दुनिया मेरी नज़र से - world from my eyes!!

Entries from February 2007

क्रेडिट कार्ड ले लो ….. लोन ले लो लोन

February 28, 2007 · 14 Comments

यह क्या हो रहा है? कभी सुना था कि अमेरिका में टेलीमार्केटिंग तथा डोर-टू-डोर सेल्समैन/सेल्सवूमन परेशान करते हैं लेकिन अब यही चलन यहाँ भारत में भी चल निकला है!!! किसी को नया फ़ोन कनेक्शन लिए अभी एक दिन नहीं होता कि सबसे पहले घंटी बजाने वाला कोई न कोई टेलीमार्केटिंग वाला होता है। अभी मैंने कुछ समय पहले ऑफ़िस के कार्य के लिए आईडिया वालों का नया कनेक्शन लिया केवल जीपीआरएस(GPRS) सुविधा के लिए और कनेक्शन चालू होते ही पहला फ़ोन बजा एयरटेल वालों के यहाँ से, उनके कॉल-सेन्टर वाली मोहतरमा ने मुझसे पूछा कि क्या मैं उनका(एयरटेल) वालों का पोस्ट-पेड कनेक्शन लेना चाहूँगा!! मन तो किया कि उसे चार गाली सुनाऊँ और फ़ोन काट दूँ, लेकिन उसको प्यार-मोहब्बत वाली भाषा में समझाया कि पुनः इस नंबर पर फ़ोन न करे!!

रोज़ किसी न किसी मार्केटिंग वाले या वाली का फ़ोन बजता रहता है, यह समस्या और भी खीजपूर्ण हो जाती है जब शहर से बाहर रोमिंग पर हो और तब किसी ऐसे व्यक्ति का फ़ोन आ जाए। अब इसका उपाय यही है कि या तो शहर से बाहर होने पर किसी का फ़ोन मत उठाओ, या सिर्फ़ परिचित नंबरों से आने वाले फ़ोन उठाओ। लेकिन अपनी आदत हर किसी का फ़ोन लेने की है इसलिए मारे जाते हैं। वह तो शुक्र है कि महानगर टेलीफ़ोन निगम की दूसरी सरकारी सेवा भारत संचार निगम से सैटिंग है और इसी कारण अपनी रोमिंग इतनी महंगी नहीं पड़ती जितनी महंगी अन्य सेवाओं में पड़ती है!!

मैंने कहीं पढ़ा/सुना था कि अमेरिका में एक “do not disturb” जैसी कोई लिस्ट है और जो फ़ोन नंबर उसमें हैं उनपर टेलीमार्केटिंग वाले फ़ोन नहीं लगा सकते। क्या यह सही है? यह तो अपने अमेरिका में प्रवास करने बंधु ही बता सकते हैं। :) यदि ऐसा जुगाड़ यहाँ हो जाए तो बहुत सही हो जाएगा!!

इसी बात पर एक वाक्या ध्यान आता है जो अभी कुछ समय पहले मेरे एक मित्र ने मुझे बताया था। दरअसल मेरे उस मित्र का एक अभिन्न मित्र एचडीएफ़सी बैंक में लोन विभाग में मैनेजर है। एक दिन उसको एचडीएफ़सी बैंक के कॉलसेन्टर से फ़ोन आया और फ़ोन वाली मोहतरमा उनको पर्सनल(निजी) लोन लेने के लिए आग्रह करने लगी। आखिरकार खीज के उस मित्र ने गुस्से में आ कह दिया कि जिस लोन को वह मोहतरमा देने का प्रयास कर रही हैं वह लोन तब तक नहीं पॉस होगा जब तक वह मित्र उस पर दस्तखत नहीं करेंगे!! यह सुन मोहतरमा थोड़ी हकबका गई और माफ़ी माँगते हुए फ़ोन रख दिया!!! ;)

लेकिन सिर्फ़ मार्केटिंग वाले ही क्यों, कस्टमर सपोर्ट अर्थात्‌ ग्राहक सेवा वाले भी ऐसे खिजाऊ प्रकार के प्राणी होते हैं कि बस पूछो मत!! अभी इस महीने की 6 तारीख़ को आईडिया वालों का बिल आ गया, बिल जमा करने की आखिरी तारीख़ 16 फ़रवरी थी। अगले ही दिन यानि कि 7 फ़रवरी को आईडिया वालों की ओर से फ़ोन आया जिसमें फ़ोन करने वाले साहब ने बताया कि मेरा बिल डिलिवर हो चुका है, यानि मुझे मिल चुका है और मैं उसे कब जमा करवा रहा हूँ। मैंने कहा कि 16 फ़रवरी तक मैं कभी भी जमा करवा सकता हूँ इसलिए मुझसे दोबारा न पूछें कि कब जमा करवा रहा हूँ। अगला दिन आराम से बीता, कोई फ़ोन नहीं आया, पर उसके अगले दिन यानि कि 9 फ़रवरी को पुनः फ़ोन आ गया। इस बार भी मैंने वही उत्तर दिया पर थोड़ी सख्ती से। तीन दिन बाद जैसे ही मुझे समय मिला तो तुरंत आईडिया वालों की वेबसाइट पर जाकर बिल जमा करवा दिया, तारीख़ थी 12 फ़रवरी। तुरंत ही एसएमएस(SMS) द्वारा मुझे सूचित कर दिया गया कि मेरा बिल जमा हो गया है। मैंने सोचा कि चलो एक महीने के लिए जान छूटी, परन्तु इतनी आसानी से कैसे छूटनी थी!! 15 फ़रवरी को पुनः आईडिया वालों की ओर से एक मोहतरमा का फ़ोन आया और उन्होंने मुझसे वही कहा जो पहले के साहबान ने कहा था, कि मैं अपना बिल कब जमा करवा रहा हूँ!! अब तो मेरा पारा चढ़ गया, उसको प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं परन्तु मन ही मन में ऐसी ऐसी गालियाँ दीं जो मुझे यकीन है कि अभी ईजाद भी नहीं हुई होंगी! खीज भरे स्वर में मैंने उससे पूछा कि क्या वह अपने कंप्यूटर द्वारा आईडिया के नेटवर्क में लाग्गडइन है। उसके हाँ में उत्तर देने पर मैंने उससे कहा कि वह अपने कंप्यूटर पर पहले यह क्यों नहीं देख लेती कि जिस नंबर पर बिल की उगाही के लिए फ़ोन लगा रही है उस पर कोई बिल बकाया है भी या नहीं। और इतना कह मैंने फ़ोन काट दिया!! मन तो कर रहा था कि उसको खूब सुनाऊँ लेकिन किसी तरह बस अपने पर संयम रखा!!

ऐसे ही अन्य वाक्यों के बारे में पढ़ने/सुनने और अनुभव करने के बाद सोचता हूँ कि क्या सभी कॉलसेन्टर वाले ऐसे ही जड़बुद्धि होते हैं? और इन टेलीमार्केटिंग वालों से कैसे निजात पाई जाए?? तौबा!!

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संगीत के उस्ताद

February 26, 2007 · 7 Comments

लगभग एक माह पहले मेरे इनबॉक्स में एक विज्ञापन वाली ईमेल आई। अब वैसे तो रोज़ ही कई सौ आती हैं लेकिन यह उन जैसी नहीं थी। यह इंडिया टुडे वालों की ओर से आई थी जिसमें उन्होंने मुझे इंडिया टुडे बुक क्लब की सदस्यता ऑफ़र की। शर्त यह थी कि उनके कैटालॉग में से मैं कोई भी दो पुस्तकें अथवा संगीत की सीडी खरीदूँ, वे मुझे उसी कैटालॉग में से मेरी पसंद की कोई चार पुस्तकें अथवा सीडी मुफ़्त में देंगे और साथ में सदस्यता भी जिसके अंतर्गत मैं भविष्य में हर खरीद पर छूट प्राप्त करूँगा।

अमूमन मैं इस तरह के विज्ञापन पढ़कर मिटा देता हूँ लेकिन मुझे कुछ रूचिकर लगा, उस समय मेरे पास थोड़ा खाली समय भी था, तो सोचा देख लेते हैं, यदि कोई काम की चीज़ नहीं लगी तो नहीं लेंगे। दिए गए पते पर पहुँच जो पुस्तकें देखी उनमें से मुझे अपनी रूचि की कोई भी नहीं लगी, लेकिन संगीत की कुछ सीडी पसंद आई। तो मैंने निम्न सीडी खरीदी:

  1. Music for Relaxation - composed by Vishwa Mohan Bhatt
  2. Music for Rejuvenation - Libra

और निम्न सीडी मुफ़्त उपहार में पसंद करीं:

  1. The Elements - Wind - composed by Hariprasad Chaurasia
  2. The Elements - Water - composed by Shiv Kumar Sharma
  3. The Elements - Earth - composed by Vanraj Bhatia
  4. The Elements - Fire - composed by Bhaskar Chandavarkar

वैसे तो ये सभी सीडी बहुत बढ़िया हैं, पूरे पैसे वसूल, लेकिन शिव कुमार शर्मा का तो मैं पंखा(हिन्दी में बोले तो ….. फ़ैन) हो गया। इससे पहले मुझे कभी इन संगीतकारों अथवा इनके संगीत में कोई रूचि नहीं रही लेकिन अभी 7-8 दिन पहले जब से ये सीडी आईं हैं तब से इन्हें ही बारंबार सुने जा रहा हूँ। The Elements - Water में शिव कुमार शर्मा ने वाकई बहुत अच्छा संगीत दिया है, उसके बाद मुझे सबसे अच्छी लगी वनराज भाटिया की The Elements - Earth जिसमें पहला संगीत ट्रैक At the Dawn of Creation बहुत ही अच्छा है। The Elements की शृंखला, जो कि पाँच तत्वों पर है, में एक सीडी रह गई जिसका नाम है The Elements - Space जिसका संगीत तबले के उस्ताद ज़ाकिर हुसैन ने दिया है। मैं इसे खोज रहा हूँ और आशा है कि जल्द ही यह मिल जाएगी।

अब जब शौक चढ़ा तो अगली बार जब मैं प्लैनेट-एम गया तो वहाँ से पंडित जसराज की “मियां तानसेन” ले आया जिसमें तानसेन के कई राग हैं। यह दो सीडी का पैक है जो मैंने अभी पूर्ण नहीं सुनी लेकिन जितना सुना है वह बहुत ही अच्छा लगा। थोड़े से अच्छे स्पीकर या हेडफोन हों और उस पर यह संगीत चला के सुना जाए और आँख बन्द कर बैठा जाए, आहा, स्वर्ग की सी अनुभूति होती है। :) वाकई ये सभी आज के युग के तानसेन हैं।

अभी कुछ और ऐसी ही सीडी देखीं हैं, जल्द ही उनको प्राप्त कर संगीतमयी स्वर्ग के सुख की प्राप्ती करुँगा। :D

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वीर योद्धाओं के देश में - भाग ३

February 26, 2007 · 7 Comments

पिछले अंक से आगे …..

सुबह उठ सभी जल्दी तैयार हुए और होटल में ही तुरन्त नाश्ता निपटा के दरगाह शरीफ़ की ओर निकल पड़े। पार्किंग में गाड़ी खड़ी कर हम लोग दरगाह की ओर चल पड़े। बाज़ार में हितेश और योगेश ने सुन्दर सी टोपियाँ खरीदीं।

हितेश तो लाल रंग की जैकेट, अपनी टोपी और धूप के चश्में के कारण किसी फिल्म का हीरो टाईप ऑटो ड्राईवर लग रिया था!! ;) हमको बाज़ार में ही एक साहब मिले जो हमारा मार्गदर्शन करते हुए हमें दरगाह तक ले गए। दरगाह पर चढ़ाने के लिए चादर आदि ले कर हमने दरगाह में प्रवेश किया, वे साहब निरंतर हमारे साथ मार्गदर्शन करते हुए चल रहे थे। फ़िर एक जगह अंदर अंदर प्रवेशद्वार पर वे रूके, वहाँ बैठे मुल्ला जी ने हमें अपने सामने बिठा हमसे अजमेर शरीफ़ के दरबार में दुआ मंगवाई।

अन्य श्रद्धालु जन भी वहाँ पास ही दुआ में हाथ उठाए खड़े थे।

तीन दिन बाद मोहर्रम होने के कारण दरगाह पर कुछ अधिक ही भीड़ थी। बहरहाल हमारे मार्गदर्शक महोदय ने हमें अंदर प्रवेश करवा ही दिया, अंदर जाते ही पता चला कि बाहर की भीड़ तो कुछ भी नहीं थी, वास्तव भीड़ का एहसास तो अंदर हुआ जहाँ पाँव रखने की भी जगह नहीं थी। बड़ी कठिनाई से एक मुल्ला जी को चादर दी गई और फ़िर हम सभी बाहर की ओर निकल लिए। निकास द्वार के कुछ पहले एक मुल्ला जी ने मेरे को पकड़ लिया और मेरे गले में धागा बाँध कर कुछ बुदबुदा के फ़ूँका और फ़िर अपनी दक्षिणा माँगी। अब दिक्कत की बात यह थी कि मेरे पास पैसे नहीं थे क्योंकि मेरे ट्रैक सूट में सही जेब न होने के कारण मैंने अपना मोबाईल तथा बटुवा हितेश को दे दिए थे जो कि मेरे से काफ़ी पीछे था। मैंने मुल्ला जी से कहा कि मेरे पास पैसे नहीं मेरे साथी के पास हैं जो कि पीछे आ रहा है पर कदाचित्‌ उन्होंने समझा कि मैं उनसे कह रहा हूँ कि वे मेरे साथी से पैसे ले लें तो वे बोले कि देने तो मुझे अपने हाथ से ही होंगे, जितने चाहे उतने दे दूँ। फ़िर मैंने उनको पुनः कहा कि मेरे पास एक रूपया भी नहीं है, तो तब उन्होंने मेरे को छोड़ा। छूटते ही मैं तुरंत गोली की तरह बाहर निकल आया तथा मैं और एन्सी(जो मेरे आगे ही थी और मुल्ला जी की गिरफ़्त में नहीं आई थी) बाकी मित्रों की प्रतीक्षा करने लगे। जल्द ही बाकी लोग भी आ गए तो फ़िर जिसकी श्रद्धा था उन्होंने मन्नत माँगते हुए पास ही की दीवार की जाली में धागे बाँधे।

तत्पश्चात हमने आसपास की कुछ तस्वीरें लीं, थोड़ी देर एक जगह बैठ विश्राम किया। हमारे मार्गदर्शक महोदय हमारे पास आए और अपना कार्ड हमें दिया। हम सभी अभी तक सोचे बैठे थे कि वे अन्य गाईडों की भांति अंत में हमने पैसे माँगेंगे परन्तु उन्होंने बताया कि वे दरगाह समीति की ओर से नियुक्त किए गए पुजारियों में से एक हैं जिनका कार्य पर्यटकों को गरगाह के दर्शन करवाना है ताकि वे किसी गलत व्यक्ति(जैसे कि किसी दुकानदार, पेशेवर गाईड आदि) के चक्कर में न पड़ जाएँ और वे इसके लिए पर्यटकों से कोई पैसा नहीं लेते। कुछ देर दरगाह प्रांगण में बिता हमने बाहर की राह पकड़ी। बाहर निकलने से पहले हमने मुग़ल बादशाह अकबर द्वारा दान में दी गई बड़ी देग़ और जहाँगीर द्वारा दी गई छोटी देग देखी जिनमें कभी सैकड़ों लोगों के लिए खाना बनता था।

सीढ़ियाँ चढ़ के ऊपर पहुँच देखा कि देग में अब पैसे आदि पड़े हैं, अन्धविश्वासी लोगों ने इसको भी नहीं छोड़ा और इसे भी मन्नत माँगने का स्थान बना दिया। उस समय कैसे भाव मन में आए यह मैं व्यक्त नहीं कर सकता!!

दरगाह से बाहर आ मैंने दो प्रकार के इत्र लिए। बाज़ार से वापसी के दौरान हितेश का मन अढ़ाई दिन का झोंपड़ा देखने का हुआ तो वह और स्निग्धा उसे देखने चले गए और हम बाज़ार में प्रतीक्षा करने लगे। कुछ समय बाद दोनों लौटे और हम लोग गाड़ी में बैठ पुष्कर की ओर निकल गए।

कुछ ही समय में हम पुष्कर पहुँच गए और हमें अपना होटल, राजस्थान पर्यटन विभाग का होटल सरोवर(जो कि पुष्कर के सरोवर के बाजू में ही स्थित है), ढूँढने में भी कोई दिक्कत नहीं आई। होटल पहुँच हमने रिसेप्शन पर बताया कि हम लोगों की रिज़र्वेशन है तो उत्तर मिला कि कमरे दोपहर 12 बजे के बाद ही मिलेंगे क्योंकि उस समय कोई भी कमरा खाली नहीं था। बारह बजने में लगभग आधा घंटा था इसलिए हम होटल के लॉन में आकर बैठ गए। वहाँ कुछ प्यारे से कुत्ते के पिल्ले आपस में खेल रहे थे। मैंने उनकी तस्वीर लेने के लिए कैमरा चालू किया तो वे तुरंत तस्वीर खिंचवाने के लिए पोज़ में आ गए। ;)

लेकिन स्निग्धा जब उनको पुचकारने के लिए गई तो उसके हाथ में न कोई खाने का सामान था और न ही कैमरा। तो कदाचित्‌ खतरा भाँप के सारे पिल्ले भाग के पास ही एक झाड़ी के पीछे चले गए!! ;)

आसपास नज़र दौड़ाने से पता चला कि आसपास बहुत ही अच्छे नज़ारे थे।

जल्द ही हमें हमारे कमरे मिल गए तो उनमें अपना सामान रख हमने तुरंत दोपहर का भोजन निपटाया और गाड़ी में ब्रह्मा मंदिर की ओर निकल पड़े। ब्रह्मा मंदिर से पहले एक मार्ग सावित्री मंदिर की ओर जाता है जो कि एक पहाड़ी के शिखर पर स्थित है।

सभी ने पहले वहीं जाने का निर्णय किया। गाड़ी चढ़ाई के आरंभ में ही खड़ी कर हम पैदल आगे बढ़ चले। मंदिर में चढ़ाने के लिए हमने प्रसाद लिया। योगेश और स्निग्धा सामान्य पथ से ऊपर जाने के इच्छुक नहीं थे, उन पर ट्रेकिंग तथा पर्वतारोहण का भूत जमकर नृत्य कर रहा था इसलिए उन्होंने रेतीले और पथरीले मार्ग से ऊपर वहाँ तक चढ़ने की सोची जहाँ तक सुगमता से चल के जाया जा सकता था। हितेश और शोभना भी उनके साथ हो लिए। एन्सी उस तरीके से ऊपर जाने के लिए तैयार नहीं थी तो उसका साथ देने के लिए मैं उसके साथ हो लिया। हम लोग आराम से ऊपर चढ़े जा रहे थे, बीच बीच में एकाध जगह रूक कर तस्वीरें आदि ले रहे थे। थोड़ा ऊपर पहुँच पीछे देखा तो पूरा पुष्कर और पुष्कर की दूसरी ओर पहाड़ी पर स्थित पाप मोचिनी मंदिर दिखाई पड़ रहा था।

आधे रास्ते से थोड़ा और ऊपर पहुँचने पर मार्ग के एक ओर से एक बहुत अच्छा नज़ारा दिखा जिसने एक रोमांच की सी अनुभूति करवाई।

अन्य साथियों की आवाज़ें सुनाई पड़ रही थी, उनकी ओर से अब ऊपर आने का मार्ग दुर्गम था क्योंकि पहाड़ी सीधी हो रही थी, इसलिए उनको आम-मार्ग पर आने को बोल दिया। कुछ ही मिनट में वे ऊपर आते दिखाई पड़ गए!!

इस पहाड़ी पर लंगूरों की भरमार थी और सभी लंगूर दिलेर इतने थे कि हाथों से सामान छीन के भाग जाते थे। ऐसा ही एक लंगूर रास्ते में शोभना के हाथों से प्रसाद छीन के भाग गया था। मैंने और एन्सी ने अपना अपना प्रसाद एन्सी के बैग में रख दिया था इसलिए वह बचा रह गया।

आखिरकार हम सभी ऊपर शिखर पर पहुँच ही गए। ऊपर आते समय अन्य लोगों को कोई दिक्कत महसूस हुई या नहीं यह मैं नहीं जानता लेकिन पिछले अगस्त में तुन्गनाथ की कठिन चढ़ाई के बाद यह चढ़ाई तो बहुत मामूली सी लगी। ;)

पुष्कर में विदेशी पर्यटक बहुत आते हैं, इज़राईल से तो बहुत बड़ी संख्या में आते हैं, यहाँ सावित्री मंदिर में भी कई विदेशी पर्यटक आए हुए थे। मंदिर परिसर में तस्वीर लेना वर्जित था इसलिए हम केवल दर्शन कर और प्रसाद चढ़ा के बाहर आ गए। बाजू में ही एक हिल टॉप कैफ़े यानि कि एक चाय की दुकान थी जिसने अन्य सामान जैसे चॉकलेट, बिस्कुट, शीतल पेय आदि भी रख रखे थे। दुकान के सामने छोटी सी समतल भूमि थी जिसके आगे खाई थी और एक ओर से सूर्यास्त होता दिख रहा था। नज़ारा बहुत ही मनमोहक था इसलिए (मेरे अतिरिक्त)सभी ने वहीं (कुर्सियों पर)बैठ चाय पीने का निर्णय लिया।

सूर्यास्त हो रहा था, इसलिए इस समय श्वेत-श्याम तस्वीरें बहुत सुंदर आईं।

जब चाय आदि पी जा रही थी तो सभी लंगूर ताक में आसपास ही बैठे थे। शोभना एक बिस्कुट का पैकेट लेकर आई और तुरंत ही एक लंगूर उसे छीन के भाग गया!! इसलिए दूसरा पैकेट खोलते समय सभी सतर्क थे, जैसे ही लगा कि कोई लंगूर झपटने वाला है वैसे ही उसे छुपा के लंगूर को डरा के भगाया गया। अंधेरा हो आया था, वापसी का मार्ग कोई आसान नहीं था और वह भी अंधेरे में, तो इसलिए हमने वापसी की राह पकड़ी। ऊपर आते समय जगह-२ सूचनापट देखे थे जो कि सूर्यास्त से पहले नीचे उतर आने पर ज़ोर दे रहे थे, फ़िर भी हमारा सूर्यास्त से पहले नीचे उतरना हुआ ही नहीं, क्योंकि हम ऊपर सूर्यास्त से कुछ पहले ही गए थे। मार्ग में कुछ बल्ब आदि लगे थोड़ी रोशनी प्रदान कर रहे थे परन्तु वह पर्याप्त नहीं थी, इसलिए सावधानीवश हम एक दूसरे का हाथ पकड़ नीचे उतरे।

नीचे आकर सभी ने चैन की सांस ली और फ़िर ब्रह्मा मंदिर की ओर बढ़ चले।

अगले अंक में जारी …..

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वीर योद्धाओं के देश में - भाग २

February 11, 2007 · 6 Comments

पिछले अंक से आगे …..

तारागढ़ में मैंने कुछ अच्छी तस्वीरें ली थीं परन्तु फिर भी मन थोड़ा खिन्न था, कदाचित्‌ किले की अनुपस्थिती देख। बहरहाल अब हम तारागढ़ से नीचे वापस अजमेर में आ गए और पता पूछते हुए अना सागर के नाम से प्रसिद्ध कृत्रिम तालाब की ओर बढ़ चले। वहाँ पहुँच के लगा कि पहले भोजन कर लिया जाए, लगभग सभी क्षुधा पीड़ित थे, तो पास ही मौजूद “पंडित भोजनालय” में जाने की सोची। लेकिन वहाँ अंदर जाकर कुछ का मन बदल गया, वहाँ खाने का उनका मन नहीं था, लेकिन हमारे ड्राईवर साहब अपने भोजन का ऑर्डर दे चुके थे, तो इसलिए हम लोग भी बैठ गए कि जैसे ही वे अपना भोजन समाप्त करेंगे तो हम चल के किसी अन्य रेस्तरां में भोजन लेंगे।

कुछ देर बाद हम किसी अन्य रेस्तरां को खोज रहे थे, कई जगह पूछा, हर जगह अलग उत्तर मिला। अभी बाज़ार से गुज़र रहे थे कि एक जगह “होटल, रेस्तरां एण्ड बार” का बोर्ड दिखा तो गाड़ी रूकवा वहाँ पता करने गए कि रेस्तरां खुला है कि नहीं। रिसेप्शन पर उपस्थित महोदय ने बताया कि अभी उनका रेस्तरां चालू नहीं हुआ है। उनसे किसी अच्छे रेस्तरां के बारे में पूछा तो उन्होंने दिशा निर्देश देते हुए बताया कि पास ही में “मैंगो मसाला” नाम का रेस्तरां है जो कि अजमेर में सबसे बढ़िया है। तो हम लोग चल पड़े उनके दिए दिशा निर्देशों के अनुसार और रास्ते में भी एकाध जगह पूछ लिया उस रेस्तरां के बारे में। आखिरकार कुछ देर भटकने के बाद हम पहुँच ही गए “मैंगो मसाला” पर। सभी की तबियत उसको देख प्रसन्न हो गई। ऑर्डर देने के बाद उन्होंने खाना भी जल्द ही परोस दिया, अधिक समय नहीं लगाया। भरपेट भोजन के बाद हम पुनः पहुँच गए अना सागर नामक तालाब पर। सांयकाल और छुट्टी(26 जनवरी) होने के कारण कदाचित्‌ कुछ अधिक ही भीड़ थी, अंदर बाग़ में भी बहुत लोग अपने अपने परिवारों और मित्रों के साथ आए हुए थे, विदेशी पर्यटक भी थे।

हमने सबसे पहले तालाब में नौका विहार करने की सोची, तालाब काफी बड़ा था और बीच में एक टापू भी था। नौकाविहार के लिए टिकट लेने पहुँचे तो वहाँ भी बहुत भीड़ थी और फिर पता चला कि सभी नौकाएँ व्यस्त हैं, तकरीबन आधे घंटे बाद नंबर आएगा। यह देख हमने नौकाविहार का विचार त्याग दिया और ऐसे ही बाग़ में टहलने की सोची। तालाब के किनारे पर हर तरह का कूड़ा पड़ा था, किनारे का पानी भी बहुत गंदा हरे रंग का था और बहुत तीव्र दुर्गन्ध आ रही थी।

बाग़ में नशेड़ी भरे हुए थे जो कि नशे में धुत घास पर बेसुध पड़े थे। एन्सी और शोभना से माहौल बर्दाश्त नहीं हो रहा था तो वे लोग बाहर गाड़ी में जाकर बैठ गए। मैं और योगेश बाग़ में ही थे, योगेश को तस्वीर लेने के लिए कुछ अच्छा मिल नहीं रहा था तो उसी की तलाश थी। तभी मैंने देखा कि सूर्य पश्चिम में पहुँच चुका है और शीघ्र ही अस्त हो जाएगा। लेकिन मौजूदा स्थिति में तालाब के जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब बहुत सही लग रहा था, तो मैंने उसकी तुरंत तस्वीर ले डाली।

आखिरकार योगेश को लेने लायक एक फ्रेम दिखाई पड़ गया तो उसकी तस्वीर ले ली गई और फिर हम दोनों भी वापस बाहर ही ओर हो लिए।

अब लिस्ट में अगला नंबर था “अढाई दिन के झोंपड़े” का, तो उसका पता पूछते-पूछते हम बढ़े चले जा रहे थे। किसी महानुभाव के बताए गलत रास्ते पर बढ़ते हुए हम दरगाह के एक मार्ग पर पहुँच गए जहाँ से अढाई दिन के झोंपड़े पर पहुँचने के लिए काफी चलना पड़ता। तो फिर किसी साहब ने दूसरा मार्ग बताया जहाँ से गाड़ी जा सकती है तो हम उस मार्ग पर बढ़ चले। बढ़ते-२ एक पहाड़ी सड़क पर पहुँचे जहाँ अत्यधिक तीव्र दुर्गन्ध आ रही थी क्योंकि आसपास बहुत से कुत्ते और कुत्ते के बच्चे मरे पड़े थे और उनके शव सड़ रहे थे(ये सब गाड़ियों के नीचे आकर मरे थे क्योंकि एकदम से ये गाड़ियों के सामने आ जाते हैं)। वहाँ सड़क के एक ओर एक खंडहर सी दीवार का एक भाग ही दिख रहा था। सबने सोचा कि यही अढाई दिन का झोंपड़ा है इसलिए अपने को कोसने से लगे कि क्या इसी के लिए इतनी दूर आए। वापस पलट के जा रहे थे कि मार्ग में एक पर्यटन वालों की टवेरा को देख रूक गए कि ताकी उसके ड्राईवर से पूछ लिया जाए। ड्राईवर से पता चला कि जिस दीवार के खंडहर को हम अढ़ाई दिन का झोंपड़ा समझ रहे थे दरअसल वह एक पुरानी दीवार का भाग ही था, अढाई दिन का झोंपड़ा तो आगे था जिस पर जाने का रास्ता सड़क से नीचे उतर बाज़ार से था। तो गाड़ी वापस घुमा हम चल दिए। चूँकि अभी दो और मित्रों ने रात तक अजमेर पहुँचना था इसलिए सर्वसम्मती से निर्णय लिया गया कि हम लोग दरगाह अगले दिन सुबह जाएँगे, आज नहीं जाएँगे!! बाज़ार में एक दुकानदार से पूछा तो उसने कहा कि उसकी दुकान के पीछे जो सीढ़ियाँ जा रही हैं वहीं से रास्ता है। हम लोग वहाँ से आगे बढ़े कि एकाएक एक बावला सा लगने वाला फटेहाल व्यक्ति सामने आ गया और बोला कि वहाँ से आगे नहीं जा सकते, अढाई दिन के झोंपड़े पर जाने के लिए आगे से रास्ता है, वह नहीं है। हम उसकी बात पलटे और सीढ़ियाँ उतर दूसरे रास्ते की ओर बाज़ार में बढ़ चले। तभी शोभना घबराई सी पास आई, मैंने पूछा क्या हुआ तो बोली कि उसी व्यक्ति ने उसे पीछे से पकड़ने की कोशिश की थी। उसके बाद मैंने एन्सी और शोभना को हिदायत दी कि मेरे और योगेश के साथ रहें, अलग न विचर जाएँ।

कुछ ही पल बाद हम अढाई दिन के झोंपड़े पर पहुँच गए।

कुछ खास नहीं वहाँ, एक मस्जिद बनी हुई है। लेकिन मुख्य इमारत पर अच्छी शिल्पकारी की गई है, यह आपको दिन में ही अच्छे से दिखाई देगी, जिस समय हम पहुँचे उस समय सूर्यास्त हो चुका था। इतिहासकारों के अनुसार यहाँ हज़ार वर्ष पहले तक जैन मन्दिर होते थे। पृथ्वीराज चौहान को हरा चुकने के बाद हाकिम बने मोहम्मद गोरी ने इनको मस्जिद में तब्दील करने का फ़रमान जारी किया था जिसको उसके हुक्मबरदारों ने ढाई दिन में बजा के दिखाया था जिस कारण इसका नाम “अढाई दिन का झोंपड़ा” पड़ा।

अंधेरा घिर आया था इसलिए हम सभी ने वापस जाने की सोची।

बाज़ार में रंगीनियाँ और रोशनी बहुत थी, चहलपहल भी खूब थी। बहुत से नग वगैरह बेचने वाले बैठे थे जो कि वास्तव में सिर्फ़ काँच के टुकड़े थे। एक दुकान पर पहुँच मैंने तस्वीर ली और दुकानदार से दर्याफ़्त करने पर पता चला कि साहब अमेरिकन डायमण्ड बेच रहे थे!! ;)

बहरहाल, हम आगे बढ़ते गए, वापस अपनी गाड़ी में बैठे और अपने होटल पहुँच गए। अब सभी थकान के कारण खस्ताहाल थे। इधर हितेश को फोन लगाया तो पता चला कि वह और स्निग्धा बस पहुँच ही गए हैं और होटल की ओर आ रहे हैं। हम भी नीचे उतर आए और अपने ड्राईवर को जगाया जो कि बेचारा यह सोच गाड़ी में सो गया था कि हमारा आज का कोटा पूरा हो गया था और अब कहीं नहीं जाएँगे। हम होटल के प्रवेशद्वार पर खड़े दोनों की प्रतीक्षा कर रहे थे कि जैसे ही आएँगे उनको गाड़ी में अगवा कर रात्रिभोज के लिए चलेंगे क्योंकि तकरीबन साढ़े नौ बज रहे थे और पता नहीं था कि कब तक रेस्तरां खुलेंगे क्योंकि दुकानें आदि बंद होना शुरू हो गई थीं। तभी हमको हितेश और स्निग्धा आते नज़र आए, सभी उनसे बलगीर हो मिले। आननफ़ानन उनका सामान गाड़ी में लादा गया और गाड़ी “मैंगो मसाला” की ओर चल पड़ी। अब वही रेस्तरां इस कारण सूझा क्योंकि किसी और रेस्तरां को जाँचने का समय नहीं था। ;)

रेस्तरां पहुँच उसके बाहर गाड़ियों की ठीक-ठाक तादाद देख सबकी जान में जान आई, रेस्तरां अभी खुला था। अंदर पहुँच सभी एक टेबल पर काबिज़ हुए और तुरंत खाने का ऑर्डर दिया गया जो कि जल्द ही सर्व हुआ। पेटभर खा चुकने के बाद तीनों लड़कियों का सिन(sin) यानि कि पाप करने का मन हुआ। अब ऐसा वैसा मत सोचिए, यहाँ सिन करने का अर्थ है डेज़र्ट(dessert) से है जिसे खाना पाप इसलिए समझा जाता है ताकि उसे कम किया(खाया) जाए क्योंकि कैलोरी(calorie) से भरपूर होता है। मैंने और हितेश ने सिन करने में लड़कियों का साथ देना कबूल किया, योगेश ने बिना चॉकलेट के सभी पापों में थोड़ा हिस्सा बंटाना स्वीकारा। बहरहाल सभी ने तगड़े पाप किए और फिर वापस होटल की राह पकड़ी!! ;) होटल पहुँच सभी ने तरोताज़ा हो लड़कियों के कमरे में एकत्र हो महफ़िल जमाने की सोची और थोड़ी देर बाद सभी अपनी-२ उपस्थिति लगा रहे थे। लेकिन बोतल खोलने और खाली करने लायक कोई नहीं था, जहाँ हम चार लोग सारा दिन अजमेर में घूम ऐसी-कि-तैसी करवा चुके थे, वहीं हितेश और स्निग्धा आठ घंटे के बस के सफ़र से खस्ताहाल थे। अगले दिन सुबह जल्दी उठना भी था क्योंकि दरगाह भी जाना था और उसके बाद पुष्कर की राह पकड़नी थी, इसलिए थोड़ी देर की गपशप के बाद सभी ने शुभरात्रि बोल अपने-२ बिस्तर पकड़ लिए।

अगले अंक में जारी …..

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पाँच बातें

February 10, 2007 · 21 Comments

हद हो गई, जीवन कितनी शांति से मस्त चल रहा था, अचानक ही बेन ने मुझे टैग कर दिया!! चलो अब कर दिया तो कर दिया, निपट लेते हैं!! ;)

वैसे पिछली बार अल्का जी ने मुझे खूब फ़ंसाया था टैग कर, लेकिन इस बार मामला थोड़ा आसान है!! ;) इस बार सिर्फ़ अपने बारे में पाँच ऐसी बातें बतानी हैं जो आमतौर पर अन्य लोगों(यानि कि आपके ब्लॉग के पाठकों) को नहीं पता!! तो अर्ज़ करते हैं:

  1. मुझे पढ़ने का शौक बचपन से है, लेकिन स्कूल की किताबें(अंग्रेज़ी और इतिहास की किताबों के अतिरिक्त), खासतौर से गणित और सामाजिक ज्ञान की किताबें, पढ़ने में मुझे कभी कोई रूचि नहीं रही!! ;)
  2. मेरी माताजी गणित की अध्यापिका रही हैं लेकिन मुझे गणित से शुरू से ही चिढ़ सी थी, यह आखिरी सब्जेक्ट होता था जिसे मैं तैयार करता था, लेकिन ठीक इसके विपरीत गणित संबन्धी पहेलियाँ सुलझाने में मुझे बड़ा मज़ा आता था। एक बार मेरी मौसी ने मुझे शकुन्तला देवी की गणित की पहेलियों की किताब लाकर दी तो स्कूल में भी मैं और मेरा एक मित्र इसमें लगे पड़े रहते थे और लगभग सारी पहेलियाँ सुलझा कर ही माने।
  3. सातवीं कक्षा में मुझे अंग्रेज़ी के हार्डी ब्वॉय्ज़ के उपन्यास पढ़ने का ऐसा चस्का लगा था कि कक्षा में अध्यापिका पढ़ा रही होती थी और मैं सबसे पीछे की सीट से थोड़ा आगे की सीट पर बैठा अपना सिर नीचे किए टेबल के नीचे उपन्यास पढ़ रहा होता था। उस दौरान मैं तकरीबन 2 उपन्यास प्रतिदिन की दर से समाप्त कर रहा था।
  4. मुझे स्पर्धा पसंद है। बहुत से काम मैंने प्रतिस्पर्धा के चलते किए हैं जिनको मैं अन्यथा कभी नहीं करता। यदि प्रतियोगिता का इनाम गुप्त हो या मेरे मन माफ़िक हो तो फ़िर मैं जीतने के लिए जी-जान लगा देता हूँ। इस से संबन्धित एक वाक्या मुझे कक्षा नौ से याद आता है।

    हमारी विज्ञान की अध्यापिका छुट्टी पर थीं और सत्र समाप्त होने से पहले उनकी वापसी नहीं होनी थी। जो दूसरी अध्यापिका उनकी जगह आई थीं वह जीव-विज्ञान तो अच्छा पढ़ाती थीं लेकिन भौतिक विज्ञान तथा रसायन विज्ञान में हमें मज़ा नहीं आ रहा था(समझ लो) तो कक्षा के बहुत से विद्यार्थी प्रधानाचार्या के पास शिकायत लेकर गए, जब वे पढ़ाती थीं तो यही विषय पढ़ाती थीं। उन्होंने कक्षा में आकर हमसे कहा कि चूँकि वे हमें अधिक समय नहीं दे पाएँगी इसलिए हमको स्वयं बहुत मेहनत करनी होगी। पहले सबक के तौर पर उन्होंने कहा अगले दिन जो विद्युत-विज्ञान के पाठ के सबसे अधिक सवाल हल करके लाएगा उसको इनाम दिया जाएगा।

    मैं मजे मजे में केवल 10-12 ही करके ले गया। अगले दिन आसपास पूछने पर पता चला कि एक लड़की 25 करके लाई थी, तो मैंने तुरंत और सवाल हल किए और 30 करके बैठ गया। फ़िर पता चला कि सबसे अधिक एक दूसरी लड़की ने किए हैं, पूरे 80!! यह जान मुझे और कुछ नहीं सूझा, किताब खोल बैठ गया। किताब के सभी सवाल हल करने के बाद भी गिनती 50 के आसपास थी। अभी दूसरी अध्यापिका के आने में समय था, उसके बाद खाने के लिए 20 मिनट की आधी छुट्टी होनी थी और फ़िर एक अन्य विषय की क्लॉस के बाद विज्ञान की क्लॉस थी। मैं पुस्तकालय की ओर लपक लिया, क्लॉस गोल की, लाईब्रेरियन मुझे जानती थी(सबसे अधिक किताबें मैं ही ले जाता था और उनके पुत्र का मित्र भी था) इसलिए कुछ कहा नहीं कुछ पूछा नहीं। वहाँ अपने कक्षा के अनुसार किताब निकाली और लग गया। पूरी किताब निपट गई लेकिन गिनती अभी 90 तक ही पहुँची थी(विद्युत विज्ञान संबन्धित अधिक सवाल नहीं थे, पुस्तकें पतली सी थीं)। तो मैंने दसवीं और ग्यारहवीं कक्षा के स्तर की पुस्तकें निकाली और शुरू हो गया। 100-105 पर पहुँच मैं चैन से बैठा, खाना खाने की आधी छुट्टी लगभग समाप्त हो गई थी, खाना नहीं खाया था लेकिन मन में संतोष था कि अब मैं सबसे आगे था।

    लेकिन मैं कोई पंगा नहीं लेना चाहता था। इसलिए दोनों किताबें लेकर मैं वापस कक्षा में आ गया। किसी को नहीं बताया कि मैंने कितने प्रश्न हल कर लिए हैं। मैंने पुनः पूछताछ की, पता चला कि वही लड़की जो पहले 80 करके बैठी थी उसने भी अपनी संख्या बढ़ा के 125 कर लिए हैं, तो फ़िर क्या था, अध्यापिका पढ़ाती रही और मैं टेबल के नीचे किताब रख प्रश्न हल करता रहा। मैं अभी 130 तक पहुँच किताब बन्द करने ही वाला था कि पता चला कक्षा का एक हीरो 142 करके बैठा है और सबसे अधिक उसी के हैं। तो मन ही मन उसको ढेर सी गालियाँ देते हुए मैं ग्यारहवीं स्तर की पुस्तक से भिड़ गया और उसमें मौजूद आसान से समझ आने वाले प्रश्न करने लगा और 150 की गिनती होने पर अपनी पुस्तक बंद करके बैठ गया। किसी को नहीं बताया मैंने कितने किए हैं, सभी की निगाह में उस हीरो ने सबसे अधिक 142 किए थे और अब समय भी नहीं था, पाठ समाप्त होने वाला था और इसके बाद विज्ञान की क्लॉस थी। जब विज्ञान की अध्यापिका और फ़िर हमारी प्रधानाचार्या ने कक्षा में आकर सबसे पूछा कि किसने सबसे अधिक प्रश्न हल किए हैं तो सबने उस हीरो का नाम लिया और उसने शान से 142 प्रश्नों के हल वाली अपनी पुस्तिका पकड़ा दी। तभी मैं अपनी सीट से उठा और जाकर अध्यापिका को अपनी पुस्तिका पकड़ाई। उन्होंने पूछा कि मैंने कितने किए हैं तो “वन फ़िफ़्टी” कह मैंने उनको आखिरी पन्ना दिखाया। हीरो और उसकी मण्डली पास ही बैठे थे, सबके मुँह खुले के खुले रह गए।

    प्रधानाचार्या ने मुझे उस समय बाज़ार में उपलब्ध सबसे बड़ी डेरी मिल्क चॉकलेट मुझे पुरस्कार स्वरूप दी और बाकी तीन लोगों को जिन्होंने सौ से अधिक प्रश्न किए थे उनको एक-एक छोटी अमूल की चॉकलेट दी। उस समय जितनी खुशी मुझे थी वह मैं बयान नहीं कर सकता था, आखिर मैंने हॉबी विषय के रूप में इलेक्ट्रॉनिक्स जो लिया हुआ था, इसलिए मुझे तो प्रश्न हल करने में बहुत मज़ा आया था। यदि प्रधानाचार्या जी की निगाह आखिरी के 30-40 प्रश्नों पर जातीं तो मुझे विश्वास था कि उनको खुशी अवश्य होती क्योंकि मैंने अपनी कक्षा स्तर से दो वर्ष आगे के प्रश्न(बेशक पुस्तक में सबसे आसान वही थे) हल किए हुए थे। या शायद उनकी निगाह गई थी? मुझे पता नहीं लेकिन इतना अवश्य याद है कि दसवीं की बोर्ड की परीक्षा के बाद जब मैंने आर्ट्स ली थी और उसके बाद वाणिज्य में अपना स्थानांतरण करने के लिए उनसे कहा था तो उन्होंने मुझे विज्ञान लेने के लिए यह कहते हुए बहुत ज़ोर दिया था कि मेरे लिए विज्ञान ही सर्वोचित है लेकिन मेरी ज़िद वाणिज्य के लिए ही थी जो उन्होंने मुझे कदाचित्‌ अनमने मन से दिया।

  5. मुझे अंधेरे से बहुत डर लगता था।

अब जैसा कि नियम है, मैं अपने शिकारों का चुनाव करूँगा जिनके बारे में मैं जानना चाहता हूँ। तो यह है मेरी हिट-लिस्ट:

  1. अल्का जी [ बदले का समय ;) ]
  2. रचना जी
  3. साँझ परी यानी कि ट्वाईलाईट फ़ेयरी(twilight fairy)
  4. प्रत्यक्षा जी
  5. ई-स्वामी जी

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english translation for Ben & others who don’t understand hindi

Oh man, life was going pretty quiet(with few bumps here & there) when all of a sudden & unexpectedly came a tag from Ben. First I thought why would someone want to tag me, then I thought “cool eh, Ben has started writing again”, then I thought “ok, lets get it over with”!! ;)

Last time I was tagged, Alka did manage to put me in a rather tight spot, but its quite easy this time, all I’ve to do is just reveal 5 things about me which usually people don’t know(atleast the readers of this blog)!! Now that is indeed a bit difficult(I mean which things I can afford to reveal, eh!!), but here it goes!! ;)

  1. I’ve really liked reading a lot right from my childhood days, but never had any passion for my school books(except english literature & history books) especially social science books, eeek!! ;)
  2. Though my mom was a mathematics teacher, I’ve really disliked mathematics always. It used to the last subject that I used to prepare before exams, but on the contrary, I’ve always liked solving puzzles, especially maths puzzles. My aunt once got me a maths puzzle book written by Shakuntala Devi which me & one of my friends in school used to solve with lots of enthusiasm & almost solved the whole book.
  3. In the seventh grade, I got so addicted to Hardy Boys novels that I used to read them in school even when a class was in progress & the teacher was teaching, by sitting on a seat a bit before the last one in a row next to last(experience taught it that teachers’ eyes were mostly on last benches & last rows, so one easily got away with things when right under teachers’ nose, like the saying goes; if you wanna hide something, hide it in plain sight!)!! In those days, I was wrapping up at the rate of 2 novels per day!! ;)
  4. I like competition, there are a lot of things that I’ve done due to competition which I wouldn’t have done otherwise. If the prize is a surprise or something that I like, then I go with full steam to win!! There’s a memorable incident that I remember in this regard from the days of my 9th grade in school.

    Our science teacher had gone on a long leave & her chances of coming back before the end of term were pretty slim. The teacher who had come as her replacement was good in biology but in physics & chemistry….. So one day some classmates decided that its about time they talk to the school principal about this since she used to teach physics in her teaching days. The principal said that since she won’t be able to take all classes in a week, we’ll have to work hard on our own as well. So to start things off, she said that we were to solve as many electronics numericals as we can & the student having solved maximum numericals next day would get a prize.

    I didn’t take it seriously at all & arrived at school next day with just 10-12 numericals. On asking around, I got to know that a girl has done 25 numericals, so I decided to oust her & reached the count of 30. Then I got the intel that another girl has done more than anyone else, a total of 80 numericals!! Now that was astounding, so I opened my book & started finishing off numericals like a machine & was soon done with all in the book, but the score was still around 50!! Next class was about to start & then we were to have a 20 minute recess & then another class before science class. So I bunked the class & rushed to the library; the librarian knew me(I was the one who used to take away more books than anyone else & anyways, I & her son were friends) so she didn’t ask me any uneasy questions like why was I not in class!! In the physics section I got a book as per my grade & started with it. But even after finishing off with that book I was still around 90(since the electronics chapter was a bit short & not many numericals in there). So I pulled out another couple of books which were of 10th & 11th grade & started with the easy questions in them. Having reached 100-105 I breathed a sigh of relief, recess was almost over, but I had this satisfaction of being in the lead!!

    Still not wanting to take any chance, I took the books along with me & reached my classroom. I didn’t let out how many I’ve done, but got to know that the same girl who had done 80 earlier was sitting tight on 125, so I started again, didn’t want to loose having come all this way. So book under the table, I went off again & was just about to close my notebook with 130 numericals, I came to know about a guy who’d done the most, 142. So after cursing him in my thoughts, I was at it again & finally closed my notebook at 150. I didn’t tell anyone how many I’d done(I guess no one was expecting much either) & everyone had accepted that that guy was gonna win with his 142 numericals, there was no time to do any more as well. On time, the bio teacher & the principal entered the classroom & asked who had done the most number of numericals. Everyone looked at that guy as he gave his notebook with 142 numericals to the bio teacher. After that I got up & handed her mine. She asked me how many I’d done & the answer came crisply from me, “one fifty”. That guy & his gang were seated near the place where I was standing & their jaws dropped right to the floor!! ;)

    The principal, as the prize, gave me the biggest Dairy Milk chocolate bar available in the market at that time & as a consolation prize gave an Amul chocolate bar to each of the 3 people who’d done more than 100 numericals. I was damn happy at that time, since I’d taken Electronics as my hobby subject I’d enjoyed solving all the numericals!! But I wondered, had the principal seen the last 30-40 numericals, perhaps she’d been more pleased with me since they were of a level 2 years above me(even though they were the easy ones in the book)!! I don’t know whether she saw that or not but I know this, when after the board exams of 10th, when after having taken Arts in 11th I went to her to get her to transfer me to Commerce, she’d asked me why I hadn’t taken Science as according to her that was where I should’ve gone, but I insisted on taking Commerce which I think she reluctantly gave to me.

  5. I used to fear the dark!! ;)

Now its time I pick my victims(about whom I want to know) for this thing so that the chain continues. So here’s my hitlist:

  1. Alka [ payback time ;) ]
  2. Rachana
  3. Twilight Fairy
  4. Pratyaksha
  5. E-swami

Categories: mindless rants · फ़ालतू बड़बड़

वीर योद्धाओं के देश में - भाग १

February 3, 2007 · 4 Comments

अभी हाल ही में, यानि कि कुछ दिन पहले ही, पर्वतों में नव-वर्ष का स्वागत किया परन्तु घूमने फ़िरने का कीड़ा पुनः कुलबुला रहा था, इसलिए फिर कहीं घूम आने की सोची। इस बार किसी पर्वतीय स्थल की ओर न जाने का निर्णय लिया, सर्दियों का मौसम है इसलिए धूप से नहाया राजस्थान हमें आवाज़ दे बुला रहा था। पिछले वर्ष नवंबर के अंत में उर्स के दौरान जहाँ हम न जा पाए, उस वीरों के देश अजमेर घूम आने का हमने मन और प्रोग्राम बनाया। जैसे कि अब आदत हो गई है और जैसा कि अब अपेक्षित रहता है, इस यात्रा के आरम्भ में भी वही पुरानी नौटंकियाँ हुई, कलाकार लोगों की आदत आराम से थोड़े ही छूटती है!! ;) बहरहाल, हमेशा की तरह अपना इरादा पक्का था, साथ देने वालों की कमी नहीं थी, तो अपना रायता नहीं बिखरा। 26 जनवरी का शुक्रवार था, इसलिए तीन दिन की सप्ताहांत की छुट्टी थी, तो मैं, योगेश, एन्सी और शोभना 25 जनवरी की रात को अजमेर की ओर निकल पड़े। साथ में एन्सी के मित्र मनीष भी थे जो अपने घर जयपुर जा रहे थे, अब चूँकि जयपुर अजमेर के रास्ते में ही पड़ता है इसलिए हमने उनको जयपुर तक लिफ़्ट देना सहर्ष स्वीकार लिया। स्निग्धा और हितेश 26 की शाम तक अजमेर पहुँचने वाले थे क्योंकि स्निग्धा की बंगलूरू से दिल्ली की उड़ान 26 तारीख़ की सुबह की थी।

तो अपना अपना सामान लाद(गाड़ी में) हम लोग निकल पड़े दिल्ली-जयपुर राजमार्ग पर, आहा, सड़क ऐसी जैसे मक्खन, गाड़ी अपनी गति से उड़ी जा रही थी। टैक्सी वाले ने इस बार जो गाड़ी भेजी थी उसमें सीडी-एमपी३ प्लेयर था, तो गानों की मस्त धुनें एक के बाद एक बजे जा रही थी, नींद भी आ रही थी, बीच-बीच में कब आँख लग जाती पता ही नहीं चलता था। एक जगह रूक चाय आदि पी गई और मैं आगे ड्राईवर के बगल वाली सीट से हट सबसे पीछे की एक सीट पर सामान के साथ अकेला जा बैठा। इसी कारण मुझे शेवरलेट की टवेरा टोयोटा की क्वालिस से अधिक पसंद है, क्योंकि टवेरा की पीछे की सीटें क्वालिस के मुकाबले अधिक आरामदायक हैं। तो अपन तो पूरा लाभ लेते हुए पीछे की एक सीट पर पसर गए, पूरे नहीं तो कुछ ही सही!! ;) कुछ घंटों बाद पता चला कि जयपुर आ गया है, वहाँ हमने मनीष को अलविदा कहा और अजमेर के रास्ते पर बढ़ गए। आबादी पुनः पीछे छूट गई और हम सुनसान सी सड़क पर आगे बढ़े जा रहे थे। थोड़ा आगे जाकर हमने किशनगढ़ को पार किया। सारी रात अधलेटी अवस्था में उचटती सी निद्रा लेने के कारण बदन दुख सा रहा था, सबसे आगे बैठे योगेश ने आवाज़ लगा कर बताया कि पौ फटने वाली है और यदि कोई तस्वीर आदि लेनी है तो बढ़िया समय है। थोड़ा आगे रिलायंस का एक पेट्रोल पंप दिखा तो गाड़ी वहाँ रोक दी गई ताकी सभी अपनी टाँगे सीधी कर सकें, किसी को हल्का होना है तो वह काम भी निपटा लिया जाए!! ;) सूर्योदय होने वाला था, इसलिए अपना कैमरा निकाल मैं तैयार था और नतीजे से मुझे निराश नहीं होना पड़ा!! :)

बहुत कम ऐसा हुआ है कि कोई तस्वीर लेकर संतुष्टि हुई है, यह तस्वीर उन कुछ तस्वीरों में से एक जिसे लेकर संतुष्टि का एहसास हुआ। :) बहरहाल, एकाध तस्वीर लेकर हम पुनः अपने रास्ते लग लिए, मंज़िल अब कोई अधिक दूर नहीं थी। सवेरा हो आया था और हम बिना भटके अपने पहले पड़ाव यानि कि होटल खादिम तक पहुँच गए। अंदर रिसेप्शन पर पता चला कि मैंने जो फोन पर कमरे बुक करवाए थे वे हमे मिल जाएँगे, बुकिंग को उन्होंने मज़ाक में नहीं लिया था!! तो हम लोगों ने अपने कमरों में पहुँच सामान पटका, कमरे तक छोड़ने आया बैरा आदतानुसार सलाम बजाता खड़ा रहा जब तक उसे टिप नहीं दी गई!! नाश्ते के लिए हमे नीचे होटल के रेस्तरां में जाना पड़ा, फोन पर उन्होंने साफ़ बता दिया कि रूम सर्विस उपलब्ध नहीं है। नीचे रेस्तरां में नाश्ते की प्रतीक्षा करते हमने एक बैरे को कुछ खाने-पीने के सामान को ले जाते देखा तो हमें अजीब लगा क्योंकि उन्होंने मना कर दिया था कि रूम सर्विस नहीं है। पूछने पर पता चला कि किसी बीमार व्यक्ति के लिए ले जाया जा रहा है जो स्वयं रेस्तरां में नहीं आ सकता। लेकिन कुछ समय बाद और भी नाश्ते की प्लेटें आदि जाती देखी और उसके बाद और भी, तो हम सोचने पर मजबूर हो गए कि क्या अजमेर में मौजूद सभी बीमार पर्यटक होटल खादिम में रूके हुए हैं!! वैसे दिमाग को अधिक कसरत करवाने की आवश्यकता नहीं थी, हम समझ गए कि नाश्ते क्यों और किन लोगों के लिए जा रहे हैं!! खैर, हम अपने नाश्ते आदि से निपटने के बाद अपने कमरों में आ गए दो घंटे की नींद ले थकान दूर करने के लिए। कहीं जाने की कोई जल्दी नहीं थी और वैसे भी उस समय सुबह के सिर्फ़ नौ बजे थे, इसलिए सवा ग्यारह का अलार्म लगा मैं भी सो गया।

थोड़ी देर बाद योगेश ने मुझे जगा दिया यह कहकर कि बहुत नींद ले ली!! मुझे लगा कि अभी तो सोया था और फ़िर अपने को कोसने लगा कि मैं आदतानुसार पुनः अलार्म बंद कर सो क्यों गया। लेकिन आश्चर्य भी हुआ क्योंकि अलार्म बंद कर सोने की आदत तो घर पर है, बाहर कहीं, खासतौर पर किसी यात्रा के दौरान, तो मैं अलार्म बजते ही तुरंत उठ जाता हूँ। मोबाईल में समय देखा तो पता चला कि ग्यारह बजने में पंद्रह मिनट थे, यानि कि योगेश ने मुझे आधा घंटा पहले ही उठा दिया था। मन तो ऐसा हुआ कि पता नहीं क्या कर दूँ, लेकिन अब क्या कर सकता था, इसलिए निद्रा रानी को फ़िर मिलने का वायदा कह अलविदा किया और नहा-धोकर तैयार हो गए। लड़कियों के कमरे में गए तो जैसा कि अपेक्षित था, वे अभी तैयार नहीं हुई थी जबकि मैं और योगेश पूरी तरह तैयार थे। खैर, थोड़ी देर बाद हम सभी तैयार थे, इसलिए नीचे गाड़ी के पास पहुँच ड्राईवर साहब को उठाया। रिसेप्शन पर बैठे अंकल से पूछा कि अजमेर में देखने को क्या है तो वे बोले कि अजमेर में देखने को कुछ नहीं है। तारागढ़ के किले का कुछ नहीं बचा है और वहाँ मुस्लिम बस्ती बसी हुई है, अना-सागर तालाब बेकार है, बस प्रसिद्ध सूफ़ी मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है जहाँ दर्शन करने लोग आते हैं। अब जब ऐसा सुनने को मिला तो मैंने कुछ ना बोलना ही ठीक समझा, अंकल को धन्यवाद कहा और अपनी आऊटलुक ट्रैवलर की गाईडबुक पर भरोसा कर चल दिए तारागढ़ के किले की ओर। 26 जनवरी होने के कारण सड़कें खाली सी पड़ी थीं, तारागढ़ के लिए चढ़ाई आरम्भ होने से पहले सड़क पर एक जगह तस्वीरें लेने के लिए सही लगी तो वहाँ सभी तस्वीर लेने और खिंचवाने के लिए उतर गए।

बहरहाल, तस्वीरें ले हम आगे बढ़ चले और तारागढ़ जाने के पहाड़ी रास्ते को पकड़ा। मार्ग में एक जगह राजस्थान पर्यटन विभाग ने पर्यटन स्थल जैसा कुछ बना रखा है जिसे “सम्राट पृथ्वीराज चौहान स्मारक” का नाम दे रखा है और जहाँ घोड़े पर सवार पृथ्वीराज चौहान की काले पत्थर की बड़ी प्रतिमा लगा रखी है। कुछ देर बाद हम तारागढ़ पहुँच गए, किला वहाँ अब नहीं है, सिर्फ़ दीवारों के कुछ छोटे-मोटे भाग ही बचे हुए हैं। जैसा कि होटल के रिसेप्शन पर बताया गया था, तारगढ़ में अब मस्जिद और दरगाह है और मुस्लिम बस्ती है। कभी यहाँ एक किला हुआ करता था जो कि लगभग नौ शताब्दियों पहले तक चौहान साम्राज्य का गढ़ था। तारागढ़ के बारे में कहा जाता है कि किसी पर्वत पर बना यह एशिया का पहला किला था, तो इस आधार पर यह विश्व के उन गिने चुने किलों में आ जाता है जो पहले पहल बनें। इस किले से चौहान राजा अजमेर और अपने राज्य पर सात-आठ शताब्दी पहले तक शासन किया करते थे। गाड़ी पार्किंग में लगाते ही एक साहब पास आए और हमें वहाँ मौजूद “बाबा” की दरगाह के बारे में बताने लगे। हमने कहा कि आसपास देखने के बाद दरगाह के बारे में देखा जाएगा तो वह फट से बोल पड़े कि लोग वहाँ “बाबा” की दरगाह के लिए ही आते हैं और वह कोई घूमने-फिरने का स्थान नहीं है। किसी तरह उन साहब से पीछा छुड़ा हम आगे बढ़े और एक जगह पहाड़ी के किनारे के पास पहुँचे। ऊपर पहाड़ी से नीचे अजमेर शहर विस्तृत रूप से फ़ैला हुआ और बहुत छोटा दिखाई पड़ रहा था।

धूप अब थोड़ी चुभ रही थी, मैं और योगेश तो मौसम के अनुरूप हल्के फुल्के कपड़े पहने थे लेकिन एन्सी और शोभना ने हल्की ठंड की अपेक्षा में कपड़े पहने हुए थे, इसलिए अब उनको गर्मी लग रही थी। पास ही हमें एक पुराना खंडहर सा दिखा तो हमने वहाँ जाकर छाँव में थोड़ा समय बिताने की सोची। उस खंडहर से नीचे अजमेर का नज़ारा और भी अच्छा दिख रहा था और वहाँ कहीं धूप के कारण रोशनी थी तो कहीं अंधेरा था, इसलिए वहाँ श्याम-श्वेत तस्वीरें लेने का विचार मन में आया।

हमने तो खैर ली ही, औरों ने हमारी भी ले डाली!! ;)

तस्वीरें आदि लेने और शांत माहौल में बढ़िया समय बिताने के बाद हमने वापस जाने का निर्णय लिया। वापस अपनी गाड़ी की ओर बढ़ रहे थे कि मस्जिद की दीवार पर किसी प्रकार के तेल का विज्ञापन देखा। आप भी देख लीजिए और समझ लीजिए!! ;)

अब वहाँ और कुछ देखने की इच्छा नहीं थी, तो गाड़ी निकलवा उसमें सवार हुए। हमें गाड़ी में सवार होता देख वो “बाबा” की दरगाह वाले साहब पुनः आ गए और कहने लगे कि “बाबा” के दर्शन तो अवश्य करने होंगे। मैंने कहा कि भई अब साथी लोग जाना चाहते हैं देर हो रही है तो साहब गले ही पड़ गए, बोले कि दर्शन किए बिना नहीं जा सकते। किसी तरह उनसे पुनः पीछा छुड़वाया और गाड़ी में सवार हो वापसी की राह पकड़ी, वो साहब देखते रहने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर पाए।

अगले अंक में जारी …..

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पर्वतों में नव वर्ष - भाग ३

February 1, 2007 · 6 Comments

पिछले भाग से आगे …..

अगले दिन सुबह जल्दी उठ सभी तैयार हुए, नाश्ता कर वापसी की राह पकड़ने को सभी आतुर थे। लेकिन जल्दी निकलना कदाचित्‌ किस्मत में नहीं था, रिसॉर्ट वाले से पंगा हो गया। दिल्ली से जब बुकिंग करवाई थी तो उसने कमरों का किराया 1000 रूपये प्रति दिन के हिसाब से बताया था और बिल में उसने उनके 1800 और 2800 रूपये लगा दिए थे यह कहकर कि 1000 वाले कमरे उपलब्ध नहीं थे। कहने का अर्थ यह कि हमें उसके अनुसार महंगे कमरे में ठहरा दिया और हमें बताना भी उचित नहीं समझा कि जो कमरे हमें दिए जा रहे हैं वे महंगे हैं!! बिल की जाँच करने से पता चला कि साहब ने खाने-पीने के बिल इत्यादि जोड़ने में भी घपला किया हुआ था, 1000 रूपये खामखा के अधिक लगा रखे थे। तो बस बिल को लेकर तकरीबन एक घंटा बहस हुई और फ़िर हम अपने मन मुताबिक पैसे देकर वहाँ से चल दिए। लान्सडौन जाने वाले ध्यान रखें, इस अनुभव के आधार पर मैं रिट्रीट आनंद नामक जंगल रिसॉर्ट में रहने की किसी को सलाह नहीं दूँगा, वहाँ अन्य होटल आदि भी हैं, गढ़वाल मण्डल वालों का यात्री निवास भी है जहाँ ठहरा जा सकता है।

तो अब आखिरकार हम लोगों ने वापसी की राह पकड़ी। पहाड़ी से नीचे उतरते हुए कई मनमोहक नज़ारे देखने को मिल रहे थे।

पहाड़ी से नीचे उतर कर कोटद्वार से थोड़ा आगे कर्ण्वाश्रम भी देखना था। किंवदन्तियों के अनुसार सदियों पहले यह कर्ण्व ऋषि का आश्रम होता था जहाँ एक बार राजर्षि विश्वामित्र गहन तपस्या में लीन थे और जहाँ स्वर्ग की अप्सरा मेनका ने उनको अपने पर मोहित कर उनकी तपस्या भंग की थी और उन दोनों के संगम से शकुन्तला का जन्म हुआ था। कहते हैं कि राजर्षि विश्वामित्र ने शकुन्तला को कर्ण्व ऋषि को सौंप दिया जिन्होंने उसका पालन पोषण किया और जिसके साथ हस्तिनापुर नरेश दुष्यंत का विवाह हुआ। यहीं इसी आश्रम में शकुन्तला और दुष्यंत के पुत्र और भावी सम्राट भरत का जन्म हुआ जिनके नाम पर इस देश का नाम पड़ा।

कोटद्वार पहुँच आगे का रास्ता पूछ हम लोग कर्ण्वाश्रम पहुँचे। पहुँचने का मार्ग थोड़ा टूटा कुछ फूटा था, आश्रम के आसपास छोटा सा गांव/कस्बा है जो कि ग्रामीण भारत की झलक दिखलाता है(जैसे वो हिमेशवा झलक दिखलाने को बार बार कहता रहता है)!!

लेकिन कर्ण्वाश्रम पहुँच इस बात को साक्षात देखा कि भारत के इतिहास की यह धरोहर ठीक उसी तरह सूनी पड़ी है जैसे किसी विधवा की माँग।

और यह अकेली ऐतिहासिक धरोहर नहीं है जिसका ऐसा हाल है। वहाँ मात्र एक व्यक्ति का निवास है जो कि पुजारी हैं और वहाँ रह योग साधना करते हैं। उनसे पता चला कि वहाँ कोई इक्का-दुक्का व्यक्ति ही कभी कभार आता है अन्यथा वहाँ पर्यटक आदि नहीं आते। अब यह बात जानकर कोई खास आश्चर्य नहीं हुआ, ऐसा अपेक्षित सा ही लगा क्योंकि कम लोगों को इस जगह की जानकारी है और वैसे भी यहाँ उसी का आना बनेगा जो कि लान्सडौन जाएगा, अन्यथा सिर्फ़ इस जगह कोई नहीं आएगा। वहाँ थोड़ा समय बिता हम वापस अपनी गाड़ी की ओर चल पड़े। कर्ण्वाश्रम के आसपास हल्का-फुल्का जंगल सा है और उसमें थोड़ा आगे जाकर एक झरना है जो कि सहस्त्रधारा के नाम से जाना जाता है। किंवदंतियों के अनुसार शकुन्तला के समयकाल में इस झरने से पानी की जगह दूध बहा करता था!! ;)

बहरहाल, हम वापस कोटद्वार की ओर चल पड़े। निश्चय किया गया कि दोपहर का भोजन ले लिया जाए क्योंकि फ़िर काफी समय तक कोई ढंग की खाने-पीने की जगह नहीं मिलेगी। कोटद्वार में ही एक अच्छा सा रेस्तरां मिल गया जो कि साथियों को पसंद आया और उसमें डट कर पेट पूजा की गई। इसके बाद ड्राईवर को बोल दिया गया “चक्‌ दे फट्टे” और गाड़ी सरपट दिल्ली की ओर उड़ चली। ;) लेकिन मार पड़े अव्यवस्थित यातायात के बहाव को, पहले नजीबाबाद और फ़िर बिजनौर में फ़ंस गए जिस कारण कुछ घंटे खराब हो गए। मेरठ पहुँचते पहुँचते अंधेरा हो चला था। अब मेरठ से गुज़र रहे थे तो सोचा कि यहाँ कि प्रसिद्ध गजक और रेवड़ी ले ली जाए, तो निधि से पूछा कि कहाँ बढ़िया गजक मिलेगी। मेरठ की होने के कारण निधि को सब पता था और वह हमें सही दुकान पर ले गई जहाँ की गजक वाकई स्वादिष्ट थी। तो जहाँ हम में कुछ ने गजक खरीदी, वहीं बाकी के लोगों को हम पर खीज हो रही थी कि खामखा इतना समय लगा रहे हैं!! ;) तो फटाफट खरीददारी निबटा हम वापस गाड़ी में आ गए और अपने गंतव्य की ओर चल पड़े, दिल्ली अब दूर नहीं थी। ;) कुछ ही घंटों में हम दिल्ली में थे, एक-एक कर सबको उनके घर छोड़ते हुए मैं वापस अपने घर पहुँचा।

पिछले वर्ष मई में लान्सडौन जाने का कार्यक्रम बन रहा था जो कि बाद में स्थगित करना पड़ा था और बाद में हम लोग ऋषिकेश चले गए थे, लेकिन आखिरकार लान्सडौन भी हो आए, इस बात से मन अति प्रसन्न था। सर्दियों में हिल-स्टेशन का पहला अनुभव यादगार रहा लेकिन दोबारा ऐसा करने से पहले 31 दिसंबर की रात और उस समय की ठंड और जिस जगह हम लोगों ने वह रात गुज़ारी, इन सब बातों को कम से कम एक बार अवश्य ध्यान में लाउँगा!! ;)

इस यात्रा के दौरान लिए गए सभी छायाचित्र यहाँ उपलब्ध हैं।