पिछले भाग से आगे …..
अभी हाल ही में हिन्दी ब्लॉगजगत में पोस्ट आदि की चोरी का मुद्दा उठा था और बहुत से लोगों ने पुरज़ोर इसका विरोध करते हुए इस पर अपने कड़े विचार व्यक्त किए थे। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि कुछ लोग जो अपने ब्लॉगों से पोस्ट चोरी होने पर व्यथित और क्रोधित थे(इतने कि उनका वश चलता तो चोर को फांसी पर चढ़ा देते और उसके कपड़े बीच बाज़ार नीलाम कर देते) यदि उनके ब्लॉग देखें जाएँ तो बहुत सा चोरी का माल उनके पास ही मिल जाएगा। क्यों भई, आपका माल चोरी हो तो वह गलत, लेकिन आप किसी का माल चोरी करो तो वह गलत नहीं है? मेरा इरादा किसी व्यक्ति विशेष का नाम लेकर उनको सरेआम बेइज़्ज़त करना नहीं है, मैं विनम्र शब्दों में सिर्फ़ यह बताना चाहता हूँ कि जिस तरह आपका लिखा आपका कॉपीराइट है उसी प्रकार किसी अन्य का माल भी उसकी संपत्ति है जिसे आप बिना उस व्यक्ति की आज्ञा के नहीं प्रयोग कर सकते।
खैर यह तो अलग बात है, लेकिन कुछ लोग बड़े बेशर्म भी होते हैं। चोरी जाने में की या अजनाने में, उनको जब चोरी हुए माल का मालिक विनम्र शब्दों में यह कहे कि भई यह मेरा माल है और इसको प्रयोग करने की अनुमति आपने नहीं ली है इसलिए इसको हटा लीजिए तो दो तरह से व्यक्ति पेश आता है:
- आपका माल हटाने से साफ़ मुकर जाता है और आपको कहता है कि जो उखाड़ सकते हो उखाड़ लो, यानि कि एक तो चोरी ऊपर से सीनाज़ोरी।
- आपका माल हटाने को मान जाता है लेकिन अपने मानसिक असंतुलन को दिखाने के लिए या तो आपको ईमेल द्वारा भला बुरा कहता है या फिर यदि मानसिक संतुलन कुछ अधिक ही बिगड़ा हुआ है तो अपनी मूर्खता का प्रचार करने के लिए सरेआम ब्लॉगपोस्ट आदि लिख आप पर व्यंग्य करता है।
दूसरी तरह से पेश आने वाले लोगों की तो छोड़ ही दें, उनपर तो खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे वाली कहावत चरितार्थ होती है। इन लोगों को इस बात का शुक्र नहीं होता कि जिसका माल इन्होंने चोरी किया उसने प्यार-मोहब्बत से बोलते हुए इनसे वह माल हटाने को कहा जबकि वह सीधे ही लीगल नोटिस भिजवा के इन पर हर्जाने का मुकदमा भी ठोक सकता था। ऐसे लोग परिपक्व नहीं होते और छोटे बालकों की बुद्धि के होते हैं, इसलिए इन की बात का क्या बुरा मानना। वैसे हाल ही में मेरे साथ भी ऐसा ही वाकया हुआ और मैंने यह सोच ही मेरा माल उड़ाने वाले व्यक्ति के व्यंग्य को जाने दिया कि इससे क्या अपना माथा फोड़ना। वैसे गौरतलब बात यह थी कि अमुक व्यक्ति ने पूरी तरह जानते बूझते हुए मेरा कॉपीराइट नोटिस हटा के मेरे द्वारा ली फोटो प्रयोग की थी और मुझे भोला बन के दिखा रहा था कि उसे नहीं पता क्या हुआ।
खैर, मुख्य है यहाँ पहली तरह के व्यक्ति, जो कि चोरी भी करते हैं और सीनाज़ोरी भी। अब ऐसे व्यक्ति आपके समझाने से नहीं समझेंगे, ये इस गफ़लत में होते हैं कि आप इनका कुछ कर नहीं सकते। लेकिन ऐसा नहीं है, इनका बहुत कुछ बिगड़ सकता है, बस बिगाड़ने की नीयत चाहिए और निम्न तरीकों से इनका जीना दुश्वार कर सकते हैं:
- यदि चोर आपके देश में रहता है तो आप उस पर मुकदमा कर सकते हैं। कोई बहुत बड़ा आफ़त वाला काम नहीं है आपके लिए, सिर्फ़ सिविल कोर्ट में कॉपीराइट उल्लंघन का मुकदमा करना है। मुकदमा करने से पहले लीगल नोटिस भेजा जा सकता है, अधिकतर सीनाज़ोर इस लीगल नोटिस के मिलने से ही हिल जाते हैं, क्योंकि यकीन मानिए कोर्ट में तो वे भी नहीं जाना चाहेंगे।
- उस व्यक्ति के वेब होस्ट से शिकायत कर सकते हैं। अधिकतर वेबहोस्ट इस तरह के मामलों को गंभीरता से लेते हैं और यदि आपकी बात में सच्चाई है तो वे अमुक व्यक्ति को या तो आपका माल हटाने को कहेंगे या फिर उनको सूचित किए बिना उनकी वेबसाइट/ब्लॉग को क्लीन-बोल्ड कर देंगे। यदि ब्लॉग ब्लॉगस्पॉट या वर्डप्रैस.कॉम जैसी सेवा पर है तो आपका काम अधिक आसान होगा क्योंकि ये लोग ऐसे मामलों को बर्दाश्त करने वालों में से नहीं हैं।
अब यदि चोर आपके देश का निवासी नहीं है तो कचहरी में उसपर मुकदमा करना कदाचित् आपके लिए संभव नहीं होगा लेकिन दूसरा तरीका तो आप अपना ही सकते हैं और कामयाबी मिलने पर आपका कार्य तो हो ही गया, चोर की वेबसाइट/ब्लॉग से आपका माल तो हट ही जाएगा साथ-२ सज़ा के तौर पर उसका अपना माल भी साफ़ हो जाएगा।
तो यदि आप भी सीनाज़ोरी करने वाले लोगों में से हैं तो सावधान हो जाईये, यह सीनाज़ोरी महंगी पड़ सकती है। यदि माल का मालिक आपसे विनम्र निवेदन कर रहा है अपना माल हटाने का तो अपने आपको भाग्यशाली मानिए क्योंकि उसको कोई आवश्यकता नहीं है कि आपसे विनम्र निवेदन करे, वह आपसे डंडे के ज़ोर पर भी बात कर सकता है।
लेकिन एक बात जो बहुत सामान्य है और जिसको अधिकतर लोग व्यवहार में नहीं लाते वह है सामाजिक शिष्टाचार। क्या आप अपने पड़ोसी या किसी परिचित के घर जाते हैं और जो चीज़ आपको पसंद आती है वह आप बिना पूछे ऐसे ही उठा लाते हैं? यदि आप विनम्र होकर अमुक वस्तु को प्रयोग करने की अनुमति माँगे तो प्रायः अनुमति मिल ही जाती है। “प्लीज़” तथा “कृपया” जैसे शब्द बहुत प्रभावशाली होते हैं, इनका वार खाली जाने की बहुत कम संभावना होती है। तो क्यों लोग ऑनलाईन इस शिष्टाचार को भूल जाते हैं। यदि यह समझते हैं कि ऑनलाईन उनको कोई पकड़ नहीं सकता या उनका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता तो यह सोचना ठीक वैसा है जैसा कि किसी शुतुरमुर्ग का रेत में अपनी मुंडी छुपा सोचना कि उसको कोई देख नहीं सकता।
हाल ही की बात है कि मैं एक विषय पर एकाध लेख लिखने की सोच रहा था तो उससे संबन्धित कुछ ग्राफिक्स (graphics) आदि मुझे लेख में प्रयोग करने थे। अब जिन वेबसाइट पर वे ग्राफिक्स (graphics) थे वहाँ उनको प्रयोग करने संबन्धी कोई जानकारी नहीं थी जिसका यह अर्थ हुआ कि उनको प्रयोग नहीं किया जा सकता। तो इसलिए मैंने उन वेबसाइटों के मालिकों को निजी ईमेल लिख उनसे अनुमति लेना बेहतर समझा, उनको बताया कि किस कार्य के लिए मुझे वे ग्राफिक्स (graphics) चाहिए और उन्होंने बिना हिचके मुझे उन ग्राफिक्स (graphics) को अपने लेख में प्रयोग करने की अनुमति दे दी। यदि वे अनुमति नहीं देते तो मैं जबरन उनके माल को प्रयोग नहीं करने वाला था, उस स्थिति में मैं फिर वैसे ही अन्य ग्राफिक्स (graphics) देखता या फिर स्वयं अपने आप बनाता।
चोरी की बात तो यहाँ तक है कि बड़ी-२ कंपनियाँ तक कान पकड़ जाती हैं आम लोगों के सामने। अभी हाल ही की बात है, यहीं दिल्ली के एक परिचित, जो कि मेरी तरह शौकिया फोटोग्राफ़र है, द्वारा ली एक फोटो को बिना उनकी अनुमति के निकोन (nikon) वालों ने अपने विज्ञापन में छाप दिया था। जैसे ही उस परिचित को पता चला वह चढ़ दौड़ा निकोन (nikon) वालों पर और निकोन (nikon) वाले भी कदाचित् कोई कोर्ट आदि का चक्कर नहीं लगाना चाहते थे इसलिए दोनो पार्टियों ने आपस में ही समझौता कर लिया जिसके तहत निकोन (nikon) वालों ने कुछ हर्जाना आदि देकर अपनी जान छुड़ाई। और इससे पहले एक अन्य प्रसिद्ध हाई-प्रोफाईल मामला तब हुआ था जब लगभग आठ-नौ महीने पहले याहू के मलयालम पोर्टल पर एक ब्लॉगर का चोरी किया लेख पूर्ण रूप में छाप दिया गया था बिना किसी अनुमति के और हल्ला मचने पर याहू ने दोष मढ़ दिया अपने माल के सप्लायर वेबदुनिया पर और सरेआम माफ़ी भी माँगी। रुचिकर बात यह रही कि पढ़ने में आया कि याहू द्वारा माफ़ी माँगने के कुछ ही दिन के भीतर याहू की भारतीय शाखा के कन्टेन्ट हेड (content head) अजय नाम्बियार और मनोरंजन हेड (head of entertainment) नियती सेनगुप्ता ने अपने-२ पदों से इस्तीफ़े दे दिए।
इसलिए सीधी-साधी सलाह यही है कि शिष्टाचार को नहीं भूलना चाहिए। जो लोग शिष्टाचार को औपचारिकता कह दरकिनार करते हैं उनको किसी जंगल में जाकर आदि-मानव की भांति रहना चाहिए क्योंकि सभ्य समाज में रहने लायक वे नहीं लगते। और साथ ही गूगल के मोटो (motto) Do no Evil यानि कि बुरा मत करो को ध्यान में रखिए, बेशक गूगल इसको मानने में अब यकीन न रखे लेकिन आप अवश्य रखिए क्योंकि आप गूगल नहीं हैं और बहुत लोग आपका बहुत कुछ उखाड़ सकते हैं, इसलिए पंगा काहे लें!!
तीन भागों का यह लेख आम जनता के लाभार्थ लिखा गया है और इसको लिखने के पीछे मेरा मकसद किसी से खुन्दक निकालना या किसी पर तंज कसना नहीं है।


5 responses so far ↓
Shastri JC Philip // December 21, 2007 at 9:52 am
यह लेख आज ही मेरी नजर में पडा. पहले लेख से तीसरे लेख तक एक सांस में पढ गया. चूंकि चोरी का मुद्दा मैं ने एवं उन्मुक्त जी ने पहली बार उठाया था अत: इस लेख में रूचि स्वाभाविक थी.
आपने विषय को बहुत ही स्पष्ट तरीके से, सारे महत्वपूर्ण प्रश्नों का उचित समाधान करते हुए, लिखा है. बधाई हो.
जीवन लेने वाले से बहुत बडा होता है जीवन देने वाला. गलती को प्रोत्साहित करने के बदले उसके विरुद्ध चेतावनी देने वाल व्यक्ति इसी तरह महत्वपूर्ण कार्य करता है — शास्त्री
हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है.
हर महीने कम से कम एक हिन्दी पुस्तक खरीदें !
मैं और आप नहीं तो क्या विदेशी लोग हिन्दी
लेखकों को प्रोत्साहन देंगे ??
मुिदत // December 21, 2007 at 10:20 am
मुझे आपके ब्लॉग का लिंक बर्काम्प दिल्ली ४ के पृष्ट से मिल्ला, अती प्रसन्नता हुई जब आपका पुरा हिन्दी ब्लॉग को देखा. वो कहते हैना ‘फुला नही समाना ‘ बिल्कुल वैसी ही अनुभूति हुई, मेरी हिन्दी इतनी अची नही है, कोई गलती हुई हो तोू क्षमा करना
धन्यवाद
सागर चन्द नाहर // December 21, 2007 at 5:17 pm
धन्यवाद अमितजी
सीधे तरीके से समझाने के लिये, अब एक आखिरी प्रश्न। अगर किसी साईट पर कोई HTML कोड आपको सही लगता है, तो क्या वह कोड भी उस ब्लॉगर की सम्पति है? क्यों कि कोड तो जावा स्क्रिप्ट में बना है औरवह तो कोई भी बना सकता है, या उसमें थोड़ा बदलाव तो कोई भी कर सकता है।
उदाहरण के लिये मेरे ब्लॉगरोल वाला कोड, मैने किसी चिट्ठे के सोर्स कोड से ढूंढ़ा था और थोड़ा बदलाव कर अपने चिट्ठे पर लगाया था।
Amit // December 21, 2007 at 11:56 pm
लेख पसंद करने के लिए धन्यवाद शास्त्री जी।
जी नहीं, यदि मेरी याददाश्त दुरुस्त है तो आपके उठाने से पहले भी हिन्दी ब्लॉगजगत में यह मुद्दा पहले कुछेक बार उठ चुका है।
मुदित, प्रसन्नता हुई कि हिन्दी अच्छी नहीं होने के बावजूद आपने हिन्दी लिखने का प्रयास किया। मेरा मानना है कि परिणाम से अधिक प्रयास का महत्व है। और धन्यवाद कि आपको मेरा ब्लॉग अच्छा लगा।
सागर जी, HTML code आदि के बारे में मैं नहीं जानता कि उसके बारे में कानून का क्या नज़रिया है इसलिए इस बारे में कोई सलाह आदि नहीं दे सकता। जितना मैंने देखा है, अधिकतर वेब-प्रोग्रामर दूसरों के लिखे कोड को देख के बहुत सीखते हैं। रही बात किसी वेबसाइट का कोड उठा प्रयोग करने की तो इस मामले के कानूनी पक्ष से अंजान होने के कारण आपको कोई राय नहीं दूँगा, अपने रिस्क पर प्रयोग कीजिए। जहाँ तक कोई भी लिख सकता है की बात है, तो पहले भाग में रवि जी की ऐसी ही एक टिप्पणी का उत्तर मैंने एक उदाहरण सहित दिया था, कृपया उस पर एक बार पुनः नज़र मार लें।
पुनीत ओमर // December 26, 2007 at 3:33 pm
अमित जी, मुद्दा वाकई में गम्भीर है और तकनीकी से जुडा होने की वजह से आगे चल कर इसमें और भी कानूनी पेंच आने की सम्भावना है। अत्यन्त व्यवस्थित शैली में लिखे गये आपके ले्खों से इस सम्वेदनशील विषय के बारे में काफ़ी कुछ जानने को मिला। मेरा भी विगत में कुछ अनुभव इससे जुड़ा रहा था लेकिन ब्लॉगिग में कदाचित नया होने था इस विषय विशेष पर इतनी व्यवस्थित जानकारी के अभाव में सम्भवतय: मेरी ओर से भी कुछ गलतियाँ रहीं।
आपने ना केवल इतना कुछ बताया बल्कि एक जिम्मेदार इन्टरनेट उपभोक्ता बनने के लिये सभी को प्रेरित भी किया। आपके इस प्रयास के लिये धन्यवाद। आगे भी इस विषय में कुछ और अच्छे लेख की उम्मीद रखूँगा।
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