दुनिया मेरी नज़र से - world from my eyes!!

फ्री की मोबाइल सेवा ……

August 5, 2007 · 7 Comments

….. क्या आप भुगतने के लिए तैयार हैं??

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भुगतना? हाँ जी भुगतना, अब ऐसे ही तो फ्री में मोबाइल से फुनवा लगा गाँव में अम्मा से या बगल के ऑफिस में, अपने जगमग एलसीडी(LCD) स्क्रीन के सामने बैठी, रीता से गप्पें तो नहीं ना मार सकोगे ना!! तो उसके लिए का भुगतना होगा? अरे भई ज्यादा कछु नहीं, सिर्फ़ कुछ विज्ञापन झेलने होंगे। नहीं समझे? लो, कल्लो बात, कौन से झाड़ में घुसे रहते हो भई?? ऊ ससुरा गुगलवा ने अपने फुनवा का प्रोटोटाइप(prototype) बना लिया है जिसको ऊ एक बरस में बाज़ार में उतार सकता है, फिलहाल अमरीका के मोबाइल सेवा प्रदाताओं और मोबाइल फुनवा बनाने वालों के साथ सांठ-गाँठ करने में लगा है ताकि मोबाइल निर्माता उसके अनुसार फोन बनाएँ और सेवा प्रदाता उसके अनुसार सेवा प्रदान करें।

बाकी कुछ हो न हो, लेकिन मजे की बात ई रहेगी कि मोबाइल सेवा प्रदाता क्या सोचते हैं इस बारे में, क्योंकि वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक गुगलवा के साथ ई सैटिंग सेवा प्रदाताओं के लिए दो-धारी तलवार है; गुगलवा के साथ सैटिंग का लाभ ई हो सकता है कि अधिक से अधिक लोग डाटा प्लान लेंगें जिनमें पैसा बनेगा क्योंकि कॉल वाली सेवा में वैसे भी अधिक पैसा नहीं रहा है तो वहीं दूसरी ओर ई डर भी है कि मोबाइल विज्ञापन की डॉलर कमाऊ ज़मीन उनके हाथ से जाती रहेगी!!

अब यदि गुगलवा अपनी इस नई सेवा को बाज़ार में लाता है तो मोबाइल बाज़ार में आने वाली दूसरी ऐसी कंपनी होगी जिसका इस बाज़ार से पहले कोई लेना-देना नहीं था। काहे? अरे पहली ऊ ससुरी सेब कंपनी है ना जो मैंफोन….. यानि कि आईफोन(iphone) निकाले रही, बेशक खामखा का डॉलर बर्बाद शोशा ही सही लेकिन लोग तो पिले रहे ना ऊ का फुनवा ले की खातिर। अब सेब….. यानि कि ऐपलवा ने तो सिर्फ़ एक के साथ सांठ-गाँठ करी, ऐ टी एण्ड टी(AT&T) के साथ, लेकिन गुगलवा तो घणा होशियार रहे, स्यानों में डेढ़ स्याना रहे, इसलिए ऊ एक के साथ नहीं सब मोबाइल सेवा प्रदाताओं के साथ सैटिंग करेगा, ग्राहक जाएगा तो किधर बच के जाएगा, बचने के लिए बैन्डविड्थ कम पड़ जाएगी कौनो कैरियर ना मिलेगा!! ;)

वैसे ई सेवा को ऊ लोग कदाचित्‌ ही प्रयोग करें जो मोबाइल सेवा का खर्चा वहन करने की क्षमता रखते हैं। अब का है कि ऊ लोग इस तरह कॉलवा के बीच में रेडियो/टीवी शो की तरह कमर्शियल ब्रेकवा नाही लेना पसंद करेंगे ना!! तो ई भी हुई सकत है कि गुगलवा की ई सेवा अल्पव्यस्कों(teenagers) और ऊ लोगन को टार्गेट(target) करे जौन मोबाइलवा का खर्चा नाही उठा सकत!!

तो अब देखे का है कि ई गुगलवा का नया शगूफ़ा कब तक बाज़ार में आवत है, और का रंग दिखावत है!!

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हिन्दी? तुम्हारा दिमाग तो सही है??

August 5, 2007 · 5 Comments

मसिजीवी जी ने कुछ अंग्रेज़ी के सरमायेदारों के बारे में, या कहें एक अंग्रेज़ी के सरमायेदार के बारे में बताते हुए लिखा कि इंटरनेट पर हिन्दी भाषी दुनिया में अंग्रेज़ी के विरुद्ध इतने लोग नहीं हैं जितने हिन्दी विरोधी भारतीय अंग्रेज़ी ब्लॉगरों की जमात में हैं।

अधिक तो खैर कुछ नहीं लिखूँगा क्योंकि यदि लिखने लगा तो कदाचित्‌ बहुत कुछ लिख जाउँगा, लेकिन इतना अवश्य कहना चाहूँगा कि यह बताने का भी मसिजीवी जी को कष्ट करना चाहिए था कि इस लिंक पर कितने लोग हिन्दी के प्रति ऐसी हेय दृष्टि रखे हुए थे और कितने अंग्रेज़ी वाले उस व्यक्ति को लताड़ रहे थे। लिंक पर क्लिक कर कोई भी देख सकता है कि वह सिर्फ़ एक बीमार मानसिकता वाला डॉलर का गुलाम व्यक्ति था जो विक्षिप्त प्रलाप कर रहा था जबकि बाकी उसको समझाने का प्रयत्न कर रहे थे। और साथ ही यह बात भी गौरतलब है कि वह पोस्ट 2 वर्ष पुरानी है; यहाँ 2 दिन में दुनिया बदल जाती है, तो क्या दो वर्षों में हालात कुछ सुधरे नहीं हैं? थोड़ा ही सही लेकिन मैं समझता हूँ कि सुधार हुआ है। और वैसे भी इस तरह के लोग दोनों ओर हैं, यदि हिन्दी को भला-बुरा कहने वाले अंग्रेज़ भारतीय हैं तो यहाँ हिन्दी वालों में भी अंग्रेज़ी को खामखा गरियाने वाले कम नहीं हैं!! लेकिन इन लोगों से क्या कोई फर्क पड़ता है? मैं नहीं समझता पड़ता है, मेरे अनुसार ये लोग गौण उत्पादन(by-product) हैं जिनको अनदेखा कर बिना कोई भाव दिए आगे बढ़ना चाहिए, न कि उनसे वाद-विवाद में अपना समय नष्ट करना चाहिए, क्योंकि समझ वही सकता है जिसमें अक्ल हो, जिसमें अक्ल नहीं उन लोगों को समझाना भैंस के आगे बीन बजाना है!!

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