दुनिया मेरी नज़र से - world from my eyes!!

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तुन्गनाथ - भाग २

June 22, 2007 · 6 Comments

पिछले भाग से आगे …..

समीर जी ने पूछा कि नए स्लीपिंग बैग में ठंड झेल पाए कि नहीं, तो उसके संबन्ध में भी एक रोचक वाक्या हुआ। अब हुआ यूँ कि अपन नए स्लीपिंग बैग का कुछ अधिक ही भाव खा गए, और शुक्रवार की रात को केवल एक पतली सी टी-शर्ट और ट्रैक पैन्ट पहने ही घुस गए उसमें। थोड़ी देर बाद शरीर के ऊपरी भाग में ठंड सी लगने लगी, क्योंकि ऊपर से स्लीपिंग बैग खुला था!! जैकेट आदि पहन इसलिए नहीं सोया था कि सोचा स्लीपिंग बैग ही काफ़ी रहेगा!! ;) तो गलती में कुछ सुधार करते हुए जैकेट को ओढ़ लिया और उसके बाद ठंड नहीं लगी!! :) शनिवार की रात जो ऊपर तुन्गनाथ पर बिताई, तब तक समझ आ गई थी, इसलिए जैकेट और जुराब पहन के सोया था, बहुत गर्म सा रहा और अच्छी नींद आई, रविवार सुबह जल्दी ही उठ गया(बाकी सब मेरे से पहले उठ चुके थे) और अपने को बहुत तरोताज़ा महसूस किया। :D


( हमारे दो तंबुओं के सामने प्रसन्नचित माइक। )
चोपता में शुक्रवार की रात को एक अजब वाक्या हुआ था। हम तकरीबन दस बजे अपने-२ तंबुओ में अपने स्लीपिंग बैग बिछा सो गए थे। ग्यारह-बारह के आसपास रमित अचानक उठ गया, पूछने पर बोला कि बाहर तंबू के पास कोई घूम रहा है। ध्यान से सुनने पर कदमों की आहट सुनाई दी, टॉर्च आदि जला के ऊँची आवाज़ में पूछा भी गया कि कौन है लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला और आवाज़ आनी बन्द हो गई। हम सो गए, थोड़ी देर बाद पुनः आवाज़ आने लगी और रमित फिर जाग गया और साथ ही मैं भी। बाहर झांक के भी देख लिया लेकिन कोई दिखाई नहीं दिया, बड़ी टॉर्च की रोशनी भी किसी काम की नहीं थी, घुप्प अंधेरा था। अंदर आकर पुनः सो गए, मन में अजीब से ख्याल आ रहे थे कि कोई वाकई में तो नहीं है, यदि है तो अगर कोई चोर हुआ तो तम्बू को चाकू आदि से काट सामान लेकर चलता बनेगा!! किसी तरह सुबह हुई, साढ़े चार के करीब रोशनी हुई और रमित चिल्ला पड़ा कि किस पागल ने टॉर्च जलाई है, उसको सोने दिया जाए!! ;) बहरहाल, सुबह उठ हम लोगों को पता चला कि रात कोई नहीं था, हवा वेग से चल रही थी और तम्बू से तकराने के कारण आवाज़ हो रही थी!! ;)


( सुबह इतना बढ़िया नज़ारा दिखाई दिया, मन प्रसन्न हो गया। )


( ऊपर तुन्गनाथ तक पहुँचते ही ओलों की बरसात हो गई, इतने ओले गिरे कि बरसात थमने के बाद ऐसा लग रहा था कि बर्फ़ गिरी हो। ओले पड़ने के कारण हमारा कार्यक्रम बिगड़ गया, तुन्गनाथ पर अब तम्बू नहीं लगा सकते थे, इसलिए एक धर्मशाला में दो बड़े कमरे लिए। )


( रविवार की सुबह, जिस दिन हमको वापस लौटना था। )

इस बार तुन्गनाथ की चढ़ाई में मेरा उतना बुरा हाल नहीं हुआ जितना पिछली बार हुआ था। इस बार स्निग्धा साथ नहीं थी कि हौसला दे साथ चले, इस बार अपने आप करना था और किया। पिछली बार के मुकाबले इस बार चढ़ने में एक घंटा कम लिया, उतना कठिन नहीं लगा जितना पिछली बार लगा था(क्योंकि इस बार शर्मा जी और वनराज भाटिया साहब को सुनते हुए चढ़ाई की)। उतरते समय भी पिछली बार के मुकाबले एक घंटा कम लिया, आधा रास्ता सुबोश्री से बात करते हुए कटा और आधा रास्ता शर्मा जी को सुनते और खूबसूरत नज़ारों को निहारते हुए। :)

इस यात्रा के दौरान लिए गए सभी चित्र यहाँ देख सकते हैं।

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तुन्गनाथ - भाग १

June 21, 2007 · 7 Comments

मई 2007 के दूसरे सप्ताहांत पर पुनः तुन्गनाथ जाने का कार्यक्रम बना। पिछली बार का हादसा याद था, लेकिन जोश बरकरार था और मन में नई उमंग थी। इस बार की अपनी यात्रा भी अलग होनी थी, इस बार तम्बू वगैरह लेकर चल रहे थे, पैक्ड रेडी-टू-ईट(ready-to-eat) खाना साथ था जो कि तुरन्त बनने वाली किस्म का था। तुन्गनाथ पर पिछली बार की ठंड का अनुभव होने के कारण मैंने यात्रा पर निकलने से पहले ला-फूमा का नया स्लीपिंग बैग खरीदा जो कि 5 डिग्री सेल्सियस से 0 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान आराम से झेल लेता है; पहली रात तम्बू चोपता में लगाना था और समुद्र स्तर से लगभग साढ़े बारह हज़ार फीट की ऊँचाई पर रात को तापमान कम होने की पूरी आशा थी, मई में भी, क्योंकि इतनी उँचाई पर सारा साल ही ठंड रहती है। एक और खास बात यह थी कि यह व्हर्लविन्ड(whirlwind) यात्रा होनी थी क्योंकि यदि इसको आराम से करना हो तो चार दिन लगते हैं और हमे इसको तीन दिन में निपटाना था। ;) इस बार दिल्ली से गाड़ी ले जाने की जगह हम हरिद्वार तक ट्रेन से गए और वहाँ से आगे जाने के लिए टाटा सूमो ली। केवल योगेश और मेरी ही यह तुन्गनाथ की दूसरी यात्रा थी, बाकी के पाँचों साथी पहली बार जा रहे थे।

चूँकि इस यात्रा के फोटो मैंने पिछली बार लिए थे, इसलिए लेने के लिए इस बार कुछ खास नहीं था।


( देवप्रयाग में भगीरथी और अलकनंदा का संगम )


( ऋषिकेश की ओर जाती गंगा )


( सियालसौर पर सड़क किनारे एक रेस्तरां में दोपहर भोजन के लिए रूके थे। वहीं बगल में ऊपर से बह कर आ रही थी मंदाकिनी। )


( चोपता पहुँच हमारी कैम्पसाइट से दिखाई देती हिम से ढकी पर्वत शृंखला )


( दो-तीन सप्ताह पूर्व तक तो तुन्गनाथ पर भी बर्फ़ थी जो कि पिघली नहीं थी, यानि कि अप्रैल के महीने में जब हम मुक्तेश्वर की यात्रा पर थे। )


( यदि मेरा कैमरे पर पोलराइज़र लगा होता तो यह फोटो और बढ़िया आता )


( इस पर्वत ने और दृश्य ने तो मेरा मन मोह लिया था )

अगले भाग में जारी …..

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मुक्तेश्वर - भाग ४

June 17, 2007 · 11 Comments

पिछले भाग से आगे …..

रविवार सुबह जल्द ही आँख खुल गई। लगभग सभी जाग गए थे; बाहर बाल्कनी में आकर देखा तो आज की सुबह आकाश पिछली सुबह के मुकाबले काफ़ी साफ था। इसलिए आज सामने स्थित पर्वत शिखरों की तस्वीरें बेहतर आईं। इतनी दूर होने पर भी नंदा देवी, चौखम्बा, त्रिशूल आदि इतनी पास लग रही थी कि मन कर रहा था कि हनुमान की भांति एक ही छलांग लगा किसी एक के शिखर पर लैंड कर जाओ। ;)

बहरहाल आज समय अधिक नहीं था, हमको जल्द ही निकलना था ताकि मुक्तेश्वर में एकाध जगह देख वापसी की जाए, नौकुछियाताल आदि देख सांय जल्दी हल्द्वानी पहुँच अच्छी डीलक्स बस में सवार हो दिल्ली पहुँचें। तो फटाफट तैयार हो, नाश्ता कर और यात्री निवास का बकाया भुगतान कर हम लोग चौली की जाली की ओर पैदल ही चल पड़े, गाड़ी के ड्राईवर को बोल दिया कि मंदिर के पास पहुँच हमारी प्रतीक्षा करे। चौली की जाली यात्री निवास के पीछे से होकर जाती एक पगडंडी के अंत पर है, एकाध पत्थर की शिलाएँ हैं जिनके आगे गहरी खाई है। मुक्तेश्वर में एक एडवेन्चर कैम्प मौजूद है जिसका नाम “कैम्प पर्पल” है। वे लोग यहाँ चौली की जाली पर रैप्पलिंग(rappelling) करवाते हैं। जब हम लोग वहाँ पहुँचे तो कुछ लोगों का एक फैमिली ग्रुप वहाँ था और जीन्स पहने एक मोहक सी कन्या बैठी थी(जो कि उस फैमिली ग्रुप की सदस्या नहीं थी)। वहाँ एक शिला पर हम भी कुछ मिनट बैठे, तस्वीरें आदि ली गईं। अब सबकी एकसाथ तस्वीर भी चाहिए थी, लेकिन किससे कहते लेने को, इसलिए एक पत्थर पर मैंने अपना कैमरा टिका ऑटो टाईमर ऑन किया जिससे हम सब लोगों की एक साथ वाली तस्वीर आ गई।

धूप बहुत तेज़ी से निकल आई थी, लेकिन अधिक नहीं चुभनी आरम्भ हुई थी। लेकिन धूप निकल आने का एक लाभ यह हुआ कि उस जगह से दूर-२ तक साफ़ दिखाई दे रहा था।

योगेश और मनोज को कुछ और नहीं सूझा तो दोनो पेड़ पर ही चढ़ बैठ गए और मुझसे बोला गया कि लो तस्वीर। अब अपना क्या घिसता था जब दो लंगूर…..अरर….. मेरा मतलब दो मॉडल बैठे बिठाए मिल गए तो!! ;)

लेकिन कदाचित्‌ हितेश को लगा कि पेड़ पर चढ़ना इतना कूल नहीं है, इससे आगे जाना होगा। वहाँ कैम्प पर्पल वाले आ चुके थे अपने अतिथियों के साथ जो रैप्पलिंग करना चाहते थे। उनसे बात की गई और वे हितेश को रैप्पलिंग करवाने को तैयार हो गए। तुरंत ही अपने बांका जवान को सजा दिया गया और एक ओर शिला से नीचे खाई में उतारा गया।

उसको करीब 80 फ़ीट नीचे उतारा गया जहाँ पत्थरीली दीवार का एक हिस्सा बाहर आया हुआ था और एक प्रकार की लैंडिंग बनी हुई थी। अब नीचे उतरना तो आसान था लेकिन वापस ऊपर चढ़ना कठिन। लेकिन कुछ देर के प्रयास के बाद हितेश वापस ऊपर आ गया। उसका मन प्रसन्न था कि मज़े ले लिए, हम प्रसन्न थे कि बिना दुर्घटना के एडवेन्चर पूरा हुआ। ;) अब इसके बाद शायद योगेश भी जाना चाहता था लेकिन कैम्प पर्पल वालों का अपना समूह तैयार था इसलिए उन्होंने खेद जताते हुए मना किया कि किसी और को नहीं करवा पाएँगे। अब धूप में रूकने का कोई कारण नहीं था, इसलिए सब दूसरे रास्ते पर आगे बढ़ लिए जो कि मंदिर तक जाता था जहाँ हमारी गाड़ी और ड्राईवर हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। मंदिर पहुँच सभी मंदिर में दर्शन करने चले गए और मैं गाड़ी की ओर बढ़ गया। थोड़ी देर बाद बाकी के साथी भी आ गए तो हम लोग गाड़ी में लद नौकुछियाताल की ओर बढ़ लिए। ड्राईवर गाइड का भी काम कर रहा था और कई रोचक बातें बताता जा रहा था।

नौकुछियाताल के पास एक पहाड़ी पर पैरा-ग्लाईडिन्ग होती है, तो सभी का मन था कि वहाँ चल उसका आनंद भी लिया जाए, आखिर केवल हितेश की काहे मजे ले!! ;) जल्द ही हम लोग उस पहाड़ी पर पहुँच गए जहाँ पैरा-ग्लाईडिन्ग कराई जाती है। एक बड़े और चौड़े पैराशूट से लटककर व्यक्ति उँचाई से नीचे कूदता है और हवाओं के धक्के से आगे ग्लाईड करता लैन्डिन्ग स्थल पर लैन्ड करता है जो कि वहाँ से 2 किलोमीटर दूर था। वहाँ प्रतीक्षारत व्यक्ति उसको जीप में बिठा वापस पहाड़ी पर लाकर छोड़ देते हैं। हमारी गाड़ी एक निश्चित स्थान तक ही गई, उसके बाद ऊपर हमको पैदल ही चढ़ना था जहाँ पैरा-ग्लाईडिन्ग हो रही थी। इस चढ़ाई ने तुन्गनाथ वाली चढ़ाई की याद दिला दी, हालांकि यह चढ़ाई तो बहुत छोटी थी!! ;) ऊपर पहुँच देखा तो पता चला कि काफ़ी भीड़ है। एक जवान पैराशूट से बंधा अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहा था और उसकी सुन्दर नई नवेली पत्नी उसको निहार रही थी। अब इसको किसी गलत सेन्स में नहीं लिया जाए, वो मोहतरमा सुन्दर थीं तो इसलिए मैंने सुन्दर लिखा है। :) हम लोग पीछे की ओर पत्थर पर बैठ गए। हवा का मन नहीं था इसलिए आराम से चल रही थी बिना वेग के, थककर बेचारा जवान भी बैठ गया। वहाँ उपर से नौकुछियाताल बहुत अच्छा लग रहा था। हमारे ड्राईवर ने बताया कि इस ताल के नौ कोने हैं और सभी एक साथ नहीं दिखते, दंत कथा है कि यदि कोई इसके सारे नौ कोने एक साथ देख ले तो उसकी तुरंत मृत्यु हो जाएगी।

किसी को उस जवान की बारी आती नहीं दिख रही थी, और उसके बाद 7-8 लोग और लाइन में थे, तो हम लोगों ने सोचा कि चला जाए, पैरा-ग्लाईडिन्ग उस रोज़ संभव नहीं। उतर कर नीचे गाड़ी के पास आए तो वहाँ से नौकुछियाताल की एक बढ़िया तस्वीर मिल गई।

कुछ ही देर में हम लोग नौकुछियाताल पहुँच गए। सबने निर्णय लिया कि पहले नौका विहार किया जाए और उसके बाद दोपहर का भोजन। मेरा मन हंस के आकार वाली एक नौका में विहार करने का था, लान्सडौन में हितेश और शोभना ने उस में बैठ पता नहीं क्या आनंद लिया था!! ;) तो मेरे साथ मनोज हंस वाली नौका में आ गया और बाकी के लोग चार सीट वाली दूसरी नौका में चले गए जिसमें पहले हितेश और दीपक पीछे बैठ पैडल चला रहे थे। मैंने अपनी नौका इन लोगों की नौका के पीछे साईड में लगा ली और पास पहुँच मनोज ने पीछे से इनकी नौका पकड़ ली और मैंने पैडल चलाना बन्द कर दिया। अब उन लोगों की नौका के साथ ही अपनी नौका भी धीरे-२ बढ़ रही थी। :D हितेश को एकाएक लगा कि उन लोगों की नौका थोड़ी भारी हो गई है, पैडल चलाने में दिक्कत हो रही थी। दीपक ने पीछे मुड़ के देखा तो पाया कि मनोज उनकी नौका को पकड़े दांत फाड़ रहा था। ;) तुरंत ही हम लोगों को उन दोनों से सुनने को स्तुति गान मिला और हमने हंसते हुए उनकी नौका छोड़ी और अलग हो फटाफट निकल लिए(क्योंकि हितेश खड़ा हो हमारी नौका में आने की तैयारी कर रहा था)!! ;) वे लोग अलग निकल लिए और हम उनसे आगे अलग निकल लिए। इस बड़े ताल में बहुत से जोड़े भी विहार कर रहे थे। हम थोड़ा आगे गए तो एक सुनसान किनारे पर एक नौका को खड़े देखा जिसमें तोता-मैना का एक जोड़ा चोंच लड़ाने में व्यस्त था। आगे एक किनारा थोड़ी उँचाई पर था और वहाँ कुछ मकान बने थे, मन यह सोच रहा था कि यदि ऐसे मकान में रहा जाए तो कितना आनंद आएगा। अभी हम लोग मुड़कर दूसरी ओर आए कि आगे एक और नौका दिखी जिसमें एक और तोता-मैना का जोड़ा चोंच लड़ा रहा था। खैर यह तो आम बात है, इसलिए नज़रअंदाज़ कर हम लोग आगे निकल लिए। बाकी के साथी पूरे ताल की परिक्रमा करने का इरादा रखे हुए थे, जबकि हम लोग ताल के बीच में ही टाइमपास कर रहे थे। जब वे लोग वापस हो हमारे पास आए तो हमने अपनी नौका उनके बाजू में लगा ली। उनको लगा कि हम पुनः वही हरकत करने वाले हैं इसलिए हमको चेतावनी दी गई और हमारे सफ़ेद झंडा दिखाने के पश्चात ही हमको उनके बगल में नौका लगाने की अनुमति मिली। तकरीबन 20-25 मिनट के विहार के बाद हम लोग किनारे पर पहुँच बाहर आ गए।

बाहर आते ही एक मज़ेदार वाक्या हुआ। सोनी के एक बेसिक साइबरशॉट डिजिटल कैमरा लिए एक फोटोग्राफ़र ने हमको घेर लिया और फोटो खिंचवाने के लिए बोलने लगा। हमारे मना करने पर भी नहीं टला और जबरन अपनी एल्बम हितेश के हाथ में थमा दी। यार लोग भी अब मूड में आ गए थे कि मजा लिया जाए, इसलिए उसके द्वारा खींची तस्वीरें देखने लगे जो कि कोई खास नहीं थी, ऐसी तो हम ही खींच सकते थे!! ;) तो जब उन साहब को एल्बम वापस की गई तो वे पुनः बोले। इस बार हम सबने अपने-२ औज़ार निकाल लिए। सबके पास उन साहब के कैमरे से महँगे और बेहतर कैमरे थे, और योगेश के पास तो निकोन का एसएलआर था!! ;) वो साहब थोड़ा चकित हुए तो हमने आगे उनको और घेरा। हितेश की ओर इशारा कर उनको बताया गया कि इन साहब(हितेश) के दिल्ली में दो फोटो स्टूडियो हैं। अब वो फोटोग्राफ़र नीचे आ गिरा, बोला कि उसको भी नौकरी दे दी जाए, तो हम लोग मुस्कुराते हुए सामने मौजूद ढाबे पर बढ़ लिए और वो फोटोग्राफ़र साहब अपने रास्ते। घोड़े देख हितेश का मन सवारी करने का हुआ, पट्ठा एक ही दिन में पूरी मौज लेना चाहता था!! तो उसने एक नहीं वरन्‌ दो-दो चक्कर काटे सुल्तान नाम के एक बढ़िया श्यामवर्ण घोड़े पर।

इसके बाद आखिरकार भोजन किया गया। सभी को अच्छी खासी भूख लग आई थी और खाना भी स्वादिष्ट था। भोजन उपरांत हम लोग भीमताल की ओर बढ़ लिए। यह ताल नौकुछियाताल से भी बड़ा है और यहाँ भी नौका विहार होता है लेकिन चूंकि हम लोग नौकुछियाताल में विहार कर चुके थे इसलिए यहाँ करने की कोई इच्छा नहीं थी। तो कोई फोन पर व्यस्त था तो कोई हल्का होने चला गया, मैं, दीपक और योगेश ताल के किनारे एक पत्थर की छतरी के नीचे ताश खेलने लगे।

कुछ देर पश्चात एक रेस्तरां में हमने चाय-कॉफ़ी आदि ली और उसके बाद ताज़ादम हो वापस हल्द्वानी की ओर बढ़ लिए। हल्द्वानी पहुँचे तब तक अंधेरा हो गया था। ड्राईवर को बकाया पैसे और अच्छी सी टिप देकर हमने विदा किया और बस स्टैन्ड की ओर बढ़ लिए। एक बात देखकर बहुत खीज हुई, पूछताछ काउंटर पर कोई उपस्थित नहीं था और अन्य किसी को डीलक्स बस की सही जानकारी नहीं थी या सही बताना नहीं चाहता था। जिससे पूछो यही कहता कि सामने जो उत्तरांचल परिवाहन की बस जा रही है वही है दिल्ली के लिए, उसी में निकल लो। अब वह तो हमको भी दिख रहा था लेकिन दो-ढाई सौ किलोमीटर का रात का सफ़र हम उस थकी हुई बस में नहीं करना चाहते थे। डिलक्स बस के दोगुने पैसे देने में हमे कोई ऐतराज़ नहीं था लेकिन सफ़र आराम से करना चाहते थे क्योंकि सभी थके हुए थे और थोड़ी नींद लेना चाहते थे। लेकिन जब डीलक्स बस का कोई पता नहीं चला तो हमने सोचा कि उस थकी हुई बस में ही आराम से जाएँगे, इसलिए तीन वाली बड़ी तीन सीटें ली और बकायदा नंबर लिखवा बुक करा ली। उसके बाद पास ही की एक मिठाई की दुकान में गए जिसमें खान-पीने की व्यवस्था भी थी। मेनू तो लंबा चौड़ा था लेकिन जो भी चीज़ पूछो उसी के लिए उत्तर मिलता कि उपलब्ध नहीं है। आखिर में मैंने पूछा कि भई जो है वही बता दे और इस प्रकार ठीक-ठाक बने वेज फ्राईड चावल से पेट भरा गया, क्या करते, भूख में तो चने भी मेवा लगते हैं!! तो दाना चुगने के बाद हम अपनी बस में आकर बैठ गए, और थोड़ी ही देर में बस चल पड़ी।

हितेश और मैं आगे एक सीट पर बैठे थे और अपने बैग हमने बीच में रखे हुए थे, बाकी लोग पीछे की दो सीटों पर विराज रहे थे। नींद लेने की कोशिश की गई लेकिन आई नहीं। आगे एक स्टैन्ड पर कुछ लोग चढ़े, एक साहब अकड़ के बोले कि बैग उठाकर अपनी गोद में रखूँ और उनको बैठने दूँ, तो मैंने भी अकड़कर उत्तर दे दिया कि पूरी सीट(तीन लोगों) के पैसे दिए हैं, इसलिए आराम से खड़ा रह। उनको यकीन नहीं आया तो कंडक्टर को बुला लिया और जब कंडक्टर ने मुझसे पूछा तो मैंने टिकट दिखा दिए जिसके बाद वो साहब बुरा सा मुँह बना बस के बोनट पर बैठ गए। पता नहीं कितना समय बीत गया, बस ठीक-ठाक रफ़्तार से बढ़ रही थी लेकिन उस कड़ी सीट पर बैठना कष्टदायी हो रहा था, सारा दिन टाटा सूमों में सफ़र किया था जिसकी सीट भी कुछ खास नहीं थी लेकिन बस की सीट से बढ़िया थी, लेकिन बैठे-२ वाट तो लग ही जाती है। एक बड़े से बस अड्डे पर बस रूकी, जहाँ ड्राईवर को चाय वगैरह पीनी थी। तो हम लोग भी टाँग सीधी करने की गरज से नीचे उतर आए। वहीं बाजू में जेबीसीएल की एक उत्तर प्रदेश परिवाहन की वातानुकूलित 2×2 डीलक्स बस देखी जो कि हल्द्वानी से आ रही थी(हमारी बस के पीछे-२ ही चली दिख रही थी) और दिल्ली जा रही थी। हमको उन दोनों बस वालों पर बहुत क्रोध आया जिन्होंने हल्द्वानी बस स्टैन्ड पर हमको कहा था कि रविवार को कोई डीलक्स बस नहीं चलती दिल्ली के लिए। यकीनन उन्होंने इसलिए गलत बताया था क्योंकि डीलक्स बस उत्तरांचल परिवाहन की न होकर उत्तर प्रदेश परिवाहन की थी। पर अब क्या कर सकते थे, जी-भर कर उन दोनों को गालियाँ देने के बाद हम वापस अपनी बस में आकर बैठ गए, अब तो बैठना और भी कष्टदायी हो गया था। थोड़ी देर बाद बस चल पड़ी, आखिरकार थके हुए मस्तिष्क पर नींद हावी हुई और एक झपकी आ गई, कुछ देर बाद आँख गर्मी के कारण खुली और देखा कि अपनी बस लगभग 20-30 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से रेंग रही है। आखिरकार किसी तरह उस नारकीय बस यात्रा का अंत हुआ और हम दिल्ली पहुँच गए। एक बात जो मेरे ध्यान में आई वह यह कि इस यात्रा पर ठीक तरीके से सोना नसीब नहीं हुआ, न जाते समय, न यात्रा के दौरान और न ही आते समय।

इस यात्रा के दौरान ली गई तस्वीरें यहाँ उपलब्ध हैं।

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मुक्तेश्वर - भाग ३

June 8, 2007 · 7 Comments

पिछले भाग से आगे …..

अगले दिन की सुबह बढ़िया थी, लेकिन हमारे पहली मंज़िल पर स्थित कमरे की बाल्कनी से सामने नंदादेवी, पूर्वी नंदादेवी, चौखम्बा, त्रिशूल आदि साफ़ नज़र नहीं आ रहे थे, उनकी शिखाओं को बादलों और धुंध ने घेर रखा था, बर्फ़ ने अपनी चादर से तो वैसे ढक ही रखा था। सुबह जल्दी ही निकलने का कार्यक्रम था, मेरे को नींद आ रही थी, जाने का मन नहीं था लेकिन मेरी एक नहीं चली, कह दिया गया कि यदि नींद आ रही है तो गाड़ी में सो जाउँ, जंगल वाले शॉर्टकट से जाने पर भी अल्मोड़ा पहुँचने में एक-डेढ़ घंटा तो लगेगा ही, तो हम लोग पौने आठ तक निकल लिए। लेकिन मेरा मन कुछ अजीब सा हो रहा था, उल्टी सी आने को हो रही थी, तबियत खराब लग रही थी। :(

किसी ने सुबह नाश्ता नहीं किया था इसलिए थोड़ी आगे जाने पर एक चाय की दुकान पर गाड़ी रोकी गई और सभी निकल चाय पीने चले गए। मैं गाड़ी में ही आँखें बन्द किए बैठा रहा,तबीयत वाकई खराब लग रही थी, कदाचित्‌ ठंड लग गई थी। मोन्टू और मनोज को लगा कि तबीयत खराब सी है तो वो पूछने भी आए और बोले कि यदि अधिक खराब नहीं है तो साथ ही चल लूँ, थोड़ी देर में ठीक हो जाएगी, नहीं तो वापस जा आराम करूँ। अब मेरे भी दो मन थे, एक कहता कि वापस जाउँ और एक कहता बढ़े चलो वीर जवान। मन किया कि घर फोन कर माँ से बात करूँ, लेकिन गले से भारी सी आवाज़ निकल रही थी। माँ ने छूटते ही पूछा कि आवाज़ को क्या हुआ, पिछली रात को बोतल वगैरह लगाई थी क्या!! ;) तब मैंने बताया कि नहीं बोतल तो नहीं लगाई थी, लेकिन तबीयत खराब लग रही है। तुरंत सलाह मिली कि एक लौंग दाढ़ में दबा लूँ और कुछ गर्म दूध या कॉफ़ी पी लूँ। अब चाय मैं पीता नहीं इसलिए माँ ने वो पीने को नहीं कहा। तो मैंने सलाह पर अमल करते हुए मनोज से कहा कि आसपास देखे लौंग मिले तो ले आए और चूँकि कॉफ़ी उपल्ब्ध नहीं थी, मैंने इसलिए इलायची वाली चाय पी। चाय पीते ही और लौंग मुँह में दबाते ही चमत्कारी असर हुआ, तबीयत सुधरने लगी। :)

बाकियों ने भी मेरी तबियत में सुधार देख राहत की साँस ली होगी, क्योंकि साथ चलने वालों में किसी एक की भी तबियत खराब हो जाए तो बाकियों को भी भुगतना पड़ता है। तो इस सुधरती तबीयत के साथ हम लोग आगे बढ़ चले, जंगल के बीच से निकलती सड़क से अल्मोड़ा की ओर। जंगल में एकाध जगह बीच में हम रूके भी, जहाँ लोग कुछ टहल लिए और हल्के हो लिए। हितेश को पता ही नहीं चला कि कब उसके पीछे से आकर मैंने उसकी उस समय तस्वीर ले ली जब वह एक पेड़ की सिंचाई में व्यस्त था!! ;)

थोड़े समय बाद हम लोग अल्मोड़ा को पार कर कटारमल की ओर बढ़ रहे थे, मार्ग में कोसी पड़ा जहाँ नदी किनारे हम लोगों ने दोपहर का भोजन करने की सोची। कुछ ही देर में कटारमल भी पहुँच गए। यहाँ का सूर्यमंदिर कभी भव्य रहा होगा, लेकिन वर्षों से अपेक्षित पड़े रहने के कारण खंडहर हो गया।

लेकिन फिर कुछ समय पहले एएसआई को सुध आई होगी और इसके रीस्टोरेशन का कार्य आरम्भ हुआ, जब हम गए तब भी चल रहा था।

इसके कॉमप्लेक्स में एक बड़े मंदिर को घेरे 45 छोटे मंदिर हैं, जिनमें अब मूर्तियाँ आदि नहीं हैं, केवल ढांचे ही हैं।

थोड़ा समय वहाँ व्यतीत कर हम लोग वापस हो लिए। कोसी पहुँच सभी का नदी में बैठने का मन हुआ। आसपास के कुछ स्थानीय लोग भी स्नान कर रहे थे। एक स्थान पर जहाँ पत्थर अधिक थे और पानी केवल घुटनों से नीचे था, वहाँ सभी लोग अपनी-२ बीयर की बोतलें खोल के बैठ गए। अब न मेरा बीयर का मन था और न ही नदी में जाने का, इसलिए मैं किनारे पर ही एक शिला पर बैठ बाकी लोगों की अर्ध नग्न तस्वीरें लेने लगा, एकाध वीडियो भी बना डाले। ;) वे लोग जब बाहर आ कपड़े बदल रहे थे तो तब भी अपने मोबाइल से उन सबका वीडियो उतारा जा रहा था जिसकी उनको भनक भी न थी। दीपक ने सोचा कि मैं तस्वीर लेने जा रहा हूँ तो अपनी-२ चड्ढी और अंगोछे संभाल सभी एक दूसरे के कंधों पर हाथ रख एक कतार में पोज़ बना के खड़े हो गए। झटका तो उनको तब लगा जब मैंने खुलासा किया कि उनका तो वीडियो बन रहा है और काफ़ी देर से बन रहा है!! ;)

आखिरकार अपने-२ कपड़े पहन सभी रेस्तरां में पहुँचे और वहाँ दोपहर का भोजन निपटाया गया। उसके बाद वापस मुक्तेश्वर की ओर चल दिए। रास्ते में एक जगह बढ़िया कैम्पसाइट दिखी, सड़क के बाजू में ही घास का मैदान और उसपर उगे हुए लम्बे पेड़। वहाँ बड़े ही टशन में फोटो खिंचवाई गई।

उसके बाद अगला पड़ाव अल्मोड़ा था। मोन्टू का कहना था कि बाज़ार बहुत अच्छा है वो देखना है तो हम उसके कहने पर बाज़ार भी देख लिए, कुछ खास न था, मोन्टू की सभी ने खूब चिकाई करी!! और वहाँ की नगर पालिका की स्थापना सन्‌ 1864 में हुई थी यह देख वाकई हैरानी हुई।

अल्मोड़ा से भी एकाध जगह से सुन्दर दृश्य दिखे।

तत्पश्चात हम लोग वापस मुक्तेश्वर आ गए। यात्री निवास की ओर जाते समय सूर्यास्त हो रहा था, तो उसकी एक और अच्छी तस्वीर मिल गई।

थके होने के कारण सभी आराम करना चाहते थे, इसलिए बोतल वगैरह को अधिक तवज्जो नहीं दी गई। लेकिन ताश का जो खेल पिछली रात्रि खेला था उसमें मज़ा आ गया था इसलिए मनोज और मैंने योगेश तथा हितेश को थोड़ी देर खेलने के लिए तो पकड़ ही लिया। मैं मन ही मन सोच रहा था कि अच्छा हुआ जो सुबह यात्री निवास में नहीं रूका और वापस आने से पहले माँ को फोन कर लिया, तबीयत में सुधार हो गया और बाकी का दिन मौज-मस्ती से बीता वर्ना में पूरा दिन खामखा बेकार तो होता ही, अकेले मैं बोर भी हो जाता!! ;)

अगले भाग में जारी …..

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मुक्तेश्वर - भाग २

June 2, 2007 · 7 Comments

पिछले भाग से आगे …..

सारी रात शर्मा जी का संगीत सुनते-२ बीती, जब भी नींद आने लगती, एरिस के दूत मच्छर कान के पास अपनी म्यूज़िकल नाइट का आयोजन करने लगते। खैर, किसी तरह रात्रि बीती। सुबह हलद्वानी पर गाड़ी रूकी तो हम लोग भी उतर लिए। बस अड्डा रेलवे स्टेशन से लगभग एक किलोमीटर ही दूर है, लेकिन पता न होने के कारण ऑटो वाले ने हम लोगों से चालीस रूपए ऐंठ लिए। बस अड्डे पर पहुँच सभी ने थोड़ी पेट पूजा की, तकरीबन एक घंटा प्रतीक्षा के बाद दीपक का दोस्त मनोज भी चण्डीगढ़ से पहुँच गया। अब आगे जाने के लिए हम लोगों को एक गाड़ी चाहिए थी, मोलभाव के बाद आठ सौ रूपए प्रतिदिन(डीज़ल का खर्च अलग) पर एक टाटा सूमो मिल गई और हम लोग अपने रास्ते लग लिए।

कुछ देर बाद हम लोग भीमताल पहुँचे। यहाँ रूक सभी ने कुछ तस्वीरें ली। अब मेरा कैमरा तो घर से निकलते समय नाराज़ हो गया था, लेकिन इस बार चल गया, कदाचित्‌ प्रसन्न था कि उसको किसी बेकार जगह की तस्वीर नहीं लेनी पड़ेगी!! ;)

लगभग दस बजे हम लोग मुक्तेश्वर स्थित कुमाउँ मण्डल विकास निगम के यात्री निवास पहुँच गए। वहाँ से सामने हिमालय की पहाड़ियों का बहुत ही सुन्दर नज़ारा था।

यात्री निवास वालों की पानी की टंकी खाली थी। पास ही एक बड़ी टंकी थी जिसमें ऊपर चोटी से पानी की एक धार बहकर आती थी और टंकी में पानी एकत्र होता था। आसपास वालों के लिए पानी का एक वही स्रोत है। उसी टंकी में से हम लोगों ने थोड़ा बर्फ़ीला पानी लिया और हर गंगे का उच्चारण किया!! ;) पहले दिन का कोई एजेन्डा नहीं था, इसलिए पेट पूजा कर हम सभी पास के जंगली मार्ग पर पैदल ही पाँच किलोमीटर दूर सीतला गाँव की ओर चल दिए। जंगल में लाल रंग के अति सुन्दर फूलों के कई पेड़ थे।

जंगल से होकर गुज़रते इस मार्ग को देखने से ऐसा लग रहा था कि मानो नज़ारा किसी परी-कथा से कोई दृश्य जीवित हो उठा हो।

थोड़ी दूर पर एक खंडहर इमारत दिखाई पड़ी तो वहाँ थोड़ी देर रूके, तस्वीरें आदि ली गई और फिर अपनी राह लग लिए। तकरीबन डेढ़-दो घंटे में सीतला पहुँच गए। वहाँ सीतला एस्टेट(एक पुरानी हवेली, अब एक छोटा हेरिटेज होटल है) के बाजू में मौजूद दुकान पर शीतल पेय आदि पिया गया, थोड़ी देर बैठे और दुकान पर बैठे बुजुर्गवार से बात की गई। उसके बाद वापस मुक्तेश्वर की ओर चल पड़े। मन में आया की सीतला एस्टेट भी देख ली जाए तो मैं, हितेश और मोन्टू उसको अंदर से देखने गए। वहाँ मौजूद कर्मचारी ने बताया कि इसकी बुकिंग दिल्ली से होती है। वहाँ दो सुइट और एक कमरा है जिनका एक दिन का किराया 4500, 4000 और 3500 रूपए है। 4500 और 4000 रूपए वाले दो सुइट हैं, जो कि बहुत अच्छे बने हुए हैं और 3500 रूपए वाला कमरा है। सभी की सजावट पुराने ज़माने जैसी राजसी प्रकार की है, और किराए में ही आपका तीन समय का भोजन और दो समय की चाय भी सम्मिलित है। मुझे 4000 रूपए वाला सुइट सबसे अधिक पसंद आया क्योंकि उसका वादी की ओर रूख है और बिस्तर के बिलकुल सामने एक बहुत बड़ी पारदर्शी शीशे की खिड़की है जिससे पूरी वादी का लुभावना नज़ारा होता है। समझने वाले समझ सकते हैं कि यहाँ ठहरने का फायदा कब है!! ;)

बहरहाल, एस्टेट देखने के बाद हम लोग मुक्तेश्वर के रास्ते पुनः लग लिए। शाम हो आई थी, सूर्यास्त होने ही वाला था। तकरीबन ढाई घंटे में हम लोग वापस पहुँच गए। जाते समय तो केवल एक पतली सी टी-शर्ट डाल रखी थी क्योंकि बहुत गर्मी लग रही थी, लेकिन अब वापस ऊपर मुक्तेश्वर पहुँचे के बाद ठंड लगनी आरंभ हो गई थी, पसीना सूख रहा था, सूर्यास्त हो गया था!!

वापस पहुँच सभी बिस्तर पर पड़ गए, काफी थकान हो रही थी। हितेश ने एक बाल्टी गर्म पानी मंगवा लिया और आधा पानी मेरे लिए छोड़ बाल्टी में पैर डाल उनकी सिकाई करने लगा। इधर सांय सूर्यास्त से पहले मैं और मनोज पास के बाज़ार में जाकर नाश्ते का सामान ले आए थे। तो अंधेरा होते ही हमारे कमरे में महफ़िल जमी, मैं, योगेश, मनोज और हितेश समय व्यतीत करने के लिए ताश खेलने लगे। कोई नया खेल था जो मैंने कभी पहले खेला नहीं था, मनोज भी इसमें नया था, हितेश और योगेश पुराने खिलाड़ी हैं, लेकिन मज़ा खूब आया इसमे कोई शक नहीं।

अगले दिन के बारे में निर्णय हुआ कि सुबहे सवेरे अल्मोड़ा के आगे कोसी और कटारमल की ओर निकल पड़ेंगे।

अगले भाग में जारी …..

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मुक्तेश्वर - भाग १

April 25, 2007 · 8 Comments

खजुराहो और ओरछा घूमकर आए तकरीबन दो महीने हो गए थे, घुमक्कड़ कीड़ा कुलबुला रहा था। गुड फ़्राईडे वाले सप्ताहांत पर पुनः पहाड़ों में हो आने का कार्यक्रम बना, जगह चुनी गई अल्मोड़ा के थोड़ा आगे उपस्थित बिन्सर। ट्रेन की काठगोदाम तक की टिकटें करवा दी गई, अत्यधिक भीड़ होने के कारण वेटिंग लिस्ट में मिली। यहाँ पंगा हुआ, जाने की टिकट तो सही मिल गई, लेकिन हितेश ने रेलवे में अपने जिस जुगाड़ से टिकट करवाई थी उन सरकारी बाबू ने समझदारी दिखाते हुए सोचा कि रविवार को आठ नहीं सात तारीख है और इसलिए वापसी की उन्होंने सात तारीख की टिकट करवा दी!! अब वो टिकटें हमारे लिए बेकार, आठ तारीख की टिकटें उपलब्ध नहीं थी, इसलिए उनको तो कैन्सल करवाया और यही सोचा गया कि वापसी बस में ही करनी होगी। पर अभी बस कहाँ, कुमाऊँ मण्डल में पूछने पर पता चला कि उनके बिन्सर वाले यात्री निवास में जगह नहीं है, वहाँ मौजूद अन्य रहने के ठिकाने अपने बजट से थोड़ा ऊपर हो जाते और तम्बू आदि लगाने की वहाँ आज्ञा नहीं। दूसरी जगह के रूप में सितलाखेत सही लगा तो उसके बारे में जानकारी ली गई, लेकिन पुनः बात नहीं बनी। एकाध जगह और देखी लेकिन बात नहीं बनी, अपना पोपट होता नज़र आ रहा था, काठगोदाम के आजू-बाजू और जगह तलाशी जा रही थी वर्ना टिकटें कैन्सिल करवा कहीं और निकलना पड़ता। पुनः लान्सडौन वाली स्थिति हो गई थी। तभी नक्शे में मुक्तेश्वर दिखाई दिया और उसके बारे में पता किया, वहाँ के कुमाऊँ मण्डल के यात्री निवास में कठिनाई से एक चार बिस्तरों का फैमिली कक्ष और दो बिस्तरों का डीलक्स कक्ष मिला, कुछ भी हो अपना जुगाड़ तो हो गया।

गुरुवार 5 अप्रैल को रात्रि दस बजकर दस मिनट पर अपनी ट्रेन निज़ामुद्दीन लगनी थी और दस बजकर चालीस मिनट पर चल देनी थी। वेटिंग लिस्ट में होने के कारण अपने को बोगी और सीट नंबर स्टेशन पर ही पता चलने थे, वैसे सीटें तो हमें मिल गईं थी, पीएनाअर नंबर द्वारा चेक करवा लिए थे इंटरनेट पर। सभी को बोल दिया कि साढ़े नौ तक स्टेशन पहुँच जाएँ ताकि बोगी और सीट ढूँढने के लिए पर्याप्त समय हो। लेकिन जैसा हर यात्रा से पहले अपने साथ होता है, इस बार भी फ़ड्डा होना ही था। गुरुवार को सांय मैं रजौरी गार्डन स्थित सिटी स्क्वेयर मॉल पहुँचा, लाईफ़स्टाईल स्टोर में, एक टोपी लेनी थी और एक कमर पर बाँधने वाला पाउच भी लेना था। योगेश को भी टोपी लेनी थी इसलिए वहीं बुला लिया। हमारे पास अधिक समय नहीं था, सिर्फ़ एक घंटा क्योंकि योगेश साहब सात बजे पहुँचे थे। खैर, देखने का कार्यक्रम चालू हुआ, नाईकी की एक टोपी पसंद आई और उसे ले लिया गया, वेस्ट पाउच मैं पहले ही पसंद कर चुका था तो उसे भी ले लिया गया। लेकिन आदत से मजबूर अपने योगेश बाबू कपड़े देखने में लग गए। आठ बज गए और उनका कपड़े देखने का कार्यक्रम बदस्तूर चले जा रहा था, मैंने समय भी बताया लेकिन साहब पूरी निष्ठा से लगे हुए थे। इसी बीच मैंने एक टी-शर्ट अपने लिए पसंद कर ले ली लेकिन उनको कुछ पसंद नहीं आया। आखिरकार जब नौ बजने में दस मिनट रह गए तो उनको लगा कि हम लोग लेट हो गए हैं, बहुत लेट….. भागो!!! आनफानन भुगतान कर चैकाऊट किया गया और हम पार्किंग की ओर लपक लिए। मैंने मोटरसाईकिल दौड़ा दी, पहले योगेश को उनके घर छोड़ा और फिर अपने घर की ओर उड़ लिया। खौफ़नाक बात यह थी कि हम दोनों में से किसी का सामान पैक नहीं था, मेरा तो खैर सभी सामान बाहर निकला पड़ा था, सिर्फ़ बैग में ठूसना भर था, लेकिन योगेश का तो सामान निकला हुआ भी नहीं था। रास्ते में ही अपनी बहन को फोन लगा उन्होंने सामान निकालने को बोला था!!

घर के पास पहुँच मैंने सोचा कि पहले एक ऑटो पकड़ लिया जाए, उस समय मिलना वैसे ही मुश्किल होता है। लेकिन जिस ऑटो वाले से पूछो वो निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन जाने को तैयार ही नहीं। कठिनाई से एक ऑटो वाला मिला, घर पहुँच सामान बैग में जैसे तैसे डाला, कैमरा चैक किया तो अब वो नाराज़ हो गया, चल के न दे। उसे भी बैग में ऐसे ही ठूस लिया, सोचा बाद में देखेंगे, चलेगा तो ठीक नहीं तो देखी जाएगी, मोबाईल तो है ही!! ऑटो में बैठ योगेश के घर की ओर निकल लिया, ऑटो चालक को बोला कि दौड़ा ले बेशक फालतू पैसे ले ले, लेकिन दौड़ा ले!! योगेश को अपने गली-मोहल्ले से बाहर निकल मुख्य सड़क पर प्रतीक्षा रत पाया, लेकिन तभी ध्यान आया कि कुमाऊँ मण्डल के यात्री निवास में जो अपने कमरे बुक करवाए थे उसकी रसीद तो लाना भूल गया था। वैसे उसके बिना भी काम चल ही जाता लेकिन पंगा काहे लिया जाए!! नौ बजकर चालीस मिनट हो रहे थे, ऑटो को वापस मोड़ा गया, शुक्र की बात यह थी कि मेरा घर योगेश के घर से केवल 9-10 किलोमीटर के ही फासले पर है और वहीं याद आ गया, अधिक दूर जाने पर आता तो समस्या हो जाती। ऑटो वाले को बोला गया कि पैसों की टेन्शन न ले, भगा ले!! वापसी जाते हुए हितेश का योगेश को फोन आया यह पूछने के लिए कि कहाँ हैं। उनसे सिर्फ़ यही कहा कि रास्ते में हैं, कौन से रास्ते पर यह बोलना स्वास्थ्यवर्धक नहीं लग रहा था। ;) जल्द ही घर पहुँच रसीद कब्ज़े में की गई, माताजी ने सलाह दी कि सोच लूँ कि कुछ और तो नहीं छूटा है क्योंकि दोबारा वापिस आने का समय नहीं होगा। मैंने तुरंत सोचा और निर्णय लिया कि आवश्यक कुछ नहीं छूटा है।

अब हम स्टेशन की ओर बढ़ रहे थे, ऑटो वाला जितना तेज़ चला सकता था चला रहा था। लेकिन योगेश और मैं अब चर्चा कर रहे थे कि भई ट्रेन तो छूटी ही छूटी। सवा दस बज रहे थे और अभी भी फासला काफ़ी था। तो अब हम सोच रहे थे कि बस पकड़ हलद्वानी पहुँचना होगा और वहाँ बाकी साथियों को पकड़ना होगा। लेकिन भला हो ऑटो वाले का, साढ़े दस बजे उसने हमको निज़ामुद्दीन स्टेशन के बाहर तक पहुँचा दिया। तुरंत उसको पैसे दिए गए, जितने तय हुए थे उसके दोगुने आभार सहित दे दिए और हम दोनों अपने बैग कमर पर लाद स्टेशन के अंदर भाग लिए। आशा की किरण थी, ट्रेन नहीं छूटेगी। पाँच मिनट बाद हम सही प्लेटफ़ॉर्म पर अपनी बोगी के सामने मोन्टू और हितेश के रूबरू खड़े थे और हांफ़ रहे थे(योगेश का तो पता नहीं, मैं तो हांफ़ रहा था)!!! मोन्टू और हितेश के पूछने पर मैंने और योगेश ने एक दूसरे पर इल्ज़ाम लगाए, गलती दोनों की थी, लेकिन कुछ भी हो, ट्रेन छूटने से पहले पहुँच गए थे, यही बहुत बड़ी बात थी।

कुछ मिनट बाद ट्रेन चल पड़ी, हम पाँच लोगों को तीन बर्थ मिलीं थी, टिकट-चेकर बाबू ने और सीट देने में असमर्थता जताई। हमारी सीट के सामने वाली सीट पर मौजूद साहब से हमारी सैटिंग हुई, उनके पास दो टिकटें खाली थी क्योंकि उनके दो साथी नहीं आ पाए थे, उनको भुगतान कर वो सीटें हमने ले ली, मामला सैट, सबके पास सोने की जगह थी। मेरी सीट पर एक साहब बैठे थे, परिचय के आदान-प्रदान से पता चला की “द वीक” पत्रिका छापने वाली कंपनी के उत्तरांचल में सर्कुलेशन ऑफ़िसर हैं और दफ़्तर के कार्य से काठगोदाम तक जा रहे हैं, वहाँ से आगे जाने का उनका कार्यक्रम है। थोड़ी देर तक मेरी उनसे बातचीत होती रही, फिर उसके बाद शुभरात्रि कह वह टिकट वाले बाबू के पीछे हो लिए ताकि रात सोने के लिए कोई बर्थ मिल जाए, उन्होंने भी आनन-फ़ानन बिना आरक्षण के ट्रेन पकड़ी थी। हम सभी लोगों ने भी सोने की सोची, सुबह काठगोदाम से एक स्टेशन पहले हल्द्वानी उतरने का कार्यक्रम था क्योंकि दीपक का दोस्त जो चंडीगढ़ से आ रहा था उसे हल्द्वानी उतरने को बोला गया था। तो हम सभी अपनी-२ सीटों पर लंबे हो लिए, लेकिन मार पड़े मच्छरों को, एक मिनट चैन से लेटने नहीं दिया। मोन्टू तो पता नहीं कैसे पड़ा सो रहा था, मैं तो थोड़ी देर बाद उठकर बैठ गया और खिड़की खोल रात की कालिमा को चीरती शीतल चान्दनी और ठंडी हवा और मोबाईल में बजते शिवकुमार शर्मा के मधुर संगीत का आनंद लेने लगा।

अगले भाग में जारी …..

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पर्वतों में नव वर्ष - भाग ३

February 1, 2007 · 6 Comments

पिछले भाग से आगे …..

अगले दिन सुबह जल्दी उठ सभी तैयार हुए, नाश्ता कर वापसी की राह पकड़ने को सभी आतुर थे। लेकिन जल्दी निकलना कदाचित्‌ किस्मत में नहीं था, रिसॉर्ट वाले से पंगा हो गया। दिल्ली से जब बुकिंग करवाई थी तो उसने कमरों का किराया 1000 रूपये प्रति दिन के हिसाब से बताया था और बिल में उसने उनके 1800 और 2800 रूपये लगा दिए थे यह कहकर कि 1000 वाले कमरे उपलब्ध नहीं थे। कहने का अर्थ यह कि हमें उसके अनुसार महंगे कमरे में ठहरा दिया और हमें बताना भी उचित नहीं समझा कि जो कमरे हमें दिए जा रहे हैं वे महंगे हैं!! बिल की जाँच करने से पता चला कि साहब ने खाने-पीने के बिल इत्यादि जोड़ने में भी घपला किया हुआ था, 1000 रूपये खामखा के अधिक लगा रखे थे। तो बस बिल को लेकर तकरीबन एक घंटा बहस हुई और फ़िर हम अपने मन मुताबिक पैसे देकर वहाँ से चल दिए। लान्सडौन जाने वाले ध्यान रखें, इस अनुभव के आधार पर मैं रिट्रीट आनंद नामक जंगल रिसॉर्ट में रहने की किसी को सलाह नहीं दूँगा, वहाँ अन्य होटल आदि भी हैं, गढ़वाल मण्डल वालों का यात्री निवास भी है जहाँ ठहरा जा सकता है।

तो अब आखिरकार हम लोगों ने वापसी की राह पकड़ी। पहाड़ी से नीचे उतरते हुए कई मनमोहक नज़ारे देखने को मिल रहे थे।

पहाड़ी से नीचे उतर कर कोटद्वार से थोड़ा आगे कर्ण्वाश्रम भी देखना था। किंवदन्तियों के अनुसार सदियों पहले यह कर्ण्व ऋषि का आश्रम होता था जहाँ एक बार राजर्षि विश्वामित्र गहन तपस्या में लीन थे और जहाँ स्वर्ग की अप्सरा मेनका ने उनको अपने पर मोहित कर उनकी तपस्या भंग की थी और उन दोनों के संगम से शकुन्तला का जन्म हुआ था। कहते हैं कि राजर्षि विश्वामित्र ने शकुन्तला को कर्ण्व ऋषि को सौंप दिया जिन्होंने उसका पालन पोषण किया और जिसके साथ हस्तिनापुर नरेश दुष्यंत का विवाह हुआ। यहीं इसी आश्रम में शकुन्तला और दुष्यंत के पुत्र और भावी सम्राट भरत का जन्म हुआ जिनके नाम पर इस देश का नाम पड़ा।

कोटद्वार पहुँच आगे का रास्ता पूछ हम लोग कर्ण्वाश्रम पहुँचे। पहुँचने का मार्ग थोड़ा टूटा कुछ फूटा था, आश्रम के आसपास छोटा सा गांव/कस्बा है जो कि ग्रामीण भारत की झलक दिखलाता है(जैसे वो हिमेशवा झलक दिखलाने को बार बार कहता रहता है)!!

लेकिन कर्ण्वाश्रम पहुँच इस बात को साक्षात देखा कि भारत के इतिहास की यह धरोहर ठीक उसी तरह सूनी पड़ी है जैसे किसी विधवा की माँग।

और यह अकेली ऐतिहासिक धरोहर नहीं है जिसका ऐसा हाल है। वहाँ मात्र एक व्यक्ति का निवास है जो कि पुजारी हैं और वहाँ रह योग साधना करते हैं। उनसे पता चला कि वहाँ कोई इक्का-दुक्का व्यक्ति ही कभी कभार आता है अन्यथा वहाँ पर्यटक आदि नहीं आते। अब यह बात जानकर कोई खास आश्चर्य नहीं हुआ, ऐसा अपेक्षित सा ही लगा क्योंकि कम लोगों को इस जगह की जानकारी है और वैसे भी यहाँ उसी का आना बनेगा जो कि लान्सडौन जाएगा, अन्यथा सिर्फ़ इस जगह कोई नहीं आएगा। वहाँ थोड़ा समय बिता हम वापस अपनी गाड़ी की ओर चल पड़े। कर्ण्वाश्रम के आसपास हल्का-फुल्का जंगल सा है और उसमें थोड़ा आगे जाकर एक झरना है जो कि सहस्त्रधारा के नाम से जाना जाता है। किंवदंतियों के अनुसार शकुन्तला के समयकाल में इस झरने से पानी की जगह दूध बहा करता था!! ;)

बहरहाल, हम वापस कोटद्वार की ओर चल पड़े। निश्चय किया गया कि दोपहर का भोजन ले लिया जाए क्योंकि फ़िर काफी समय तक कोई ढंग की खाने-पीने की जगह नहीं मिलेगी। कोटद्वार में ही एक अच्छा सा रेस्तरां मिल गया जो कि साथियों को पसंद आया और उसमें डट कर पेट पूजा की गई। इसके बाद ड्राईवर को बोल दिया गया “चक्‌ दे फट्टे” और गाड़ी सरपट दिल्ली की ओर उड़ चली। ;) लेकिन मार पड़े अव्यवस्थित यातायात के बहाव को, पहले नजीबाबाद और फ़िर बिजनौर में फ़ंस गए जिस कारण कुछ घंटे खराब हो गए। मेरठ पहुँचते पहुँचते अंधेरा हो चला था। अब मेरठ से गुज़र रहे थे तो सोचा कि यहाँ कि प्रसिद्ध गजक और रेवड़ी ले ली जाए, तो निधि से पूछा कि कहाँ बढ़िया गजक मिलेगी। मेरठ की होने के कारण निधि को सब पता था और वह हमें सही दुकान पर ले गई जहाँ की गजक वाकई स्वादिष्ट थी। तो जहाँ हम में कुछ ने गजक खरीदी, वहीं बाकी के लोगों को हम पर खीज हो रही थी कि खामखा इतना समय लगा रहे हैं!! ;) तो फटाफट खरीददारी निबटा हम वापस गाड़ी में आ गए और अपने गंतव्य की ओर चल पड़े, दिल्ली अब दूर नहीं थी। ;) कुछ ही घंटों में हम दिल्ली में थे, एक-एक कर सबको उनके घर छोड़ते हुए मैं वापस अपने घर पहुँचा।

पिछले वर्ष मई में लान्सडौन जाने का कार्यक्रम बन रहा था जो कि बाद में स्थगित करना पड़ा था और बाद में हम लोग ऋषिकेश चले गए थे, लेकिन आखिरकार लान्सडौन भी हो आए, इस बात से मन अति प्रसन्न था। सर्दियों में हिल-स्टेशन का पहला अनुभव यादगार रहा लेकिन दोबारा ऐसा करने से पहले 31 दिसंबर की रात और उस समय की ठंड और जिस जगह हम लोगों ने वह रात गुज़ारी, इन सब बातों को कम से कम एक बार अवश्य ध्यान में लाउँगा!! ;)

इस यात्रा के दौरान लिए गए सभी छायाचित्र यहाँ उपलब्ध हैं।

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पर्वतों में नव वर्ष - भाग २

January 5, 2007 · No Comments

पिछले भाग से आगे …..

सुबह सवेरे मोबाईल में अलार्म बजते ही निद्रा खुल गई, ऐसा लगा कि जैसे अभी कुछ मिनट पहले ही तो सोए थे(4 घंटे पहले सोए थे)। नींद खुलने के बाद ठण्ड लगने लगी थी, रात को चढ़ाई गर्मी का असर समाप्त हो गया था, उस की वजह से रात निकल गई थी यही बहुत था वर्ना बहुत बुरा हाल हो सकता था। बाहर आकर हमने सुहावनी सुबह के दर्शन किए, सूर्य पर्वतों के पीछे से उदय हो रहा था और राहत की बात यह थी कि हल्की हल्की धूप दिखाई दे रही थी, कोहरा आदि कुछ भी नहीं था। हम सभी उठ कर लड़कियों के कमरे की ओर चल पड़े और जाकर देखा कि अभी तो वे भी नहीं उठे थे। बहरहाल क्योंकि हम लोगों का जल्दी निकलने का कार्यक्रम था इसलिए सभी फ़टाफ़ट तैयार होने लगे, रिसॉर्ट का एक कर्मचारी थोड़ी थोड़ी देर में हमको गर्म पानी लाकर दे रहा था और एक-एक कर सभी तैयार होते जा रहे थे। शीघ्र ही तैयार हो हम अपने रास्ते निकल लिए, मन्ज़िल थी कुछ दूरी पर स्थित ताड़केश्वर महादेव मंदिर जो कि भारत के सबसे पुराने सिद्धपीठों में से एक है।

रास्ता पूछते-पूछते हम आगे जा रहे थे, लान्सडौन से तकरीबन 8 किलोमीटर आगे निकल आने के बाद एक जगह पूछा तो पता चला कि अभी लगभग 20-22 किलोमीटर और जाना था। इधर पहाड़ी रास्ते के तीव्र घुमावों और तीखे मोड़ों के कारण संजुक्ता तथा एकाध की तबीयत खराब सी होने लगी, तो सबने यही निर्णय लिया कि वापस लौट लिया जाए, कहीं 20 किलोमीटर के आगे के सफ़र और लगभग 30 किलोमीटर के वापसी के सफ़र में इनकी तबीयत और खराब न हो जाए। वापस लान्सडौन पहुँच हम लोग टिप-इन-टॉप की ओर चल दिए जो कि लान्सडौन की मशहूर जगहों में से एक है क्योंकि यहाँ से नज़ारा बहुत अच्छा नज़र आता है। टिप-इन-टॉप पहुँच सभी लोग अपने अपने कैमरे निकाल व्यस्त हो गए(तस्वीरें लेनें में)।

वहीं पास में लान्सडौन का सबसे पुराना गिरजा, सेंट मेरी चर्च, है जिसमें अब एक छोटा सा संग्रहालय भी बना दिया गया है।

दोपहर हो आई थी तो हमने भोजन करने की सोची क्योंकि सुबह भी कुछ खाए बिना ही निकले थे। तो भोजन करने हम पहुँच गए लान्सडौन के मुख्य बाज़ार में स्थित मयूर होटल में जहाँ के परांठों की तारीफ़ मोन्टू पिछले दिन से किए जा रहा था। भोजन की प्रतीक्षा करते-करते एक-एक मिनट मानो सदियों की तरह बीत रहा था, तो कई सदियों की प्रतीक्षा के बाद खाद्य सामग्री हमारी टेबल पर आई और सभी लोग स्वादिष्ट खाने का आनंद लेने लगे। अब खाना वाकई स्वादिष्ट