दुनिया मेरी नज़र से - world from my eyes!!

मुक्तेश्वर - भाग २

June 2, 2007 · 7 Comments

पिछले भाग से आगे …..

सारी रात शर्मा जी का संगीत सुनते-२ बीती, जब भी नींद आने लगती, एरिस के दूत मच्छर कान के पास अपनी म्यूज़िकल नाइट का आयोजन करने लगते। खैर, किसी तरह रात्रि बीती। सुबह हलद्वानी पर गाड़ी रूकी तो हम लोग भी उतर लिए। बस अड्डा रेलवे स्टेशन से लगभग एक किलोमीटर ही दूर है, लेकिन पता न होने के कारण ऑटो वाले ने हम लोगों से चालीस रूपए ऐंठ लिए। बस अड्डे पर पहुँच सभी ने थोड़ी पेट पूजा की, तकरीबन एक घंटा प्रतीक्षा के बाद दीपक का दोस्त मनोज भी चण्डीगढ़ से पहुँच गया। अब आगे जाने के लिए हम लोगों को एक गाड़ी चाहिए थी, मोलभाव के बाद आठ सौ रूपए प्रतिदिन(डीज़ल का खर्च अलग) पर एक टाटा सूमो मिल गई और हम लोग अपने रास्ते लग लिए।

कुछ देर बाद हम लोग भीमताल पहुँचे। यहाँ रूक सभी ने कुछ तस्वीरें ली। अब मेरा कैमरा तो घर से निकलते समय नाराज़ हो गया था, लेकिन इस बार चल गया, कदाचित्‌ प्रसन्न था कि उसको किसी बेकार जगह की तस्वीर नहीं लेनी पड़ेगी!! ;)

लगभग दस बजे हम लोग मुक्तेश्वर स्थित कुमाउँ मण्डल विकास निगम के यात्री निवास पहुँच गए। वहाँ से सामने हिमालय की पहाड़ियों का बहुत ही सुन्दर नज़ारा था।

यात्री निवास वालों की पानी की टंकी खाली थी। पास ही एक बड़ी टंकी थी जिसमें ऊपर चोटी से पानी की एक धार बहकर आती थी और टंकी में पानी एकत्र होता था। आसपास वालों के लिए पानी का एक वही स्रोत है। उसी टंकी में से हम लोगों ने थोड़ा बर्फ़ीला पानी लिया और हर गंगे का उच्चारण किया!! ;) पहले दिन का कोई एजेन्डा नहीं था, इसलिए पेट पूजा कर हम सभी पास के जंगली मार्ग पर पैदल ही पाँच किलोमीटर दूर सीतला गाँव की ओर चल दिए। जंगल में लाल रंग के अति सुन्दर फूलों के कई पेड़ थे।

जंगल से होकर गुज़रते इस मार्ग को देखने से ऐसा लग रहा था कि मानो नज़ारा किसी परी-कथा से कोई दृश्य जीवित हो उठा हो।

थोड़ी दूर पर एक खंडहर इमारत दिखाई पड़ी तो वहाँ थोड़ी देर रूके, तस्वीरें आदि ली गई और फिर अपनी राह लग लिए। तकरीबन डेढ़-दो घंटे में सीतला पहुँच गए। वहाँ सीतला एस्टेट(एक पुरानी हवेली, अब एक छोटा हेरिटेज होटल है) के बाजू में मौजूद दुकान पर शीतल पेय आदि पिया गया, थोड़ी देर बैठे और दुकान पर बैठे बुजुर्गवार से बात की गई। उसके बाद वापस मुक्तेश्वर की ओर चल पड़े। मन में आया की सीतला एस्टेट भी देख ली जाए तो मैं, हितेश और मोन्टू उसको अंदर से देखने गए। वहाँ मौजूद कर्मचारी ने बताया कि इसकी बुकिंग दिल्ली से होती है। वहाँ दो सुइट और एक कमरा है जिनका एक दिन का किराया 4500, 4000 और 3500 रूपए है। 4500 और 4000 रूपए वाले दो सुइट हैं, जो कि बहुत अच्छे बने हुए हैं और 3500 रूपए वाला कमरा है। सभी की सजावट पुराने ज़माने जैसी राजसी प्रकार की है, और किराए में ही आपका तीन समय का भोजन और दो समय की चाय भी सम्मिलित है। मुझे 4000 रूपए वाला सुइट सबसे अधिक पसंद आया क्योंकि उसका वादी की ओर रूख है और बिस्तर के बिलकुल सामने एक बहुत बड़ी पारदर्शी शीशे की खिड़की है जिससे पूरी वादी का लुभावना नज़ारा होता है। समझने वाले समझ सकते हैं कि यहाँ ठहरने का फायदा कब है!! ;)

बहरहाल, एस्टेट देखने के बाद हम लोग मुक्तेश्वर के रास्ते पुनः लग लिए। शाम हो आई थी, सूर्यास्त होने ही वाला था। तकरीबन ढाई घंटे में हम लोग वापस पहुँच गए। जाते समय तो केवल एक पतली सी टी-शर्ट डाल रखी थी क्योंकि बहुत गर्मी लग रही थी, लेकिन अब वापस ऊपर मुक्तेश्वर पहुँचे के बाद ठंड लगनी आरंभ हो गई थी, पसीना सूख रहा था, सूर्यास्त हो गया था!!

वापस पहुँच सभी बिस्तर पर पड़ गए, काफी थकान हो रही थी। हितेश ने एक बाल्टी गर्म पानी मंगवा लिया और आधा पानी मेरे लिए छोड़ बाल्टी में पैर डाल उनकी सिकाई करने लगा। इधर सांय सूर्यास्त से पहले मैं और मनोज पास के बाज़ार में जाकर नाश्ते का सामान ले आए थे। तो अंधेरा होते ही हमारे कमरे में महफ़िल जमी, मैं, योगेश, मनोज और हितेश समय व्यतीत करने के लिए ताश खेलने लगे। कोई नया खेल था जो मैंने कभी पहले खेला नहीं था, मनोज भी इसमें नया था, हितेश और योगेश पुराने खिलाड़ी हैं, लेकिन मज़ा खूब आया इसमे कोई शक नहीं।

अगले दिन के बारे में निर्णय हुआ कि सुबहे सवेरे अल्मोड़ा के आगे कोसी और कटारमल की ओर निकल पड़ेंगे।

अगले भाग में जारी …..

Categories: asia · himalayas · india · kumaon · memories · uttaranchal · wanderer · उत्तरांचल · एशिया · कुमाऊँ · घुमक्कड़ · भारत · यादें · हिमालय

7 responses so far ↓

  • RC Mishra // June 2, 2007 at 2:12 am

    बड़े डिटेल मे लिखे हो, बिल्कुल सैर करा दी, बैठे बैठे, और वाकयी, कैमरे को खुश होना चाहिये था, इतने सुन्दर दृश्य जो थे लेन्स के सामने। बहुत अच्छी तस्वीरें हैं।

  • समीर लाल // June 2, 2007 at 7:03 am

    समझने वाले समझ सकते हैं कि यहाँ ठहरने का फायदा कब है!! -समझ गये :)

    –बहुत ही जीवंत वृतांत है. पढ़कर आनन्द आया और तस्वीरें तो गजब की प्रोफेशनल हैं भाई!! बधाई..अगले अंक का इंतजार है.

  • पंकज बेंगाणी // June 2, 2007 at 9:27 am

    बहुत अच्छे…

    भई आपका यह सुन्दर वृतांत पढकर दिल अब पहाडो की सैर करने को उछलने लगा है… अब तो जाना ही पडेगा… :)

  • Amit // June 2, 2007 at 3:15 pm

    सभी का धन्यवाद। :)

    भई आपका यह सुन्दर वृतांत पढकर दिल अब पहाडो की सैर करने को उछलने लगा है… अब तो जाना ही पडेगा…

    तो चले चलो भई, जुलाई का पिरोगराम है। :)

  • श्रीश शर्मा // June 3, 2007 at 6:45 am

    वाह अमित भाई तुम्हारी सैर के बहाने अपनी यादें भी ताजा होती रहती हैं। :)

  • mohinder // June 7, 2007 at 2:09 pm

    लेख पढते पढते ऐसा लगा जैसे मैं स्वयं यात्रा पर हूं और यही सफ़ल लेखन का प्रभाव है… लिखते रहिये

  • Amit // June 8, 2007 at 1:26 am

    धन्यवाद श्रीश बाबू और मोहिन्दर जी।

Leave a Comment