दुनिया मेरी नज़र से - world from my eyes!!

माफ़ी चाहूँगा…..

January 13, 2008 · 7 Comments

हिन्दी ब्लॉगजगत में सबको निमंत्रण मैंने दिया, पकड़-२ पूछा भी कि आ रहे हो कि नहीं, लेकिन मौके पर मैं ही नहीं पहुँच सका। क्यों? ऐसी मेरी मजाल कैसे हुई?

दक्षिण भारत से भी कुछ लोग आए हुए थे जिनको हिन्दी नहीं आती। ऐसों में एक साहब याहू से भी आए थे जिनको याहू वालों ने कल सुबह बंगलोर से खासतौर पर इसी सभा के लिए उड़ाया था!!

तो हुआ यूँ कि हम आयोजकों को मौका-ए-वारदात पर सुबह तकरीबन दस बजे पहुँचना था(अलग से समोसे उड़ाने नहीं) ताकि सब तामझाम देख लिया जाए कि सब ठीक-ठाक है कि नहीं। अब मैं इसके लिए उठा सुबह छह बजे लेकिन तबीयत कुछ ठीक न लगी इसलिए अपना तापमान नापने का मीटर मुँह में घुसा यह नापा की अपने को तो 102 डिग्री बुखार है। मन ही मन खुंदक चढ़ी कि कमबख्त कल शाम तक तो ठीक-ठाक था एकाएक कैसे हो गया ये गोलमाल!! हो सकता है कि पिछले सप्ताह भर की अत्यधिक भागदौड़ और पिछले दो-तीन दिन से बिना नींद लिए काम करने की थकान के कारण हो गया हो। लेकिन हो गया तो हो गया, कुछ कर नहीं सकते इसलिए वार-फुटिंग पर बाकी साथी आयोजकों को फुनवा लगाए कि भई अपन तो आ नहीं सकेंगे इसलिए अपने आप संभालो और हमारे हिन्दी ब्लॉगजगत से जो बंधु आ रहे हैं उनका ज़िम्मा भी तुम्हीं पर है।

बहुत कोफ़्त भी होती है इस पर लेकिन यह आज का सत्य है कि सभी भारतीयों को हिन्दी नहीं आती। यह कल का सत्य न रहे इसी पर आप और हमको कार्य करना है और यही कदाचित्‌ अपने-२ तरीके से कर भी रहे हैं, हिन्दी को बढ़ावा देकर।

कुछ साथियों ने अपने-२ अड्डों पर आज रपट छाप दी है कि हुआ क्या था वहाँ और मैं न जाने कहाँ नदारद था। साथ ही यह भी कहा कि अंग्रेज़ी का बोलबाला था। तो पहले तो उनसे इस बात की क्षमा चाहूँगा कि उनको अपनत्व नहीं लगा, यकीन मानिए मैं होता तो पूरी कोशिश करता कि पूरा अपनत्व लगे। अभिषेक बक्शी ने जो सत्र लिया वह मैंने और उन्होंने साथ में लेना था और मैंने तो हिन्दी में ही बोलना था, लेकिन उनको श्रेय यह जाता है कि बंदे ने अपने आप मामला संभाल लिया, सुबह उनको भी सूचित कर दिया था कि भई अपना तो बैंड बज गया है इसलिए सिर्फ़ मन से वहाँ मौजूद रहेंगे तन से नहीं। दूसरी बात यह कि मुझे नहीं पता कि अपने बंधु लोग क्या सोच के आए थे लेकिन बंधुओं मैंने यह नहीं कहा था कि यह सिर्फ़ और सिर्फ़ हिन्दी का आयोजन है, यह ब्लॉग सभा थी जिसमें सभी भाषी आमंत्रित थे। कदाचित्‌ अपने हिन्दी ब्लॉगजगत के बंधुओं को न पता हो लेकिन दक्षिण भारत से भी कुछ लोग आए हुए थे जिनको हिन्दी नहीं आती। ऐसों में एक साहब याहू से भी आए थे जिनको याहू वालों ने कल सुबह बंगलोर से खासतौर पर इसी सभा के लिए उड़ाया था!! तो कार्यक्रम अंग्रेज़ी में इसलिए था कि सभी को कुछ न कुछ तो समझ आ ही जाएगा। मानता हूँ और बहुत कोफ़्त भी होती है इस पर लेकिन यह आज का सत्य है कि सभी भारतीयों को हिन्दी नहीं आती। यह कल का सत्य न रहे इसी पर आप और हमको कार्य करना है और यही कदाचित्‌ अपने-२ तरीके से कर भी रहे हैं, हिन्दी को बढ़ावा देकर। और साथी लोगों को अपनत्व की कमी न लगे इसलिए ही श्री अशोक चक्रधर जी का सत्र था। बालेन्दु जी आए इसके लिए उनको भी बहुत धन्यवाद, उनका सत्र भी रखवाते लेकिन उनका आना पहले से तय ना था और आखिर में ही तय हुआ था।

तो हाल-फिलहाल यह था मामला। मैं न आ सका, जानता हूँ यशवंत जी की मेरे से मिलने की तमन्ना थी तो उनसे और बाकी साथियों से माफ़ी चाहूँगा। जल्द ही पुनः मिलने का कार्यक्रम बनाया जाएगा खालिस हिन्दी वालों का, इसलिए टेन्शन नहीं लेने का। :D

रेवाड़ी(हरयाणा) से पधारे शैलेन्द्र यादव जी ने कुछ वीडियो उतारे जो कि यहाँ उपलब्ध हैं। उनको वीडियो उतार सबके साथ बाँटने और इतनी दूर से इस आयोजन में पधारने के लिए बहुत-२ धन्यवाद। :)

 

Categories: Blogger Meetups · blogging · unconference · असम्मेलन · ब्लॉगिंग

7 responses so far ↓

  • Pramendra Pratap Singh // January 13, 2008 at 6:34 pm

    ये तो अच्‍छी बात नही है, बुलाने वाला ही नही बहुँचा, वैसे अमित बाबू आप भी इलाहाबाद आ रहे है और हम भी आपके राह देख रहे है :)

  • अविनाश वाचस्पति // January 13, 2008 at 6:57 pm

    अमित नहीं आए
    पकड़ लिया बुखार ने
    आते तो मीत बन
    छाते, वे आते
    तो ठंडी हवा न आती।

    बुलाया हमें
    चले गए बुखार
    के बुलाने पर
    वहां पर
    आलू बुखारा
    न मिला होगा।

    अब वे जब भी
    बुलाएं तो पहले
    अपनी गारंटी दें
    दिल्ली में बुलाएं
    किसी कोने पर
    अंदर ही न बुलाएं।

    अमित आएं
    हिंदी अंग्रेजी
    को मीत बनाएं
    दिल्ली के दिल
    पर छा जाएं।

  • yash // January 13, 2008 at 8:53 pm

    ओह, मुझे ये नहीं पता था कि बुखार में थे आप। सारी। अब आप कैसे हैं? आपसे मिलने की तमन्ना अभी भी कायम है।
    यशवंत

  • राजीव तनेजा // January 13, 2008 at 10:32 pm

    इस बार नहीं तो अगली बार सही…. सेहत का नम्बर पहला है….

  • Amit // January 14, 2008 at 5:18 pm

    अरे प्रमेन्द्र बाबू, अगर बुखार ने नहीं आ दबोचा होता तो जाना तो था ही, अब जिस कार्यक्रम की पिछले दो-तीन महीनो से तैयारी कर रहे थे तो उसमें काहे नहीं जाते भई!! ;) इलाहाबाद का पक्का है, बस देखें कब आना होता है। :)

    कविता के लिए धन्यवाद अविनाश जी। :)

    यशवंत जी, मैं अब बिलकुल बढ़िया हूँ, कल ही स्वस्थ हो गया था। तमन्ना कायम रखिए, जल्द ही पूरी होगी। :)

    इस बार नहीं तो अगली बार सही…. सेहत का नम्बर पहला है….

    बिलकुल राजीव जी, मेरा भी ऐसा ही सोचना है। सेहत रही तो ऐसे काम आगे भी मुमकिन रहेंगे। :)

  • शैलेन्द्र // January 14, 2008 at 9:58 pm

    बाकि सब तो ठीक है पर हमारा जो इतना नुकसान हो गया आपके न आने से उसकी भरपाई कौन करेगा और कैसे करेगा. सस्ते मे नही छुट सकते है आप.

  • Amit // January 14, 2008 at 11:57 pm

    कैसा नुकसान शैलेन्द्र जी? चलिए आप कहते हैं तो सस्ते में नहीं छूटेंगे, अगली बार आईयेगा तो आपको एक बढ़िया सी टकाटक कॉफी पिलाई जाएगी!! :D

Leave a Comment