दुनिया मेरी नज़र से - world from my eyes!!

Entries from January 2007

हिन्दी में बात करके प्रसन्नता होगी …..

January 14, 2007 · 17 Comments

पहले भी कई बार लिखा जा चुका है, मैंने भी लिखा है तथा अन्य लोगों ने भी लिखा है, कि क्या कारण हो सकते हैं कि लोग हिन्दी जानते हुए भी हिन्दी में बात नहीं करते। जब भी किसी अच्छे हाई-फ़ाई रेस्तरां में जाता हूँ और वहाँ पर पूछा जाता है:

हैलो सर! व्हॉट वुड यू लाईक टु हैव?

या किसी अन्य संस्थान में जाओ तो वहाँ पर स्वागत कक्ष में बैठी महिला पूछतीं हैं:

हाऊ मे आई हैल्प यू?

जब ऐसा होता है तो मुझे उस संस्थान/रेस्तरां के मैनेजमैन्ट आदि पर बड़ी कोफ़्त होती है। बड़े बड़े बी-स्कूल में पढ़ मैनेज करना आदि तो सीख लेते हैं लेकिन बाकी कुछ नहीं सीखते। अब यहाँ वेटर या उस रिसेप्शनिस्ट की गलती नहीं है, उन्हें तो जैसे बोला जाएगा वही करेंगे नहीं तो नौकरी से हाथ धोएँगे। लेकिन जो उनको ऐसा करने को बोलते हैं वे अपनी ज़रा भी अक्ल का प्रयोग नहीं करते। अरे भई यदि किसी भारतीय को संबोधित कर रहे हो(खासतौर पर जब वो उत्तर भारतीय दिख रहा है) तो उसे हिन्दी में क्यों नहीं संबोधित करते? यदि सामने वाले को हिन्दी समझ नहीं आई तो उससे अंग्रेज़ी आदि में वार्तालाप को आगे बढ़ाया जा सकता है लेकिन सीधे ही अंग्रेज़ी में बात करना तो समझदारी नहीं दिखती!! और संबोधित हो रहे लोग भी अधिकतर भूरे/काले अंग्रेज़ होते हैं जो अंग्रेज़ी में ही बात करना पसंद करते हैं!!

अभी कल(शनिवार) की बात है, दिल्ली ब्लॉगर समूह की स्थापना के तीन वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में एक भेंटवार्ता लोधी गार्डन में आयोजित की गई। अब मेरा वहाँ जाने का पूरा पिरोगराम फिट था, लेकिन अचानक परसों रात ऑफ़िस का कुछ आवश्यक कार्य आ जाने से पूरी रात उसको करना पड़ा, कल सुबह नौ बजे सोया और फिर दोपहर में एक बजे उठा। सिर में तीव्र दर्द हो रहा था इसलिए मैंने सोचा कि नहीं जाते भेंटवार्ता में, वैसे भी दो बजे का समय था पहुँचने का। लेकिन बाद में भी तो जा सकते थे, यह सोच अपन तैयार हुए, योगेश को फ़ोन कर पूछा कि साथ चलने का मन है क्या, बोले आ जाओ तो उनके घर पहुँच गए। अब साहब तैयार नहीं थे, तो उसमें कुछ मिनट लगाए, चलने से पहले सोचा कि पहले देख लें कि भेंटवार्ता अभी चल रही है कि नहीं, तो मोन्टू को फ़ोन लगाया और पता चला कि वह तो आधा घंटा पहले समाप्त हो गई और अब तो मोन्टू भी घर पहुँचने वाला है। सांयकाल के पाँच बज रहे थे, तो हम दोनों ने सोचा कि क्नॉट प्लेस हो आया जाए, घूम-फिर के वापस आ जाएँगे।

क्नॉट प्लेस पहुँच हमने सोचा कि कुछ खा-पी लें तो इसी गरज से पहुँच गए “निज़ाम्स काठी कबाब” में। अभी अपना ऑर्डर दिया ही था कि वहाँ रखी एक तख़्ती पर मेरी निगाह पड़ी और उसे देख बड़ी प्रसन्नता हुई।

ऐसा पहला रेस्तरां देखा जहाँ वो अंग्रेज़ी में बातचीत का दिखावा नहीं, इसको देख मुझे कितनी प्रसन्नता हुई मैं बता नहीं सकता। मैंने सोचा कि चलो कोई रेस्तरां तो है जो अपनी भाषा की परवाह करता है और उसमे बात करने से अपने को छोटा या लज्जित महसूस नहीं करता। यदि इसी तरह सभी रेस्तरां हो जाएँ और भारतीय(खास तौर से उत्तर भारतीय) ग्राहकों से हिन्दी में बोलें तो वाकई बहुत अच्छा हो जाएगा। :)

कहने का अर्थ है कि ऐसा भी नहीं है कि लोगों को भाषा समझ नहीं आती। तो फ़िर अपनी ही भाषा में बात करने को हीनता क्यों समझा जाता है??

वैसे कल बहुत बड़ा लफड़ा भी हो जाता। हुआ यूँ कि वेन्गर से पेस्ट्री आदि ले हम बाहर बैठ खा रहे थे और वहाँ एकाध तस्वीरें भी लीं। अब वहाँ से कैफ़े कॉफ़ी डे में कॉफ़ी पीने चले गए, पहले नीचे बैठे और फ़िर जब देखा कि ऊपर जगह खाली है तो ऊपर जाकर सोफ़े पर बैठने की सोची। अब ऊपर जाकर देखा कि कैमरा तो हाथ में है ही नहीं!! वापस आ नीचे देखा तो कुर्सी पर जहाँ पहले सामान रखा था वहाँ भी नहीं दिखा, मेरी तो सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई!! वापस उसी जगह गया, वेन्गर के पास, जहाँ हम लोग बैठे थे परन्तु वहाँ भी नहीं मिला। पास के कूड़ेदान में भी देख डाला कि कहीं गलती से खाली डब्बे के साथ कैमरा भी तो नहीं फ़ेंक दिया!! इतने में योगेश का फ़ोन आया और पता चला कि उनको कैमरा वहीं कैफ़े में नीचे की कुर्सी पर पड़ा मिल गया है जो कि हड़बड़ी में मुझे नहीं दिखा! मैंने चैन की सांस ली और वापस अपनी कॉफ़ी पीने पहुँच गया। :D

कैफ़े कॉफ़ी डे वालों की एक नई कॉफ़ी(नई बोले तो मेरे लिए नई) का ज़ायका लिया, कोलोम्बियन क्वेस्ट, जो कि उनकी अंतर्राष्ट्रीय कॉफ़ियों में से एक है। इस श्रेणी की दूसरी कॉफ़ी, इथोपियन काहवा, मुझे कुछ खास नहीं लगी, लेकिन वह कोलोम्बियन क्वेस्ट बढ़िया थी। इसमें ये लोग तीन ज़ायके(फ़्लेवर) देते हैं - आयरिश, हेज़लनट(एक प्रकार का बादाम) और चॉकलेट। तो इसमें मैंने आयरिश ज़ायके वाली कॉफ़ी ली और उसका स्वाद बढ़िया था! :) कभी मौका लगे तो आप भी पी कर देखिएगा, एक बड़े आकार के कप में सर्व होने वाली यह कॉफ़ी आपको भी अच्छी लगेगी। और मैं अगली बार जब किसी कैफ़े कॉफ़ी डे में जाऊँगा तो हेज़लनट ज़ायके वाली ट्राई करके देखूँगा। ;)

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अपना नाम स्वयं कैसे खराब करें?

January 10, 2007 · 2 Comments

क्या सिर्फ़ मेरा तजुर्बा ऐसा रहा है या वाकई भारतीय व्यवसायिक वेबसाइटें ऐसी हरकतें करती हैं जो कि समझदारी से बहुत दूर होती हैं?? पिछले कई वर्षों में ऐसे कई नमूने देखे हैं, अब ताज़ा तरीन नमूना पेश-ए-खिदमत है।

कुछ अरसा पहले वेबचटनी नामक कंपनी ने बड़े धूम धड़ाके के साथ एक ट्रैवल संबन्धी वेबसाइट ओके टाटा बॉय बॉय आरम्भ की थी जिसे वे लोग आज भी भारत की पहली ऑनलाइन ट्रैवल बिरादरी कहते है। अब कहने को तो हर कोई अपने को पहल करने वाला कहता है तो इसलिए इनके इस दावे को चुनौती नहीं दे रहा, लेकिन अब कोई खुद ही अपना नाम डुबाने की कोशिश करे तो क्या करें? इस वेबसाइट से कभी कभार विज्ञापन वाली ईमेल भेजी जाती है जिसमें वेबसाइट पर कुछ नया आरम्भ होने या किसी और बात की जानकारी दी जाती है। यहाँ तक तो सब ठीक है लेकिन समस्या आगे आती है। अब पता नहीं यह प्रबंधक समिति की समझदारी है या इस वेबसाइट के तकनीकी पक्ष संभालने वालों की, ये लोग ईमेल में अपना पता(जहाँ से ईमेल आई है) हमेशा गलत डालते हैं। पहले याहू/जीमेल जैसी मुफ़्त वाली ईमेल दिखाते थे और हर बार याहू के स्पैम फ़िल्टर उस ईमेल को स्पैम समझ इन्बॉक्स के बाहर बिठा देते थे।

कहते हैं समय बदलता है और लोगों का अंदाज़ बदलता है, वही आज हुआ। आज जब कई दिन बाद इनकी ईमेल आई तो पुनः स्पैम को रोकने वाले द्वारपालों ने उस ईमेल को बाहर बिठा दिया। ईमेल जाँचने पर पता चला कि इन लोगों ने अपने पिछले तरीके यानि मुफ़्त ईमेल सेवा के फ़र्जी पते को “ओके टाटा बॉय बॉय” कह दिया और अब फ़र्जी डोमेन के फ़र्जी पते को ईमेल भेजने वाले के तौर पर दिखा रहे हैं। इस बार ईमेल okttb.com से आई दिखाई गई।

ओके टाटा बॉय बॉय - धोखा या नासमझी?

एक नज़र देखने से आभास होता है कि okttb वास्तव में ok tata bye bye का छोटा रूप है। लेकिन अपना खुर्की दिमाग जो ठहरा, बखिया उधेड़ने की पुरानी आदत है। तो तुरंत जाँच करने से पता चल गया कि okttb.com इन चटनी वालों का है ही नहीं, और तो और, यह डोमेन तो अभी तक किसी ने रजिस्टर ही नहीं किया है!! यानि कि बिना डोमेन पर किसी अधिकार के उससे ईमेल भेजी जा रही है!! अब इसे तो सीधे सीधे स्पैम ही कहा जाएगा ना? और वह तो इनके लिए शुक्र की बात है कि इन्होंने भेजने वाले के स्थान पर okttb.com दिखाया, यदि गलती से अंत में एक b और लगा उसे okttbb.com दिखा देते तो गड़बड़ हो जाती, फ़िर तो सीधे सीधे चार सौ बीसी का मुकदमा चल सकता था क्योंकि okttbb.com डोमेन मेक माई ट्रिप वालों का है!! ;)

यह तो खैर तकनीकी बात हुई, अब प्रश्न है कि इससे वेबसाइट की और इसके पीछे चटनी वालों की साख पर क्या असर पड़ता है। तो बात यूँ है कि यदि अब कोई इस ईमेल का उत्तर दे कुछ पूछना चाहे तो कैसे पूछेगा? “रिप्लाई” यानि कि प्रतिउत्तर वाले बटन पर क्लिक करने से जो संदेश बनेगा वह तो फ़र्जी डोमेन के फ़र्जी पते पर जाएगा, यानि कि टांय टांय फ़िस्स!!! साफ़ पता चल जाएगा कि यह वेबसाइट और इसके पीछे की कंपनी विश्वसनीय नहीं है तो यदि कोई विज्ञापक विज्ञापन देने के लिए इस वेबसाइट वालों से संपर्क करना चाहे तो नहीं कर पाएगा, कंपनी को होने वाली कमाई तो गई ही गई, नाम पर भी अच्छे से काली रोशनी पड़ेगी।

यह सब मामला देख मुझे इस वेबसाइट के पीछे तकनीकी समझदारी दिखाने वालों की अक्ल पर तरस आता है कि इतने उच्च स्तरीय कंपनी होने का दावा और काज ऐसे निम्न स्तर के!! अब यदि यह किसी तरह की भूल है तो भी मामला गंभीर है, कम से कम कंपनी के लिए कि वे बिना जाँचे परखे ही अपना सामान बेचने के लिए काऊंटर पर रख देते हैं!!

चलो वैसे बढ़िया है, ऐसे लोग मौजूद रहेंगे तो बढ़िया काम करने वालों को अच्छे पैसे मिलते रहेंगे!!! ;)

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ग्लोबल वायसिस में हिन्दी

January 8, 2007 · 12 Comments

ग्लोबल वायसिस हॉर्वर्ड लॉ स्कूल के बर्कमैन सेन्टर फ़ॉर इंटरनेट एण्ड सोसाईटी द्वारा स्थापित एक अव्यवसायिक संस्था है जिसका उद्देश्य(कम शब्दों में) दुनिया के अलग अलग कोनों से लोगों के विचार ब्लॉग, पॉडकॉस्ट आदि द्वारा सभी तक पहुँचाना है। विश्व के अलग अलग हिस्सों के अलग अलग संपादक और लेखक हैं जो अपने अपने प्रांतों में हो रहे ब्लॉग संवाद आदि को अंग्रेज़ी में ग्लोबल वायसिस के ब्लॉग द्वारा बताते हैं।
(अब मैं उनके बारे में पूर्ण जानकारी का हिन्दी में अनुवाद नहीं कर पाऊँगा, इसलिए अंग्रेज़ी में उसे यहाँ पढ़ें)

अभी तक हिन्दी ब्लॉग जगत का इसमें प्रतिनिधित्व नहीं था, परन्तु मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि आज से यह कमी पूरी हो गई है। जिस प्रकार अनूप जी, जीतू भाई तथा अन्य बंधु हिन्दी में चिट्ठाचर्चा पर नियमित चिट्ठे बाँचते हैं उसी प्रकार मैं अंग्रेज़ी में हिन्दी चिट्ठे बाँच कर सभी को हिन्दी ब्लॉग जगत में चल रहे संवादों से परिचित करवाऊँगा। :) इसका लाभ हिन्दी चिट्ठों को बढ़े हुए ट्रैफ़िक और पाठकों के रूप में मिलेगा। बेशक ग्लोबल वायसिस का ब्लॉग पढ़ने वाले सभी हिन्दी के जानकार नहीं हैं परन्तु जो हैं और जो हिन्दी चिट्ठों के बारे में अधिक नहीं जानते वे तो पाठक बनेंगे!! ;)

पहले प्रयास के रूप में मेरी पहली पोस्ट यहाँ है। :)

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पर्वतों में नव वर्ष - भाग २

January 5, 2007 · No Comments

पिछले भाग से आगे …..

सुबह सवेरे मोबाईल में अलार्म बजते ही निद्रा खुल गई, ऐसा लगा कि जैसे अभी कुछ मिनट पहले ही तो सोए थे(4 घंटे पहले सोए थे)। नींद खुलने के बाद ठण्ड लगने लगी थी, रात को चढ़ाई गर्मी का असर समाप्त हो गया था, उस की वजह से रात निकल गई थी यही बहुत था वर्ना बहुत बुरा हाल हो सकता था। बाहर आकर हमने सुहावनी सुबह के दर्शन किए, सूर्य पर्वतों के पीछे से उदय हो रहा था और राहत की बात यह थी कि हल्की हल्की धूप दिखाई दे रही थी, कोहरा आदि कुछ भी नहीं था। हम सभी उठ कर लड़कियों के कमरे की ओर चल पड़े और जाकर देखा कि अभी तो वे भी नहीं उठे थे। बहरहाल क्योंकि हम लोगों का जल्दी निकलने का कार्यक्रम था इसलिए सभी फ़टाफ़ट तैयार होने लगे, रिसॉर्ट का एक कर्मचारी थोड़ी थोड़ी देर में हमको गर्म पानी लाकर दे रहा था और एक-एक कर सभी तैयार होते जा रहे थे। शीघ्र ही तैयार हो हम अपने रास्ते निकल लिए, मन्ज़िल थी कुछ दूरी पर स्थित ताड़केश्वर महादेव मंदिर जो कि भारत के सबसे पुराने सिद्धपीठों में से एक है।

रास्ता पूछते-पूछते हम आगे जा रहे थे, लान्सडौन से तकरीबन 8 किलोमीटर आगे निकल आने के बाद एक जगह पूछा तो पता चला कि अभी लगभग 20-22 किलोमीटर और जाना था। इधर पहाड़ी रास्ते के तीव्र घुमावों और तीखे मोड़ों के कारण संजुक्ता तथा एकाध की तबीयत खराब सी होने लगी, तो सबने यही निर्णय लिया कि वापस लौट लिया जाए, कहीं 20 किलोमीटर के आगे के सफ़र और लगभग 30 किलोमीटर के वापसी के सफ़र में इनकी तबीयत और खराब न हो जाए। वापस लान्सडौन पहुँच हम लोग टिप-इन-टॉप की ओर चल दिए जो कि लान्सडौन की मशहूर जगहों में से एक है क्योंकि यहाँ से नज़ारा बहुत अच्छा नज़र आता है। टिप-इन-टॉप पहुँच सभी लोग अपने अपने कैमरे निकाल व्यस्त हो गए(तस्वीरें लेनें में)।

वहीं पास में लान्सडौन का सबसे पुराना गिरजा, सेंट मेरी चर्च, है जिसमें अब एक छोटा सा संग्रहालय भी बना दिया गया है।

दोपहर हो आई थी तो हमने भोजन करने की सोची क्योंकि सुबह भी कुछ खाए बिना ही निकले थे। तो भोजन करने हम पहुँच गए लान्सडौन के मुख्य बाज़ार में स्थित मयूर होटल में जहाँ के परांठों की तारीफ़ मोन्टू पिछले दिन से किए जा रहा था। भोजन की प्रतीक्षा करते-करते एक-एक मिनट मानो सदियों की तरह बीत रहा था, तो कई सदियों की प्रतीक्षा के बाद खाद्य सामग्री हमारी टेबल पर आई और सभी लोग स्वादिष्ट खाने का आनंद लेने लगे। अब खाना वाकई स्वादिष्ट था कि नहीं यह तो कह नहीं सकते क्योंकि उस समय हम सभी क्षुधा से अति व्याकुल थे और वो कहते हैं न कि

भूख में किवाड़ भी पापड़ लगते हैं

भूख में चने भी मेवा लगते है

बस तो इन्हीं कहावतों को चरितार्थ भी कर सकता है वहाँ का खाना, इसलिए कोई इस को दिल पर न ले कि वहाँ का खाना बहुत अच्छा था!! ;) बहरहाल, पेट भर चुकने के बाद हमने पास ही में मौजूद कृत्रिम रूप से तैयार किए गए भुल्ला-ताल जा नौका विहार करने का निर्णय लिया।

कुछ ही देर में हम लोग भुल्ला-ताल पहुँच गए और दो-दो के जोड़ों में नौकाओं में सवार हो गए। संजुक्ता और शोभना की मौज हो गई क्योंकि उनको हितेश और वरुण के रूप में दो नौका चालक मिल गए, इसलिए वे लोग 4 लोगों वाली नौका में आगे की सीटों पर बैठ गए ताकि बेचारे दोनों लड़के उनको नौका विहार करा सकें!! ;) बाकी मोन्टू और निधि एक नौका में थे तथा मैं और एन्सी एक नौका में विहार कर रहे थे। ताल में कुछेक बतखें भी थीं, रंगीन और श्वेत रंग की। तो मैंने और एन्सी ने उनके पास जाकर उनकी तस्वीरें लेने की सोची, पूरे ताल का चक्कर लगा एक जगह उनको घेर ही लिया!! :)

तैरते हुए इन बतख़ों के दो वीडियो भी उतारे जो कि यहाँ उपलब्ध हैं।

जब नौका विहार कर चुके तो ताल से बाहर आकर वहाँ रखी कुर्सियों पर बैठ धूप का आनंद लेने लगे क्योंकि हितेश और शोभना का मन नौका विहार से भरा नहीं था और वहाँ मौजूद एकलौती हंस के आकार वाली नौका में उनको विहार करना था। थोड़ी देर बाद जब वे लोग भी आ गए तो हमने आगे बढ़ने की सोची। तभी नज़र पास ही रखे पिंजरे में मौजूद अंगूरा खरगोशों पर गई। हमारे पिंजरे के पास पहुँचते ही वे सभी हमारे पास तुरंत इस उम्मीद में आए कि उनको खाने को कुछ मिलेगा, लेकिन अंत में बेचारों के हाथ निराशा ही आई क्योंकि हमारे पास खाने को कुछ नहीं था, लेकिन उनकी तस्वीरें लेना नहीं भूले। :)

तत्पश्चात हम सभी पास ही में मौजूद संतोषी माता के मंदिर पहुँचे। मंदिर की सीढ़ियाँ ऊँची और बहुत सारी थी, एन्सी और संजुक्ता ने जाने से मना कर दिया, तो हम सब बाकी लोग ऊपर चल पड़े, मंदिर तक पहुँचते पहुँचे सांस फूल गई!!! मंदिर की कोई खासी महिमा नहीं, जैसे अन्य मंदिर होते हैं वैसा ही है, कोई पुजारी भी आस पास नहीं था, लेकिन ऊँचाई पर होने के कारण वहाँ से नीचे का नज़ारा बहुत अच्छा था।

शाम हो आई थी, इसलिए मंदिर से नीचे उतर हम वापस रिसॉर्ट की ओर चल दिए। अब तक रिसॉर्ट लगभग खाली हो ही गया था, इसलिए हमको लड़कियों के कमरे के बराबर में ही दो बढ़िया कमरे मिल गए। सभी के सभी एक कमरे में बिस्तर पर लद गए और चाय-पानी तथा नाश्ते का हुक्म दनदना दिया गया। इधर उधर की बातें होती रही, टीका टिप्पणियाँ भी चलती रही। सभी से कहा गया कि वे एक दूसरे के बारे में अपनी अपनी राय व्यक्त करें पिछले दो दिनों के अनुभव पर। इस तरह राय व्यक्त की गईं और उन पर चर्चा हुई, समय तेज़ी से बीता। रात्रि हो आई और रिसॉर्ट के कर्मचारी ने आकर बताया कि उस रोज़ उनकी रसोई रात्रि 9 बजे बंद हो जाएगी क्योंकि वे लोग पिछली रात के जागे हुए हैं(बेकार की बात है, नववर्ष की रात्रि वे लोग 12-1 बजे सो गए थे)। खैर, हमने कोई बहस नहीं करी और उसको कह दिया कि हम लोगों के लिए भोजन अंत में लाए, यानि कि 9 बजे के आसपास।

साढ़े आठ बजे के आसपास नए मिले दो कमरों के पास की खाली जगह पर आग का प्रबंध किया गया और खाना भी वहीं लगवा दिया गया। सभी ने निश्चय किया था कि उस रात कोई मदिरापान नहीं करेगा, पिछली रात का ड्रामा काफ़ी था, अन्यथा स्टॉक तो अपने पास पर्याप्त से कुछ अधिक ही था। ;) पिछली रात की तरह इस बार खाना ठण्डा नहीं करते हुए सभी ने गर्मा-गर्म खाया और पूरा आनंद उठाया। खाना खा चुकने के बाद आग को घेरे सभी बैठे बतिया रहे थे कि बात वहाँ जंगल में कभी कभार विचरने वाले चीतों पर चली गई। रिसॉर्ट के कर्मचारी से पूछा तो उसने बताया कि अब चीते आदि नहीं आते क्योंकि इंसानों की आवाजाही उस इलाके में बढ़ गई है। हितेश बाबू अपने बांधवगढ़ के अनुभव के बारे में बता रहे थे कि जंगल में कुछ दूर एक टॉर्च की रोशनी दिखाई दी जो कि तीव्र गती से हिलती-डुलती हमारी ओर बढ़ रही थी। अब न जाने शेर-चीते की बातों का डर था या कुछ और, सभी लड़कियाँ डर कर हमारे कमरे में जा घुसी। उनको यह समझाया कि कोई शेर-चीता टॉर्च लेकर हमारे पास नहीं आएगा तो उन्होंने कहा कि हो सकता है कि टॉर्च वाले व्यक्ति के पीछे पड़ा हो अन्यथा वह इतनी तेज़ी से भागत हुआ क्यों आ रहा था। तभी बाहर से आ किसी ने बताया कि वह व्यक्ति स्थानीय था और कदाचित्‌ तेज़ी से इसलिए आ रहा था क्योंकि ठण्ड बढ़ रही थी और वह जल्द ही अपने घर पहुँचने का इच्छुक था। परन्तु उस वाकये के बाद लड़कियाँ आग के पास बैठने की इच्छुक नहीं लगी, इसलिए सभी कमरों में आ गए।

थोड़ी देर बाद सभी इस बात पर सहमत हो सोने चले गए कि अगले दिन सुबह जल्दी उठ वापसी की राह पकड़ी जाए क्योंकि हमने वापसी के रास्ते में कर्ण्वाश्रम भी देखना था।

अगले भाग में जारी …..

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पर्वतों में नव वर्ष - भाग १

January 4, 2007 · 5 Comments

चार महीने से ऊपर हो गए थे पिछली यात्रा को, तब से कहीं घूमने फ़िरने नहीं गया था। तो इसलिए मन मचल रहा था, पैरों में खुजली हो रही थी कि कहीं घूम-फ़िर आया जाए। मोन्टू ने कहा कि नए साल का स्वागत कहीं बाहर करेंगे तो ऐसा ही करने की सोची। परन्तु यह इतना आसान कहाँ था, लोगबाग़ महीनों पहले कार्यक्रम बना और बुकिंग आदि करा के बैठे होते हैं, इसलिए हमने किसी लोकप्रिय जगह जाने का तो ख्याल ही छोड़ दिया। कम लोकप्रिय जगहों पर यात्रीनिवासों और होटलों में पता किया गया, लेकिन हर जगह निराशा ही मिली, गढ़वाल मण्डल वालों ने तो हाथ खड़े कर दिए, बोले कि उनके किसी भी यात्रीनिवास में जगह उपलब्ध नहीं है। बड़ी मुश्किल से लान्सडौन के जंगल रिसॉर्ट रिट्रीट आनंद में जगह का जुगाड़ हो पाया। :) हम पाँच लोगों का प्रोग्राम था जाने का लेकिन यात्रा की तिथि निकत आते आते हम आठ हो गए, दो-तीन को तो मना करना पड़ा क्योंकि रहने के लिए ज़्यादा जुगाड़ नहीं था इसलिए समस्या हो जाती।

तो 31 दिसंबर की सुबह अपन निकल पड़े, सभी यार दोस्तों को ले मोन्टू के घर पहुँचे। लेकिन समस्या यह थी कि एन्सी की ट्रेन लेट हो गई थी, वह अपने गृहनगर से वापस आ रही थी और दिल्ली में कोहरे के कारण ट्रेन लेट थी। उसने कहा भी कि हम लोग उसकी प्रतीक्षा न करें और निकल लें, लेकिन हमने प्रतीक्षा करने की ठान ली, जो होगा देखा जाएगा। आखिरकार सुबह 9 बजे(करीब 3 घंटे लेट) उसकी ट्रेन स्टेशन पर लगी और वह अपने घर निकल पड़ी जहाँ से उसने अपना सामान लेना था। थोड़ी देर बाद हम लोग उसके घर पहुँच गए और उसे ले अपने सफ़र पर निकल पड़े।

गाज़ियाबाद, मोदीनगर, मेरठ, बिजनौर तथा नजीबाबाद होते हुए हम कोटद्वार पहुँचे। यहाँ से लगभग 40 किलोमीटर का पहाड़ी रास्ता तय कर हमें लान्सडौन पहुँचना था। अगले दिन ईद थी, इसलिए मार्ग में हमें काफ़ी ट्रैफ़िक और भीड़-भाड़ मिली जिस कारण हम और लेट हो गए, नतीजन जब हम लान्सडौन के रास्ते पर थे तभी सूर्यास्त हो रहा था। अब उसे कैसे छोड़ सकते थे, इसलिए गाड़ी रूकवाई गई ताकि सभी उसे(सूर्यास्त को) अपने अपने कैमरों में बन्द कर सकें।

चित्र आदि ले हम लोग पुनः चल पड़े, लान्सडौन पहुँचते पहुँचते अंधेरा हो चुका था और हमें रिट्रीट आनंद ढूँढने में बहुत दिक्कत आ रही थी, जिससे पूछो वही नया मार्ग बता देता था। आखिरकार कुछ देर भटकने के बाद हम जंगल रिसॉर्ट में पहुँच ही गए, वहाँ का मालिक बेसब्री से हमारा इंतज़ार कर रहा था, उसे लग रहा था कि हम आएँगे ही नहीं। ;) यह रिसॉर्ट(कहने भर को ही है, वास्तव में नहीं है) जंगल में ईंट-पत्थर की कुटियाएँ डाल बनाया गया है, यानि कि पूरा का पूरा जंगल में रहने का मज़ा। लेकिन समस्या यह थी कि हमें एक ही कमरा मिला और एक टिन-लकड़ी की कुटिया। तो भद्र पुरुष होने के कारण हमने कमरा लड़कियों को दे दिया और स्वयं टिन-लकड़ी की कुटिया में रात्रि गुजारने का निर्णय लिया। भूख बहुत लगी थी सभी को इसलिए नाश्ता मंगवाया गया और आग का प्रबंध करने को कहा गया। थोड़ी देर में आग का प्रबन्ध हो गया और उसके पास ही कुर्सियाँ रख दी गई तो हम सब आग को घेर बैठ गए और सर्दी में गर्मी का आनंद लेने लगे।

फ़िर विह्स्की, रम, वोदका तथा वाईन खुली और अंताक्षरी का दौर चलने लगा। अत्यधिक ठण्ड होने के कारण मैंने भी रम के 5-6 पैग और वोदका के 1-2 पैग चढ़ा लिए, लेकिन आश्चर्य कि नशा बिलकुल नहीं हुआ, परन्तु जिस मकसद के तहत जीवन में पहली बार चढ़ाई वह पूरा हुआ, शरीर में अंदर काफ़ी गर्मी आ गई। ;) अंताक्षरी के बाद नाच गाना भी हुआ।

नया साल आरंभ होते ही रिसॉर्ट में ठहरे एक यात्री समूह ने आतिशबाज़ियाँ की, हम सभी मित्रों ने आपस में गले मिल एक दूसरे को बधाईयाँ और शुभकामनाएँ दीं। हमारा खाना कब का लग चुका था, आखिरकार वह भी खा लिया गया, बर्फ़ सा ठण्डा हो गया था लेकिन स्वादिष्ट था। एन्सी और संजुक्ता का मदिरापान कुछ अधिक हो गया था इसलिए मैं और मोन्टू उन दोनों को उनके कमरे तक छोड़ आए ताकि वे सो जाएँ। वापस आ हम बाकियों के साथ आग तापते बतियाते रहे और तकरीबन आधे घंटे बाद सभी ने सोने जाने का निर्णय लिया, सुबह जल्दी उठ ताड़केश्वर महादेव मंदिर जाना था जो कि कुछ दूर था और भारत के सबसे पुराने सिद्धपीठों में से एक है। तो लड़कियों को उनके कमरे में छोड़ और शुभरात्रि कह हम लोग टिन-लकड़ की कुटिया की ओर चल दिए। कुछ देरे मेरे और हितेश के बीच स्टिफ़न हॉकिंग और ब्रह्माण्ड आदि के बारे में चर्चा हुई, तत्पश्चात हम लोग अपने अपने बिस्तरों में घुस गए।

अगले भाग में जारी …..

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नया समय ….. नए चिट्ठाकार

January 3, 2007 · 7 Comments

कल रात लगभग 11 बजे मैं लान्सडौन में 3 दिन की छुट्टी के बाद वापस लौटा। आते ही सबसे पहले कंप्यूटर चला के ईमेल देखी, तीन दिन की अनुपस्थिति के चलते इन्बॉक्स में ईमेलें ठसा ठस भरी हुई थी, तो मैं कचरा ईमेलों को मिटाने और अन्य ईमेलों को पढ़ने बैठ गया, कई नए साल की शुभकामनाओं वाली ईमेलें थीं जिनके उत्तर दिए और कुछेक अन्य ईमेलें थीं।

एक ईमेल चिट्ठाकार समूह पर भी आई हुई थी किसी दिव्यभ आर्यन महाशय की जिसमें वे वही राग अलाप रहे थे जो कि अभी हाल ही में चिट्ठाकार समूह में चर्चित हुआ था। मुद्दा यह था कि कुछ नए चिट्ठाकार अपने अपने चिट्ठों अर्थात्‌ ब्लॉग पर प्रकाशित नई पोस्टों की सूचना ईमेल द्वारा पूरे समूह को दे रहे थे। अब एकाध तो ठीक है परन्तु जब कई ब्लॉगर कई कई ईमेलें करने लगेंगे तो सभी को दिक्कत होगी, जिसे कि वे लोग नहीं समझ रहे थे। अब उनकी दुविधा भी जायज़ है कि अपने नए ब्लॉग आदि के बारे में जब तक किसी को बताएँगे नहीं तो लोगों को पता कैसे चलेगा, लेकिन उचित समाधान बताए जाने पर भी उनका न समझना सिर्फ़ ढीढता को ही दर्शाता है। उनको बताया गया कि इस तरह हर नई पोस्ट के बारे में सभी को ईमेल करना अनुचित है, किसी को वे अपना ब्लॉग पढ़ने के लिए बाध्य नहीं कर सकते, केवल एक बार अपने ब्लॉग के बारे में बता दो, अपने ईमेल के सिग्नेचर में अपने ब्लॉग का पता रखो, नारद तथा हिन्दी ब्लॉग्स जैसी सेवाओं को अपने ब्लॉग के बारे में जानकारी दो ताकी सभी आपके ब्लॉग की नई पोस्ट आदि पढ़ सकें, फ़िर जिसको पढ़ना होगा वह पढ़ेगा, लेकिन कुछ लोगों को तो मानों स्पैम करने के लिए बहाना चाहिए, उनको इन उपायों में से कोई भी उपाय स्वीकार नहीं।

एक नए चिट्ठाकार ने यह मुद्दा भी उठाया कि उनकी पोस्ट पर कोई टिप्पणी नहीं करता तो यह बात भी समझ में आती है। इस पर तरूण भाई ने कहा कि लेने से पहले देने की सोचें क्योंकि “give and take” का ज़माना है। यदि आप दूसरे के ब्लॉग पर टिप्पणी करेंगे तो दूसरा भी आपके ब्लॉग पर बेशक टिप्पणी नहीं करे लेकिन एक बार कम से कम पढ़ने तो आएगा, और क्या पता नियमित पाठक बन नियमित टिप्पणियाँ दे। एक बात यह भी सोचने की है कि लिखने वाले को अपने आप से सच्चे दिल से पूछना चाहिए कि वह ऐसा क्या लिखता है कि लोग उसके ब्लॉग को पढ़ें और उस पर टिप्पणी भी दें? यदि वह कुछ ऐसा लिखता है जो लोगों को पसंद आता है तो लोगबाग़ पढ़ने भी आएँगे और टिप्पणियाँ भी करेंगे।

लेकिन यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि कुछ को यह बात भी स्वीकार्य नहीं, उनको तो लगातार स्पैम करना ही है, अपने ब्लॉग को जबर्दस्ती दूसरों को पढ़वाना है और टिप्पणियाँ भी लेनी हैं। मतलब यह तो वही बात हो गई(जैसे एक मित्र ने मुझे बताया था) कि मानों कह रहे हों:

सरपंचों की बात सिर-माथे, लेकिन नाली तो यहीं से बहेगी!!!

हाँ तो इन दिव्यभ महोदय ने तरूण भाई की ईमेल के उत्तर में चिट्ठाकार समूह में यह ईमेल करी जिसमें साहब हक/अधिकारों की बात करते हुए कहते हैं कि उनका तो हक बनता है अपनी बात को रखना, उस बात को कार्यान्वित करना बाकी सब की ज़िम्मेदारी है। अब यह कहाँ का कानून है भई?? बहरहाल अपनी खीज को दबाते हुए मैंने प्यार-मोहब्बत की भाषा में उत्तर दिया कि भई अधिकारों की बात करने से पहले व्यक्ति को अपनी ज़िम्मेदारियों को समझना और पूरा करने का प्रयास करना चाहिए, तभी वह अपने अधिकारों को प्राप्त करने योग्य है। लेकिन एक भूल मुझ से यह हुई कि यह नहीं देखा कि ईमेल कहाँ जा रही है, गलती से वह ईमेल चिट्ठाकार समूह मे जाने की बजाय दिव्यभ महोदय के पते पर चली गई। उस ईमेल के उत्तर में महाशय ने आज मुझे यह ईमेल भेजी:

Mr. Amit Gupt,
tumhare sahare mane Blog nahi Likhana shuru kiya hai.ya to tum aabbal darje ke bebakuf ho ya nakare.baat lagata hai ki tumhare dimaag me aati hi nahi.u know the problem of Hindi blogger is just like u…unke pass na to tahejib hoti hai aur na aakal,mai to samajhata tha ki samajhadaro ki toli hai yah.maine padha hai tumhara Blog jo likhate ho tum kud janate ho tumhare liye maine ye dhun taiyaar ki hai—
“Chale the Carvan me baith hazaro itihash rachane
par kuch jo ban jate hain itihash aur koi ek hi
de pata hai Gehara Paigam.” aage se mujhe mail karne ki jaroorat nahin hai aur na hi mera mail jayega aapke so called ChittaKar Bunglow me. Sukriya aur Hve a great morning Jindagi se kuch Seekhne ki koshish karo.thodi samajdari aur tahejib lao Nahi to wohin Atke Raho ge Samjhe.

Divyabh.

यानि कि बद्तमीज़ी और बेअक्ली वाली बात करने वाले साहब तमीज़ और अक्ल की बात कर रहे हैं, इस बात से मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ, संसार में ऐसे लोग भरे पड़े हैं और दुख की बात है कि अब ये लोग ऑनलाईन आ अपनी गंदगी फ़ैलाएँगे जिससे जल्द ही वास्तविक संसार की भांति यह इंटरनेट भी दूषित हो जाएगा। लेकिन क्या कर सकते हैं जी, मुक्त संसार है, सभी अपनी इच्छानुसार बर्ताव करने के लिए तैयार हैं।

इस पोस्ट का मकसद सिर्फ़ इस बात को दर्शाना है कि एक साधारण चलती चर्चा में लोग किस तरह व्यक्तिगत हो खामखा कीचड़ उछालने लगते हैं, यह भी कोई वैसे नई बात नहीं है, अभी हाल ही में परिचर्चा पर भी ऐसा देखने/पढ़ने को मिला। दूसरा मकसद अन्य हिन्दी चिट्ठाकारों को यह ईमेल पढ़वाना भी था क्योंकि अन्य चिट्ठाकारों को भी बद्तमीज़ और बेअक्ल कहा गया है।

और दिव्यभ महोदय, चूंकि आप नहीं चाहते कि आपको मैं ईमेल करूँ इसलिए आपकी तरह बद्तमीज़ और गंवार न होने के कारण मैं आपकी इच्छा का सम्मान करते हुए आपको ईमेल द्वारा अपना उत्तर नहीं देते हुए अपने ब्लॉग द्वारा दे रहा हूँ।

मैंने तो कहा ही नहीं कि मैंने आपको ब्लॉग लिखना सिखाया, यह कोई बहुत बड़ी बात भी नहीं है, यदि आपने अपने आप सीखा तो अच्छी बात, यदि किसी ने सिखाया तो उसका धन्यवाद करना मत भूलना(जो कि मुझे लगता है कि आप अवश्य भूल गए होंगे)। नाकारे होने के बारे में तो पता नहीं लेकिन बेवकूफ़ आप अवश्य हो क्योंकि बात आपके दिमाग में नहीं आती जो कि सीधी सरल भाषा में आपको कई लोगों ने समझाई। मैं दुआ करता हूँ कि आप कभी कोई गैरकानूनी कार्य न कर बैठो नहीं तो जज के सामने भी यही राग अलापोगे कि आपने तो कुछ गलत किया नहीं, वह तो कानून ही बेढंगा है!! हिन्दी ब्लॉगर समुदाय मेरे आने से पहले भी खुश था और मेरे आने के बाद भी, हाँ यही बात आपके आने के बाद के बारे में नहीं कही जा सकती शायद, लेकिन वो कहते हैं न कि “हाथी चलते रहते हैं …….”!! ;) हिन्दी चिट्ठाकार बहुत ही समझदार, तमीज़दार हैं, बस आप जैसी कुछ सड़ी मछलियाँ तालाब गंदा करने का भरसक प्रयास कर रही हैं जिसे सफ़ल होने से रोकने का पूर्ण प्रयास किया जाएगा।

आपको तो मैं ईमेल पहले भी नहीं करना चाहता था, वह तो याहू की गलती से चली गई, तथा चिट्ठाकार समूह मेरे अकेले का नहीं है, वह तो सभी का है, वैसे मुझे खुशी है कि तालाब से एक गंदी मछली कम हुई। रही बात ज़िन्दगी से कुछ सीखने की, वह तो मैं रोज़ ही सीखता हूँ, लेकिन आप जैसे बद्‌किस्मत नहीं सीख पाते क्योंकि उसके लिए अक्ल दरकार होती है। बाकी समझ और तहज़ीब लाने वाली बात गलती से आप अपनी जगह मेरे लिए लिख गए अन्यथा वह तो आप पर पूर्णतया सटीक बैठती है, क्योंकि आपको क्या पता मैं अटका हुआ हूँ, वह तो आप जैसों का ही दुर्भाग्य होता है!!!

साथ ही अंत में मैं दिव्यभ महोदय से क्षमा चाहता हूँ कि उनको मेरी ईमेल चली गई, अन्यथा उन जैसों को तो मैं ईमेल लिखना ही पसंद नहीं करता।

आगे से मुझे इस बात का खास ख़्याल रखना होगा कि जिसको ईमेल भेजना चाहता हूँ उसी को जाए, किसी ऐरे-गैरे को नहीं।

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