तकरीबन चार दिन से घर में ही था, मन बेचैन था तो पिछले से पिछले बृहसपति-वार की शाम को मन हुआ कि कहीं लम्बी ड्राईव पर चला जाए। आशीष को फोन कर पूछा कि क्या एक लम्बी ड्राईव पर साथ चलना चाहेगा तो उसने कहा कि उस दिन जाने की जगह अगले दिन(शुक्रवार) को शाम को जल्दी निकल लेते हैं जयपुर की तरफ़ और वहाँ चोखी ढाणी में खाना खा के वापस आ जाएँगे देर रात तक। आईडिया मुझे जंचा तो मैंने हाँ कर दी और फिर योगेश को फोन लगाया। चलने को योगेश भी तैयार लेकिन उसने सुझाव दिया कि रात को वापस न आकर रात वहीं बिताते हैं और अगले दिन एकाध किला वगैरह देख वापस आते हैं। अपने को ये बात बेहतर लगी, इसलिए आशीष को फाईनल प्रोग्राम बता दिया और उसने भी सहमति जता दी। अगले दिन यानि कि शुक्रवार को दोपहर में मैं और योगेश मेरी मोटरसाइकिल पर लद के गुड़गाँव पहुँचे और वहाँ से आशीष की गाड़ी में हम तीनों लद के जयपुर की ओर रवाना हो गए। पिछले ही दिन गाड़ी में लगाए सोनी(sony) के नए सीडी प्लेयर(CD Player) और जेबीएल(JBL) के स्पीकरों से मस्त संगीत बज रहा था और गति से हम जयपुर की ओर चल पड़े।
शाम घिर आई, अंधेरा हो गया, मैंने घड़ी में समय देखा तो कोई खास नहीं हुआ था, मैंने सोचा कि कुछ जल्दी ही अंधेरा हो गया, लगता है वाकई सर्दियाँ आ गई हैं और दिन छोटे हो गए हैं। लेकिन फिर आशीष ने कहा कि अब तो चश्मा उतार दूँ, तो तब एहसास हुआ कि आँखों पर धूप का चश्मा चढ़ा हुआ था और इस कारण मुझे लगा कि अंधेरा हो गया है, वैसे असल में अंधेरा होने में समय था!!
बहरहाल, मैंने धूप का चश्मा उतार अपना रेगुलर वाला लगा लिया और इधर असली में अंधेरा हुआ उधर पीछे की सीट पर आराम फ़रमा रहे योगेश बाबू को बीयर (beer) की तलब लग आई और वे बोले कि बीयर लेनी है। रास्ते में जो भी छोटा कस्बा आदि पड़ता, और कुछ हो या ना हो लेकिन उनको अंग्रेज़ी का ठेका अवश्य दिख जाता!!
काफ़ी देर तक तो हमने उनको कंट्रोल करवाए रखा लेकिन आखिर कब तक करवाते, आखिरकार एक पेट्रोल पंप पर हल्का होने की गरज़ से गाड़ी रोकी और योगेश बाबू काम निपटा बीयर की बोतलें भी ले आए अपने लिए!!
तकरीबन साढ़े पाँच घंटे में हमने जयपुर में प्रवेश किया, लेकिन यातायात की बड़ी समस्या थी, बहुत से मार्ग इसलिए बंद थे क्योंकि कोई रैली निकल रही थी, पहले हम रेलवे स्टेशन का रास्ता पूछ भटकते रहे, जिस सरकारी होटल में हमने रात गुजारनी थी वह रेलवे स्टेशन के पास ही है यह जानकारी राजस्थान टूरिज़म की वेबसाईट मोबाइल पर खोल हासिल की थी!! पर जब हमको आधा घंटा हो गया छोटी गलियों से निकलते और इधर-उधर भटकते तो हमने निश्चय किया कि पहले चोखीढाणी चलते हैं वापसी पर रात हो जाएगी और तब तक सड़कें खाली हो जाएँगी, तो हमने एक-दो ट्रैफ़िक पुलिस वालों से रास्ता पूछा और चोखीढाणी पहुँच गए। पिछली बार चोखीढाणी मैं पिछले वर्ष जुलाई में आया था। एक वर्ष के अरसे में चोखीढाणी में काफ़ी बदलाव आए ऐसा महसूस हुआ,काफ़ी कुछ नया सा लगा।
वैसे इस एक वर्ष के अरसे में मुझमें भी कुछ सुधार हुए हैं, पिछली बार जब वहाँ एक स्टॉल पर तीर-कमान से निशाने लगाए थे तो एकाध ही निशाने वाले गोल बोर्ड पर लगा था बाकी तो दाँए-बाँए निकल गए थे!!
इस बार लगता है कि तरकश वाले संजय भाई का आशीर्वाद साथ था, एक ही तीर बस निशाने से पहले गिर गया बाकी चारों बोर्ड पर लगे और उनमें से तीन सम्मानजनक थे।
योगेश बाबू ने भी अपना हाथ तीरांदाज़ी पर आज़माया और वह मुझसे अधिक सफ़ल रहे!! वहीं लगी दुकानों में से एक में सुंदर रंगी गई तस्वीरें भी दिखी।
भोजन के स्तर में भी काफ़ी अंतर आ गया था, पिछले वर्ष किए गए भोजन को यदि मैं अति लज़ीज़ की संज्ञा दूँगा तो इस बार के भोजन को साधारण की श्रेणी में ही रखूँगा। हम सभी को काफ़ी भूख लगी थी लेकिन फिर भी भोजन में वो बात नहीं आई जिसकी अपेक्षा थी, यहाँ तक कि अंत में परोसे गए मालपुए भी उतने बढ़िया नहीं थे!! खैर, हम लोग भोजन उपरांत थोड़ा और घूमे और उसके बाद वापस जयपुर की ओर चल दिए। सड़के हर तरह की भीड़ से रिक्त हो चुकीं थी और हम आराम से सदर थाने के निकट स्थित होटल स्वागतम पहुँच गए।
अगले दिन थोड़ा जल्दी निकलने का प्रोग्राम था क्योंकि योगेश को शाम पाँच बजे तक घर पहुँचना था, लेकिन आशीष बिस्तर पर पड़ा सोता रहा और हम लोग होटल से लेट निकले। खैर, सबसे पहले हम लोग पहुँचे बस अड्डे के निकट स्थित मशहूर रावत कचौड़ी वाले के जहाँ कुछ हल्का फुल्का नाश्ता किया गया। तत्पश्चात हम लोग निकल चले किलों की ओर, समय कम था इसलिए तय किया गया कि एक ही किला देखेंगे और नाहरगढ़ किले के रास्ते पर निकल चले(पिछली बार जयगढ़ और आम्बेर के किले देखे थे, नाहरगढ़ छूट गया था)। इस बार एक बदलाव यह देखा कि पिछली बार सूखी भूमि पर स्थित जल-महल के चारों ओर इस बार काफ़ी जल था!!
खैर, हम लोगों के साथ पंगा हो गया और हम नाहरगढ़ की जगह जयगढ़ पहुँच गए। अब पहुँच गए तो पहुँच गए, शराफ़त से तीन प्रवेश टिकट लिए और तीन कैमरों के, लेकिन टिकट खिड़की में मौजूद साहब का या तो गणित कमज़ोर था या वो कुछ अधिक ही स्याने थे, हर किसी से फालतू पैसे ले रहे थे। मैंने और योगेश ने गेट के अंदर जाते ही पैसों का हिसाब लगाया तो पाया कि उन साहब ने हमसे चालीस रूपए अधिक वसूल लिए थे, तो इसलिए मैं वापस गया और उनसे वो चालीस रूपए वापस ले आया। लेकिन बाकी लोगों में कुछ तो विचार करते दिखे कि टिकट वाले बाबू ने पैसे अधिक लिए लेकिन वापस लेने कोई नहीं गया(हमारे सामने तो कोई नहीं गया, बाद में गया तो पता नहीं)!!
जयगढ़ किले में जब हम लोग घूम रहे थे तो एक मौसी जी भी अपने दो छोटे भाँजों और बहन के साथ हमारे पीछे ही थीं। ये मौसी जी फिल्म शोले जैसी नहीं थीं, ये तो जवान भी थीं और सुंदर भी और अविवाहित भी!!
बहरहाल, मौसी जी की कुछ ज्ञान भरी बातें हम लोगों के कान में भी पड़ रही थीं, जैसे कि वे अपने भाँजों और बहन को बता रहीं थी कि जयगढ़ किला कोई तीन-चार सौ वर्ष पहले बना था(थोड़ी कन्फ्यूज़िया गई थीं मौसी जी क्योंकि जयगढ़ किला तकरीबन हज़ार वर्ष पहले बना था और उसके नीचे स्थित आम्बेर किला लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व बना था)। मौसी जी अपनी बहन जी को फोटोग्राफ़ी भी सिखा रहीं थी, भरी धूप में छोटी फ्लैश वाले छोटे डिजिटल कैमरे से फोटो खींचती अपनी बहन को सलाह दे रही थीं कि फ्लैश का प्रयोग करें!!
बहरहाल हम लोग मौसी जी और उनके ग्रुप को पीछे छोड़ आगे निकल लिए। हम लोगों के पास समय का अभाव था इसलिए जल्दी ही सब निपटा वापसी की राह पकड़नी थी।
तो सारा मामला निपटा हम गुड़गाँव की राह पकड़ लिए, देर तो हो ही गई थी, तकरीबन सवा छह बजे गुड़गाँव पहुँचे और फिर मोटरसाइकिल पर सवार हो सात बजे तक योगेश को घर पहुँचाया!!
इस यात्रा में लिए गए सभी फोटो यहाँ हैं।











14 responses so far ↓
sajeevsarathie // October 23, 2007 at 8:03 am
waah amit bhai bahut maze kiye le ho bahuta achha varnan aur chitr to as usual hain hi achee
sanjay bengani // October 23, 2007 at 10:31 am
विवरण चाकचक रहा और फ़ोटूएं भी. एक भी तीर दिल के पार नहीं हुआ.
ashish maharishi // October 23, 2007 at 11:42 am
shukirya mere jaipur aane ke liye
Amit // October 23, 2007 at 3:42 pm
धन्यवाद सजीव जी, संजय भाई और आशीष जी।
का करें संजय भाई, सीख रहे हैं लेकिन अभी परिणाम संतोषजनक नहीं हैं, अभी और काफ़ी सीखना है!!
सागर चन्द नाहर // October 23, 2007 at 5:06 pm
मौसीजी की फोटो भी है या नहीं , दूसरे लिंक पर? हो तो जायें।
समीर लाल // October 24, 2007 at 2:32 am
हमेशा की तरह बेहतरीन वृतांत और भाई, सीखते समय जब यह हाल है फोटोग्राफी का तो सीख जाओगे, तब तो गजब ही कर डालोगे.
बहुत अच्छा, जारी रहो.
और हाँ, ये सागर भाई क्या पूछ रहे हैं? पता नहीं…
rajeevjain // October 24, 2007 at 2:48 am
हमारे शहर में आए, बहुत अच्छा लगा। इतने सुंदर फोटो देश दुनिया को दिखाए और भी अच्छा
सही कहा आपने अब चोखी ढाणी को शायद हवा लग गई। कमर्शियल ज्यादा हो गया, स्वाद कमजोर पड गया।
वैसे आपने बढिया लिखा।
बताकर आते कि जयपुर आ रहे हैं तो आपके स्वागत सत्कार की व्यवस्था भी करवा देते।
Amit // October 24, 2007 at 4:09 am
नहीं उनका फोटो नहीं लिया सागर जी। यदि थोड़ा दूर होतीं तो शायद ले लेता लेकिन बिलकुल पास ही थीं हम लोगों के, लेता तो जूते पड़ जाते बेगाने शहर में कोई बचाने भी न आता!!
अरे समीर जी, काहे झाड़ पर चढ़ा रहे हैं, अभी तो बस कैमरा भाँजना ही आता है।
ही ही ही!!
धन्यवाद राजीव जी। आपने सही कहा, मुझे भी यह एहसास हुआ कि चोखीढाणी अब कुछ अधिक ही कमर्शियल हो गया है और जो उसका selling point था वह कम हो गया है। किसी ने कुछ समय पहले बताया था कि जयपुर में एक रेस्तरां है जो कि चोखीढाणी की ही तरह पारम्परिक तरीके सा है और सौ रूपए कुछ की वहाँ थाली मिलती है और उसका पारम्परिक राजस्थानी भोजन चोखीढाणी के बहुत अधिक बेहतर होता है, उस जगह का नाम ध्यान से निकल गया नहीं तो वहाँ भी ट्राई कर लेते।
अरे मैं कोई सेलेब्रिटी थोड़े ही हूँ!!
यह तो खैर कुछ तुरत-फुरत वाली ट्रिप थी, अगली बार ऐसे ही एक दिन का चक्कर लगाउँगा(नाहरगढ़ भी देखना है), उस समय आप लोगों को इत्तला अवश्य करूँगा और एक छोटी सी ब्लॉगर मीट रखी जा सकती है, बाकी ब्लॉगर बंधुओं से मिलकर प्रसन्नता होगी। पिछले वर्ष जब हम लोग जयपुर गए थे तब आप लोगों का ब्लॉगिंग में आना नहीं हुआ था नहीं तो तब भी ज़ोरदार भेंट होती। 
अजित वडनेरकर // October 24, 2007 at 4:34 am
बंधु वृत्तांत अच्छा रहा। जयपुर की यादें ताजा हो गई। इस शहर में हमने दस साल आवारगी की हैं । एक तरह से हमारा मायका है ये शहर। बहरहाल, समीर भाई की बात से सहमत है सभी चित्र अच्छे हैं। तरक्की करेंगे इस विधा में । लगे रहें।
अनूप शुक्ल // October 24, 2007 at 6:01 am
अच्छा विवरण है।निशानेबाजी अच्छी रही बधाई!
Sanjeet Tripathi // October 24, 2007 at 4:32 pm
मस्त विवरण और फोटो तो बहुत बढ़िया आए है, शुक्रिया!!
Amit // October 24, 2007 at 8:34 pm
धन्यवाद अजित जी, अनूप जी और संजीत जी।
Yogesh Kuamar // January 27, 2008 at 6:12 pm
aapne apna photo aur ashish ka photo nahi lagaya.
kile ka photo thora close up lete to aur jayada badhiya hota.
Amit // January 28, 2008 at 2:09 am
योगेश जी, अपने फोटो प्रायः मैं अपने ही ब्लॉग पर नहीं लगाता हूँ। वैसे इस यात्रा की सभी फोटो के एल्बम का लिंक मैंने ऊपर पोस्ट के अंत में दिया है जहाँ सभी फोटो उपलब्ध हैं।
और किले के कौन से फोटो को पास से लेने की कह रहे हैं? यदि ऊपर से छठे फोटो की बात कर रहे हैं तो वह फोटो तो किले के अंदर से लिया था।
यदि आपका आशय न समझा हूँ तो कृपया थोड़ा और विस्तार से बताईये, किसी भी सुझाव के लिए अग्रिम धन्यवाद। 
Leave a Comment