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बदलता समय ….. बदलते त्योहार

December 23, 2006 · 7 Comments

परसों मैं टीडीआई मॉल में स्थित प्लैनेट एम से फ़िल्मों की कुछ वीसीडी और डीवीडी लाया था, परन्तु कल जब “क्राऊचिंग टाईगर हिड्डन ड्रैगन” की डीवीडी चलाई तो वह चली नहीं। यानि कि उसमें कुछ लोचा था इसलिए आज उसे वापस दे दूसरी लाने की सोची। लेकिन सप्ताहांत होने के कारण देर से सोया सुबह को जिस कारण दोपहर में देर से उठना हुआ। प्लैनेट एम के लिए निकलने तक सांय हो चुकी थी। (आने वाले)परसों यानि कि सोमवार को क्रिसमस है, लेकिन बहुत सी बड़ी बड़ी दुकानों में 2-3 हफ़्ते पहले से ही चहल-पहल आरंभ हो जाती है। बहरहाल जब मैं मॉल में पहुँचा तो देखा कि उसके मध्य भाग में कुछ हो रहा है, मतलब ऑरकेस्ट्रा आदि बज रहा था, गाने वगैरह चल रहे थे और भीड़ जमा थी। लेकिन मैंने पहले जिस कार्य से आया था उसे निबटाने की सोची और प्लैनेट एम में चला गया। वहाँ उनके पास उसी फ़िल्म की दूसरी डीवीडी नहीं थी, तो उतनी कीमत की मैंने दो फ़िल्मों की वीसीडी ले ली और बाहर आ पहली मंज़िल की बाल्कनी के मध्य में पहुँच गया यह देखने कि काहे का मज़मा लगा हुआ था।

देखने पर पता चला कि किसी प्रकार का कार्यक्रम हो रहा है जिसे कुछ कंपनियाँ आदि प्रायोजित कर रही हैं जैसे शहनाज़ हुसैन की सौंदर्य प्रसाधन कंपनी, 94.1FM वगैरह। यह सब क्रिसमस के अवसर पर हो रहा था और अगले दो दिन भी चलना था। मॉल को सजाया हुआ था। कार्यक्रम का मेज़बान अलग अलग तरह के खेल आदि करवा रहा था और जीतने वालों को पुरस्कार दिए जा रहे थे।

लोग इन खेलों आदि का खूब मज़ा ले रहे थे, वाकई अच्छा मनोरंजन हो रहा था। पर कुछ देर बाद लगा कि अब चलना चाहिए। चलते समय सजे धजे क्रिसमस ट्री पर भी नज़र पड़ी।

यह सिर्फ़ यहाँ ही नहीं वरन्‌ आस पास के अन्य दो मॉल सिटी स्क्वेयर और वेस्ट गेट का भी है। इसे देख मन में ख्याल आया कि क्या हमारा समाज इस तरह के बदलाव पर भी है? क्रिसमस और वेलेन्टाईन डे पर बड़ी दुकाने और बाज़ार सज जाते हैं, चहल पहल होती है, परन्तु दीपावली और ईद जैसे त्योहारों पर ऐसी कोई खासी चहल पहल नहीं होती इन बड़ी दुकानों और बाज़ारों में। या केवल मुझे ही ऐसा लग रहा है? क्योंकि मुझे अच्छी तरह याद है कि दीपावली और ईद के दिनों में भी मैं एकाध बार इन मॉलों में गया लेकिन त्योहार वाली चहल पहल मुझे न दिखाई दी जो आज दिखाई दी।

मुझे क्रिसमस पर कोई आपत्ति नहीं है, त्योहारों का मकसद खुशियाँ मनाना होता है, और खुशियाँ किसी एक संप्रदाय या धर्म आदि की जाग़ीर नहीं। उन पर सभी का अधिकार है। इसलिए चाहे दीपावली हो या ईद या क्रिसमस, अपन तो हर वक्त खुशी मनाते हैं। लेकिन यह बर्ताव थोड़ा अजीब सा लगा कि ये तथाकथित हाई-फ़ाई बड़ी दुकानें केवल पाश्चात्य संस्कृति का अनुसरण करते हैं। जिस बाज़ार में हैं वहाँ के लोकल ज़ायके का भी ख़्याल रखना चाहिए। या केवल मुझे ऐसा लग रहा है? मैं निश्चय नहीं कर पाया और घर वापसी के दौरान सारे रास्ते इसी उधेड़बुन में रहा।

Categories: some thoughts · कुछ विचार

7 responses so far ↓

  • संजय बेंगाणी // December 24, 2006 at 10:05 am

    हम अपना मुँह नहीं खोलेंगे, हमारे शब्दो को पकड़ लोग-बाग पंगा फैलाते है. पर यह सच है. बाजार वालो को त्योंहारों से नहीं बिक्री से मतलब है. दिवाली-ईद आदी पर तो वैसे ही खरीददारी होती ही है. बाकी समय के लिए नए नए बहाने, दिन घड़े जाते है.

  • सागर चन्द नाहर // December 24, 2006 at 11:41 am

    संजय भाई बिल्कुल सही कह रहे हैं, और आप दिल्ली जैसे महानगर की बात कर रहे हैं आजकल छोटे शहरों का भी यही हाल है, वेलेन्टाईन डे, फ्रेन्डशीप डे और क्रिसमस पर जितनी रौनक बाजारों में दिखती है उतनी दीपावली जैसे त्यौहारों पर नहीं दिखती।

  • रवि // December 24, 2006 at 12:17 pm

    अमित,
    परिचर्चा के डिस्प्ले पर कुछ चिट्ठाकारों के फ़ोटो लगा दें तो कैसा रहे?

    नहीं तो भारतीय फ़िल्मस्टारों के ही लगा दें “ ;)

  • SHUAIB // December 24, 2006 at 1:47 pm

    जब ख़ुदा ने नया जेम्स बॉण्ड का सीडी लगाया तो तब भी खड खड की आवाज़ से सीडी अटक गई थी ;)

  • Amit // December 24, 2006 at 2:54 pm

    हम अपना मुँह नहीं खोलेंगे, हमारे शब्दो को पकड़ लोग-बाग पंगा फैलाते है

    हा हा हा, ठीक है, आप मुँह मत खोलो, कीबोर्ड द्वारा टाईप कर दो!! ;)

    परिचर्चा के डिस्प्ले पर कुछ चिट्ठाकारों के फ़ोटो लगा दें तो कैसा रहे?

    नहीं तो भारतीय फ़िल्मस्टारों के ही लगा दें

    कहीं आप दायीं ओर परिचर्चा के विज्ञापन की बात तो नहीं कर रहे?

    जब ख़ुदा ने नया जेम्स बॉण्ड का सीडी लगाया तो तब भी खड खड की आवाज़ से सीडी अटक गई थी

    अब भई घटिया स्तर की सीडी पर पॉयरेटिड फ़िल्म देखोगे तो ऐसा ही होगा ना!! ;) :P हम तो यहाँ सोनी वालों की एकदम कानूनी ओरिजनल डीवीडी की बात कर रहे थे। ;)

  • anil sinha // December 30, 2006 at 3:41 pm

    ईसाइयों के लिये क्रिसमस एक धार्मिक आयोजन है
    और उसे वह खुशियों और उल्‍लास के साथ मनाते हैं। पर माल वाले इस पर्व पर कोई धार्मिक आयोजन नहीं करते और पाश्चात्य संस्कृति का आंख मूंद कर अनुसरण करने वाले इस त्‍योहार को केवल मस्‍ती के साथ मदिरा-पान, नाच-गाना व घूमने-फिरने के साथ ही मनाते हैं। सोच कर देखिये कि कि ईसाइयों के अलावा कितने लोग घरो में क्रिसमस ट्री सजाते हैं या इस दिन गिरजाघरों में जाकर प्रार्थता करते हैं।

  • Amit // December 30, 2006 at 11:53 pm

    अनिल जी, शायद आपने मेरी पूरी पोस्ट नहीं पढ़ी। इसलिए आपसे कहूँगा कि आप मेरी पूरी पोस्ट पढ़िए और उसके बाद आपने जो टिप्पणी की है उसे पढ़िए और बताएँ कि आपकी टिप्पणी की क्या तुक बनती है। :)

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