दुनिया मेरी नज़र से - world from my eyes!!

संगीत के उस्ताद

February 26, 2007 · 7 Comments

लगभग एक माह पहले मेरे इनबॉक्स में एक विज्ञापन वाली ईमेल आई। अब वैसे तो रोज़ ही कई सौ आती हैं लेकिन यह उन जैसी नहीं थी। यह इंडिया टुडे वालों की ओर से आई थी जिसमें उन्होंने मुझे इंडिया टुडे बुक क्लब की सदस्यता ऑफ़र की। शर्त यह थी कि उनके कैटालॉग में से मैं कोई भी दो पुस्तकें अथवा संगीत की सीडी खरीदूँ, वे मुझे उसी कैटालॉग में से मेरी पसंद की कोई चार पुस्तकें अथवा सीडी मुफ़्त में देंगे और साथ में सदस्यता भी जिसके अंतर्गत मैं भविष्य में हर खरीद पर छूट प्राप्त करूँगा।

अमूमन मैं इस तरह के विज्ञापन पढ़कर मिटा देता हूँ लेकिन मुझे कुछ रूचिकर लगा, उस समय मेरे पास थोड़ा खाली समय भी था, तो सोचा देख लेते हैं, यदि कोई काम की चीज़ नहीं लगी तो नहीं लेंगे। दिए गए पते पर पहुँच जो पुस्तकें देखी उनमें से मुझे अपनी रूचि की कोई भी नहीं लगी, लेकिन संगीत की कुछ सीडी पसंद आई। तो मैंने निम्न सीडी खरीदी:

  1. Music for Relaxation - composed by Vishwa Mohan Bhatt
  2. Music for Rejuvenation - Libra

और निम्न सीडी मुफ़्त उपहार में पसंद करीं:

  1. The Elements - Wind - composed by Hariprasad Chaurasia
  2. The Elements - Water - composed by Shiv Kumar Sharma
  3. The Elements - Earth - composed by Vanraj Bhatia
  4. The Elements - Fire - composed by Bhaskar Chandavarkar

वैसे तो ये सभी सीडी बहुत बढ़िया हैं, पूरे पैसे वसूल, लेकिन शिव कुमार शर्मा का तो मैं पंखा(हिन्दी में बोले तो ….. फ़ैन) हो गया। इससे पहले मुझे कभी इन संगीतकारों अथवा इनके संगीत में कोई रूचि नहीं रही लेकिन अभी 7-8 दिन पहले जब से ये सीडी आईं हैं तब से इन्हें ही बारंबार सुने जा रहा हूँ। The Elements - Water में शिव कुमार शर्मा ने वाकई बहुत अच्छा संगीत दिया है, उसके बाद मुझे सबसे अच्छी लगी वनराज भाटिया की The Elements - Earth जिसमें पहला संगीत ट्रैक At the Dawn of Creation बहुत ही अच्छा है। The Elements की शृंखला, जो कि पाँच तत्वों पर है, में एक सीडी रह गई जिसका नाम है The Elements - Space जिसका संगीत तबले के उस्ताद ज़ाकिर हुसैन ने दिया है। मैं इसे खोज रहा हूँ और आशा है कि जल्द ही यह मिल जाएगी।

अब जब शौक चढ़ा तो अगली बार जब मैं प्लैनेट-एम गया तो वहाँ से पंडित जसराज की “मियां तानसेन” ले आया जिसमें तानसेन के कई राग हैं। यह दो सीडी का पैक है जो मैंने अभी पूर्ण नहीं सुनी लेकिन जितना सुना है वह बहुत ही अच्छा लगा। थोड़े से अच्छे स्पीकर या हेडफोन हों और उस पर यह संगीत चला के सुना जाए और आँख बन्द कर बैठा जाए, आहा, स्वर्ग की सी अनुभूति होती है। :) वाकई ये सभी आज के युग के तानसेन हैं।

अभी कुछ और ऐसी ही सीडी देखीं हैं, जल्द ही उनको प्राप्त कर संगीतमयी स्वर्ग के सुख की प्राप्ती करुँगा। :D

Categories: music · संगीत

वीर योद्धाओं के देश में - भाग ३

February 26, 2007 · 7 Comments

पिछले अंक से आगे …..

सुबह उठ सभी जल्दी तैयार हुए और होटल में ही तुरन्त नाश्ता निपटा के दरगाह शरीफ़ की ओर निकल पड़े। पार्किंग में गाड़ी खड़ी कर हम लोग दरगाह की ओर चल पड़े। बाज़ार में हितेश और योगेश ने सुन्दर सी टोपियाँ खरीदीं।

हितेश तो लाल रंग की जैकेट, अपनी टोपी और धूप के चश्में के कारण किसी फिल्म का हीरो टाईप ऑटो ड्राईवर लग रिया था!! ;) हमको बाज़ार में ही एक साहब मिले जो हमारा मार्गदर्शन करते हुए हमें दरगाह तक ले गए। दरगाह पर चढ़ाने के लिए चादर आदि ले कर हमने दरगाह में प्रवेश किया, वे साहब निरंतर हमारे साथ मार्गदर्शन करते हुए चल रहे थे। फ़िर एक जगह अंदर अंदर प्रवेशद्वार पर वे रूके, वहाँ बैठे मुल्ला जी ने हमें अपने सामने बिठा हमसे अजमेर शरीफ़ के दरबार में दुआ मंगवाई।

अन्य श्रद्धालु जन भी वहाँ पास ही दुआ में हाथ उठाए खड़े थे।

तीन दिन बाद मोहर्रम होने के कारण दरगाह पर कुछ अधिक ही भीड़ थी। बहरहाल हमारे मार्गदर्शक महोदय ने हमें अंदर प्रवेश करवा ही दिया, अंदर जाते ही पता चला कि बाहर की भीड़ तो कुछ भी नहीं थी, वास्तव भीड़ का एहसास तो अंदर हुआ जहाँ पाँव रखने की भी जगह नहीं थी। बड़ी कठिनाई से एक मुल्ला जी को चादर दी गई और फ़िर हम सभी बाहर की ओर निकल लिए। निकास द्वार के कुछ पहले एक मुल्ला जी ने मेरे को पकड़ लिया और मेरे गले में धागा बाँध कर कुछ बुदबुदा के फ़ूँका और फ़िर अपनी दक्षिणा माँगी। अब दिक्कत की बात यह थी कि मेरे पास पैसे नहीं थे क्योंकि मेरे ट्रैक सूट में सही जेब न होने के कारण मैंने अपना मोबाईल तथा बटुवा हितेश को दे दिए थे जो कि मेरे से काफ़ी पीछे था। मैंने मुल्ला जी से कहा कि मेरे पास पैसे नहीं मेरे साथी के पास हैं जो कि पीछे आ रहा है पर कदाचित्‌ उन्होंने समझा कि मैं उनसे कह रहा हूँ कि वे मेरे साथी से पैसे ले लें तो वे बोले कि देने तो मुझे अपने हाथ से ही होंगे, जितने चाहे उतने दे दूँ। फ़िर मैंने उनको पुनः कहा कि मेरे पास एक रूपया भी नहीं है, तो तब उन्होंने मेरे को छोड़ा। छूटते ही मैं तुरंत गोली की तरह बाहर निकल आया तथा मैं और एन्सी(जो मेरे आगे ही थी और मुल्ला जी की गिरफ़्त में नहीं आई थी) बाकी मित्रों की प्रतीक्षा करने लगे। जल्द ही बाकी लोग भी आ गए तो फ़िर जिसकी श्रद्धा था उन्होंने मन्नत माँगते हुए पास ही की दीवार की जाली में धागे बाँधे।

तत्पश्चात हमने आसपास की कुछ तस्वीरें लीं, थोड़ी देर एक जगह बैठ विश्राम किया। हमारे मार्गदर्शक महोदय हमारे पास आए और अपना कार्ड हमें दिया। हम सभी अभी तक सोचे बैठे थे कि वे अन्य गाईडों की भांति अंत में हमने पैसे माँगेंगे परन्तु उन्होंने बताया कि वे दरगाह समीति की ओर से नियुक्त किए गए पुजारियों में से एक हैं जिनका कार्य पर्यटकों को गरगाह के दर्शन करवाना है ताकि वे किसी गलत व्यक्ति(जैसे कि किसी दुकानदार, पेशेवर गाईड आदि) के चक्कर में न पड़ जाएँ और वे इसके लिए पर्यटकों से कोई पैसा नहीं लेते। कुछ देर दरगाह प्रांगण में बिता हमने बाहर की राह पकड़ी। बाहर निकलने से पहले हमने मुग़ल बादशाह अकबर द्वारा दान में दी गई बड़ी देग़ और जहाँगीर द्वारा दी गई छोटी देग देखी जिनमें कभी सैकड़ों लोगों के लिए खाना बनता था।

सीढ़ियाँ चढ़ के ऊपर पहुँच देखा कि देग में अब पैसे आदि पड़े हैं, अन्धविश्वासी लोगों ने इसको भी नहीं छोड़ा और इसे भी मन्नत माँगने का स्थान बना दिया। उस समय कैसे भाव मन में आए यह मैं व्यक्त नहीं कर सकता!!

दरगाह से बाहर आ मैंने दो प्रकार के इत्र लिए। बाज़ार से वापसी के दौरान हितेश का मन अढ़ाई दिन का झोंपड़ा देखने का हुआ तो वह और स्निग्धा उसे देखने चले गए और हम बाज़ार में प्रतीक्षा करने लगे। कुछ समय बाद दोनों लौटे और हम लोग गाड़ी में बैठ पुष्कर की ओर निकल गए।

कुछ ही समय में हम पुष्कर पहुँच गए और हमें अपना होटल, राजस्थान पर्यटन विभाग का होटल सरोवर(जो कि पुष्कर के सरोवर के बाजू में ही स्थित है), ढूँढने में भी कोई दिक्कत नहीं आई। होटल पहुँच हमने रिसेप्शन पर बताया कि हम लोगों की रिज़र्वेशन है तो उत्तर मिला कि कमरे दोपहर 12 बजे के बाद ही मिलेंगे क्योंकि उस समय कोई भी कमरा खाली नहीं था। बारह बजने में लगभग आधा घंटा था इसलिए हम होटल के लॉन में आकर बैठ गए। वहाँ कुछ प्यारे से कुत्ते के पिल्ले आपस में खेल रहे थे। मैंने उनकी तस्वीर लेने के लिए कैमरा चालू किया तो वे तुरंत तस्वीर खिंचवाने के लिए पोज़ में आ गए। ;)

लेकिन स्निग्धा जब उनको पुचकारने के लिए गई तो उसके हाथ में न कोई खाने का सामान था और न ही कैमरा। तो कदाचित्‌ खतरा भाँप के सारे पिल्ले भाग के पास ही एक झाड़ी के पीछे चले गए!! ;)

आसपास नज़र दौड़ाने से पता चला कि आसपास बहुत ही अच्छे नज़ारे थे।

जल्द ही हमें हमारे कमरे मिल गए तो उनमें अपना सामान रख हमने तुरंत दोपहर का भोजन निपटाया और गाड़ी में ब्रह्मा मंदिर की ओर निकल पड़े। ब्रह्मा मंदिर से पहले एक मार्ग सावित्री मंदिर की ओर जाता है जो कि एक पहाड़ी के शिखर पर स्थित है।

सभी ने पहले वहीं जाने का निर्णय किया। गाड़ी चढ़ाई के आरंभ में ही खड़ी कर हम पैदल आगे बढ़ चले। मंदिर में चढ़ाने के लिए हमने प्रसाद लिया। योगेश और स्निग्धा सामान्य पथ से ऊपर जाने के इच्छुक नहीं थे, उन पर ट्रेकिंग तथा पर्वतारोहण का भूत जमकर नृत्य कर रहा था इसलिए उन्होंने रेतीले और पथरीले मार्ग से ऊपर वहाँ तक चढ़ने की सोची जहाँ तक सुगमता से चल के जाया जा सकता था। हितेश और शोभना भी उनके साथ हो लिए। एन्सी उस तरीके से ऊपर जाने के लिए तैयार नहीं थी तो उसका साथ देने के लिए मैं उसके साथ हो लिया। हम लोग आराम से ऊपर चढ़े जा रहे थे, बीच बीच में एकाध जगह रूक कर तस्वीरें आदि ले रहे थे। थोड़ा ऊपर पहुँच पीछे देखा तो पूरा पुष्कर और पुष्कर की दूसरी ओर पहाड़ी पर स्थित पाप मोचिनी मंदिर दिखाई पड़ रहा था।

आधे रास्ते से थोड़ा और ऊपर पहुँचने पर मार्ग के एक ओर से एक बहुत अच्छा नज़ारा दिखा जिसने एक रोमांच की सी अनुभूति करवाई।

अन्य साथियों की आवाज़ें सुनाई पड़ रही थी, उनकी ओर से अब ऊपर आने का मार्ग दुर्गम था क्योंकि पहाड़ी सीधी हो रही थी, इसलिए उनको आम-मार्ग पर आने को बोल दिया। कुछ ही मिनट में वे ऊपर आते दिखाई पड़ गए!!

इस पहाड़ी पर लंगूरों की भरमार थी और सभी लंगूर दिलेर इतने थे कि हाथों से सामान छीन के भाग जाते थे। ऐसा ही एक लंगूर रास्ते में शोभना के हाथों से प्रसाद छीन के भाग गया था। मैंने और एन्सी ने अपना अपना प्रसाद एन्सी के बैग में रख दिया था इसलिए वह बचा रह गया।

आखिरकार हम सभी ऊपर शिखर पर पहुँच ही गए। ऊपर आते समय अन्य लोगों को कोई दिक्कत महसूस हुई या नहीं यह मैं नहीं जानता लेकिन पिछले अगस्त में तुन्गनाथ की कठिन चढ़ाई के बाद यह चढ़ाई तो बहुत मामूली सी लगी। ;)

पुष्कर में विदेशी पर्यटक बहुत आते हैं, इज़राईल से तो बहुत बड़ी संख्या में आते हैं, यहाँ सावित्री मंदिर में भी कई विदेशी पर्यटक आए हुए थे। मंदिर परिसर में तस्वीर लेना वर्जित था इसलिए हम केवल दर्शन कर और प्रसाद चढ़ा के बाहर आ गए। बाजू में ही एक हिल टॉप कैफ़े यानि कि एक चाय की दुकान थी जिसने अन्य सामान जैसे चॉकलेट, बिस्कुट, शीतल पेय आदि भी रख रखे थे। दुकान के सामने छोटी सी समतल भूमि थी जिसके आगे खाई थी और एक ओर से सूर्यास्त होता दिख रहा था। नज़ारा बहुत ही मनमोहक था इसलिए (मेरे अतिरिक्त)सभी ने वहीं (कुर्सियों पर)बैठ चाय पीने का निर्णय लिया।

सूर्यास्त हो रहा था, इसलिए इस समय श्वेत-श्याम तस्वीरें बहुत सुंदर आईं।

जब चाय आदि पी जा रही थी तो सभी लंगूर ताक में आसपास ही बैठे थे। शोभना एक बिस्कुट का पैकेट लेकर आई और तुरंत ही एक लंगूर उसे छीन के भाग गया!! इसलिए दूसरा पैकेट खोलते समय सभी सतर्क थे, जैसे ही लगा कि कोई लंगूर झपटने वाला है वैसे ही उसे छुपा के लंगूर को डरा के भगाया गया। अंधेरा हो आया था, वापसी का मार्ग कोई आसान नहीं था और वह भी अंधेरे में, तो इसलिए हमने वापसी की राह पकड़ी। ऊपर आते समय जगह-२ सूचनापट देखे थे जो कि सूर्यास्त से पहले नीचे उतर आने पर ज़ोर दे रहे थे, फ़िर भी हमारा सूर्यास्त से पहले नीचे उतरना हुआ ही नहीं, क्योंकि हम ऊपर सूर्यास्त से कुछ पहले ही गए थे। मार्ग में कुछ बल्ब आदि लगे थोड़ी रोशनी प्रदान कर रहे थे परन्तु वह पर्याप्त नहीं थी, इसलिए सावधानीवश हम एक दूसरे का हाथ पकड़ नीचे उतरे।

नीचे आकर सभी ने चैन की सांस ली और फ़िर ब्रह्मा मंदिर की ओर बढ़ चले।

अगले अंक में जारी …..

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