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अंधा है कानून ….. गुंडों का है राज

March 2, 2007 · 12 Comments

बहुत लोग कहते हैं कि हमारा देश तरक्की पर है। कुछ लोग इसको यथार्थ के रूप में कहते हैं और कुछ इसको व्यंग्य के तौर पर। जो लोग व्यंग्य के तौर पर कहते हैं उनमें से कुछ का इशारा कदाचित्‌ इसी ओर होता है। साठ साल पहले हमने लड़-झगड़कर अंग्रेज़ों से देश को आज़ाद करवा लिया, परन्तु क्या हम सही मायने में आज़ाद हुए? यदि समाज और उस पर राज करते कीड़ों को देखो तो एहसास होता है कि आज़ादी अंग्रेज़ों से तो मिल गई परन्तु उनकी जगह देशी तानाशाह आ गए, आज़ाद तो हम हुए नहीं, सिर्फ़ गुलामी की रस्सी, नाक की नकेल में बंधी, एक के हाथ से निकल दूसरे के हाथ में चली गई, और अभी भी भारत में हैं अंधेर राज।

यह अंधेर नहीं है तो और क्या है? चंडीगढ़ निवासी शान्तनु गोयल तथा उसके परिवार को उसके भाई के ससुराल वालों ने बेदर्दी से पुलिस के सामने पीट डाला, सिर फ़ोड़ दिए, हाथ तोड़ दिए, घर में तोड़ फ़ोड़ की, और तो और, उनकी बीमार माताजी को भी नहीं बक्शा, उनकी धर्मपत्नी के साथ बदसलूकी की हद लाँघते हुए उनके भी कपड़े फाड़ डाले!!! और यह सब किसलिए? यह सब इसलिए क्योंकि शान्तनु के भाई की पत्नी कलह कर अपने मायके जाकर बस गई थी और उसके मायके वाले शान्तनु के भाई से यह सब कलह और मामला समाप्त करने के लिए 30 लाख रूपए माँग रहे थे जिसमें (आजकल जगह-२ चल रही सेल के सदके) उन्होंने छूट देते हुए 50 प्रतिशत माफ़ कर दिए और बाद में अपनी माँग को रिवाईज़ करते हुए 15 लाख की माँग की जिससे एक पैसा कम लेने को वो लोग तैयार नहीं। जब शान्तनु के भाई ने रकम देने में अपनी असमर्थता जताई और उसके घर वालों ने मामले को बातचीत से सुलझाने की कोशिश की तो शान्तनु की भावज के घरवाले अपने रिश्तेदारों की गुंडा फ़ौज लेकर शान्तनु के चंडीगढ़ स्थित फ़्लैट पर आ धमके और जबरन घर में घुसते हुए उन्होंने सभी घरवालों की क्लॉस ले डाली। किसी के सिर पर टेलीफोन इतनी ज़ोर से मारा कि टेलीफोन के टुकड़े हो गए तो किसी का सिर काँच की टेबल पर दे मारा और जब सब टूट गया तो दीवारें तो फ़िर भी खड़ी थी, तो वहीं सिर दे मारे!!!

लेकिन अभी बस कहाँ हुई थी। कलह कर घर लौटी कन्या के पिताजी ने गुंडागर्दी की कमान स्वयं संभालते हुए शान्तनु की बीमार माताजी को रोटी बेलने वाले बेलन से पीट दिया, तत्पश्चात उनके घर की औरतों में भी बैंडिट क्वीन की आत्मा का प्रवेश हुआ और उन्होंने बीमार माताजी की फ़्राईंग पैन और सैन्डलों से पूजा की!! शान्तनु के घर वाले पुलिस को फोन नहीं कर पाए क्योंकि गुंडो ने पहले से ही उनके घर के टेलीफोन की तार काट दी थी। लेकिन यदि नहीं भी काटते तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता। पड़ोसियों के बुलाने पर पुलिस आखिरकार आई अवश्य, लेकिन उन्होंने ने भी अपने-२ मुँह फ़ेर लिए। प्रत्यक्षदर्शियों के बहुत ज़ोर डालने पर पुलिस ने ड्रामा बन्द करवाया, पुलिस स्टेशन भी ले गए सबको, लेकिन कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं की। शान्तनु और उनके घरवालों के ज़ख्मों को मामूली बता छोड़ दिया गया और गुंडों को डॉक्टरी उपचार मुहैया करवाया गया(बिना किसी चोट के मरहम-पट्टी??)। डीएसपी तक शिकायत जाने पर पुलिस ने रिपोर्ट तो दर्ज कर ली लेकिन बड़ी तादाद में प्रत्यक्षदर्शियों के उपस्थित होने और उनके बयान के बावजूद आज पाँच दिन बाद तक भी कोई कार्यवाही नहीं की गई है, कोई गिरफ़्तारी नहीं हुई है। उधर दूसरी ओर गुंडों की धमकियाँ ज़ारी हैं जो अगली बार और गंभीर परिणामों की सूचक हैं।

एक रिपोर्ट में मैंने पढ़ा था कि भ्रष्टाचार के मामले में भारत विश्व में 71वें स्थान पर है। यदि वाकई ऐसा है तो कोई भी सोचकर ही काँप जाएगा कि विश्व का सबसे भ्रष्ट देश दक्षिण अफ़्रीका कैसा होगा और वहाँ की पुलिस कैसी होगी!!!

इसको पढ़ रहे और मीडिया(अख़बार, टीवी चैनल, रेडियो, आदि) से जुड़े हर व्यक्ति से अपील है कि इस खबर और चंडीगढ़ पुलिस वालों की गुंडों से मिलीभगत को अपने-२ प्रसार माध्यमों द्वारा सरेआम नग्न कर शान्तनु की सहायता करें। यहाँ कई ज़िन्दगियों का प्रश्न हैं जिनके जीवन को कभी भी यातना के अंधेरे निगल सकते हैं।

अन्य सभी से भी अपील है कि यदि कोई निजी तौर पर या प्रशासन आदि में अपने किसी संपर्क सूत्र द्वारा कुछ कर सकता है तो अवश्य करे।

Categories: corruption · politics · भ्रष्टाचार · राजनीति

12 responses so far ↓

  • dhurvirodhi // March 2, 2007 at 7:10 pm

    पुलिस इसे गुंडागर्दी नहीं मानती. शादी के बाद लड़की के परिवार वाले दहेज मांगने अथवा महिला उत्पीड़न के नाम पर कुछ भी कर सकते हैं. आप खैर मनाईये कि पुलिस ने शान्तनु गोयल एवं उनके परिवार वालों के ही खिलाफ़ मामला बना कर उन्हें जेल में नही डाला अर्थात पुलिस की सहानुभूति शान्तनु गोयल के परिवार वालों के साथ ही है.
    दोस्त, वाकई इस मामले में कानून अंधा ही है.

  • संजय बेंगाणी // March 2, 2007 at 7:23 pm

    बापरे..पहूँच वाले गुण्डे होंगे…
    अपना तो कोई सम्पर्क है नहीं. जरूरी हुआ तो आपकी तरह लिख सकते है.
    खबर सब तक पहूँचाने के लिए साधूवाद.

  • अनूप शुक्ला // March 3, 2007 at 12:08 am

    बड़ी दुखद घटना है। वैसे धुर विरोधी की बात सही है।

  • Tarun // March 3, 2007 at 12:17 am

    media ko amitabh, shahrukh, shilpa shetty aur indian cricket team se chutti mile tabhi na kuch likhe…..Police ke maamle me India me to waqai jungle raaj hai. Agar police itni jaldi harkat me aati to Nithari kand hi nahi hota.

    Mai to kehta hoon ek baar India ke ssare police walon ko Iraq bhej do

  • Vineeta Mishra // March 3, 2007 at 12:21 am

    This is the blog of Shantanu Goel himself and he has described more in detail what is written in this blog.
    http://iamhuman.blogspot.com/2007/03/desperate-call-for-help.html

    I am very scared to read this blog and very upset. I am reading hindi blogs for long and you all are heroes for me. This is request to all journalist bloggers like Neeraj Diwan ji and others to help Shantanu ji as soon as possible.
    You all have power I know that and you all can really take action against this atrocity soon.
    Please help Shantanu ji and his family and we need to do something soon because every minute is surely hard to pass for this family.

  • Divyabh // March 3, 2007 at 2:20 am

    यह मात्र अपने देश का ही हाल नहीं है इससे भी
    बुरी हालत में ठीक हम जैसे देश हैं लेकिन हमारे साथ समस्या यह है कि हम धैर्य रखना नहीं जानते
    घुड़दौड़ में जो लगे हैं…यहाँ का हर शक्स खुद को विद्वान हीं मानता है तो हाल सामने है…कोई देश बुरा नहीं होता चंद उदाहरणों को पकड़कर हम वृहत चर्चा नहीं कर सकते…लेकिन यह तो मेरी समझ है पर जो लिखा है वह निश्चित हीं कुछ के आँखों से तिनका निकाले का काम करे…।

  • ghughutibasuti // March 3, 2007 at 2:45 am

    होली की शुभकामनाएँ !
    जो हुआ वह गलत हुआ ।शोषण चाहे पुरुष करे या स्त्री या उसका परिवार हर हाल में गलत है। यदि नहीं बन रही थी तो तलाक लिया जा सकता है । फिर यह वहिशयानापन क्यों ?
    घुघूती बासूती

  • Shrish // March 3, 2007 at 10:57 am

    दहेज विरोधी कानूनों का दुरुपयोग है ये। रही बात पुलिस की तो वो अंग्रेजों ने भारतीय जनता का दमन करने को बनाई थी। अंग्रेज चले गए लेकिन पुलिस का मॉडल वही रहा। आज हालात यह हैं कि शरीफ आदमी तो पुलिस से डरता है और बदमाशों की उनसे मिलीभगत है।

  • Amit // March 3, 2007 at 1:27 pm

    प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद। धुरविरोधी जी की बात मुझे भी दुरुस्त लगी।

    विनिता जी, मैंने शान्तनु की ब्लॉग पोस्ट का लिंक अपनी पोस्ट में ऊपर दिया है।

    दहेज विरोधी कानूनों का दुरुपयोग है ये।

    हाँ भई है तो, लेकिन क्या कर सकते हो? आजकल बहुत सी कन्याओं और उनके घरवालों ने इसको अपना हथियार बना वर और उसके घरवालों का उत्पीड़न आरंभ कर दिया है। धमकी के रूप में नग्न तलवार होती है दहेज विरोधी कानून के रूप में अथवा महिला उत्पीड़न के नाम की, क्योंकि कानून अंधा है और उसका झुकाव महिलाओं की ओर है, वैसे भी यदि ऐसा मुकदमा किसी महिला मजिस्ट्रेट की अदालत में चला गया तो “कोढ़ में खाज” वाला मामला हो जाता है। न्यायाधीशों की पहले से ही एक धारणा बनी हुई होती है कि महिला निर्दोष है और पुरूष दोषी, अब ऐसे पक्षपात वाले मन के चलते कैसे न्याय हो सकता है!!

  • DR PRABHAT TANDON // March 4, 2007 at 9:41 pm

    दहेज विरोधी कानूनों का दुरुपयोग है ये।

    100% सच । यह अकेले शान्तनु की दुख भरी हकीकत नही है बल्कि ऐसे कई परिवारों मे भी देखा गया है। मेरे जानने वाले ऐसे ही एक परिवार की बहू ने जो थोडी मानसिक तुनकमिजाजी थी , अपने पति से झगडन्रे के बाद कीटनाशक खा कर आत्महत्या कर ली , बाद मे लडकी के घर वालों ने दहेज विरोधी कानून के अंतर्गत लडके ,उसकी बूढी माँ, पिता को बुरी तरह से फ़ँसा दिया।

  • अतुल शर्मा // March 6, 2007 at 6:00 pm

    हद है!

  • गरिमा // March 10, 2007 at 5:32 pm

    सच कहुँ तो मुझे हँसी आ रही है, बुरा ना माने आपके विचार या लेख पर नही बल्कि इसलिये कि मै जिस परिवेश मे पली हुँ वहाँ तो ये आम घटना है।
    क्या कहुँ क्या न कहुँ समझ मे नही आ रहा है।

    दहेज की जहाँ तक बात है मैने तो सिर्फ बहुओ को जलते ही देखा है कभी न्याय नही देखा, पुलिस का गुण्डा राज के तो क्या कहने…

    जब ऐसे हालात बचपन से ही देखे है तो मेरे मन मे आक्रोश और प्रतिशोध के सिवा कोई टिप्पणी नही है।

    शुक्रिया
    गरिमा

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