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तेरा क्या होगा रे याहू??

February 2, 2008 · 4 Comments

भईये टैम बोत खराब है! हाँ यदि आपने याहू (Yahoo!) के शेयर खरीद रखे हैं या फिर आप याहू के कर्मचारी हैं तो वाकई आपके लिए खराब टैम है। क्यों? अरे भांग खा के कहीं सो रहे थे का भई? याहू अपनी विश्वव्यापी 14300 कर्मचारियों की फौज में से लगभग 1000 कर्मचारियों को सेवा-निवृत्त करने की सोच रिया है ताकि अपने घटते मुनाफ़े में कुछ जोड़ सके। कैसे? अरे इस तरह इतनी बड़ी सेवा-निवृत्ति से याहू के सालाना खर्च में 10 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक की कमी आएगी और इस समय तो एक-एक डॉलर उसके लिए कीमती है क्योंकि मुनाफ़ा लगातार नीचे जाने वाली लिफ्ट पर सवार है। (अंग्रेज़ी में खबर यहाँ पढ़ें)

तो अब ऐसी हालत होने पर अनुमान लगाया जा रहा है कि याहू के पास दो ही रास्ते बचते हैं; या तो बिक जाए या फिर अपनी सर्च सुविधा को किनारे लगा गूगल की सर्च का हाथ थामे और उसके ज़रिए विज्ञापनों द्वारा डॉलर कमाए तथा अपनी हाल ही में खरीदी जायदादों को डॉलर बनाने की मशीनों में कन्वर्ट करे। अब पहले रास्ते को अपनाने से याहू के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स की सिरदर्दी तो खत्म हो जाएगी(खरीदने वाली कंपनी को बतौर बोनस में दे देंगे ना) और यदि दूसरे रास्ते को अपनाता है तो काफ़ी मेहनत करनी होगी, बहुत ज़्यादा मेहनत!!

खैर, ऐसे माहौल में अटकलों का बाज़ार पुनः गर्म हो गया है। यह मान के चला जा रहा है कि याहू तो बिकेगा ही बिकेगा, उसके पास और कोई रास्ता नहीं। ऐसे में अनुमान लगाए जा रहे हैं कि कौन आखिरकार बोलेगा या ऽऽऽऽ हू ऽऽऽऽऽ (शम्मी कपूर साहब नहीं, उनका तो टैम निकल गया, जब बोलना था तब बोल लिए, आजकल तो ईश्वर भजन में लगे रहते हैं, टैम जो आ रहा है मीटिंग का)। माइक्रोसॉफ़्ट को सबसे बड़ा दावेदार माना जा रहा है, बल्कि खबर यहाँ तक है कि माइक्रोसॉफ़्ट की ओर से 44.6 अरब अमेरिकी डॉलर में याहू को खरीदने की पेशकश हुई है। (अंग्रेज़ी में खबर यहाँ पढ़ें)

गौरतलब है कि कुछ समय पहले माइक्रोसॉफ़्ट ने याहू को 40 अरब अमेरिकी डॉलर में खरीदने की पेशकश की थी जिस पर याहू के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने 80 अरब अमेरिकी डॉलर की माँग की थी, यानि कि अन्य शब्दों में बिकने से मना कर दिया था। वैसे कुछ लोग गूगल को भी याहू की खरीद का एक प्रबल दावेदार मान रहे हैं। वैसे भी मुख्य दो खिलाड़ी यही दोनों हैं, तीसरा तो कोई दिखाई नहीं देता जिसकी इतने डॉलर अदा कर खरीदने की औकात हो!! गूगल के हाल भी कोई बहुत ज़्यादा अच्छे नहीं हैं, इसलिए हो सकता है कि वो याहू की खरीद में उस कारण या किसी अन्य कारण रुचि न दिखाए। परन्तु यदि माइक्रोसॉफ़्ट याहू को खरीदने में सफ़ल होता है तो यह माइक्रोसॉफ़्ट के लिए अभी तक का सबसे बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकता है क्योंकि माइक्रोसॉफ़्ट की भी इंटरनेट के बाज़ार में बैन्ड बजी हुई है और वह येन-केन-प्रकारेण अरबों डॉलर के इस केक में अपना बड़ा सा हिस्सा पाने की यथा संभव कोशिश में है। तकनीकी के बाज़ार में भी यह अभी तक की सबसे बड़ी बिक्री होगी, इससे पहले अभी तक की सबसे बड़ी बिक्री सन्‌ 2002 में हुई थी जब हेवलेट्ट पैकर्ड ने कंप्यूटर बनाने वाली कंपनी कॉम्पैक को 25 अरब अमेरिकी डॉलर में खरीदा था।

तो अब देखना यह है कि याहू इस संकट से पहले की भांति येन-केन-प्रकारेण बच निकलता है या इस बार वाकई कोई उसकी गिल्ली खरीद लेगा। ;)

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4 responses so far ↓

  • संजय बेंगाणी // February 2, 2008 at 10:00 am

    गूगल याहू को खरीदेगा तो उसके कई उत्पाद “बिटा” से बाहर आ सकेंगे.

    माइक्रोसॉफ्ट खरिदेगा तो गूगल को और मजबूत प्रतियोगी मिलेगा.

    याहू न बिका तो?

    किसी दिन भारतीय कम्पनी उसे खरीदेगी.

  • Amit // February 3, 2008 at 12:22 am

    गूगल याहू को खरीदेगा तो उसके कई उत्पाद “बिटा” से बाहर आ सकेंगे.

    कोई गारंटी नहीं है संजय भाई, गूगल अपने उत्पाद बीटा में अपनी सिरदर्दी बचाने के लिए रखे हुए है! :)

    याहू न बिका तो?

    किसी दिन भारतीय कम्पनी उसे खरीदेगी.

    बैंक से लोन लेकर? ही ही ही!! ;)

  • जीतू // February 3, 2008 at 11:20 am

    सबकी नजर इन्टरनैट पर विज्ञापनों से कमाई पर है, ये धंधा लगभग 25 से 30% सालाना की दर से बढ रहा है। इसमे वही विजेता रहेगा जिसके पास ज्यादा से ज्यादा इन्टरनैट प्रापर्टी होगी, अभी तक तो गूगल इसमे बाजी मारे है, आगे राम जाने।

    हमरी दिली इच्छा है कि याहू बिके और इसको बिल्लू खरीदे। क्योंकि एकाधिकार चाहे किसी का भी हो ठीक नही रहता। वैसे इस समय सभी की अच्छी बैंड बजी हुई है। एक तरीका और हो सकता है अंबानी भाई मिलकर(मिलेंगे भी?) याहू को ले लें। वैसे भी अनिल हर धन्धे मे हाथ मारना चाहता है, इन्टरनैट के धन्धे मे ही सही।

  • Amit // February 3, 2008 at 2:15 pm

    सबकी नजर इन्टरनैट पर विज्ञापनों से कमाई पर है, ये धंधा लगभग 25 से 30% सालाना की दर से बढ रहा है।

    सही कहा दादा, कंपनियाँ भी इंटरनेट पर अपने विज्ञापनों की तादाद बढ़ा रही हैं, यहाँ अधिक से अधिक खर्च कर रही हैं।

    क्योंकि एकाधिकार चाहे किसी का भी हो ठीक नही रहता।

    सोलह आने सच, एकाधिकार कभी उपभोग्ता के लिए हितकारी नहीं होता।

    वैसे भी अनिल हर धन्धे मे हाथ मारना चाहता है, इन्टरनैट के धन्धे मे ही सही।

    अरे मारे हुए तो है, वो बिगअड्डा.कॉम लिया हुआ तो है जिसका अभी हाल भी में आया कि उसके प्रयोगकर्ताओं की संख्या एक मिलियन यानि कि दस लाख से ऊपर हो गई। ;)

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