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तुन्गनाथ - भाग २

June 22, 2007 · 6 Comments

पिछले भाग से आगे …..

समीर जी ने पूछा कि नए स्लीपिंग बैग में ठंड झेल पाए कि नहीं, तो उसके संबन्ध में भी एक रोचक वाक्या हुआ। अब हुआ यूँ कि अपन नए स्लीपिंग बैग का कुछ अधिक ही भाव खा गए, और शुक्रवार की रात को केवल एक पतली सी टी-शर्ट और ट्रैक पैन्ट पहने ही घुस गए उसमें। थोड़ी देर बाद शरीर के ऊपरी भाग में ठंड सी लगने लगी, क्योंकि ऊपर से स्लीपिंग बैग खुला था!! जैकेट आदि पहन इसलिए नहीं सोया था कि सोचा स्लीपिंग बैग ही काफ़ी रहेगा!! ;) तो गलती में कुछ सुधार करते हुए जैकेट को ओढ़ लिया और उसके बाद ठंड नहीं लगी!! :) शनिवार की रात जो ऊपर तुन्गनाथ पर बिताई, तब तक समझ आ गई थी, इसलिए जैकेट और जुराब पहन के सोया था, बहुत गर्म सा रहा और अच्छी नींद आई, रविवार सुबह जल्दी ही उठ गया(बाकी सब मेरे से पहले उठ चुके थे) और अपने को बहुत तरोताज़ा महसूस किया। :D


( हमारे दो तंबुओं के सामने प्रसन्नचित माइक। )
चोपता में शुक्रवार की रात को एक अजब वाक्या हुआ था। हम तकरीबन दस बजे अपने-२ तंबुओ में अपने स्लीपिंग बैग बिछा सो गए थे। ग्यारह-बारह के आसपास रमित अचानक उठ गया, पूछने पर बोला कि बाहर तंबू के पास कोई घूम रहा है। ध्यान से सुनने पर कदमों की आहट सुनाई दी, टॉर्च आदि जला के ऊँची आवाज़ में पूछा भी गया कि कौन है लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला और आवाज़ आनी बन्द हो गई। हम सो गए, थोड़ी देर बाद पुनः आवाज़ आने लगी और रमित फिर जाग गया और साथ ही मैं भी। बाहर झांक के भी देख लिया लेकिन कोई दिखाई नहीं दिया, बड़ी टॉर्च की रोशनी भी किसी काम की नहीं थी, घुप्प अंधेरा था। अंदर आकर पुनः सो गए, मन में अजीब से ख्याल आ रहे थे कि कोई वाकई में तो नहीं है, यदि है तो अगर कोई चोर हुआ तो तम्बू को चाकू आदि से काट सामान लेकर चलता बनेगा!! किसी तरह सुबह हुई, साढ़े चार के करीब रोशनी हुई और रमित चिल्ला पड़ा कि किस पागल ने टॉर्च जलाई है, उसको सोने दिया जाए!! ;) बहरहाल, सुबह उठ हम लोगों को पता चला कि रात कोई नहीं था, हवा वेग से चल रही थी और तम्बू से तकराने के कारण आवाज़ हो रही थी!! ;)


( सुबह इतना बढ़िया नज़ारा दिखाई दिया, मन प्रसन्न हो गया। )


( ऊपर तुन्गनाथ तक पहुँचते ही ओलों की बरसात हो गई, इतने ओले गिरे कि बरसात थमने के बाद ऐसा लग रहा था कि बर्फ़ गिरी हो। ओले पड़ने के कारण हमारा कार्यक्रम बिगड़ गया, तुन्गनाथ पर अब तम्बू नहीं लगा सकते थे, इसलिए एक धर्मशाला में दो बड़े कमरे लिए। )


( रविवार की सुबह, जिस दिन हमको वापस लौटना था। )

इस बार तुन्गनाथ की चढ़ाई में मेरा उतना बुरा हाल नहीं हुआ जितना पिछली बार हुआ था। इस बार स्निग्धा साथ नहीं थी कि हौसला दे साथ चले, इस बार अपने आप करना था और किया। पिछली बार के मुकाबले इस बार चढ़ने में एक घंटा कम लिया, उतना कठिन नहीं लगा जितना पिछली बार लगा था(क्योंकि इस बार शर्मा जी और वनराज भाटिया साहब को सुनते हुए चढ़ाई की)। उतरते समय भी पिछली बार के मुकाबले एक घंटा कम लिया, आधा रास्ता सुबोश्री से बात करते हुए कटा और आधा रास्ता शर्मा जी को सुनते और खूबसूरत नज़ारों को निहारते हुए। :)

इस यात्रा के दौरान लिए गए सभी चित्र यहाँ देख सकते हैं।

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6 responses so far ↓

  • Sanjeet Tripathi // June 22, 2007 at 10:53 am

    शुक्रिया विवरण के लिए!

    फोटो मस्त , शानदार!

  • समीर लाल // June 22, 2007 at 6:19 pm

    रोचक विवरण. हम तो स्लिपिंग बैग में घुस जायें तो जिप ही नहीं बंद होती. :)

  • Amit // June 23, 2007 at 1:15 am

    धन्यवाद संजीत जी और समीर जी।

    हम तो स्लिपिंग बैग में घुस जायें तो जिप ही नहीं बंद होती

    हा हा हा, होता है। मेरा पहला स्लीपिंग बैग लोकल माल है, इसलिए एक्स्ट्रा लार्ज साइज़ में मिल गया था, ला-फूमा वाला जो लिया वो जाँच परख के लिया था कि उसमें समा के ज़िप बन्द होगी कि नहीं!! ;)

  • Shrish // June 25, 2007 at 10:04 pm

    वाह वाह क्या फोटुएं लाए यार, आपकी फोटुएं देखकर तो एक बार इस जगह जरुर जाना पड़ेगा। :)

  • Shailesh // October 21, 2007 at 11:13 am

    Hi..
    I am from the same place.. i.e. you might have heard of Guptkashi while touring Tungnath..
    I am staying here in Bangalore.. but dont get time to go my home town so frequently.. But these pics remind me about my childhood.. and about the sweet time i spent there,,,,
    Thanks a lot of sharing all these…

  • Amit // October 22, 2007 at 10:00 pm

    जी हाँ शैलेश जी, मैंने “गुप्तकाशी” के बारे में सुना है। पिछली बार जब मैं तुन्गनाथ गया था तब उखीमठ में मौजूद गढ़वाल मण्डल विकास निगम के यात्री निवास में रूका था और वही सामने से दूसरी पहाड़ी पर गुप्तकाशी देखी थी। :)

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