दुनिया मेरी नज़र से - world from my eyes!!

Entries from September 2007

सस्तेलाल के लिए स्मार्ट फोन

September 29, 2007 · 9 Comments

पाँच-छह वर्ष पहले कॉलेज के दौरान मेरे जन्मदिन पर माँ ने मेरा पहला मोबाइल फोन, नोकिआ 3315, और मेरा मोबाइल कनेक्शन नंबर(जो आज भी वही है) मुझे उपहार स्वरूप दिया था। उस समय 3315 ही नोकिआ का सबसे सस्ता फोन उपलब्ध था जो कि चार हज़ार एक सौ रूपए देकर खरीदा था। मोबाइल फोनों के बारे में उस समय जानकारी बिलकुल नहीं थी(आज भी कोई खास नहीं है), फोन के साथ आए मैनुअल (manual) को पढ़कर एक घंटे के अंदर-२ फोन का पूर्ण प्रयोग करना सीखा था। उस समय अपनी मोबाइल ज़िंदगी श्वेत-श्याम ही थी, कुछ महीनों बाद एक क्लाइंट का नोकिआ 7250 फोन देखने को मिला था जिसमें रंगीन स्क्रीन थी, आकार छोटा था लेकिन कीमत (तकरीबन सत्ताईस हज़ार रूपए) बहुत बड़ी थी, वो बात अलग है कि ढाई वर्ष पूर्व 2005 में मैंने उसी का अगला वर्ज़न 7250i तकरीबन आठ हज़ार दो सौ रूपए में ब्रांड न्यू (brand new) लिया था जो आज भी मेरे पास है!! उसके कुछ समय बाद इससे भी महंगे और उच्च तकनीक वाले फोन मॉडलों के बारे में पता चला, इंटरनेट के माध्यम से उनके दर्शन भी किए और उनकी खूबियों के बारे में भी पढ़ा। स्मार्टफोन बाज़ार में थे लेकिन दाम बहुत उँचे थे!! हार्डवेयर के लगातर गिरते दामों को देख यह सांत्वना मन में थी कि कभी दाम इतने गिर जाएँगे कि ये अपने बजट में समा जाएँगे और ऐसा हुआ भी। पिछले वर्ष दिसंबर में जब मैं अपने लिए नया फोन देख रहा था तो नोकिआ एन सीरीज़ (n series) के एन70 म्यूज़िक एडिशन (N70 Music Edition) के कम दाम का पता चला तो उसे खरीद लिया, इस तरह यह मेरा पहला स्मार्ट फोन हुआ, लेकिन अधिकतर लोग जो कि आठ-नौ हज़ार से नीचे का ही बजट रखते हैं उनके लिए अभी भी दिल्ली दूर थी। इधर उन्नत होती तकनीक के कारण स्मार्ट फोन के मॉडलों का बाज़ार में जैसे सैलाब आ रहा हो, ओ२ हो या नोकिआ, मोटोरोला हो या सोनी-एरिक्सन, सभी अपने स्मार्ट फोन मॉडलों के उन्नत रूप कम दाम में बाज़ार में निकाल रहे हैं!! लेकिन ढंग के मॉडलों के दाम अभी भी दस हज़ार से ऊपर ही हैं।

Palm Centro
शायद इसी को भांपते हुए पॉम (palm) अपना नया स्मार्टफोन सेन्ट्रो (centro) बाज़ार में सबसे कम कीमत में निकालने जा रहा है। सौ अमेरिकी डॉलर ($100), यानि तकरीबन चार हज़ार रूपए, के इस फोन से पॉम आशा कर रहा है कि वह स्मार्टफोन बाज़ार में मौजूद महंगे प्रतिद्वंद्वियों आईफोन (iPhone) और मोटो क्यू (Moto Q) को तगड़ी टक्कर दे पाएगा। पॉम के अपने ऑपरेटिंग सिस्टम(वर्ज़न 5.4.9) से लैस इस स्मार्टफोन में आम मोबाइल फोन के अतिरिक्त आप ऐम(AIM), एमएसएन(MSN) तथा याहू(Yahoo) चैट की सुविधा तो उठा ही पाएँगे साथ ही अपने जीमेल(Gmail), एओएल(AOL) तथा याहू(Yahoo) ईमेल खातों द्वारा दूसरों के संपर्क में भी रह पाएँगे। ब्लेज़र(Blazer) वेब ब्राउज़र तो इसमें है ही, गूगल मैप भी है। इसमें रेडियो है, एक 1.3 मेगापिक्सल का कैमरा है(वैसे तो कुछ खास नहीं लेकिन कीमत के अनुसार काफ़ी वाजिब है), माइक्रो एसडी कार्ड (micro sd card) द्वारा आप इसकी स्टोरेज क्षमता 4 गीगाबाइट (GB) तक बढ़ा सकते हैं और इसमें टच स्क्रीन (touch screen) भी है। दाम को देखते हुए काफ़ी अच्छी फीचर इसमें पॉम वालों ने दी हैं और फिर चूंकि स्मार्ट फोन है तो पॉम ऑपरेटिंग सिस्टम के लिए उपलब्ध ढेरों सॉफ़्टवेयर भी इस पर इंस्टॉल हो बहुत सी काम की सुविधाएँ भी प्रदान कर सकते हैं।

फिलहाल तीन महीनों के लिए पॉम का यह सस्ता स्मार्टफोन सिर्फ़ अमेरिकी टेलीकॉम प्रदाता स्प्रिंट (sprint) के ग्राहकों को ही उपलब्ध होगा। कम से कम इस बात से लोगों को राहत होगी कि सेब जैसी मूर्खता न दिखाते हुए पॉम ने यह निर्णय नहीं लिया कि उसका फोन सिर्फ़ एक मोबाइल सेवा प्रदाता के नेटवर्क पर ही कार्य करेगा। इस तरह सस्ते स्मार्टफोन आने के कारण वे लोग भी इसके लाभ उठा पाएँगे जो महंगे स्मार्टफोन नहीं खरीद सकते। कदाचित्‌ जल्द ही यह भारत में भी उपलब्ध हो जाएगा। देखने वाली बात यह रहेगी कि इस स्मार्टफोन से कितनी जनता स्मार्ट होती है….. मतलब कितने लोग इसको अपनाते हैं!! ;)

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अंडरग्राउंड …..

September 29, 2007 · 3 Comments

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मोबाइल पर लिखी हिन्दी …..

September 28, 2007 · 8 Comments

पहले माँग थी कि मोबाइल पर हिन्दी चलनी चाहिए। जब इस वर्ष मई में मैंने मोबाइल फोन पर हिन्दी पाठ दिखा दिया तो उसके बाद मोबाइल फोन पर यूनिकोड हिन्दी में लिखने पर ज़ोर दिया जाने लगा। आज जगदीश जी ने अपने नए नवेले मोबाइल द्वारा जब अपने वर्डप्रैस.कॉम ब्लॉग पर हिन्दी लिख के दिखा दी तो मन बहुत प्रसन्न हुआ कि यह किला भी फतह हुआ। और जब उन्होंने लिखने का तरीका बताया तो मन और भी प्रसन्न हो गया, यह तरीका वही है जो मैंने अपने नोकिआ 7250i मोबाइल फोन पर प्रयोग किया था लेकिन पर्याप्त मेमोरी न होने के कारण उसमें एरर आ गया था और हिन्दी पोस्ट ब्लॉग पर प्रकाशित न हो पाई थी। चूंकि मैं निश्चित नहीं था कि इतने आसान तरीके से हिन्दी लिखी जा सकेगी, मैंने इस बात को तब तक किसी के साथ न बांटने का निश्चय किया जब तक मैं किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुँच जाता या कोई अन्य इस पर कुछ ठोस करके नहीं दिखाता। ब्लॉग पर पोस्ट नहीं हुई तो क्या हुआ, अभी-२ जगदीश जी को अपने नोकिआ 7250i से हिन्दी में एसएमएस(sms) भेजा और जगदीश जी ने तसदीक की कि उनको मेरे द्वारा हिन्दी में लिखा गया संदेश बिलकुल सही रूप में प्राप्त हुआ है और उनका उत्तर भी हिन्दी में आ गया जिसको मैं मोबाइल पर आराम से पढ़ पाया हूँ। :)

अब यह समझ आता है कि नोकिआ अंग्रेज़ी के अतिरिक्त अन्य भाषाएँ अपने फोन में उपलब्ध करवाने के लिए यूनिकोड का ही प्रयोग करता है, और जिन फोन मॉडलों में हिन्दी का विकल्प होता है उनमें हिन्दी की किसी भी यूनिकोड वेबसाइट को पढ़ा भी जा सकता है और हिन्दी में लिख पोस्ट भी किया जा सकता है। लेकिन मेरे ख्याल से पुराने फोन मॉडलों में मेमोरी का पंगा हो सकता है जैसा मेरे साथ हुआ था। नए फोन मॉडलों में पुराने मॉडलों के मुकाबले अधिक मेमोरी आ रही है इसलिए इनमें यह दिक्कत नहीं आएगी। जैसे जगदीश जी अपने मोबाइल फोन द्वारा पोस्ट करने में कामयाब हुए उसी तरह मुझे लगता है कि सृजनशिल्पी जी भी अपने नोकिआ 5700 एक्सप्रैस म्यूज़िक द्वारा(और वे सभी लोग जिनके नोकिआ मोबाइल फोन में हिन्दी भाषा का विकल्प है) हिन्दी में अपने ब्लॉग आदि पर लिख पोस्ट कर पाएँगे। :) बाकी किसी अन्य कंपनी के मोबाइल फोन के बारे में मैं विचार व्यक्त नहीं कर सकता। यदि कोई नोकिआ के अतिरिक्त किसी अन्य कंपनी का मोबाइल प्रयोग करता हो जिसमें हिन्दी भाषा का विकल्प है तो कृपया वह जाँच कर बताए। :)

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क्रिकेटिया रस में डूबे कुछ यादगार पल …..

September 27, 2007 · 7 Comments

स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बताया है कि आजकल क्रिकेटिया ज्वर चल रिया है, भारतीय जवान पहला २०-२० वाला अर्द्ध क्रिकेट विश्वकप जीत लाए हैं। अब इस पर भी प्रश्न हो रहे हैं, कोई कह रहा है कि हॉकी वालों को क्यों भूल गए और रईसों पर पैसे की बारिश क्यों तो दूसरी ओर कोई कुछ गरीब क्रिकेटरों के हक़ के लिए लड़ रहा है। इधर जीतू भाई अपने बचपन के बीते क्रिकेटिया दिनों में पहुँच गए तो मेरे को लगा कि क्रिकेट तो मैं भी काफ़ी खेला हूँ बचपन में, काफ़ी क्या जितना खेला हूँ उससे भी मन नहीं भरा!! ;) दसवीं के बोर्ड की परीक्षाएँ चल रही थीं, अगले दिन परीक्षा होती, पाठ तैयार होता या न होता, क्रिकेट खेलने अवश्य पहुँच जाता और जब वापस आता तो माता जी से अपने लिए स्तुतिगान सुनता और झापड़ों का प्रसाद भी मिलता बकायदा!! ;) इतना ही नहीं, रात को भी पूरा इंतज़ाम होता अंडर द लाइट्स (under the lights) खेलने का। ;) अब क्या है, नानी जी की सोसायटी में ही अपने सारे यार दोस्त, साथ के भी, और बड़े (अकड़ू और खड़ूस)भईया लोग भी, और सोसायटी की एक इमारत में नीचे एक बड़ा सा हॉल(चार फ्लैटों के जितने एरिया में), उसी में मरकरी (mercury) लाईटें लगाई, बिजली के मेन्स में तार जोड़ी और एक क्रिकेट वाले नेट का जुगाड़ किया और रात को खेलने के लिए मामाला सेट!! अब क्या है कि इस हॉल के एक मुँह पर सोसायटी का खुला मध्य-भाग है और दूसरे मुँह पर एक मीटर दूर दीवार है, तो खुले मुँह पर नेट लगा दिया जाता ताकि गेंद अंधेरे में खो न जाए। ;) फिर दो तरीके का क्रिकेट खेला जाता; लाँग पिच (long pitch) और शॉर्ट पिच (short pitch)। लाँग पिच में हॉल के एक मुँहाने पर बल्लेबाज़ होता और दूसरे पर से तेज़ गेन्दबाज़ी होती(गेन्दबाज़ बाहर से भाग के आता), वहीं दूसरी ओर शॉर्ट पिच तब खेलते जब खेलने वाले अधिक हों, तो लंबाई में खेलने की जगह चौड़ाई में खेला जाता, बायीं ओर की दीवार के पास बल्लेबाज़ और दायीं ओर की दीवार पर गेंदबाज़ बिना हाथ घुमाए स्पिन गेन्दबाज़ी करता और लेग साइड पर रन बनाने होते(कभी-२ इसको पलट कर ऑफ़ साइड रन बनाने वाला भी खेला जाता)।

आवश्यकता अविष्कार की जननी होती है, यहाँ भी अविष्कार की कमी नहीं थी। बंदे ज़्यादा हैं तो शॉर्ट पिच खेल का अविष्कार हुआ जो कि २०-२० की तरह सरासर बल्लेबाज़ का खेल था। क्योंकि तेज़ गेन्द फेंकने पर पाबंदी थी, इसलिए रन पड़ने से रोकने के लिए एक से बढ़कर एक स्पिन की ईजाद की गई। इसमें मैं और एक अन्य लड़का सबसे आगे, नए-२ प्रयोग करते रहते थे(जब साथ में छोटे बच्चे खेल रहे हों या सामने कोई ढीला खिलाड़ी हो) और इन्हीं प्रयोगों के चलते हम दोनों ने एक-२ नई ईजाद की; उसने टप्पा खाकर रूक जाने वाली(या वापस गेंदबाज़ की दिशा में सरकने वाली) गेंद की ईज़ाद की और मैंने बल्लेबाज़ के पैर के पास टप्पा डाल अप्रत्याशित रूप से बल्लेबाज़ के चेहरे तक उछल जाने वाली गेंद की ईज़ाद की। ये दोनों गेंदे सही तरीके से अचानक प्रयोग करने पर बहुत मारक सिद्ध होतीं थीं। लेकिन मैंने महसूस किया था कि मेरी तकनीक उतनी कारगर नहीं होती विकेट लेने में जितनी वो रूक जाने वाली गेंद होती थी तो इसलिए प्रतियोगिता में रहने के लिए मैंने जल्द ही समझ लिया कि यह गेंद आखिरकार होती कैसे है(उस लड़के ने नहीं बताया था) और फिर उसको धीरे-२ सुधारा। लेकिन अपनी ईज़ाद की तकनीक को मैं भूला नहीं और उसको लाँग पिच वाले खेल में प्रयोग करने की कोशिश की। गर्मियों की छुट्टियों में भरी दोपहर में, जब कोई कुत्ता भी बाहर नहीं नज़र आता था, मैं उस सोसायटी हॉल में अकेले अपनी गेंदबाज़ी सुधारने का अभ्यास करता था और नए-२ तरीकों को आज़माता था। जितने गेंदबाज़ी के एक्शन मैंने बदले होंगे उतने पूरे मोहल्ले में किसी ने न बदले होंगे, चाह थी सिर्फ़ अधिकतम गति से स्टीक गेंद फेंकने की, हाथ से नहीं वरन्‌ कंधे के बल का प्रयोग करने की!! तो आखिरकार अपनी उस अप्रत्याशित उछाल वाली तकनीक को मैंने लाँग पिच वाले खेल में भी शामिल कर लिया, उस लड़के की रूक सकने वाली गेंद यहाँ नहीं आ सकी क्योंकि हाथ घुमाकर वो गेंद डालना असंभव है।

अब सभी तेज़ गेंदबाज़ प्रायः गुस्सैल क्यों होते हैं यह एक रिसर्च का विषय है, गुस्सैल अपन भी कम नहीं और अपन भी तेज़ गेंदबाज़ ही थे। शुरुआत में बाएँ हाथ से तेज़ गेंदबाज़ी किया करता था लेकिन नौ वर्ष की आयु में स्कूल से वापस आते समय बच्चों से भरे ऑटोरिक्शा के नीचे बायां हाथ आ जाने के कारण दाएँ हाथ से खेलना शुरु किया। बाएँ हाथ को कुछ हुआ नहीं, हड्डी वगैरह भी फ्रैक्चर नहीं हुई लेकिन उस दिन के बाद इससे गेंद नहीं फेंक पाया, कदाचित्‌ कुछ मानसिक असर था। बहरहाल, तो अपनी टोली में एक हुआ करता था सहवाग टाइप लपेड़ा बल्लेबाज़, बल्ले पर जो गेंद चढ़ गई तो समझो छक्का तो लगे ही लगे!! अब उसको गेंदबाज़ी करने का भी शौक हुआ करता था, लेकिन हाथ घुमाकर भी बट्टा ही फेंक पाता, मैंने और अन्य गेंदबाज़ों ने जी भर कोशिश कर ली लेकिन उसको ठीक से हाथ घुमाकर गेंद फेंकना न सिखा पाए। अब उसकी बट्टा गेंद से शुरु में हम लोगों की हवा टाइट होती थी, एक तो तेज़ फेंकता था(मेरे जितनी और मैं अपनी टोली में सबसे अधिक तेज़ फेंकता था, स्वयं मैं अपने जितनी तेज़ खेलने से उस समय घबराता था) और ऊपर से निशाना सही लगता था उसका, गेंद की पिटाई तो दूर विकेट बचाने के लाले पड़ जाते थे!! इसलिए आम सहमति से यही निर्णय लिया जाता था कि बट्टा गेंद प्रतिबंधित है और वो मुँह सुजाकर रह जाता था।

एक बार की बात है कि हम लोग खेल रहे थे, वो अपना बट्टा फेंकने वाला लपेड़ा बल्लेबाज़ दोस्त दूसरी टीम में था और उसका कप्तान पता नहीं काहे हम लोगों से चिढ़ गया कि खेल के बीच में ही(हमारी बल्लेबाज़ी के दौरान) उसको गेंद पकड़ा दी और फिर उसके बाद तो हम लोगों के रनों का सिलसिला थम गया, पाँच ओवर के खेल में हम कुछ खास न बना पाए। अब जब हमारी गेंदबाज़ी आई तो उनकी गिल्लियाँ हम निकाल रहे थे लेकिन पाँचवें ओवर तक आते-२ वही हाल हो गया था जो अभी २०-२० के फाइनल में भारत-पाकिस्तान का था, मतलब रन कम चाहिए थे लेकिन विकेट भी एक ही था। ओवर मेरा था और यदि चार रन पड़ जाते तो मेरे को बहुत भला-बुरा सुनने को मिलता(मत्थे तो मेरे ही मढ़ी जाती हार)। तभी मेरे दिमाग में एक शैतानी विचार आया, दूसरी टीम वालों ने बीच मैच में धोखा कर बट्टा गेंद फिंकवा हमारी वाट लगाई थी तो हम क्यों पीछे रहें, खून का बदला खून वाला जज़्बा वेग से मेरी नसों में दौड़ा, विरोधी टीम का आखिरी बल्लेबाज़ ठुकाई के मूड में था, और अपन दोनों टीमों में सबसे तेज़ गेंदबाज़(सबसे बेहतर नहीं लेकिन सबसे तेज़ अवश्य), इस पर विरोधी टीम का दुर्भाग्य कि मैंने कुछ दिन पहले ही बॉडीलाइन (bodyline) गेंदबाज़ी के बारे में टीवी पर देखा था। तीन गेंद बाकी थी आखिरी ओवर की, चार रन दरकार थे और आखिरी विकेट बचा था। मैंने सोच लिया था कि क्या करना है और अपनी सोच को अंजाम देते हुए पूरा दम लगाकर और निशाना साध बल्लेबाज़ के पेट पर सीधी गेंद फेंकी, वो सीधा हुआ और उसकी जंघा पर गेंद वेग से टकराई, कॉस्को की टेनिस वाली गेंद थी लेकिन फिर भी बहुत ज़ोर से लगी, वो तड़प के नीचे बैठ गया और उसके टीम वालों ने उसे घेर लिया, इधर मेरी टीम वाले प्रसन्न, मेरी ओर शाबाशी वाली निगाहें, ऐसा लग रहा था कि अब ये तो रिटायर्ड हर्ट (retired hurt) हो लिया और अपन जीत गए!! ;) लेकिन दस मिनट बाद किसी तरह साहस जुटा (और टीम वालों के प्रोत्साहन पर) वो लड़खड़ाता हुआ किसी तरह उठ खड़ा हुआ, इधर मैं भी तैयार था, पुनः पूरा दम लगाकर गेंद फेंकी और वेग से आती हुई गेंद उसको बचने का मौका दिए बिना फिर शरीर के उसी भाग से टकराई और इस बार उसका रहा सहा सारा दम निकल गया, अगले ने हाथ जोड़ दिए और आखिरी गेंद खेलने से मना कर दिया और मैच हम लोगों ने जीत लिया। ;)

उछलने कूदने चिल्लाने के बाद हम लोगों ने हमदर्दी और अफ़सोस जताते हुए उसका हाल भी पूछा और औपचारिकता के नाते मैंने माफ़ी भी माँगी लेकिन इस पूरे प्रकरण में अपने दोस्त(दूसरी टीम के कप्तान) को यह सबक मिल गया कि यदि स्वयं गंदा खेलोगे तो दूसरी तरफ़ से भी गंदे खेल के लिए तैयार रहना चाहिए, यदि तुम सेर हो तो दूसरा सवा सेर हो सकता है!! ;) रही बात उस बल्लेबाज़ की(अरे उसी की जिसकी सिकाई हुई थी) तो वह तो आने वाले कुछ समय तक मेरी गेंदबाज़ी से आतंकित रहा ही(जो कि गेंदबाज़ के तौर पर मेरे लिए लाभदायक था), साथ ही वह बट्टा फेंकने वाला अपना लपेड़ा मित्र भी यदि विरोधी टीम में होता तो मेरी गेंद को ज़रा इज़्ज़त देकर खेलता था क्योंकि उसको भी आशंका रहती थी कि कहीं मैं उसकी भी आरती न उतार दूँ!! ;) :D

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बीता एक और साल …..

September 23, 2007 · 17 Comments

मोर पंख
( यह फोटो इस मूल फोटो से पंगे लिए होने का नतीजा है। )

एक बार में एक दिन जीयो; पीछे मुड़ देखकर दुख न करो क्योंकि जो बीत गया सो बीत गया, भविष्य के बारे में सोच चिन्तन न करो क्योंकि वह अभी आया नहीं है। आज को जीयो और उसको इतना अच्छा बनाओ कि वो यादगार बन जाए।

- अज्ञात

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लोमो

September 22, 2007 · 2 Comments

नहीं-२, यह कोई मोमो (momo) जैसा व्यंजन नहीं है जिसको बनाया और खाया। ;) यह दरअसल नाम है रूस के एक कैमरा निर्माता का जो इसी नाम के कैमरे बाज़ार में लगभग पिछले सत्तर वर्षों से निकाल रहा है। शुरुआती दौर में सरकारी रही और 1993 में पब्लिक हुई यह कंपनी कहने को तो रूस की सबसे बड़ी ऑप्टिक निर्माता है लेकिन इसके कैमरे ज़रा अलग तरह के होते हैं। इसके कैमरे बहुत ही घटिया दर्जे के लेन्स प्रयोग करते हैं जिस कारण उनके द्वारा ली गई तस्वीरों में एक अलग बात होती है। इसके द्वारा ली गई तस्वीरें बहुत अच्छी क्या अच्छी भी नहीं आती, विग्नेटिंग दिखाई पड़ती है (यानि कि तस्वीर के बॉर्डर स्पष्ट नहीं होते, काले से होते हैं) और काफ़ी सैचुरेटिड (saturated) होती हैं यानि कि उनमें रंगों के कुछ शेड बहुत तीव्र होते हैं और तस्वीर बीच में से कुछ अधिक ही शॉर्प (sharp) होती है। लोमोग्राफ़ी के ऑस्ट्रियाई संस्थापक 1991 में चेकोस्लोवाकिया (czechoslovakia) की राजधानी प्राग (prague) के दौरे के दौरान लोमो कैमरे से रूबरू हुए और इस कैमरे से निकली धुंधली सी तस्वीरें उनको बहुत भा गई। उन्होंने इस तरह की तस्वीरों को कला के तौर पर बाज़ार में स्थापित किया और फिर लोमो कंपनी से एक करार किया जिसके तहत रूस के बाहर यह ऑस्ट्रियाई कंपनी लोमो कैमरों की एकलौती वितरक बनी।

डिजिटल कैमरों के दौर से पहले फिल्म पर उतारी गई तस्वीरों में अधिक सैचुरेशन (saturation) पाने के लिए क्रॉस प्रोसेसिंग (cross processing) भी की जाती थी जिसके तहत रंगीन स्लाईड फिल्म को उसके लिए बने रसायन घोल E6 में डेवेलप (develop) करने की जगह साधारण फिल्म के रसायन घोल C41 में डेवेलप किया जाता था। इस तरह की तस्वीरों ने जल्द ही एक पंथ (cult) का रूप ले लिया और डिजिटल कैमरों के आने के बाद तो लोमो फोटो के लिए आपके पास लोमो कैमरा होने की भी आवश्यकता नहीं रह गई, आप अपने किसी भी डिजिटल कैमरे से फोटो लेकर कंप्यूटर पर ही उसको लोमो बना सकते हैं।

जैसे यह देखिए मेरे कैमरे द्वारा ली गई असली तस्वीर:

Plain Tiger

और डम्पर के लोमो टूल द्वारा बनाया गया इसका लोमो यह है:

Plain Tiger Butterfly - Lomo 1

स्वयं मैंने पंगेबाज़ी कर यह एक हल्का लोमो बनाया जिसमे सैचुरेशन (saturation) इतना नहीं है:

Plain Tiger Butterfly - Lomo Light

और इसी फोटो में जब सैचुरेशन (saturation) बढ़ा दिया तो यह नतीजा निकला:

Plain Tiger Butterfly - Lomo Saturated

फोटो को लोमो बनाने के बहुत तरीके हैं, यदि सिर्फ़ फोटोशॉप (photoshop) को ही लें तो उसमें भी आप कई अलग-२ तरीकों से लोमो बना सकते हैं। इंटरनेट पर इसके लिए बहुत से ट्यूटोरियल (tutorial) मिल जाएँगे और कोई आवश्यक नहीं कि जैसा उनमें बताया गया है आप बिलकुल वैसा ही करें क्योंकि प्रत्येक फोटो अलग होती है और उसके रंग आदि भी अलग होते हैं। तो आप स्वयं पंगेबाज़ी करके देख सकते हैं और जो नतीजे आपको अच्छे लगें उन्हीं को अपनाएँ, आखिर यह सब सृजनात्मक कार्य है, अपनी क्रिएटिविटी (creativity) को कार्य पर लगाईये और नतीजे देखिए। :)

जो लोग फोटोशॉप (photoshop) जैसे किसी एडिटर (editor) में पंगेबाज़ी नहीं कर सकते या जिनको तुरंत नतीजे चाहिए वे डम्पर के इस लोमो जुगाड़ का भी प्रयोग कर सकते हैं, बस अपनी फोटो अपलोड करिए और उसका लोमो रूप प्राप्त कीजिए!! लोमोग्राफ़ी पर थोड़ा अधिक विस्तार से अंग्रेज़ी में यहाँ पढ़िए

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ओ ऽऽ राम तेरा ऽऽ सेतु

September 19, 2007 · 13 Comments

….. बना वोट पाने का माल ऽऽ,
कांग्रेस भी चाहे पाना इसको करुणा के साथ ऽऽ ॥

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हमरी फोटू लगी गैलरी मा

September 18, 2007 · 12 Comments

ईयहाँ वहाँ सुनत रहे एकठौ जगह पढ़े भी रहे कि फलां की फोटुओं की फलां गैलरी मा प्रदर्शनी हो रही है, फलां जगह डिसप्ले पर लगी है!! कई बार फोटू बहुत अच्छे होते तो कई बार ऐवईं चलती फिरती चवन्नी छाप फोटू होती कि सोच मा पड़ जाते कि ऐसन लोग जब प्रदर्शनी लगा सकत हैं और लोग-बाग़ देखन भी जात है, एकाध फोटू बिक भी जात(जिस मा प्रदर्शनी वगैरह की लागत लगभग सारी निकल आत है) हैं, तो हम काहे नाही अपनी भी लगा लें!! कोई रोके थोड़े ही है, ठीक ठाक तो हम भी खींच लेत हैं कभी कभार, तो आखिरकार हम भी अपनी प्रदर्शनी लगा लिए। अभी का है कि लगा लिए, लेकिन ऊ का प्रमाण का है? उधर नीरज दद्दा के ब्लॉग पर पढ़े रहे कि परभू राम को भी प्रमाण दे की जरूरत है, हम ठहरे मामूली गरीब आदमी, तो हमार को प्रमाण देई की जरूरत पड़े ही पड़ेगी!! तो प्रमाण हम तैयार कर लिए, प्रदर्शनी को हटाई दिए, ई है ऊ प्रमाण का फोटू जो साबित करे कि हम प्रदर्शनी लगाए थे!!

Gallery Exhibit!

ई फोटू हमहू लिए रहे, ऊ का प्रमाण है ई फोटू:

तो अब तो माने ही पड़ेगा कि हमार फोटू का भी प्रदर्शनी लगा था। ई का लगाए के हमार एकठौ तमन्ना भी पूरी हुई गवा, अब बाकियों का नंबर लगाएँगे!! ;)

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अरे चौंकिए मत, टेन्शन भी मत लीजिए, लेकिन यदि प्रदर्शनी लगाने की मुबारकबाद देना चाहते हैं तो अग्रिम रूप से ले लेंगे, बाद में कभी प्रदर्शनी लगाई तो तब वाले खाते में डाल दी जाएँगी!! कोई प्रदर्शनी वगैरह नहीं लगी मेरी किसी फोटो की, यह सिर्फ़ मज़ाक है। वह तितली की फोटो(दूसरे नंबर वाली) मैंने ही परसों रविवार(16 सितम्बर 2007) को ली है लेकिन वो गैलरी वाली फोटो(पहले नंबर वाली) सरासर नकली है। ;) तितली की इस फोटो को गैलरी में स्थित फ्रेम में एक मुफ़्त ऑनलाईन जुगाड़ के ज़रिए चढ़ाया है। इस जुगाड़ का नाम है डंपर (dumpr) और इस पर ऐसे कई फोकटी जुगाड़ हैं। अपनी पिछली पोस्ट में मैंने हिन्दी ब्लॉगजगत के चार महारथियों का स्कैच बना के दिखाया था, जो कि जुलाई में ली उनकी एक फोटो में कुछ पंगेबाज़ी करके बनाया था, तो कुछ लोगों ने पूछा था कि कैसे बनाया। अब मैंने तो पंगे लेकर उँगली करके किसी तरह बनाया था, इंटरनेट पर ढूँढेंगे तो बहुत ट्यूटोरियल (tutorial) भी मिल जाएँगे, लेकिन हर कोई कदाचित्‌ ऐसे पंगे समयाभाव आदि के कारण न ले पाए इसलिए एक तुरत-फुरत वाला जुगाड़ इस डंपर (dumpr) पर यहाँ उपलब्ध है। इस पर बिलकुल ही स्कैच जैसी बन जाती है फोटो, हर फोटो में शायद वो बात न आए लेकिन फ्री के जुगाड़ के रूप में यह अच्छा है। तो बस इंतज़ार किस बात का, इस पर फोटो अपलोड (upload) करिए या अपने फ़्लिकर (flickr), पिकासा (picasa), माईस्पेस (myspace) अथवा ज़ूमर (zoomr) पर मौजूद फोटो वाले पन्ने का लिंक या फोटो का सीधा लिंक डालिए और फोटो का एक क्लिक में स्कैच बनाईये, डाउनलोड कर अपनी ऑनलाईन फोटो एल्बम/गैलरी पर चढ़ाईये और सबको दिखाईये!! :)

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हमहू भी स्केचियाएँ…..

September 15, 2007 · 14 Comments

जुलाई में जीतू भाई के आगमन पर हुई रेगुलर ब्लॉगर मीट के कुछ लम्हें मैंने यहाँ दिखाए थे। उस दिन ली सभी तस्वीरों में से एक फोटो से मैं कुछ दिन पहले समय मिलने पर पंगे ले रहा था, अलग-२ कुछ प्रयोग से कर रहा था, नतीजन एक बढ़िया सा स्केच बन गया तो आखिरकार आज उसको अपलोड कर दिया अपने फ्लिकर गैलरी में। लीजिए आप भी देखिए और मौज लीजिए। :)

Bloggers' Day Out

( बाएँ से दाएँ - नीरज दादा, जगदीश जी, श्रीश और जीतू भाई )

असली फोटो जिससे पंगे लिए गए वह यहाँ है। इस स्कैच का रंगीन संस्करण यहाँ है

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अथ श्री घिसा पिटा प्रलाप आरंभम्‌ भवति

September 7, 2007 · 8 Comments

लो जी, फिर वही घिसा पिटा बदहज़मी युक्त प्रलाप शुरु हो गया कुछ लोगों का। किसी ने बताया कि दिल्ली में फैशन सप्ताह(fashion week) शुरु हो गया है और कई नामी देशी डिज़ाईनर भाग ले रहे हैं, अपनी कृतियाँ दिखा रहे हैं। वहीं किसी ने बताया कि फलां लोगों ने पुराना नग्नता और अश्लीलता का फटा बाँस फूँकना शुरु कर दिया है। अब भई अपने पल्ले ये नहीं पड़ता कि क्यों लोग कला और अश्लीलता में अंतर नहीं समझते!! किसी ने कहा कि पारंपरिक परिधानों को दर-किनार किया जा रहा है तो कोई बोला कि इस तरह के फैशन शो में प्रदर्शित होने वाले परिधान आम जनता के लिए नहीं होते। परिवर्तन प्रकृति का नियम है अन्यथा एक कोशिका वाले जीव से लेकर आज लाखों कोशिकाओं वाले जीवों का सफ़र कभी न हुआ होता। तो कोई आवश्यक नहीं है कि परंपरा को पकड़े हुए बाबा आदम के स्टाईल के परिधान ही पहने जाएँ। ऐसा नहीं है कि पारंपरिक परिधानों को त्यागा जा रहा है, लेकिन उनमें डिज़ाईनर अपनी रचनात्मक्ता और समझ के अनुसार बदलाव लाकर उनको बाज़ार में उतार रहे हैं। रीना ढाका, रितु बेरी, मनीष मल्होत्रा, रोहित बल जैसे नामी डिज़ाईनर औरतों के लिए साड़ियाँ और मर्दों के लिए कुर्ते, शेरवानी आदि भी डिज़ाईन करते हैं, तो इसलिए यह नहीं कह सकते कि परंपरागत परिधानों को त्याग दिया गया है। लेकिन इनके द्वारा डिज़ाईन किए गए परिधान आम जनता के लिए नहीं होते यह बात सत्य है। अब जब पचास हज़ार से लेकर लाख रूपए से उपर कीमत की साड़ियों और शेरवानियों की बात करेंगे तो आम जनता कहाँ से लेगी?? लेकिन इस तरह के परिधानों को डिज़ाईन करते समय ये लोग आम जनता को टार्गेट करते ही नहीं!! और यह कहाँ लिखा है कि फैशन शो आदि में सिर्फ़ आम जनता के पहनने लायक ही परिधान प्रदर्शित किए जाएँ? यदि किसी नामी चित्रकार की कलाकृतियों की प्रदर्शनी लगती है तो ये लोग वहाँ कला की तारीफ़ करने लगते हैं कि क्या कलाकार है और क्या कला का नमूना है। क्या उसके सभी चित्र आदि इतने सस्ते होते हैं कि आम जनता खरीद सके? लाखों रूपयों में बिकने वाले चित्रों के एक अलग दर्जे के ग्राहक होते हैं; प्रशंसक बहुत हो सकते हैं लेकिन सभी खरीददार नहीं हो सकते। अमां कोई समाजवादी कम्यूनिस्ट राष्ट्र में रह रहे हो क्या जहाँ जो कार्य हो समस्त जनता-जनार्दन के भले के लिए हो? यदि आपके सामाजिक वृत्त (social circle) में कोई ऐसे परिधान नहीं पहनता तो इसका अर्थ यह नहीं कि कोई पहनता ही नहीं, आखिर समाज आपकी या मेरी या कल्लू की सामाजिक परिधि (social circle) तक ही तो सीमित नहीं है!!

अब यदि आम जनता इतने महंगे डिज़ाईनर परिधान नहीं खरीद सकती तो क्या करे? दो ही रास्ते होते हैं; या तो मन मसोस चुप बैठे या पड़ोस के बुटीक के दर्ज़ी को उस डिज़ाईन की तस्वीर वगैरह दिखा अपने लिए भी वैसा कुर्ता, सलवार-सूट आदि बनवा लें। पाईरेसी(piracy) वगैरह हर जगह है, यहाँ भी है!! ;)

वैसे कोई पूछे तो यह पूछना चाहिए कि ये “परंपरा” का रोना रोने वालों में कितने लोग धोती-कुर्ते में घूमते हैं? अपने दफ़्तर आदि धोती-कुर्ता पहन और पाँव में चप्पल डाल के बैलगाड़ी या घोड़ागाड़ी में जाते हैं? और मोहतरमाओं में कितनी लैक्में, लोरियाल आदि से लेकर देशी ब्रांडों की लिप्सटिक, पाउडर आदि सौन्दर्य प्रसाधनों की जगह परंपरागत सौन्दर्य प्रसाधन प्रयोग करती हैं? चेहरे के लिए एवर यूथ वगैरह का संतरे अखरोठ वाला फेस स्क्रब(face scrub) प्रयोग हो सकता है, परंपरागत नुस्खा नहीं!! अब इन लोगों से ऐसे प्रश्न कर लो तो ये लोग या तो बगलें झांकने लगेंगे अथवा बेतुका सा उत्तर देंगे - “आप तो अति में चले गए जी”!! कारण? भई इनका विरोध बेतुका है, जिसका न कोई सिर है न पैर, जबरदस्ती वाले विरोध की हवा निकलते देख और क्या कहेंगे!! वैसे अंग्रेज़ी स्टाईल की कमीज़ पैन्ट पहने अंकल तथा अंग्रेज़ी स्टाईल की कमीज़ और अमेरिकी स्टाईल की जीन्स पहने आंटियाँ जब परंपरा की वकालत करते हैं तो मामला मुझे बहुत हास्यप्रद लगता है, चक्कर में पड़ जाता हूँ कि कहाँ की परंपरा की बात हो रही है!! ;)

जहाँ तक अश्लीलता का प्रश्न है,

सिमटे तो दिल-ए-आशिक़, फैले तो ज़माना है

स्वयं जो पहनों वह श्लील और परंपरागत, दूसरा पहने तो अश्लील और अपरंपरागत!!

इन संस्कृति के दारोगाओं को यह बात समझ नहीं आती कि वस्त्र आदि श्लील-अश्लील नहीं होते, श्लील अथवा अश्लील व्यक्ति के विचार, उसकी सोच, मानसिकता और नज़रें होती हैं। कोई लड़की यदि तंग लो-कट टॉप(low cut top) और छोटी स्कर्ट पहन सामने बैठी है तो यदि आप वासनायुक्त नज़र/विचार के साथ उसकी गर्दन से नीचे उसको देखते हैं या उसकी टॉगों पर नज़र फिराते हैं तो वह लड़की या उसके वस्त्र अश्लील नहीं हैं वरन्‌ आपके विचार और आपकी सोच अश्लील है। वहीं दूसरी ओर यदि आप उसके सौन्दर्य को निहारते हैं तो वह अश्लील नहीं है, प्रकृति ने उसको शारीरिक सौन्दर्य से नवाज़ा है तथा उस लड़की को इस बात का गर्व है, आपको अपने पर काबू नहीं है या कॉम्पलेक्स हो रहा है तो मुँह फेर लीजिए, खामखां हल्ला क्यों मचाते हैं!! प्रकृति ने सबको एक जैसा नहीं बनाया है, किसी के पास शारीरिक सौन्दर्य है तो किसी के पास आंतरिक तो किसी के पास दोनों। तो जब आप अपने भीतर के सौन्दर्य, अपने विचारों के सौन्दर्य के प्रदर्शन को अश्लील नहीं मानते तो किसी के शारीरिक सौन्दर्य के प्रदर्शन को क्यों मानते हैं? अब अगला व्यक्ति नग्न तो नहीं घूम रहा, कपड़े पहन रखे हैं जो उस पर फबते हैं(डिज़ाईनर लोग ऐरे-गैरे को अपने परिधान पहना प्रदर्शित नहीं करते), आपको किस बात की टेन्शन है?

ये गूढ़ ज्ञान की बातें नहीं हैं, लेकिन संकुचित मानसिकता वाले छोटे से दिमाग में फिर भी नहीं समाने वाली। इनको प्राप्त करने हेतु विचारों की आवाजाही के लिए मस्तिष्क के द्वार पर लगे अलीगढ़ी ताले हटाकर कपाट खोलने होंगे, दिल को भी बड़ा करना होगा।

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