कल(रविवार) सुबह मैं दो दिनों के लिए मित्रों सहित लान्सडौन घूमने जा रहा हूँ। अपनी नव वर्ष की पहली सुबह वहीं होगी।
यात्रा का विवरण आने के बाद|
आप सभी को नव वर्ष 2007 की शुभकामनाएँ, नया साल आप सब के किए मंगलमयी हो।
कल(रविवार) सुबह मैं दो दिनों के लिए मित्रों सहित लान्सडौन घूमने जा रहा हूँ। अपनी नव वर्ष की पहली सुबह वहीं होगी।
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आप सभी को नव वर्ष 2007 की शुभकामनाएँ, नया साल आप सब के किए मंगलमयी हो।
Categories: mindless rants · फ़ालतू बड़बड़
परसों मैं टीडीआई मॉल में स्थित प्लैनेट एम से फ़िल्मों की कुछ वीसीडी और डीवीडी लाया था, परन्तु कल जब “क्राऊचिंग टाईगर हिड्डन ड्रैगन” की डीवीडी चलाई तो वह चली नहीं। यानि कि उसमें कुछ लोचा था इसलिए आज उसे वापस दे दूसरी लाने की सोची। लेकिन सप्ताहांत होने के कारण देर से सोया सुबह को जिस कारण दोपहर में देर से उठना हुआ। प्लैनेट एम के लिए निकलने तक सांय हो चुकी थी। (आने वाले)परसों यानि कि सोमवार को क्रिसमस है, लेकिन बहुत सी बड़ी बड़ी दुकानों में 2-3 हफ़्ते पहले से ही चहल-पहल आरंभ हो जाती है। बहरहाल जब मैं मॉल में पहुँचा तो देखा कि उसके मध्य भाग में कुछ हो रहा है, मतलब ऑरकेस्ट्रा आदि बज रहा था, गाने वगैरह चल रहे थे और भीड़ जमा थी। लेकिन मैंने पहले जिस कार्य से आया था उसे निबटाने की सोची और प्लैनेट एम में चला गया। वहाँ उनके पास उसी फ़िल्म की दूसरी डीवीडी नहीं थी, तो उतनी कीमत की मैंने दो फ़िल्मों की वीसीडी ले ली और बाहर आ पहली मंज़िल की बाल्कनी के मध्य में पहुँच गया यह देखने कि काहे का मज़मा लगा हुआ था।
देखने पर पता चला कि किसी प्रकार का कार्यक्रम हो रहा है जिसे कुछ कंपनियाँ आदि प्रायोजित कर रही हैं जैसे शहनाज़ हुसैन की सौंदर्य प्रसाधन कंपनी, 94.1FM वगैरह। यह सब क्रिसमस के अवसर पर हो रहा था और अगले दो दिन भी चलना था। मॉल को सजाया हुआ था। कार्यक्रम का मेज़बान अलग अलग तरह के खेल आदि करवा रहा था और जीतने वालों को पुरस्कार दिए जा रहे थे।
लोग इन खेलों आदि का खूब मज़ा ले रहे थे, वाकई अच्छा मनोरंजन हो रहा था। पर कुछ देर बाद लगा कि अब चलना चाहिए। चलते समय सजे धजे क्रिसमस ट्री पर भी नज़र पड़ी।
यह सिर्फ़ यहाँ ही नहीं वरन् आस पास के अन्य दो मॉल सिटी स्क्वेयर और वेस्ट गेट का भी है। इसे देख मन में ख्याल आया कि क्या हमारा समाज इस तरह के बदलाव पर भी है? क्रिसमस और वेलेन्टाईन डे पर बड़ी दुकाने और बाज़ार सज जाते हैं, चहल पहल होती है, परन्तु दीपावली और ईद जैसे त्योहारों पर ऐसी कोई खासी चहल पहल नहीं होती इन बड़ी दुकानों और बाज़ारों में। या केवल मुझे ही ऐसा लग रहा है? क्योंकि मुझे अच्छी तरह याद है कि दीपावली और ईद के दिनों में भी मैं एकाध बार इन मॉलों में गया लेकिन त्योहार वाली चहल पहल मुझे न दिखाई दी जो आज दिखाई दी।
मुझे क्रिसमस पर कोई आपत्ति नहीं है, त्योहारों का मकसद खुशियाँ मनाना होता है, और खुशियाँ किसी एक संप्रदाय या धर्म आदि की जाग़ीर नहीं। उन पर सभी का अधिकार है। इसलिए चाहे दीपावली हो या ईद या क्रिसमस, अपन तो हर वक्त खुशी मनाते हैं। लेकिन यह बर्ताव थोड़ा अजीब सा लगा कि ये तथाकथित हाई-फ़ाई बड़ी दुकानें केवल पाश्चात्य संस्कृति का अनुसरण करते हैं। जिस बाज़ार में हैं वहाँ के लोकल ज़ायके का भी ख़्याल रखना चाहिए। या केवल मुझे ऐसा लग रहा है? मैं निश्चय नहीं कर पाया और घर वापसी के दौरान सारे रास्ते इसी उधेड़बुन में रहा।
Categories: some thoughts · कुछ विचार
आज करीब एक साल बाद जामा मस्जिद के पास स्थित करीम होटल में खाना खाने गया। मन ही मन करीम के तन्दूरी चिकन के बारे में सोच सोच लड्डू फूट रहे थे!!
रविवार और ठण्ड का मौसम होने के कारण अच्छी खासी भीड़ थी, लगभग 20 मिनट प्रतीक्षा करने के बाद टेबल मिली। थोड़ी और प्रतीक्षा के बाद लज़ीज़ तन्दूरी चिकन भी सामने था, लेकिन पहला निवाला मुँह में लेते ही सारा मज़ा किरकिरा हो गया। करीम होटल के स्वादिष्ट खाने की जो लज़ीज़ यादें मन में बसी थी वो सारी की सारी धराशाई हो गई। मैंने कई जगह तन्दूरी चिकन खाया है, कहीं अच्छा तो कहीं बेकार, लेकिन इतना बेस्वाद कहीं नहीं खाया था अभी तक। समय के साथ बदलाव आते हैं लेकिन क्या स्वाद बढ़िया से घटिया और बद् से बद्तर हो जाता है?
अभी कुछ दिन पहले मेरे मित्र संतोष ने बताया था कि हाल ही में जब पहली बार अपनी पत्नी के साथ करीम होटल गए तो उन्हें तन्दूरी चिकन में कोई मज़ा नहीं आया, उसका स्तर इतना नहीं था जितना नाम सुना था। संतोष की बात सुन मुझे विश्वास नहीं आया, मैंने कहा कि हो सकता है कि उस दिन अच्छा नहीं बना हो या संतोष का ही मुँह का स्वाद खराब हो, लेकिन आज स्वयं खाने के बाद मुझे विश्वास हो गया। एक वर्ष में करीम होटल के खाने का स्वाद वाकई गिर गया है।
आज भी करीम के बरसों के जमाए नाम का ही नतीजा है कि कई लोग सिर्फ़ नाम सुनकर पहली बार खाने आते हैं। लेकिन स्वाद के इस गिरते स्तर के चलते कब तक नाम बना रहेगा? अब तो अगली बार जाने से पहले मुझे भी सोचना होगा।
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वर्डप्रैस डॉट कॉम के गृहपृष्ठ पर नया मेकअप लगा उसे मेकओवर दिया गया है, अब वह पहले की तरह फ़ीका नहीं लगता वरन् उसमे भी एक ब्लॉग पोर्टल जैसी छवि आ रही है।
ये वर्डप्रैस वाले लोग नए नए जुगाड़ में लगे रहते हैं, इसको प्रयोग करने वालों की तादाद दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है, कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि यह कोई बहुत बड़ी और बड़े लाभ वाली साइट बन जाए तो।
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“पॉयरेट्स ऑफ़ द कैरिबियन - द कर्स ऑफ़ द ब्लैक पर्ल” (कैरिबियन के समुद्री डाकू - काले मोती का शाप) फ़िल्म जब आई थी तब देखी थी, फ़िल्म उस समय आने वाली फ़िल्मों से थोड़ा अलग हटकर थी, सही भी थी। लेकिन उसके अगले भाग की आशा नहीं थी। परन्तु उसका अगला भाग “पॉयरेट्स ऑफ़ द कैरिबियन - डैड मैन्स चैस्ट” (कैरिबियन के समुद्री डाकू - मुर्दे का संदूक) कुछ महीने पूर्व रिलीज हो गया और सुना लोगों ने इस फ़िल्म को भी पसंद किया। अब उस समय मैं फ़िल्म देखने नहीं जा सका, तो अभी हाल ही में जब इसकी सीडी बाज़ार में आई मैंने तुरंत खरीद ली। परन्तु व्यस्तता के चलते उसे भी उसी समय नहीं देख पाया। परन्तु आज जब कंप्यूटर में क्रिएटिव का साउंड कार्ड लग गया तो सोचा कि आज देख ही डालते हैं, नए लिए क्रिएटिव के 4.1 स्पीकर सिस्टम पर आवाज़ भी जबरदस्त आएगी।
फ़िल्म जब आरम्भ हुई तो पिछले भाग की तरह करीब एक-तिहाई भाग तो धीमा सा लगा लेकिन उसके बाद के दो-तिहाई भाग को तो एक रोलर कोस्टर की सवारी कह सकते हैं। बढ़िया लोकेशनों पर हुई शूटिंग और हान्स ज़िम्मर द्वारा रचित शानदार साउंडट्रैक ने फ़िल्म में जान फूँक दी। जॉनी डैप ने पूरी फ़िल्म में अपना किरदार सही ढंग से अदा किया, कैप्टेन जैक स्पैरो पूरी मौज में लगे। “लॉर्ड ऑफ़ द रिंग्स”, “ट्रॉय” तथा “किंगडम ऑफ़ हेवन” के बाद ऑर्लेन्डो ब्लूम ने इस फ़िल्म में भी अच्छा अभिनय किया है, विल टर्नर की अदाकारी पिछले भाग से अधिक बढ़िया थी। कीरा नाइटली का इस फ़िल्म में भी कोई खास किरदार नहीं सिवाय एक दो दृश्यों के जहाँ उसके किरदार में दम लगा, अन्यथा पूरी फ़िल्म में जैक स्पैरो और विल टर्नर हावी रहे हैं। लेकिन इस फ़िल्म में एलिज़ाबैथ(कीरा नाइटली) एक ऐसा कार्य करती है जो बहुतों को अजीब या गलत लगेगा, उसकी उस हरकत के कारण जैक को कुछ हो जाता है ….. शायद वह मर जाता है। लेकिन इसी से अगले भाग की भूमिका रचती है, तो अब अनुमान लगा सकते हैं कि अगले वर्ष अगले भाग, “पॉयरेट्स ऑफ़ द कैरिबियन - ऐट वर्ल्ड्स एन्ड” (कैरिबियन के समुद्री डाकू - दुनिया के अंतिम छोर पर) जो कि कदाचित कड़ी की आखिरी फ़िल्म होगी, में क्या देखने को मिलेगा!!
यदि रेटिंग के लिए बोला जाए तो इस फ़िल्म को मैं 5 में से 4.5 अंक दूँगा। कहानी कोई बहुत निराली नहीं है, देखने वालों को यह पता चल ही जाएगा जिन्होंने बचपन में राक्षस और तोते में कैद उसकी जान की कहानियाँ पढ़ी/सुनी हैं, लेकिन उस कहानी को किस तरह से फ़िल्माया गया है, किस तरह की जगहों पर फ़िल्माया गया है, किरदारों ने अपनी भूमिका कैसी निभाई है, यही वे चीज़ें हैं जो एक फ़िल्म को बढ़िया अथवा घटिया का तमगा दिलवाती हैं और मैं यही कहूँगा कि इस फ़िल्म ने निराश नहीं किया।
अगर अभी तक फ़िल्म नहीं देखी है तो जैसे ही मौका मिले देख लें, बढ़िया टाईमपास की पूरी गारंटी है(शर्तें लागू)।
और अपन इंतज़ार में हैं इसके अगले भाग की!!
कल रविवार को सुबह असोला भट्टी वन्य जीव संरक्षण स्थान या wildlife sanctuary में जाने का पिरोगराम था। तो सुबह सुबह तड़के यानि कि सवा छह बजे अंधेरे में ही अपनी मोटरसाइकल पर मैं निकल लिया संतोष के घर की ओर। वैसे तो सात बजे संतोष के घर से निकलने का पिरोगराम था परन्तु जब पौने सात बजे मैं संतोष के घर पहुँचा तो महाशय अभी सोकर भी नहीं उठे थे। कई घंटियाँ बजाने पर वो नींद में डूबे द्वार खोलने आए, मेरे को स्वागत कक्ष में बिठा तैयार होने गए, अपन टीवी खोल खामखा की खबरें देखने लगे। थोड़ी देर बाद पता चला स्निग्धा भी अभी अभी सोकर उठी है और इधर संजुक्ता का कोई पता नहीं था जबकि मेरे को पिछले दिन फ़ोन पर चेतावनी दी गई थी कि मैं समय पर सुबह पहुँच जाऊँ!!
उधर मोन्टू का फ़ोन आया कि वो तैयार बैठा है और पूछ रहा है कि कब चलना है!! तौबा!!! लोग नहीं सुधरने वाले!! बहरहाल संतोष ने स्निग्धा को बोला कि संजुक्ता से अपने घर आने को बोले, हम लोग तो निकल रहे हैं। मैं और संतोष निकल पड़े अपनी अपनी मोटरसाइकलों पर, निकलने से पहले मोन्टू को पहुँचने को बोल दिया गया।
सड़कों पर अब वाहनों की संख्या बढ़ गई थी, जिस समय मैं संतोष के घर आया था उस समय तो कोई इक्का दुक्का वाहन ही था इसलिए आराम से 90 की गति से चलाता हुआ आया था।
खैर, हम लोग असोला की ओर बढ़ चले जो कि तुग़लकाबाद के किले के पास है। रास्ते में हमने कुछ खाने-पीने को ले लिया क्योंकि आशा नहीं थी कि कोई नाश्ता वगैरह करके आया होगा, कम से कम हम लोग तो नहीं आए थे। निश्चित स्थान पर पहुँचे तो देखा कि दो अन्य लोग जिनके आने की अपेक्षा थी वे हम लोगों की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनसे परिचय हुआ तो पता चला कि उनके नाम प्रदीप और हितेश हैं। मोन्टू भी कुछ मिनट में आ गया। कुछ देर प्रतिक्षा के बाद हम लोगों ने असोला जाने का निर्णय लिया, संजुक्ता को बता दिया गया कि वे लोग वहीं पहुँचे। असोला में पहुँच हमारी मुलाकात सजीव से हुई जो वहीं Conservation Education Center में कार्य करते हैं। वे हम लोगों को आसपास के इलाके के भ्रमण पर ले गए जहाँ हमने कई तरह की तितलियाँ और कुछेक पक्षी आदि देखे। सजीव बताते हुए चल रहे थे हर चीज़ के बारे में। एक वॉच टॉवर पर पहुँच हमने कुछ दूर खड़ी एक नील गाय और उसके बच्चों को देखा।
फ़िर हमने वापस पहुँच संजुक्ता और स्निग्धा के आने का इंतज़ार करने की सोची। वापसी में एक सुंदर तितली दिखाई दी जिसको ब्लू पैन्सी कहा जाता है।
कुछ देर बाद संजुक्ता और स्निग्धा पहुँच गए तो आगे का पिरोगराम शुरू हुआ। सजीव हमको ब्लैक बक दिखाने ले गए। रास्ते में हमने सियारों के रहने का स्थान देखा। कुछ आगे पहुँच हमें एक ब्लैक बक दिखाई दे गया, उसके साथ और भी दिखे। अभी उसका फ़ोटो ले ही रहा था कि पीछे से यार लोग उँची आवाज़ में बात करते आ गए और सभी ब्लैक बक डर कर भाग गए।
सोचा कि पास मौजूद वॉच टॉवर से शायद दिख जाए लेकिन वहाँ से भी नहीं दिखे। थोड़ी देर और घूमे आजू बाजू, और फ़िर वापस सजीव के ऑफ़िस की ओर चल दिए चाय-पानी के लिए, अब गर्मी बढ़ रही थी और गर्म जैकेट में बुरा हाल था लेकिन उसे उतार नहीं सकता था और ना ही उसको खोल सकता था क्योंकि फ़िर आसपास की झाड़ियों आदि में फ़ंसने का डर था। वापस पहुँच सभी कुर्सियों पर पसर गए, थोड़ा हंसी-मज़ाक हुआ और फ़िर चलने की तैयारी हुई। भूख लग रही थी, इसलिए थोड़ी दूर पर मौजूद एक रेस्तरां में जाना तय हुआ, सजीव की दोनों मातहत भी हमारे साथ थीं।
खाने के बाद तुग़लकाबाद के किले में जाने का तय हुआ। लगभग सभी ने मना कर दिया क्योंकि वे थक गए थे, मैं, मोन्टू, स्निग्धा और संजुक्ता तैयार थे तो हम ही चल दिए। तुग़लकाबाद किला सन् 1324-1325 में दिल्ली के तुग़लक बादशाह घियासुद्दीन तुग़लक ने बनवाया था। आज 780 वर्ष बाद यह किला रखरखाव के अभाव में सूने खंडहर के रूप में अलग थलग पड़ा है। अपनी आदत के अनुसार यहाँ पर भी सरकारी टिकट काऊंटर तो है लेकिन मुझे नहीं लगता कि यदि हम बिना टिकट लिए अंदर जाते तो कोई मना करता।
हांलाकि एकाध विदेशी पर्यटक भी दिखे यहाँ पर नहीं तो मैं नहीं समझता कि यहाँ कोई पर्यटक आते होंगे यदि किसी ट्रैवल पैकेज में यहाँ आना तय ना हो तो।
किसी ज़माने में आलीशान रहे उद्यान आज झाड़ आदि के जंगल से हैं और कभी जगमग रहे हॉल और कमरे आज पत्थरों के ढेर मात्र हैं। यह हालत देश की बहुत से ऐतिहासिक धरोहरों की है।
हम लोग भी एक उँचे वॉच टॉवर जैसी इमारत के खंडहर के पास पहुँच बैठ गए, कुछ और देखने को नहीं था, तो थोड़ी देर बैठ बतियाने लगे, इधर उधर की बातें की। शाम हो आई तो हमने भी चलने की सोची और अपने अपने रास्ते लग लिए।
असोला और तुग़लकाबाद किले के खींचे सभी चित्र यहाँ उपलब्ध हैं।
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