्त होते हैं यह शाश्वत सत्य है परन्तु इसका अर्थ यह तो नहीं कि सभी एक साथ ही गिर पड़ेंगें!! कोई मनुष्य 40 वर्ष की आयु में भी जन्नतनशीं हो जाता है और कोई कोई 100 पार करने के बाद भी खूँटा गाड़े रहता है। लेकिन यदि सफ़ल समूह ब्लॉग आदि का उदाहरण लें तो पाएँगे कि लंबी रेस के घोड़े वही हैं जिनके पीछे बेहतर और भरी हुई तिजोरियाँ हैं। Slashdot भी अभी तक बंद हो चुका होता यदि उसे आरम्भ करने वाले उसे OSTG को बेच ना देते। ऐसे और भी कई अन्य उदाहरण हैं।

वैसे रवि जी ने कहा कि

देसीपंडित के भविष्य पर सैकड़ों लोगों ने अपने अपने विचार रखे हैं - कुछ समर्थन में तो कुछ दुःख और चिंता जताते हुए. पैट्रिक्स अपने स्वयं के चिट्ठे पर चाहे जो कुछ सोचें कर सकते हैं चाहे जिन कारणों से, जब चाहें चालू-बंद कर सकते हैं, देसीपंडित को नहीं. उन्हें तमाम चिट्ठाकारों की भावनाओं को समझना होगा, उन्हें भी जवाब देना होगा. जब बहुत से विकल्प पैट्रिक्स के सामने खुले हैं तो उन्हें अपनाने में उन्हें क्या झिझक, कैसी शर्म?

तो भई इस पर मैं यही कहना चाहूँगा कि देश का एक प्रधान होता है, जैसे हमारे यहाँ प्रधानमंत्री जो कि अपनी समझ से अनुसार कार्य करते हुए आपात स्थिति को भी घोषित कर सकता है। विकल्प तो उस समय भी बहुत होते हैं पर यही कह सकते हैं कि उस समय जो सही लगा वही किया गया। तो यही मैं कहना चाहूँगा कि देसीपंडित का प्रबंधक होने के नाते पैट्रिक्स को यही सही लगा कि कोई विकल्प फ़िलहाल नहीं अपनाया जा सकता इसलिए उन्होंने वही किया जो उनको सही लगा।

लोगों को यदि लगता है कि यह दुकान बढ़ा देने का निर्णय सही नहीं है और उपलब्ध विकल्पों में से किसी को अपनाया जा सकता है तो किसने उनको रोक रखा है, मौका भी है, देसीपंडित जैसा कुछ वे स्वयं ही आरम्भ कर डालें। और यदि उनको लगता है कि उनमें ऐसा कुछ चलाने की योग्यता नहीं है तो उनको इस बात को भी समझना चाहिए कि जिनमें इसकी योग्यता है उन्होंने कुछ सोच समझ कर ही ऐसा निर्णय लिया होगा। लोग बाग़ समझते नहीं है, आवश्यक नहीं कि जो चीज़ देखने में आसान लगती है वह वास्तव में उतनी सरल हो।

अब हम वापस अपने हिन्दी ब्लॉगजगत में आते हैं। देसीपंडित के दुकान बढ़ाने की खबर सुन कुछ बंधुओं को गहरा आघात हुआ है और उन्होंने अब चिट्ठाचर्चा, नारद आदि के बारे में भी अटकलें लगानी आरम्भ कर दी हैं कि कहीं कल को यह भी बंद ना हो जाएँ। तो भई चिट्ठाचर्चा के विषय में तो मैं कुछ कह नहीं सकता परन्तु नारद के विषय में तो यही कहूँगा कि यह कोई समूह ब्लॉग नहीं है इसलिए इसके बंद होने के बारे में ऐसा वैसा ना सोचें जैसे देसीपंडित बंद हुआ। नारद पूरी तरह से अपने आप चलने वाला सिस्टम है। ऐसा नहीं है कि इसको चलाने में श्रम नहीं करना पड़ता परन्तु वह श्रम तकनीकी रूप से होता है, जैसे यह जाँचना कि कहीं कोई दिक्कत तो नहीं और किसी दिक्कत को हटाना, नए चिट्ठों को जोड़ना आदि। यानि कि यह एक अलग किस्म का जीव है, इसलिए बंद होने के कोई आसार फ़िलहाल नहीं हैं। :)

अब अंग्रेज़ी में दो कहावत हैं:

all good things must come to an end

और

enjoy while it lasts

तो इनको आधार मानिए और जो है उसका भरपूर आनंद लीजिए। :)

इसी के साथ अब हम चलते हैं, आप सभी को दीपावली और हिन्दु नव वर्ष की शुभकामनाएँ। :)

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करें या ना करें?

October 8, 2006 · 1 Comment

नहीं जी, कोई गलत अर्थ मत निकालना, कुछ ऐसा वैसा करने की नहीं सोच रहे। दरअसल आज इंडिया हैबिटैट सेन्टर में दिल्ली ब्लॉगर्स बिरादरी की एक भेंटवार्ता रखी गई थी। अब कोई ऐसी वैसी भेंटवार्ता नहीं थी, बकायदा एक मुद्दा था जिस पर चर्चा की गई। बात यूँ है कि अभी हाल ही में चेन्नई में एक ब्लॉगकैम्प आयोजित किया गया था। तो हमें लगा कि ऐसा कुछ यहाँ उत्तर भारत में दिल्ली में भी होना चाहिए, अब बहुत से यहाँ के लोग तो वहाँ जा नहीं पाए थे, और बहुत से जो गए थे उनको निराशा हुई क्योंकि कुछ “खास” नहीं मिला वहाँ जिसकी आशा लिए वो वहाँ गए थे।

ठीक, अब जब यह विचार आया तो अन्य लोगों को मैंने बताया। कुछ को पसंद आया तो कुछ संशय में लगे। इसलिए इसको मुद्दा बना आज की भेंटवार्ता रखी गई ताकि सभी अपने अपने विचार व्यक्त कर सकें। जितनी आशा थी उसके अनुरूप उपस्थित लोगों की संख्या कुछ खास नहीं थी परन्तु फ़िर भी संतोषजनक थी, करीब 10-12 लोगों ने तो हाज़िरी लगाई ही।

चर्चा ये की गई कि कैसा आयोजन करना है। क्या चेन्नई वाले की तरह बड़ा किया जाए या छोटे स्तर का किया जाए। इस बात पर सभी एकमत थे कि कुछ नया होना चाहिए, चेन्नई वाले ब्लॉगकैम्प का दोहराव नहीं करना कि जो वहाँ था वैसा ही यहाँ भी कर डालें। अब यही सबसे बड़ा मुद्दा बना। “नया” करें तो क्या करें?? तो सभी से कहा गया कि भई अपने अपने विचार एक कागज़ पर दर्ज करो कि आप ब्लॉगकैम्प में क्या देखना पसंद करेंगे, क्या जानना चाहेंगे। अभी इस पर चर्चा जारी रहेगी, हिन्दी ब्लॉगर बिरादरी से मेरे अतिरिक्त कोई और आ नहीं सका, इसलिए बिरादरी के मेम्बरान के विचार जानने के लिए मैंने परिचर्चा में एक सूत्र आरम्भ किया है जहाँ पर कोई भी अपने विचार आदि व्यक्त कर सकता है।

भेंटवार्ता तकरीबन दो-तीन घंटे चली जिसके उपरांत कुछ ने विदा ली और बाकी हम लोग हैबिटैट सेन्टर के रेस्तरां Eatopia में जलपान के लिए चले गए।

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