दुनिया मेरी नज़र से - world from my eyes!!

Entries from April 2007

मुक्तेश्वर - भाग १

April 25, 2007 · 8 Comments

खजुराहो और ओरछा घूमकर आए तकरीबन दो महीने हो गए थे, घुमक्कड़ कीड़ा कुलबुला रहा था। गुड फ़्राईडे वाले सप्ताहांत पर पुनः पहाड़ों में हो आने का कार्यक्रम बना, जगह चुनी गई अल्मोड़ा के थोड़ा आगे उपस्थित बिन्सर। ट्रेन की काठगोदाम तक की टिकटें करवा दी गई, अत्यधिक भीड़ होने के कारण वेटिंग लिस्ट में मिली। यहाँ पंगा हुआ, जाने की टिकट तो सही मिल गई, लेकिन हितेश ने रेलवे में अपने जिस जुगाड़ से टिकट करवाई थी उन सरकारी बाबू ने समझदारी दिखाते हुए सोचा कि रविवार को आठ नहीं सात तारीख है और इसलिए वापसी की उन्होंने सात तारीख की टिकट करवा दी!! अब वो टिकटें हमारे लिए बेकार, आठ तारीख की टिकटें उपलब्ध नहीं थी, इसलिए उनको तो कैन्सल करवाया और यही सोचा गया कि वापसी बस में ही करनी होगी। पर अभी बस कहाँ, कुमाऊँ मण्डल में पूछने पर पता चला कि उनके बिन्सर वाले यात्री निवास में जगह नहीं है, वहाँ मौजूद अन्य रहने के ठिकाने अपने बजट से थोड़ा ऊपर हो जाते और तम्बू आदि लगाने की वहाँ आज्ञा नहीं। दूसरी जगह के रूप में सितलाखेत सही लगा तो उसके बारे में जानकारी ली गई, लेकिन पुनः बात नहीं बनी। एकाध जगह और देखी लेकिन बात नहीं बनी, अपना पोपट होता नज़र आ रहा था, काठगोदाम के आजू-बाजू और जगह तलाशी जा रही थी वर्ना टिकटें कैन्सिल करवा कहीं और निकलना पड़ता। पुनः लान्सडौन वाली स्थिति हो गई थी। तभी नक्शे में मुक्तेश्वर दिखाई दिया और उसके बारे में पता किया, वहाँ के कुमाऊँ मण्डल के यात्री निवास में कठिनाई से एक चार बिस्तरों का फैमिली कक्ष और दो बिस्तरों का डीलक्स कक्ष मिला, कुछ भी हो अपना जुगाड़ तो हो गया।

गुरुवार 5 अप्रैल को रात्रि दस बजकर दस मिनट पर अपनी ट्रेन निज़ामुद्दीन लगनी थी और दस बजकर चालीस मिनट पर चल देनी थी। वेटिंग लिस्ट में होने के कारण अपने को बोगी और सीट नंबर स्टेशन पर ही पता चलने थे, वैसे सीटें तो हमें मिल गईं थी, पीएनाअर नंबर द्वारा चेक करवा लिए थे इंटरनेट पर। सभी को बोल दिया कि साढ़े नौ तक स्टेशन पहुँच जाएँ ताकि बोगी और सीट ढूँढने के लिए पर्याप्त समय हो। लेकिन जैसा हर यात्रा से पहले अपने साथ होता है, इस बार भी फ़ड्डा होना ही था। गुरुवार को सांय मैं रजौरी गार्डन स्थित सिटी स्क्वेयर मॉल पहुँचा, लाईफ़स्टाईल स्टोर में, एक टोपी लेनी थी और एक कमर पर बाँधने वाला पाउच भी लेना था। योगेश को भी टोपी लेनी थी इसलिए वहीं बुला लिया। हमारे पास अधिक समय नहीं था, सिर्फ़ एक घंटा क्योंकि योगेश साहब सात बजे पहुँचे थे। खैर, देखने का कार्यक्रम चालू हुआ, नाईकी की एक टोपी पसंद आई और उसे ले लिया गया, वेस्ट पाउच मैं पहले ही पसंद कर चुका था तो उसे भी ले लिया गया। लेकिन आदत से मजबूर अपने योगेश बाबू कपड़े देखने में लग गए। आठ बज गए और उनका कपड़े देखने का कार्यक्रम बदस्तूर चले जा रहा था, मैंने समय भी बताया लेकिन साहब पूरी निष्ठा से लगे हुए थे। इसी बीच मैंने एक टी-शर्ट अपने लिए पसंद कर ले ली लेकिन उनको कुछ पसंद नहीं आया। आखिरकार जब नौ बजने में दस मिनट रह गए तो उनको लगा कि हम लोग लेट हो गए हैं, बहुत लेट….. भागो!!! आनफानन भुगतान कर चैकाऊट किया गया और हम पार्किंग की ओर लपक लिए। मैंने मोटरसाईकिल दौड़ा दी, पहले योगेश को उनके घर छोड़ा और फिर अपने घर की ओर उड़ लिया। खौफ़नाक बात यह थी कि हम दोनों में से किसी का सामान पैक नहीं था, मेरा तो खैर सभी सामान बाहर निकला पड़ा था, सिर्फ़ बैग में ठूसना भर था, लेकिन योगेश का तो सामान निकला हुआ भी नहीं था। रास्ते में ही अपनी बहन को फोन लगा उन्होंने सामान निकालने को बोला था!!

घर के पास पहुँच मैंने सोचा कि पहले एक ऑटो पकड़ लिया जाए, उस समय मिलना वैसे ही मुश्किल होता है। लेकिन जिस ऑटो वाले से पूछो वो निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन जाने को तैयार ही नहीं। कठिनाई से एक ऑटो वाला मिला, घर पहुँच सामान बैग में जैसे तैसे डाला, कैमरा चैक किया तो अब वो नाराज़ हो गया, चल के न दे। उसे भी बैग में ऐसे ही ठूस लिया, सोचा बाद में देखेंगे, चलेगा तो ठीक नहीं तो देखी जाएगी, मोबाईल तो है ही!! ऑटो में बैठ योगेश के घर की ओर निकल लिया, ऑटो चालक को बोला कि दौड़ा ले बेशक फालतू पैसे ले ले, लेकिन दौड़ा ले!! योगेश को अपने गली-मोहल्ले से बाहर निकल मुख्य सड़क पर प्रतीक्षा रत पाया, लेकिन तभी ध्यान आया कि कुमाऊँ मण्डल के यात्री निवास में जो अपने कमरे बुक करवाए थे उसकी रसीद तो लाना भूल गया था। वैसे उसके बिना भी काम चल ही जाता लेकिन पंगा काहे लिया जाए!! नौ बजकर चालीस मिनट हो रहे थे, ऑटो को वापस मोड़ा गया, शुक्र की बात यह थी कि मेरा घर योगेश के घर से केवल 9-10 किलोमीटर के ही फासले पर है और वहीं याद आ गया, अधिक दूर जाने पर आता तो समस्या हो जाती। ऑटो वाले को बोला गया कि पैसों की टेन्शन न ले, भगा ले!! वापसी जाते हुए हितेश का योगेश को फोन आया यह पूछने के लिए कि कहाँ हैं। उनसे सिर्फ़ यही कहा कि रास्ते में हैं, कौन से रास्ते पर यह बोलना स्वास्थ्यवर्धक नहीं लग रहा था। ;) जल्द ही घर पहुँच रसीद कब्ज़े में की गई, माताजी ने सलाह दी कि सोच लूँ कि कुछ और तो नहीं छूटा है क्योंकि दोबारा वापिस आने का समय नहीं होगा। मैंने तुरंत सोचा और निर्णय लिया कि आवश्यक कुछ नहीं छूटा है।

अब हम स्टेशन की ओर बढ़ रहे थे, ऑटो वाला जितना तेज़ चला सकता था चला रहा था। लेकिन योगेश और मैं अब चर्चा कर रहे थे कि भई ट्रेन तो छूटी ही छूटी। सवा दस बज रहे थे और अभी भी फासला काफ़ी था। तो अब हम सोच रहे थे कि बस पकड़ हलद्वानी पहुँचना होगा और वहाँ बाकी साथियों को पकड़ना होगा। लेकिन भला हो ऑटो वाले का, साढ़े दस बजे उसने हमको निज़ामुद्दीन स्टेशन के बाहर तक पहुँचा दिया। तुरंत उसको पैसे दिए गए, जितने तय हुए थे उसके दोगुने आभार सहित दे दिए और हम दोनों अपने बैग कमर पर लाद स्टेशन के अंदर भाग लिए। आशा की किरण थी, ट्रेन नहीं छूटेगी। पाँच मिनट बाद हम सही प्लेटफ़ॉर्म पर अपनी बोगी के सामने मोन्टू और हितेश के रूबरू खड़े थे और हांफ़ रहे थे(योगेश का तो पता नहीं, मैं तो हांफ़ रहा था)!!! मोन्टू और हितेश के पूछने पर मैंने और योगेश ने एक दूसरे पर इल्ज़ाम लगाए, गलती दोनों की थी, लेकिन कुछ भी हो, ट्रेन छूटने से पहले पहुँच गए थे, यही बहुत बड़ी बात थी।

कुछ मिनट बाद ट्रेन चल पड़ी, हम पाँच लोगों को तीन बर्थ मिलीं थी, टिकट-चेकर बाबू ने और सीट देने में असमर्थता जताई। हमारी सीट के सामने वाली सीट पर मौजूद साहब से हमारी सैटिंग हुई, उनके पास दो टिकटें खाली थी क्योंकि उनके दो साथी नहीं आ पाए थे, उनको भुगतान कर वो सीटें हमने ले ली, मामला सैट, सबके पास सोने की जगह थी। मेरी सीट पर एक साहब बैठे थे, परिचय के आदान-प्रदान से पता चला की “द वीक” पत्रिका छापने वाली कंपनी के उत्तरांचल में सर्कुलेशन ऑफ़िसर हैं और दफ़्तर के कार्य से काठगोदाम तक जा रहे हैं, वहाँ से आगे जाने का उनका कार्यक्रम है। थोड़ी देर तक मेरी उनसे बातचीत होती रही, फिर उसके बाद शुभरात्रि कह वह टिकट वाले बाबू के पीछे हो लिए ताकि रात सोने के लिए कोई बर्थ मिल जाए, उन्होंने भी आनन-फ़ानन बिना आरक्षण के ट्रेन पकड़ी थी। हम सभी लोगों ने भी सोने की सोची, सुबह काठगोदाम से एक स्टेशन पहले हल्द्वानी उतरने का कार्यक्रम था क्योंकि दीपक का दोस्त जो चंडीगढ़ से आ रहा था उसे हल्द्वानी उतरने को बोला गया था। तो हम सभी अपनी-२ सीटों पर लंबे हो लिए, लेकिन मार पड़े मच्छरों को, एक मिनट चैन से लेटने नहीं दिया। मोन्टू तो पता नहीं कैसे पड़ा सो रहा था, मैं तो थोड़ी देर बाद उठकर बैठ गया और खिड़की खोल रात की कालिमा को चीरती शीतल चान्दनी और ठंडी हवा और मोबाईल में बजते शिवकुमार शर्मा के मधुर संगीत का आनंद लेने लगा।

अगले भाग में जारी …..

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अब मोबाईल से भगाएँ मच्छर

April 19, 2007 · 9 Comments

आजकल तकनीक काफ़ी तरक्की पर है, कब कौन सा गुल देखने को मिल जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। अभी कुछ दिन पहले ऐसे ही अपने सिम्बियन मोबाईल संबन्धी गूगल पर खोज कर रहा था कि यह एक मज़ेदार सॉफ़्टवेयर मिल गया जिसका नाम है मोस्कीटो नेट(mosquito net) यानि कि मच्छरदानी। अब यह सॉफ़्टवेयर मज़ेदार इसलिए नहीं है कि इसका नाम बढ़िया है बल्कि इसलिए है क्योंकि इसका काम रोचक है। यह आपके सिम्बियन फोन को मच्छर भगाने की मशीन बना देता है। कैसे?? बहुत ही सीधा सा वैज्ञानिक फ़न्डा है।

ड्रेगन फ़्लाई और चमगादड़ मच्छरों के पैदाईशी शत्रु होते हैं। यह सॉफ़्टवेयर फोन के स्पीकर द्वारा दोनों ही की अल्ट्रासोनिक ध्वनि निकाल सकता है जिसे सुन मच्छर भाग खड़े होते हैं। इतना ही नहीं, यह सॉफ़्टवेयर नर मच्छर की भी ध्वनि निकाल सकता है। अब आप कदाचित्‌ पूछें कि नर मच्छर की ध्वनि से क्या लाभ? तो(सॉफ़्टवेयर की वेबसाइट के अनुसार) बात ये है कि यह नर मच्छर की 12.3 किलो हर्ड़्ज पर ध्वनि निकालता है। ऐसी ध्वनी नर मच्छर मादा को आकर्षित करने के लिए निकालते हैं। नर के साथ संसर्ग द्वारा गर्भवती होने के बाद यह ध्वनि मादा को बहुत अप्रिय हो जाती है। और यह वैज्ञानिक सिद्धांत है कि खून गर्भवती मादा मच्छर ही पीती है। तो इस ध्वनि को सुनने से खून पीने वाली मादा मच्छर आसपास नर मच्छर की उपस्थिति जान दूर भागेगी, यानि कि किला फ़तह!!! :D

सॉफ़्टवेयर की वेबसाइट पर मौजूद इसके प्रयोगकर्ताओं के अनुभव अनुसार यह तीसरा तरीका वाकई कारगर है। तो फिर सोच क्या रहे हैं, यदि आपके पास सिम्बियन फोन है तो धूप-बत्ती आदि का प्रयोग बंद कर अपने नथुनों को राहत दीजिए और इस सॉफ़्टवेयर से लाभ उठाईये। अधिक जानकारी के लिए सॉफ़्टवेयर की वेबसाइट यहाँ देखें। :)

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खजुराहो और ओरछा - भाग २

April 18, 2007 · 8 Comments

पिछले भाग से जारी …..


(खजुराहो के पूर्वी भाग में स्थित जैन मंदिर)


(शिल्प कला के उत्कृष्ट नमूने)


(दूल्हा देव मंदिर)


(जावारी मंदिर)


(राम राजा मंदिर - ओरछा के इस मंदिर में राम राजा के रूप में पूजे जाते हैं, भगवान के रूप में नहीं।)


(सुबह सवेरे बेतवा नदी के किनारे)


(इस तस्वीर को लेने के लिए काफ़ी मशक्कत की, नदी के बीचो-बीच चिकने पत्थरों पर से होकर जाना पड़ा। एक अमेरिकन मिला था जाने से पहले जो कि फ़िसलकर गिरते-२ बचा था, उसी ने बताया कि जहाँ वह फ़िसला था वहाँ से अच्छा दृश्य दिखाई दे रहा है।)


(ओरछा का किला)


(जहाँगीर महल - माना जाता है कि ओरछा के किले में उपस्थित इस भव्य महल को ओरछा के राजा वीर सिंह देव प्रथम ने शहंशाह जहाँगीर के स्वागत में बनवाया था।)


(जहाँगीर महल)


(जहाँगीर महल के पीछे से बहती बेतवा नदी)


(ओरछा किले में उपस्थित राजा महल के एक कक्ष की दीवारों पर मौजूद चित्रकारी)


(राजा महल से दिखता ओरछा शहर)

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फैलता हुआ युद्धक्षेत्र

April 10, 2007 · 16 Comments

इंटरनेट पर सबसे अधिक प्रयोग होने वाला पोर्टल बनने की होड़ में सबसे आगे हैं तीन महारथी; याहू, गूगल और एमएसएन। अभी तक इनका युद्धक्षेत्र कंप्यूटरों तक ही सीमित था परन्तु नित नई तकनीक वाले मोबाईल फोनों के बाज़ार में उतरने और प्रयोगकर्ताओं के मोबाईल सेवाओं के प्रति जागृत होने से अब इस युद्धक्षेत्र का दायरा बढ़ रहा है और अब युद्ध मोबाईल फोनों पर भी होगा।

तकरीबन एक वर्ष पहले याहू ने Y!Go(याहू गो) बाज़ार में उतारा, इसका मोबाईल सॉफ़्टवेयर एकदम मुफ़्त और उसमें उसने ईमेल, चैट आदि सेवाएँ उपलब्ध करा लोगों को याहू सेवाएँ उनके मोबाईल फोन पर ही दे डालीं। अब यह सॉफ़्टवेयर बीटा में था, लोगों की इसके प्रति मिली-जुली प्रतिक्रिया थी, लेकिन कुछ तो अपनी विकृत मानसिकता के चलते खामखा इसके पीछे पड़ गए, सॉफ़्टवेयर की गलतियाँ कम गिनाई उसके निर्माताओं की अधिक। :roll:

Y!Go की पहली स्क्रीन बहरहाल, मैंने अपना पहला सिम्बियन एस60 फोन(नोकिआ एन 70 म्यूज़िक एडिशन) पिछले दिसम्बर में लिया जिसमें याहू गो पहले से डला हुआ आया था। कुछ क्लिक में वह इंस्टॉल हुआ और मैंने पहली बार जब उसे चलाया तो प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाया। याहू मेसेन्जर तो एकदम बढ़िया चल रहा था और ईमेल भी चका-चक चल रही थी। लेकिन एक-दो बार चलाने के बाद मैं उसको कुछ समय तक दोबारा प्रयोग नहीं कर पाया और अब जब हाल ही में कुछ दिन पहले उसे प्रयोग करने की कोशिश की तो उसे मेरा मोबाईल ऑपरेटर पसंद नहीं आया(पिछली बार मैंने दूसरे फोन से चिप निकाल चलाई थी क्योंकि मेरे रेगुलर नंबर पर जीपीआरएस सेवा उपलब्ध नहीं थी)। तो नए वर्जन को ढूँढने की गरज से मैं पहुँचा याहू गो की वेबसाईट पर तो पता चला कि सीमित संख्या में 2.0 गामा वर्जन(यह भी अभी टैस्ट वर्जन है) उपलब्ध है। Y!Go पर दिखता नई दिल्ली का मौजूदा तापमान अपने मोबाईल पर इसको डाऊनलोड करने के लिए लिंक भिजवाया और बिना किसी दिक्कत के सॉफ़्टवेयर डाऊनलोड हो गया। जावा में बने इस सॉफ़्टवेयर को तुरंत इंस्टॉल कर चालू किया।

चालू होते ही इसने जीपीआरएस का एक्सेस प्वायंट चुनने को कहा और उसके बाद यह पूर्ण रूप से लोड हो गया। पहली नज़र में ही इसके इंटरफेस ने प्रभावित किया, इसमें अलग-२ सेवाओं को चुनने के लिए स्क्रीन पर नीचे एक पट्टी नज़र आती है जिसमें दाएँ-बाएँ स्क्रॉल कर अलग-२ सेवाओं को चुना जा सकता है। अभी याहू गो में सर्च, ईमेल, मौसम, खेल समाचार, वित्त समाचार, नक्शे, समाचार, मनोरंजन की सेवाएँ हैं। साथ ही इसमें प्रसिद्ध फ़्लिकर सेवा को भी जोड़ दिया है। Y!Go पर दिखते खेल समाचार पर जिस सेवा की कमी लोगों को सबसे अधिक खलेगी(मुझे भी) वह है चैट सुविधा, जिसको पाने के लिए मैं समझता हूँ अधिकतर लोग(मैं भी) अन्य नगण्य सेवाओं जैसे वित्त समाचार और खेल समाचार आदि का भी त्याग करने को तैयार हो जाएँगे। ;) इसकी ईमेल सुविधा साधारण है लेकिन कंप्यूटर से दूर आवश्यक ईमेल पढ़ने और उनका उत्तर आदि देने के लिए बहुत अच्छी है, खासतौर से जब आप यात्रा कर रहे हैं। खेल और अन्य समाचार आपको दीन-दुनिया से बेखबर नहीं होने देंगे चाहे आप कहीं भी हों(यदि आपका मोबाईल नेटवर्क पकड़ रहा है तो)। और तो और, यदि आपने अपने मोबाईल फोन के कैमरे से कोई फोटो खींची है तो उसे भी तुरंत आप अपने फ़्लिकर पर डाल सकते हैं और अपनी पिछली तस्वीरों पर लोगों द्वारा छोड़ी गई टिप्पणियाँ आदि भी देख सकते हैं। चूंकि यह सेवा और सॉफ़्टवेयर अभी टैस्टिंग के दौर से गुजर रहे हैं, मैं समझता हूँ कि आने वाले समय में इनमें और अधिक सुधार आएगा।

मोबाईल पर जीमेल का इन्बॉक्स लेकिन कुछ लोग कदाचित्‌ सोच रहे होंगे कि गूगल कहाँ गया?? टेन्शन नहीं लेने का, सबसे बड़ा सर्चइन्जन अधिक पीछे नहीं है। अभी हाल ही में गूगल वालों ने भी याहू की तरह अपना पोर्टल बाज़ार में उतार दिया है और थोड़े समय पहले उन्होंने जीमेल के लिए मोबाईल सॉफ़्टवेयर भी निकाला था। बस अपने मोबाईल के ब्राऊज़र में gmail.com/app पते पर जाएँ और यदि आपके मोबाईल को गूगल सपोर्ट करता है तो आपको सॉफ़्टवेयर डाऊनलोड करने दिया जाएगा। Gmail app's options सॉफ़्टवेयर इंस्टॉल करने के बाद आप उसके द्वारा अपने जीमेल में लॉग-इन कर सकते हैं और जावा में बने इस सॉफ़्टवेयर में जीमेल की पहचान, एक साफ़ सुथरा और हल्का इंटरफेस लोड हो जाएगा जो आपको आपका इन्बॉक्स तो दिखाता ही है साथ ही आपको लेबल आदि द्वारा अपनी ईमेल छांटने भी देता है। ईमेल लिखने वाली स्क्रीन साज-सज्जा की दृष्टि से न्यूनतम है जो आपको तुरत-फुरत ईमेल लिख भेजने देती है। यह सॉफ़्टवेयर एकदम साधारण है, इसमें कोई अधिक साज-सज्जा नहीं है लेकिन एक लाभ यह है कि यह सुस्त नहीं है और अनावश्यक बाइट्स डाऊनलोड नहीं करता जो कि उन लोगों के लिए बहुत आवश्यक है जो जीपीआरएस के लिए प्रति किलोबाइट पैसे देते हैं। वैसे गूगल के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी रखने वाला यह अनुमान लगा सकता है कि यह सॉफ़्टवेयर भविष्य में अधिक सुविधाओं और फ़ीचर के साथ आएगा और याहू गो जैसा सुईट बन जाएगा, गूगल वाले शुरुआत साधारण करते हैं लेकिन फिर छक्के मारने में पीछे नहीं रहते!! ;) लेकिन एक दिक्कत जो अपने हिन्दी चिट्ठाकारों को आएगी वह यह कि हिन्दी में लिखी गई ईमेल कदाचित्‌ नहीं पढ़ पाएँगे क्योंकि यह मोबाईल और उस पर डले ऑपरेटिंग सिस्टम पर निर्भर करता है कि वह यूनिकोड दिखाएगा कि नहीं। फिलहाल मेरा सिम्बियन एस60 द्वितीय वर्जन वाला मोबाईल यूनिकोड हिन्दी नहीं दिखाता।

एमएसएन को अभी इस फैलते युद्धक्षेत्र में कदम रखना है। जितना मुझे पता है उसके अनुसार अभी वह विन्डोज़ मोबाइल तक ही सीमित है परन्तु यदि उसे जीतने के लिए खेलना है तो एक से अधिक प्लेटफ़ॉर्म सपोर्ट करने होंगे जिनमें सिम्बियन को नज़रांदाज़ करना उसके लिए हानिकारक होगा। वैसे कुछ भी हो, इस मुकाबले को कोई भी जीते,उपभोगता तो सदैव ही विजेता रहेगा, प्रतियोगिता ज़िन्दाबाद!! :D

(इस लेख को अंग्रेज़ी में यहाँ पढ़ें)

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खजुराहो और ओरछा - भाग १

April 3, 2007 · 10 Comments

15 फ़रवरी को दिल्ली से निकले और 16 फ़रवरी को खजुराहो पहुँच गए। इस बार यात्रा पर निकले सिर्फ़ मैं और योगेश, दिल्ली से झांसी और झांसी से वापस दिल्ली, बस ये दो ट्रेन की टिकटें पहले से आरक्षित करवाई थीं, इसके अतिरिक्त कहीं कोई बुकिंग नहीं, हम दोनों अपने-२ बैग उठाए चल दिए थे 3 दिन वाले सप्ताहांत की यात्रा पर, कार्यक्रम था खजुराहो और फिर ओरछा घूमने का।

यात्रा का विवरण लिखना हो नहीं पा रहा है, इसलिए प्रस्तुत हैं कुछ तस्वीरें।


(लक्षमण मंदिर)


(कन्द्रिया महादेव)


(मंगतेश्वर महादेव - खजुराहो के प्राचीन हिन्दु मंदिरों में से केवल यह अभी भी कार्यरत है जहाँ भक्तजन पूजा करते हैं। यहाँ पुजारी आपकी पूजा नहीं करवाते, भक्त स्वयं प्रसाद चढ़ा पूजा करते हैं। 16 फ़रवरी को शिवरात्रि थी जब हम लोग यहाँ गए थे।)


(विश्वनाथ मंदिर - खजुराहो के सबसे सुन्दर मंदिरों में से एक)


(विश्वनाथ मंदिर की बाहरी दीवारों पर काम कला का चित्रण)


(कन्द्रिया महादेव और जगदम्बी मंदिर)


(चित्रगुप्त मंदिर का द्वार - यह सूर्य का मंदिर है जिसमें सूर्य को अपने सात अश्वों वाले रथ पर दिखाया गया है)


(जगदम्बी मंदिर के बाहर एक सिंह की प्रतिमा)


(जगदम्बी मंदिर की बाहरी दीवारों पर काम कला का चित्रण)


(योगेश और पृष्ठभूमि में जगदम्बी मंदिर)


(कन्द्रिया महादेव)

अगले भाग में जारी …..

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दूषित मानसिकता तथा पूर्वाग्रह

April 1, 2007 · 15 Comments

लोगों की मानसिकता कितनी दूषित है और कैसे वे पूर्वाग्रहों से ग्रसित हैं, इसके अनेकों उदाहरण मिल जाएँगे। इधर मैंने सोचा कि मोटापा कुछ अधिक बढ़ गया है, सुबह सवेरे की सैर से स्वास्थ्य लाभ किया जाए। यह सोच मैं सैर पर जाने के लिए कल सांय अडीडास के हल्के और आरामदायक जूते लेकर आया और आज सवेरे छह बजे के शुभ मुहूर्त में उनको पहन अपने घर के पास के डिस्ट्रिक्ट पार्क की ओर चल दिया। अब पार्क इतना बड़ा है कि इसका एक वृत्ताकार पूर्ण चक्कर एक मील(1.61 किलोमीटर) से कुछ मीटर अधिक है। मैंने सोचा कि इसके 3-4 चक्कर लगा कर घर चलेंगे, शुरुआत के लिए इतना काफ़ी है। :)

तो अपन शुरु हो गए। 2 परिक्रमाएँ पूर्ण होने के बाद देखा कि प्रवेशद्वार से होती हुई एक ठीक-ठाक नैन-नक्श वाली कन्या आई और मेरे आगे हो ली, मतलब मेरे आगे-२ चलने लगी। अब वह कन्या मेरे से तकरीबन 2 मीटर आगे चल रही थी और गति मेरे जितनी ही थी। मैंने आगे निकलने का कोई प्रयास नहीं किया और अपनी गति से चलता रहा। सहसा मेरे पीछे से तकरीबन 55-60 की आयु वाले एक अंकल आए और मेरे और कन्या के बीच में चलने लगे। फिर वे कन्या से आगे निकले तो धीरे-२ निकले और कन्या के अग्र भाग को निरंतर देखते हुए निकले, मैंने मन ही मन में उनको पता नहीं कितनी गालियाँ दीं!! मार्ग पर हमारे विपरीत दिशा से आने वाले अंकल लोग अच्छे से कन्या को देखते हुए निकलते और फिर मुझे अजीब सी निगाहों से देखते हुए जाते। और जो आंटियाँ आती, उनकी तो पूछो ही मत। वे मुझे ऐसे देखते हुए जाती जैसे मैं पता नहीं कोई विकृतकामी शिकारी हूँ जो कि कदाचित्‌ कन्या का पीछा कर रहा हूँ। :(

इसी तरह 3 परिक्रमाएँ पूर्ण हुई और मैं 5 मील चलने के पश्चात वापस घर की ओर हो लिया। पार्क में और वापसी में भी मैं यही सोच रहा था कि उन बुड्ढे-ठुड्ढे अंकलों को क्या कुछ और नहीं दिखता और क्या वे आंटियाँ कुछ और नहीं सोच सकतीं!!

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