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हिन्दी में बात करके प्रसन्नता होगी …..

January 14, 2007 · 17 Comments

पहले भी कई बार लिखा जा चुका है, मैंने भी लिखा है तथा अन्य लोगों ने भी लिखा है, कि क्या कारण हो सकते हैं कि लोग हिन्दी जानते हुए भी हिन्दी में बात नहीं करते। जब भी किसी अच्छे हाई-फ़ाई रेस्तरां में जाता हूँ और वहाँ पर पूछा जाता है:

हैलो सर! व्हॉट वुड यू लाईक टु हैव?

या किसी अन्य संस्थान में जाओ तो वहाँ पर स्वागत कक्ष में बैठी महिला पूछतीं हैं:

हाऊ मे आई हैल्प यू?

जब ऐसा होता है तो मुझे उस संस्थान/रेस्तरां के मैनेजमैन्ट आदि पर बड़ी कोफ़्त होती है। बड़े बड़े बी-स्कूल में पढ़ मैनेज करना आदि तो सीख लेते हैं लेकिन बाकी कुछ नहीं सीखते। अब यहाँ वेटर या उस रिसेप्शनिस्ट की गलती नहीं है, उन्हें तो जैसे बोला जाएगा वही करेंगे नहीं तो नौकरी से हाथ धोएँगे। लेकिन जो उनको ऐसा करने को बोलते हैं वे अपनी ज़रा भी अक्ल का प्रयोग नहीं करते। अरे भई यदि किसी भारतीय को संबोधित कर रहे हो(खासतौर पर जब वो उत्तर भारतीय दिख रहा है) तो उसे हिन्दी में क्यों नहीं संबोधित करते? यदि सामने वाले को हिन्दी समझ नहीं आई तो उससे अंग्रेज़ी आदि में वार्तालाप को आगे बढ़ाया जा सकता है लेकिन सीधे ही अंग्रेज़ी में बात करना तो समझदारी नहीं दिखती!! और संबोधित हो रहे लोग भी अधिकतर भूरे/काले अंग्रेज़ होते हैं जो अंग्रेज़ी में ही बात करना पसंद करते हैं!!

अभी कल(शनिवार) की बात है, दिल्ली ब्लॉगर समूह की स्थापना के तीन वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में एक भेंटवार्ता लोधी गार्डन में आयोजित की गई। अब मेरा वहाँ जाने का पूरा पिरोगराम फिट था, लेकिन अचानक परसों रात ऑफ़िस का कुछ आवश्यक कार्य आ जाने से पूरी रात उसको करना पड़ा, कल सुबह नौ बजे सोया और फिर दोपहर में एक बजे उठा। सिर में तीव्र दर्द हो रहा था इसलिए मैंने सोचा कि नहीं जाते भेंटवार्ता में, वैसे भी दो बजे का समय था पहुँचने का। लेकिन बाद में भी तो जा सकते थे, यह सोच अपन तैयार हुए, योगेश को फ़ोन कर पूछा कि साथ चलने का मन है क्या, बोले आ जाओ तो उनके घर पहुँच गए। अब साहब तैयार नहीं थे, तो उसमें कुछ मिनट लगाए, चलने से पहले सोचा कि पहले देख लें कि भेंटवार्ता अभी चल रही है कि नहीं, तो मोन्टू को फ़ोन लगाया और पता चला कि वह तो आधा घंटा पहले समाप्त हो गई और अब तो मोन्टू भी घर पहुँचने वाला है। सांयकाल के पाँच बज रहे थे, तो हम दोनों ने सोचा कि क्नॉट प्लेस हो आया जाए, घूम-फिर के वापस आ जाएँगे।

क्नॉट प्लेस पहुँच हमने सोचा कि कुछ खा-पी लें तो इसी गरज से पहुँच गए “निज़ाम्स काठी कबाब” में। अभी अपना ऑर्डर दिया ही था कि वहाँ रखी एक तख़्ती पर मेरी निगाह पड़ी और उसे देख बड़ी प्रसन्नता हुई।

ऐसा पहला रेस्तरां देखा जहाँ वो अंग्रेज़ी में बातचीत का दिखावा नहीं, इसको देख मुझे कितनी प्रसन्नता हुई मैं बता नहीं सकता। मैंने सोचा कि चलो कोई रेस्तरां तो है जो अपनी भाषा की परवाह करता है और उसमे बात करने से अपने को छोटा या लज्जित महसूस नहीं करता। यदि इसी तरह सभी रेस्तरां हो जाएँ और भारतीय(खास तौर से उत्तर भारतीय) ग्राहकों से हिन्दी में बोलें तो वाकई बहुत अच्छा हो जाएगा। :)

कहने का अर्थ है कि ऐसा भी नहीं है कि लोगों को भाषा समझ नहीं आती। तो फ़िर अपनी ही भाषा में बात करने को हीनता क्यों समझा जाता है??

वैसे कल बहुत बड़ा लफड़ा भी हो जाता। हुआ यूँ कि वेन्गर से पेस्ट्री आदि ले हम बाहर बैठ खा रहे थे और वहाँ एकाध तस्वीरें भी लीं। अब वहाँ से कैफ़े कॉफ़ी डे में कॉफ़ी पीने चले गए, पहले नीचे बैठे और फ़िर जब देखा कि ऊपर जगह खाली है तो ऊपर जाकर सोफ़े पर बैठने की सोची। अब ऊपर जाकर देखा कि कैमरा तो हाथ में है ही नहीं!! वापस आ नीचे देखा तो कुर्सी पर जहाँ पहले सामान रखा था वहाँ भी नहीं दिखा, मेरी तो सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई!! वापस उसी जगह गया, वेन्गर के पास, जहाँ हम लोग बैठे थे परन्तु वहाँ भी नहीं मिला। पास के कूड़ेदान में भी देख डाला कि कहीं गलती से खाली डब्बे के साथ कैमरा भी तो नहीं फ़ेंक दिया!! इतने में योगेश का फ़ोन आया और पता चला कि उनको कैमरा वहीं कैफ़े में नीचे की कुर्सी पर पड़ा मिल गया है जो कि हड़बड़ी में मुझे नहीं दिखा! मैंने चैन की सांस ली और वापस अपनी कॉफ़ी पीने पहुँच गया। :D

कैफ़े कॉफ़ी डे वालों की एक नई कॉफ़ी(नई बोले तो मेरे लिए नई) का ज़ायका लिया, कोलोम्बियन क्वेस्ट, जो कि उनकी अंतर्राष्ट्रीय कॉफ़ियों में से एक है। इस श्रेणी की दूसरी कॉफ़ी, इथोपियन काहवा, मुझे कुछ खास नहीं लगी, लेकिन वह कोलोम्बियन क्वेस्ट बढ़िया थी। इसमें ये लोग तीन ज़ायके(फ़्लेवर) देते हैं - आयरिश, हेज़लनट(एक प्रकार का बादाम) और चॉकलेट। तो इसमें मैंने आयरिश ज़ायके वाली कॉफ़ी ली और उसका स्वाद बढ़िया था! :) कभी मौका लगे तो आप भी पी कर देखिएगा, एक बड़े आकार के कप में सर्व होने वाली यह कॉफ़ी आपको भी अच्छी लगेगी। और मैं अगली बार जब किसी कैफ़े कॉफ़ी डे में जाऊँगा तो हेज़लनट ज़ायके वाली ट्राई करके देखूँगा। ;)

Categories: some thoughts · कुछ विचार

17 responses so far ↓

  • महावीर // January 15, 2007 at 5:25 am

    ‘हिन्दी में बात करके प्रसन्नता होगी…’ , बड़ा अच्छा लेख लगा। हिन्दी को राष्ट्र भाषा को सिंहासन पर तो बैठा दिया किंतु इन अंगरेज़ीनुमा गिरगटी भारतीयों ने जूतों का हार
    पहना कर हिंदी के अनादर की सीमा तक पहुंचा दिया है। यह और भी दुख है जब
    हिंदी भाषी लोग हिन्दी शब्दों के उच्चारण को जानते हुए भी अंगरेज़ीकरण कर योग को योगा, अर्जुन को अर्जुना आदि कहने लगते हैं। मैंने भी इसी विषय पर एक लेख
    हिन्दी का गला घुट रहा है
    लिखा था। हो सके तो आप पढ़ियेगा।

  • Divyabh // January 15, 2007 at 9:28 pm

    अच्छा लगा आपका लेख और आश्चर्यांवित भी हूँ…
    तस्वीर को देखकर rarest of rare snap of a good Restaurant…in CP what a good use of this….
    हिन्दी उच्च तबके लोगों के लिय जरुर शर्मनाक
    भाषा बन गई है…दक्षिण भारत में मैने देखा है कि
    लोग हिन्दी जानते हुए भी आपसे उस भाषा में बात
    नहीं करेंगे…भारत पूर्णतः तबतक एकराष्ट्र नहीं हो
    सकता जबतक भाषागत एकता नहीं आयेगी।

  • उन्मुक्त // January 15, 2007 at 10:18 pm

    मुझे भी अक्सर इसकी झुंझलाहट होती है। खास तौर पर हवाई जहाज पर।

  • आशीष // January 15, 2007 at 10:24 pm

    पढकर अच्छा लगा !

  • संजय बेंगाणी // January 16, 2007 at 10:03 am

    हद तो तब होती है जब आप हिन्दी में जवाब दे रहे होते हैं, मगर सामनेवाला अंग्रेजी का पल्लु नहीं छोड़ता.

  • Amit // January 16, 2007 at 11:47 am

    मुझे भी अक्सर इसकी झुंझलाहट होती है। खास तौर पर हवाई जहाज पर।

    हाँ जी बिलकुल, यह बर्ताव सिर्फ़ रेस्तरां या होटल या संस्थानों तक ही सीमित नहीं वरन्‌ हर जगह है।

    हद तो तब होती है जब आप हिन्दी में जवाब दे रहे होते हैं, मगर सामनेवाला अंग्रेजी का पल्लु नहीं छोड़ता.

    उस समय तो संजय भाई ऐसा लगता है कि मानो सामने वाले के सिर पर कुछ दे मारो। लेकिन फ़िर महसूस होता है कि आज़ाद देश है, हर किसी को अपनी भाषा चुनने का अधिकार है। :)

  • Mukund // January 16, 2007 at 1:22 pm

    Muje bhi hindi mei baat karne mei jyada santosh hoga. Par filhal mei hindi mei kaise likhu?
    Muje yaad hei kahi to kisi ne to ek aisi kadi ka vivran kiya tha jismei aap kisi bhi website a naam daal kar us par ja sakte hei aur hindi mei likh sakte hei. Koi muje wo yaad kara sakta hei kya? Mere del.icio.us mei us kadi ko khojna namumkin sa ho gaya hei.

  • Amit // January 16, 2007 at 2:17 pm

    मुकुन्द जी, यदि आप रोमन में हिन्दी लिखने की जगह पूर्ण अंग्रेज़ी में लिखते तो मुझे अधिक खुशी होती क्योंकि मेरा मानना है कि जो भाषा जैसी है उसको वैसे ही रहने दें तो सही रहेगा, हिन्दी देवनागरी में ही सही लगती है!! ;) लेकिन भाषा के इस लिपि बदलाव के लिए हम सभी ज़िम्मेदार हैं, क्या करें, मनुष्य ही तो हैं, संयम छूट ही जाता है!! ;) :)

  • afloo // January 16, 2007 at 3:54 pm

    अब तो खाना ही पड़ेगा निज़ाम का कबाब ।वैसी भी ये यदि कलकत्ते वाले,’न्यू मार्केट’ वालों के भाईबन्द हों तो अच्छा होगा ही।

  • Deepa // January 17, 2007 at 7:52 am

    अमितजी.. नमस्तॆ.. मैं ने दॆखा कि आप ने अपने पिलाग में Smileys का प्रियॊग किया हैं. क्या आप इस्के तरीके बता सकते हैं..मैं BlogSpot का प्रयॊग कर्ती हूं..

  • Amit // January 17, 2007 at 3:59 pm

    अब तो खाना ही पड़ेगा निज़ाम का कबाब

    हाँ हाँ अवश्य खाईये, लेकिन मैं यह नहीं कहूँगा कि इसका कबाब बहुत बढ़िया है क्योंकि इससे बढ़िया और सस्ता कबाब मैंने निज़ामुद्दीन में खाया है। ;) वैसे आप निज़ाम्स का (शाकाहारी)मशरूम रोल ट्राई कर सकते हैं, वह बड़ा स्वादिष्ट लगा मुझे तो। :)

    मैं ने दॆखा कि आप ने अपने पिलाग में Smileys का प्रियॊग किया हैं. क्या आप इस्के तरीके बता सकते हैं..मैं BlogSpot का प्रयॊग कर्ती हूं

    दीपा जी आपको भी नमस्ते। वर्डप्रैस में तो smiley वाला जुगाड़ लगा-लगाया आता है, बस उचित चिन्ह प्रयोग किया और smiley लग गई। ब्लॉगर में जहाँ तक मैं जानता हूँ ऐसा कोई जुगाड़ नहीं है।

  • Twilight Fairy // January 17, 2007 at 8:29 pm

    pirogram? I thot you knew better hindi than that! Karyakram janaab :).

    and AG1 has misleaded you :p. We were there till 5:30-6! and then we left. How did you decide your CP plan around 5!!!

  • Deepa // January 18, 2007 at 1:06 pm

    शुक्रिया अमितजी.. काश पिलागस्पॊट में भी इस्की सुविधा हॊती..

  • Amit // January 18, 2007 at 11:02 pm

    pirogram? I thot you knew better hindi than that!

    हाँ जी हिन्दी तो आती है। वो क्या है कि आजकल अपन ज़रा मजे वाली हिन्दी में लिख रहे हैं, हिन्दी की शुद्धता पर इतना ध्यान नहीं इसलिए!! ;)

    and AG1 has misleaded you :p. We were there till 5:30-6! and then we left. How did you decide your CP plan around 5!!!

    अब उसमें हमार गलती कोई नहीं है। फ़ुनवा घुमाए के हम पूछे तो हमको गलत जवाब दिए गए तो हम का करें? लगता है कि अब फ़ोन में झूठ पकड़ने वाला तंत्र लगाए ही पड़े!! :)

  • afloo // January 19, 2007 at 9:52 pm

    “वैसे आप निज़ाम्स का (शाकाहारी)मशरूम रोल ट्राई कर सकते हैं, वह बड़ा स्वादिष्ट लगा मुझे तो। ”
    अमितजी,हमें सिर्फ़ शाकाहारी मत मानिए।हम शाकाहारी ‘ही’ नहीं ‘भी’ हैं।कलकत्ते के निज़ाम में तो ‘बड़ा’ सस्ता भी है कबाब ।

  • prakash c chhajed // January 21, 2007 at 5:44 pm

    ‍धन्‍यवाद क्‍या एसी तख्‍ती हमारे हर सरकारी दफ्‍तर में नही होनी चाहिये ?

  • Amit // January 21, 2007 at 6:59 pm

    अमितजी,हमें सिर्फ़ शाकाहारी मत मानिए।हम शाकाहारी ‘ही’ नहीं ‘भी’ हैं।कलकत्ते के निज़ाम में तो ‘बड़ा’ सस्ता भी है कबाब

    मैंने तो आपको न शाकाहारी माना और न ही मांसाहारी!! ;) मैंने आपको मशरूम रोल का सुझाव इसलिए दिया क्योंकि मैंने उस दिन वही लिया था वहाँ और वह काफ़ी स्वादिष्ट था। :)

    धन्‍यवाद क्‍या एसी तख्‍ती हमारे हर सरकारी दफ्‍तर में नही होनी चाहिये ?

    अधिकतर सरकारी दफ़्तरों में इसकी आवश्यकता नहीं!! ;)

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