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प्रयास….. विस्फोट….. और उत्तर

January 14, 2008 · 4 Comments

इस पोस्ट को लिखने के पीछे न किसी की बेइज़्ज़ती करने का इरादा है और न ही कोई व्यंग्य करने का। साफ़ दिल से यह पोस्ट लिखी है लेकिन यदि किसी को बुरा लगा हो(खासतौर से संजय तिवारी जी जिनका बहुतया उल्लेख है इस पोस्ट में) तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ क्योंकि बुरा लगाने की कोई मंशा न थी और न है।

अभी-२ एक ब्लॉगर सम्मेलन निपटा के फारिग हुआ हूँ। अच्छी खासी तादाद में लोग आए और कार्यक्रम को सफ़ल बनाया। चूँकि मैंने सबके लिए खुला रखने का प्रस्ताव दिया था इसलिए हिन्दी ब्लॉगजगत में भी इसकी खबर फैलाई कि साथी लोग आकर सत्संग का लाभ उठाएँ, कुछ ज्ञान अर्जित करें और कुछ दूसरों को दें, हिन्दी ब्लॉगजगत के बाहर भी जो ब्लॉगजगत है उससे मिलें, अंग्रेज़ी हो चाहे अन्य कोई भाषा, ब्लॉगर तो ब्लॉगर ही होता है ऐसी मेरी सोच है। लेकिन कुछ लोगों को कुछेक बातों से दिक्कत थी। अब दिक्कत खामखा दिक्कत की खातिर या किसी भ्रांति की खातिर यह मैं नहीं जानता; मैं यह मान के चल रहा हूँ कि मिथ्या भ्रांति के चलते दिक्कत थी जिसका माकूल उत्तर मिलने पर वह दूर हो सकती है, इसलिए अपनी ओर से ईमानदार कोशिश करने की खातिर यह सब लिखने का मन बनाया।

विस्फोट वाले संजय तिवारी जी ने पोस्ट दागी और सीधे ही हमें सूली पर टाँग दिया कि भई यह तो गोलमाल हो रहा है, ऐसा गोलमाल कैसे बर्दाश्त किया जाएगा। मत कीजिए प्रभु, गोलमाल बिलकुल बर्दाश्त मत कीजिए। लेकिन गोलमाल हो तभी ना?? पहले हल्के पटाखे के तौर पर पूछा कि आयोजक कैसे कह सकते हैं कि 200-300 ब्लॉगर आएँगे? जनाब यह तो कहा ही नहीं कि सभी ब्लॉगर होंगे, आंगतुकों में ब्लॉगर भी थे और गैर ब्लॉगर भी थे। गैर ब्लॉगरों में वे लोग भी थे जो दल बदलना चाहते हैं और डिफेक्ट होकर ब्लॉगर दल में आना चाहते हैं क्योंकि उनको यहाँ कुर्सी न सही लेकिन हिट मिलने के आसार दिखाई देते हैं, क्या पता निकट भविष्य में सेन्ट और डॉलर की भी बरसात हो जाए, सब बाबा जी की लीला है!! ;) साथ ही गैर ब्लॉगर दल में ऐसे भी थे जिनको स्वयं तो ब्लॉग लिखने में रूचि नहीं लेकिन जो ब्लॉग लिखते हैं उनमें अवश्य रूचि है। अब कोई कमरा बंद मीटिंग तो थी नहीं एक्सक्लूसिव और ब्लॉगर होने का तमगा लिए लोगों के लिए, खुली सभा थी बाबा जी के द्वार की भांति, कोई भी आए माथा टेके और प्रसाद पाए। दूसरे, 200 ब्लॉगर काहे नहीं आ सकते? क्या आपको अंदाज़ा है कि दिल्ली में और राजधानी क्षेत्र(नोएडा, गुड़गाँव और गाज़ियाबाद) में कुल कितने ब्लॉगर हैं? बहुत से आंकड़ों और शिक्षित अनुमान(educated guess) के अनुसार 500 से अधिक हैं, और ध्यान दें कि मैं हिन्दी ब्लॉगरों की बात नहीं कर रहा वरन्‌ सिर्फ़ ब्लॉगरों की बात कर रहा हूँ जिसमें किसी भी तरह की ब्लॉगिंग किसी भी भाषा में करने वाले हैं। ;)

अब इसके आगे अगला (पहले के मुकाबले)तगड़ा पटाखा यह छोड़ा संजय तिवारी जी(संजय भाई नोट करें, पूरा नाम लिखने में कष्ट होता है, पुरानी आदत प्रथम नाम को संबोधित करने की बनी हुई है) ने कि ऐलान कर दिया कि आयोजक तो ऐरे गैरे नत्थू खैरे हैं ही, स्पीकर आदि भी कोई पहचान वाले न लग रिये!! माई बाप, यह तो बताईये कि आप किसके होने की आशा कर रहे थे, अगली बार उनको धर-दबोचने की पूरी कोशिश की जाएगी। वैसे मैं अपने मुँह मिया मिट्ठू नहीं बनता लेकिन मैं ब्लॉगजगत से सन्‌ 1999 से जुड़ा हूँ, बहुत से देशी-विदेशी ब्लॉगरों को जानता हूँ(गिनती मत पूछना जी, वो सन्‌ 2002 में 100 होने के बाद मैंने हिसाब रखना छोड़ दिया था) पर ऐसा सोचने की दिलेरी मैं नहीं दिखा सकता कि मैं सभी को जानता हूँ। खैर हो सकता है तिवारी जी जानते हों, अब मेरे को क्या पता(अन्यथा मत लीजिएगा तिवारी जी आपका मज़ाक कतई नहीं उड़ा रहा, सिर्फ़ अपने को उलझन में पाया था आपका ऐसा कथन पढ़ने के बाद)। वैसे चुहल के लिए ही सही, जनाब क्या आपको पता है कि दुनिया के पहले ब्लॉगर कौन हैं? थोड़ा इसका इतिहास पढ़िए कई रोचक बातें जानने को मिलेंगी। :)

यदि माइक्रोसॉफ़्ट या कोई अन्य कंपनी ऐसे किसी कार्य के लिए प्रायोजक बनती है तो हानि ही क्या है? ऐसा नेक कार्य करने से उनका नाम हो रहा है और हमारा स्वार्थ हल हो रहा है कि इतनी बड़ी सभा हो रही है और किसी साथी को अपनी जेब इसके लिए ढीली नहीं करनी पड़ रही।

अब तिवारी जी के विस्फोटों को यदि देखें तो क्रमवार उन्होंने पाँच विस्फोट किए। :) पहले विस्फोट के तौर पर उन्होंने कहा:

सबसे पहले, निश्चित रूप से इस भेंटवार्ता के पीछे कोई व्यावसायिक नजरिया है. स्पांसरों का खेल है. और जहां व्यावसायिक नजरिया और स्पांसर पहुंच जाते हैं वहां आयोजन हमेशा निमित्त बनकर रह जाते हैं. होता यह है कि आयोजन स्पांसरों के प्रचार के काम में आते हैं.

इस विस्फोट का समर्थन कई साथियों ने किया। ठीक है, कोई गलत बात नहीं है ,यदि मामले की जानकारी मुझे न होती और मैं तिवारी जी की जगह होता तो मैं भी कुछ ऐसा ही सोचता, इसलिए ऐसा सोचने में कोई गड़बड़ नहीं, आखिर जब तक प्रश्न नहीं उठेगा तो उत्तर कैसे आएगा। तो जो लोग इस कार्यक्रम में शरीक हुए थे वे तो गवाह हैं ही, मैं जनाब सिर्फ़ इतना जानने का इच्छुक हूँ कि जिन-२ साहबान ने इस विस्फोट से सहमति जताई थी लगभग सभी के अपने-२ अड्डों पर विज्ञापनों की अच्छी खासी सजावट है। अब ऐसा क्यों है जनाब? यह न समझिए कि प्रश्न का उत्तर प्रश्न से दे रहा हूँ, बल्कि यह मानिए कि इस प्रश्न के उत्तर से ही आपको अपना उत्तर मिलेगा कि स्पॉन्सर क्यों थे। तो जनाब-ए-आली, क्या आपके ब्लॉग पर विज्ञापनों की सजावट का यह निष्कर्ष निकाला जाए कि आप जो लिखते हैं वह प्रायोजक द्वारा प्रभावित होता है और आप सदैव उनका ही गुणगान करते हुए लिखते हैं? नहीं, कम से कम मैं तो यह नहीं समझता कि आप प्रायोजक के प्रभाव में आकर लिखते हैं, यदि मैं गलत हूँ तो कृपया ज्ञान देकर सुधार कर दीजिए। तो जब आप जनाब इतने सारे विज्ञापन होने के बावजूद प्रभावित और प्रायोजित विस्फोट नहीं कर रहे तो मालिक आपने यह कैसे सोच लिया कि एकठो माइक्रोसॉफ़्ट के स्पॉन्सर होने कोई अंटशंट कार्य होगा? वैसे देबू दा ने इस बारे में अपने विचार बता ही दिए थे और मैं भी उनके विचारों से इत्तेफ़ाक रखता हूँ। सिर्फ़ अपना भला सोचने वाले कम्यूनिटी के लिए कुछ नहीं कर सकते। खाओ और मिल बाँट कर खाओ यही सीख मुझे बचपन से मिली है, कभी सिर्फ़ अपना मत सोचो, तो इसी तर्ज पर यदि माइक्रोसॉफ़्ट या कोई अन्य कंपनी ऐसे किसी कार्य के लिए प्रायोजक बनती है तो हानि ही क्या है? उनका नाम हो रहा है कि वे ऐसा नेक कार्य कर रहे हैं और हमारा स्वार्थ हल हो रहा है कि इतनी बड़ी सभा हो रही है और किसी साथी को अपनी जेब इसके लिए ढीली नहीं करनी पड़ रही। नहीं तो ऐसी सभा के आयोजन पर हर साथी की जेब से 300-400 रूपए निकलते तो उसका क्या लाभ था? कितने लोग देते? और जो नहीं देते वो इस सम्मेलन से खामखा वंचित रहते। जबकि स्पॉन्सर होने के कारण उनके सम्मिलित होने की राह से जेब की बाधा हट गई।

दूसरा विस्फोट तिवारी जी ने यह किया कि यह दावा ठोक दिया अपना कि चूंकि माइक्रोसॉफ़्ट स्पॉन्सर है और दूसरी कोई पीआर ऐजेन्सी, इसलिए कोई पंगा है। तिवारी जी के अपने शब्दों में:

इसका एक स्पांसर माइक्रोसाफ्ट है और दूसरा कोई पीआर एजंसी. ब्लागरों की गाढ़ी कमाई को कैसे कैश करना है इसकी योजना इस पीआर एजेंसी ने ही बनाई होगी और माईक्रोसाफ्ट को पटाया होगा यह तय बात है.

साथ ही गाढ़ी कमाई को लूट लेने की सोच का इल्ज़ाम भी!! यह तो बहुत नाइंसाफ़ी है प्रभु!! एक ओर तो हल्ला मचता रहता है हिन्दी ब्लॉगजगत में कि हिट नहीं हैं पाठक नहीं हैं, तो हम सोचे कि भई हिन्दी ब्लॉगिंग अभी शैशव काल में है और बहुत से लोग नए-२ ब्लॉग रोगी हैं जिनको अभी फंडे नहीं पता, इसलिए क्यों न किसी ऐसे बंदे से ज्ञान दिलवाया जाए जो कि ब्लॉग की ही कमाई खाता है ताकि हमारी बिरादरी के लोगों का भी कुछ भला हो उनको भी ज्ञान मिले। और यहाँ तो सीधे हम पर ही चोरी की सोच का इल्ज़ाम लग गया!! ;) और माइक्रोसॉफ़्ट के स्पॉन्सर होने में बुराई क्या है? क्या वो कोढ़ियों की जमात है कि जिनके संपर्क में आते ही सभी कोढ़ी हो जाएँगे? उसकी जगह गूगल स्पॉन्सर होता तो ठीक रहता? अगली बार गूगल को भी पकड़ने की कोशिश करेंगे जनाब, और इस “क्या माइक्रोसॉफ़्ट अछूत है?” पर भी एक पोस्ट दागूँगा अगली फुर्सत मिलते ही जिसमें इसी मुद्दे पर चर्चा करेंगे। इसलिए फिलहाल इस को यहीं छोड़ते हैं, उम्र-ज्ञान-अनुभव में आपसे छोटा हूँ तो कुछ तो छोटे की बात भी मान लीजिए। :)

तीसरा विस्फोट मुझे कुछ समझ तो आया लेकिन कोई अर्थ निकलता न दिखाई दिया। तो तिवारी जी के शब्दों में:

ब्लागर मिलन की शुरूआत ऐसे हुई कि भाई लिखते-पढ़ते तो देख लिया एकाध बार मुंह-दिखाई भी हो जाए. अचानक ही अखबारों आदि में हिन्दी ब्लागरों की पर्याप्त चर्चा हो गयी. जाहिर सी बात है अब आप अपना खून-पसीना बहाकर जो कुछ रचना कर रहे हैं कुछ व्यवसायी मानसिकता के लोग अब उसको कैश कराने की कोशिश करेंगे. उनकी नजर में किसी भी प्रकार के कार्य का यही सफल उपयोग होता है. आखिरकार सबकुछ बाजार जो है.

इस विस्फोट के दो भाग हैं इसलिए अलग-२ ही झेलते हैं दोनों को। पहला छोटा वाला; मिलने और मुँह दिखाने की बात। मानी जनाब आपकी बात, ब्लॉगर भेंटवार्ता का पहला मकसद यही है और अधिकतर ब्लॉगर भेंटवार्ताएँ होती भी इसी मकसद के तहत हैं। लेकिन जनाब, यदि चाय-कॉफी और मुँह दिखाई के आगे बढ़ एक दूसरे से कुछ सीख लिया जाए अथवा साथ मिलकर कुछ कर लिया जाए तो क्या उसमें कोई पाप है? अनैतिक है? अवांछनीय है? अपनी-२ राय हो सकती हैं, मेरी और बहुत से अन्य लोगों की ऐसी राय नहीं है, बाकी जिनकी ऐसी राय है वो भी अपने साथी ही हैं और हर किसी को अपने विचार और अपनी राय कायम करने का पूरा हक़ है और उसकी मैं इज़्ज़त करता हूँ। :)

दूसरा बड़ा विस्फोट इसमें कैश कराने और बाज़ार में बेचने की बाबत है। तो जनाब अपने ब्लॉगों पर विज्ञापन सजाकर ब्लॉगर क्या करता है और? बाज़ार में नहीं बेच रहा? पहली बात तो यह कि हमने ऐसी कोई बात ही नहीं की, दूसरे यह कि कदाचित्‌ आपको पता न हो लेकिन गूगल और अन्य बहुत सी सेवाएँ ऐसे ही चल रही हैं, दूसरे का माल बेच कमा रहे हैं, और कुछेक के साथ ही कमाई बाँट रहे हैं, सब के साथ नहीं। आपको अचम्भा हुआ? यदि हाँ तो स्वागत है इंटरनेट की दुनिया में, यहाँ वाकई एक हाथ दूसरे को धोता है चाहे दूसरा पहले को न धोए!! ;)

फिर चौथा विस्फोट हुआ जो कि दूसरे और तीसरे विस्फोट की प्रतिध्वनि ही लगा जब तिवारी जी ने लिखा:

हो सकता है एक ब्लागर के रूप में आप इस मिलन में शामिल हों और कुछ माले-मुफ्त दावत उड़ाकर संतोष कर लें लेकिन आपको इस बात का कतई अंदाजा नहीं होगा कि आपको पता भी नहीं चलेगा और आपको सरे बाजार बेच दिया जाएगा.

जनाब बिक जाने का पता तो हमको भी नहीं चला। अब दो ही कारण हो सकते हैं कि या तो हमारी आत्मा मर गई है या फिर हम भी मूर्ख हैं जो माल-ए-मुफ़्त दिल-ए-बेरहम टाइप माल उड़ा लिए लेकिन आभास ही न हुआ कि कब बिक गए। पता लगे तो म्हारे को भी बता देना मालिक, बड़ी कृपा होगी।

पाँचवा विस्फोट(अब यही मान के चल रहा हूँ) हुआ तो लेकिन अपने को सिर पैर नहीं पता चला इसका क्योंकि संबन्धित ब्लॉग तथा ब्लॉग पोस्ट कदाचित्‌ मैंने पढ़ी नहीं। तिवारी जी बालक की यह भूल क्षमा करना, प्रयत्न पूरा किया था मैंने समझने का पर पिछले विस्फोट के कारण शंका तो हो ही गई है कि मैं भी मूर्खराज की गद्दी के चुनाव में खड़ा होने योग्य हो सकता हूँ। :)

अंत में संजय तिवारी जी ने आखिरी आतिशबाज़ी यह छोड़ी:

सह-अस्तित्व और परिवार भावना की नींव पर खड़ा ब्लाग समुदाय अगर इस तरह के व्यावसायिक प्रयासों को मान्यता देता है तो हिन्दी ब्लागिंग के स्वभाव को विकृत होने से कोई बचा नहीं सकता.

माई-बाप एक ओर तो आप सह-अस्तित्व की भावना का हवाला दे रहे हैं और दूसरे हाथ पर उसी का पुरज़ोर विरोध भी कर रहे हैं। यह कैसी माया है प्रभु, इस अज्ञानी को भी कुछ ज्ञान दीजिए। :)

दूसरी ओर अनिल रघुराज जी से यह पूछने की गुस्ताखी करूँगा कि संजय तिवारी जी की विस्फोटक पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इस प्रोफेशनल ब्लॉगर मीट से अचंभित हैं तो दूसरी ओर देबू दा द्वारा इसी मुद्दे पर लिखी पोस्ट पर टिप्पणी देते हुए कहा कि ऐसे ब्लॉगर सम्मेलन उत्साह बढ़ाने वाले हैं!! जनाब यह हृदय परिवर्तन एकाएक? वैसे आपका तहेदिल से शुक्रगुज़ार भी हूँ कि आपने थोड़ा सा ही सही लेकिन विश्वास किया कि मैं इससे जुड़ा हूँ तो थोड़ी गंभीरता नज़र आती है। यकीन मानिए विश्वास करने वाले लोग शुरु में कम ही होते हैं इसलिए कुछ करने से पहले जो विश्वास करते हैं उनका विश्वास अमूल्य होता है। :)

साथ ही एक टिप्पणी स्पैमर से एडसैन्स फ्रॉड बने और अपने को ब्लॉगर कहने वाले एक साहब की पढ़ी थी जिसमें उन्होंने बताया कि उनको घोर आश्चर्य है कि हिन्दी ब्लॉगिंग को बढ़ावा देने वाले सम्मेलन का कार्यक्रम आदि अंग्रेज़ी में लिखा था!! वैसे तो कोई आवश्यक नहीं लेकिन इन साहब की शंका भी दूर किए देते हैं। तो जनाब वो ऐसा है कि “हिन्दी ब्लॉगिंग उत्थान” तो हमने टैगलाईन या मकसद में कहीं लगाया नहीं, हमारा मकसद तो “ब्लॉगिंग उत्थान” है; अब चाहे वह अंग्रेज़ी हो या हिन्दी या तमिल या बंगाली या गुजराती, ब्लॉगिंग तो ब्लॉगिंग ही होती है और ब्लॉगर तो ब्लॉगर ही होता है। अपन खुले दिल के हैं इसलिए ऐसा सोचते हैं। :) और दूसरी बात, अब पता नहीं कि आप आए थे कि नहीं परन्तु हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं की ब्लॉगिंग पर श्री अशोक चक्रधर जी तो हिन्दी में ही बोले थे अंग्रेज़ी में नहीं!! तबियत एकाएक नासाज़ हो जाने के कारण मैं जा नहीं पाया था वर्ना विश्वास कीजिए मैंने भी हिन्दी में ही बोलना था!! ;)

विशेष धन्यवाद रवि रतलामी जी को जिन्होंने इस तरह के आयोजनों के बारे में बता संशक साथी चिट्ठाकारों को ज्ञान दिया। साथ ही ऐसा ही खास वाला धन्यवाद देबू दा को उनकी पोस्ट के लिए। उन सभी लोगों को भी आभार जिन्होंने रत्ती भर भी विश्वास किया। :)

मैंने इस पोस्ट द्वारा पूरी ईमानदारी से उठाए गए प्रश्नों के उत्तर देने की कोशिश की है। अब यह कोशिश कितनी सफ़ल हुई और कितनी असफ़ल इसके निर्णायक तो आप, यानि कि पाठक और साथी ब्लॉगर, ही हैं।

एक बार पुनः कहूँगा, इस पोस्ट को लिखने के पीछे न किसी की बेइज़्ज़ती करने का इरादा है और न ही कोई व्यंग्य करने का। साफ़ दिल से यह पोस्ट लिखी है लेकिन यदि किसी को बुरा लगा हो(खासतौर से संजय तिवारी जी जिनका बहुतया उल्लेख है इस पोस्ट में) तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ क्योंकि बुरा लगाने की कोई मंशा न थी और न है। :)

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समस्या….. विश्लेषण….. समाधान…..

January 3, 2008 · 8 Comments

पिछले तीन दिनों से छप रहे कार्टूनों ने कई लोगों की उत्सुकता बढ़ाई है, कईयों ने पूछा कि आखिर कोई सिर पैर तो हो, पता ही नहीं चल रहा कि बात क्या है!! तो जनाब मामला टू द प्वायंट प्रस्तुत है।

समस्या
समस्या ये है कि ब्लॉग की गाड़ी आगे ही नहीं बढ़ रही। मैं अपनी बात नहीं कर रहा, मैं एक आम बात कर रहा हूँ। ब्लॉग एग्रीगेटरों से सिर्फ़ हम ब्लॉगरों की ही आवश्यकताएँ पूरी हो रही हैं कि हमको दर्जनों ब्लॉगों पर जाकर देखने की बजाय एक जगह ही सूचना मिल जाती है। दरअसल एग्रीगेटरों का यही काम है और अपने काम को वो बखूबी अंजाम दे रहे हैं। लेकिन इसके आगे भी कोई जहान है या यही आखिरी स्टेशन है? मेरा और कई अन्य साथी ब्लॉगरों का मानना है कि आगे जहान और भी है। ब्लॉगों की तादाद तेज़ी से बढ़ रही है, यह एक अच्छी बात है, लेकिन एक समस्या अब जो आ रही है(जिसको कुछ दूरदर्शी साथियों ने काफ़ी पहले देख लिया था) वह यह कि माल की तादाद बढ़ी लेकिन उसको हज़म करने का समय नहीं बढ़ा, सब कुछ हर कोई नहीं डकार सकता तो कैसे मनपसन्द माल चुना जाए? और दूसरे यह कि ब्लॉगरों की जमात के बाहर ब्लॉगों की कितनी पैठ हो रही है? कुछ खास नहीं और मैं समझता हूँ कि कई लोग इस बात से सहमत भी नज़र आएँगे। बहुत से उम्दा लेखक हैं जो एक से बढ़कर एक धांसू आइटम लिखते हैं लेकिन पाठकों तक सही पहुँच न होने के कारण न तो उनको बहुत लोग पढ़ पाते हैं और लोग-बाग भी वंचित रह जाते हैं।

विश्लेषण (analysis)
अब यदि समस्या को समझा जाए, तो एक बात उभर कर सामने आती है - प्रचार(marketing)। जिस ब्लॉग का जितना अच्छा प्रचार हुआ हो उसके पाठक उसके अनुसार ही होते हैं। ध्यान रहे कि बात यहाँ मसौदे की नहीं है; माल की गुणवत्ता पाठक को दोबारा आने को प्रेरित करेगी लेकिन बात यहाँ उसको पहली बार लाने की हो रही है। जब वह पहली बार ही नहीं आएगा, जब उसको पता ही नहीं होगा कि फलां जगह माल मिलता है तो माल अच्छा हो या बुरा इससे क्या फर्क पड़ता है, वह तो आगे सरका ही नहीं। अब हर कोई नाई नहीं होता, कोई बढ़ई भी होता है तो कोई ग्वाला भी; कहने का अर्थ है कि हर किसी को हर काम में महारत हासिल नहीं होती। तो इसी तरह, कुछ लोग जो कि प्रचार के फंडे जानते हैं वे तो अपने माल का प्रचार ठीक-ठाक या बढ़िया तरीके से कर लेते हैं, लेकिन जो लोग इस सब से नावाकिफ़ हैं वे क्या करें? आज के समय का नियम है कि सिर्फ़ माल अच्छा होना ही काफ़ी नहीं है, उसको आगे सही ढंग से सरकाना भी आवश्यक है अन्यथा चाहे लाख टके का माल हो उसकी औकात दो टके की नहीं रह जाती।

दूसरा मुद्दा समय का है और यह भी बहुत बड़ा मुद्दा है। ब्लॉगों की संख्या में तो दिन दुनी रात चौगुनी तरक्की हो रही है लेकिन पाठकों(यदि दूसरों के ब्लॉग पढ़ते हैं तो हम ब्लॉगर भी पाठक गण में आते हैं) के समय में इस तरह इजाफ़ा नहीं हो रहा है, बल्कि बहुत से मामलों में ब्लॉग आदि पढ़ने का समय कम ही हो रहा है। तो ऐसे में सभी को पढ़ना तो दूर, मनपसन्द लेखकों को ही पढ़ने में दिक्कत हो जाती है।

समाधान
अब हम कुछ ब्लॉगरों(दिल्ली ब्लॉगर समूह के सदस्यों) ने इस सबका यह समाधान सोचा कि कुछ ऐसा किया जाए कि ब्लॉगों की समीक्षात्मक नज़रिए से पोस्ट दिखाई जाए। इस बात को लेकर हिन्दी ब्लॉगजगत के कई साथी ब्लॉगरों ने अपने-२ विचार समय-२ पर रखे हैं जिनमें श्रेणियों में ब्लॉग रखने से लेकर समीक्षा तक के उपाय सुझाए गए हैं। कुछ इसी की तर्ज पर चिट्ठाचर्चा भी अनूप जी और अन्य साथी लोग चलाते आए हैं। लेकिन हम लोगों ने सोचा कि ब्लॉग को किसी एक या अन्य श्रेणी में क्यों रखा जाए, एक विषय आधारित ब्लॉग हो तो अलग बात है लेकिन बहुत से साथी एक ही ब्लॉग पर कई विषयों पर लिखते हैं तो इसलिए ब्लॉग को श्रेणियों में रखने के स्थान पर क्यों न प्रत्येक पोस्ट को श्रेणियों में रखा जाए। इससे पाठकों को चुनाव करने में आसानी होगी कि उनको क्या पढ़ना है और क्या नहीं, यानि कि उनके समय का सदुपयोग होगा और वे वही पढ़ेंगे जो वे पढ़ना चाहते हैं। यह कार्य ऑटोमैटिक तरीके से करने की जगह यदि जीते-जागते मनुष्यों द्वारा किया जाए तो गुणवत्ता की दर अधिक होगी ऐसा हम लोगों का मानना है, इसलिए स्वयंसेवकों के दल होंगे जो यह सब कार्य देखेंगे और सिर्फ़ हमारे जैसे ऐरे गैरे नत्थू खैरे ही नहीं बल्कि कई नामी ब्लॉगर भी इस प्रयास से जुड़े रहेंगे और हमारा हाथ बंटाएँगे।

यह तो हुआ समय वाली समस्या का समाधान, लेकिन प्रचार वाली बात का क्या? तो उसके लिए हमारे साथ है एक प्रोफेशनल पब्लिक रिलेशन्स और मार्केटिंग कंपनी जो कि कई बड़ी और नामचीन कंपनियों की मार्केटिंग आदि देखती है। यह प्रोफेशनल मार्केटिंग कंपनी इस प्रयास(वेबसाइट) का प्रचार करने का कार्य करेगी। वेबसाइट का प्रचार होगा तो उम्दा छंटे हुए लेखों तक बढ़ते पाठकों की पहुँच बनेगी और जिस कारण ब्लॉग लेखकों को लाभ मिलेगा, उनके ब्लॉग पर ट्रैफिक बढ़ेगा और यदि उन्होंने अपने ब्लॉग पर विज्ञापन आदि लगा रखे हैं तो आय की संभावना भी बढ़ेगी। जानकार बंधुओं को कदाचित्‌ स्लैशडॉट की याद आ जाए जो कि अंग्रेज़ी के तकनीकी लेखों में एक ऐसी वेबसाइट है जिस पर उम्दा लेखों की जानकारी होती है और लेख के मूल पते का लिंक होता है। स्लैशडॉट के इतने पाठक हैं कि यदि उस पर आपकी वेबसाइट का लिंक आ जाता है तो एक घंटे के अंदर आपका सर्वर ओवरलोड होकर बैठ सकता है, अच्छे अच्छों के सर्वर ऐसे बैठ जाते हैं और इसी लिए इसको स्लैशडॉट इफेक्ट की संज्ञा दी गई।

यह बात बहुतों ने महसूस की होगी कि कई बंधु अच्छा लिखते हैं लेकिन पाठक न मिलने या उत्साहवर्धन न होने के कारण निराश हो लिखना कम कर देते हैं या बंद कर देते हैं; इससे नुकसान लेखक का भी होता है और पाठकों का भी। तो इस सब का एक लाभ यह भी होगा कि गुणवत्ता का आम स्तर बढ़ेगा क्योंकि बहुत से साथी अच्छे से अच्छा लिख ऊपर आने का प्रयत्न करेंगे जिससे पाठकों को भी बढ़िया माल परोसा जाएगा और साथ ही बढ़िया लिख रहे ब्लॉगरों का उत्साहवर्धन भी होगा।

इस तरह का कोई भी प्रयास कितना ही अच्छा क्यों न हो, यदि मौलिक आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए नोट नहीं हैं तो अधिक दिन गाड़ी नहीं चलती। ऐसा मैंने होते हुए भी देखा है और स्वयं भी दो-चार हुआ हूँ। और स्वयंसेवक भी कितने ही उत्साहयुक्त और समर्पित क्यों न हों लेकिन एक समय बाद मामला गड़बड़ाने लगता है। इसलिए इस प्रयास का व्यवस्थित तरीके से आयस्रोत भी होगा ताकि सर्वर आदि के खर्चे तो निकलते ही रहे साथ ही परिश्रमी स्वयंसेवकों को कुछ पारिश्रमिक मिल सके। साथ ही समय-२ पर प्रतियोगिताएँ आयोजित करने एवं अन्य बंधुजनों द्वारा आयोजित प्रतियोगिताओं को सपोर्ट कर योग्य ब्लॉगरों आदि को पारितोषिकों से नवाज़ने की भी गुंजाइश बन सके।

इसी के चलते आपको दे रहा हूँ यह निमन्त्रण

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बीता एक और साल …..

September 23, 2007 · 17 Comments

मोर पंख
( यह फोटो इस मूल फोटो से पंगे लिए होने का नतीजा है। )

एक बार में एक दिन जीयो; पीछे मुड़ देखकर दुख न करो क्योंकि जो बीत गया सो बीत गया, भविष्य के बारे में सोच चिन्तन न करो क्योंकि वह अभी आया नहीं है। आज को जीयो और उसको इतना अच्छा बनाओ कि वो यादगार बन जाए।

- अज्ञात

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हिन्दी में बात करके प्रसन्नता होगी …..

January 14, 2007 · 17 Comments

पहले भी कई बार लिखा जा चुका है, मैंने भी लिखा है तथा अन्य लोगों ने भी लिखा है, कि क्या कारण हो सकते हैं कि लोग हिन्दी जानते हुए भी हिन्दी में बात नहीं करते। जब भी किसी अच्छे हाई-फ़ाई रेस्तरां में जाता हूँ और वहाँ पर पूछा जाता है:

हैलो सर! व्हॉट वुड यू लाईक टु हैव?

या किसी अन्य संस्थान में जाओ तो वहाँ पर स्वागत कक्ष में बैठी महिला पूछतीं हैं:

हाऊ मे आई हैल्प यू?

जब ऐसा होता है तो मुझे उस संस्थान/रेस्तरां के मैनेजमैन्ट आदि पर बड़ी कोफ़्त होती है। बड़े बड़े बी-स्कूल में पढ़ मैनेज करना आदि तो सीख लेते हैं लेकिन बाकी कुछ नहीं सीखते। अब यहाँ वेटर या उस रिसेप्शनिस्ट की गलती नहीं है, उन्हें तो जैसे बोला जाएगा वही करेंगे नहीं तो नौकरी से हाथ धोएँगे। लेकिन जो उनको ऐसा करने को बोलते हैं वे अपनी ज़रा भी अक्ल का प्रयोग नहीं करते। अरे भई यदि किसी भारतीय को संबोधित कर रहे हो(खासतौर पर जब वो उत्तर भारतीय दिख रहा है) तो उसे हिन्दी में क्यों नहीं संबोधित करते? यदि सामने वाले को हिन्दी समझ नहीं आई तो उससे अंग्रेज़ी आदि में वार्तालाप को आगे बढ़ाया जा सकता है लेकिन सीधे ही अंग्रेज़ी में बात करना तो समझदारी नहीं दिखती!! और संबोधित हो रहे लोग भी अधिकतर भूरे/काले अंग्रेज़ होते हैं जो अंग्रेज़ी में ही बात करना पसंद करते हैं!!

अभी कल(शनिवार) की बात है, दिल्ली ब्लॉगर समूह की स्थापना के तीन वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में एक भेंटवार्ता लोधी गार्डन में आयोजित की गई। अब मेरा वहाँ जाने का पूरा पिरोगराम फिट था, लेकिन अचानक परसों रात ऑफ़िस का कुछ आवश्यक कार्य आ जाने से पूरी रात उसको करना पड़ा, कल सुबह नौ बजे सोया और फिर दोपहर में एक बजे उठा। सिर में तीव्र दर्द हो रहा था इसलिए मैंने सोचा कि नहीं जाते भेंटवार्ता में, वैसे भी दो बजे का समय था पहुँचने का। लेकिन बाद में भी तो जा सकते थे, यह सोच अपन तैयार हुए, योगेश को फ़ोन कर पूछा कि साथ चलने का मन है क्या, बोले आ जाओ तो उनके घर पहुँच गए। अब साहब तैयार नहीं थे, तो उसमें कुछ मिनट लगाए, चलने से पहले सोचा कि पहले देख लें कि भेंटवार्ता अभी चल रही है कि नहीं, तो मोन्टू को फ़ोन लगाया और पता चला कि वह तो आधा घंटा पहले समाप्त हो गई और अब तो मोन्टू भी घर पहुँचने वाला है। सांयकाल के पाँच बज रहे थे, तो हम दोनों ने सोचा कि क्नॉट प्लेस हो आया जाए, घूम-फिर के वापस आ जाएँगे।

क्नॉट प्लेस पहुँच हमने सोचा कि कुछ खा-पी लें तो इसी गरज से पहुँच गए “निज़ाम्स काठी कबाब” में। अभी अपना ऑर्डर दिया ही था कि वहाँ रखी एक तख़्ती पर मेरी निगाह पड़ी और उसे देख बड़ी प्रसन्नता हुई।

ऐसा पहला रेस्तरां देखा जहाँ वो अंग्रेज़ी में बातचीत का दिखावा नहीं, इसको देख मुझे कितनी प्रसन्नता हुई मैं बता नहीं सकता। मैंने सोचा कि चलो कोई रेस्तरां तो है जो अपनी भाषा की परवाह करता है और उसमे बात करने से अपने को छोटा या लज्जित महसूस नहीं करता। यदि इसी तरह सभी रेस्तरां हो जाएँ और भारतीय(खास तौर से उत्तर भारतीय) ग्राहकों से हिन्दी में बोलें तो वाकई बहुत अच्छा हो जाएगा। :)

कहने का अर्थ है कि ऐसा भी नहीं है कि लोगों को भाषा समझ नहीं आती। तो फ़िर अपनी ही भाषा में बात करने को हीनता क्यों समझा जाता है??

वैसे कल बहुत बड़ा लफड़ा भी हो जाता। हुआ यूँ कि वेन्गर से पेस्ट्री आदि ले हम बाहर बैठ खा रहे थे और वहाँ एकाध तस्वीरें भी लीं। अब वहाँ से कैफ़े कॉफ़ी डे में कॉफ़ी पीने चले गए, पहले नीचे बैठे और फ़िर जब देखा कि ऊपर जगह खाली है तो ऊपर जाकर सोफ़े पर बैठने की सोची। अब ऊपर जाकर देखा कि कैमरा तो हाथ में है ही नहीं!! वापस आ नीचे देखा तो कुर्सी पर जहाँ पहले सामान रखा था वहाँ भी नहीं दिखा, मेरी तो सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई!! वापस उसी जगह गया, वेन्गर के पास, जहाँ हम लोग बैठे थे परन्तु वहाँ भी नहीं मिला। पास के कूड़ेदान में भी देख डाला कि कहीं गलती से खाली डब्बे के साथ कैमरा भी तो नहीं फ़ेंक दिया!! इतने में योगेश का फ़ोन आया और पता चला कि उनको कैमरा वहीं कैफ़े में नीचे की कुर्सी पर पड़ा मिल गया है जो कि हड़बड़ी में मुझे नहीं दिखा! मैंने चैन की सांस ली और वापस अपनी कॉफ़ी पीने पहुँच गया। :D

कैफ़े कॉफ़ी डे वालों की एक नई कॉफ़ी(नई बोले तो मेरे लिए नई) का ज़ायका लिया, कोलोम्बियन क्वेस्ट, जो कि उनकी अंतर्राष्ट्रीय कॉफ़ियों में से एक है। इस श्रेणी की दूसरी कॉफ़ी, इथोपियन काहवा, मुझे कुछ खास नहीं लगी, लेकिन वह कोलोम्बियन क्वेस्ट बढ़िया थी। इसमें ये लोग तीन ज़ायके(फ़्लेवर) देते हैं - आयरिश, हेज़लनट(एक प्रकार का बादाम) और चॉकलेट। तो इसमें मैंने आयरिश ज़ायके वाली कॉफ़ी ली और उसका स्वाद बढ़िया था! :) कभी मौका लगे तो आप भी पी कर देखिएगा, एक बड़े आकार के कप में सर्व होने वाली यह कॉफ़ी आपको भी अच्छी लगेगी। और मैं अगली बार जब किसी कैफ़े कॉफ़ी डे में जाऊँगा तो हेज़लनट ज़ायके वाली ट्राई करके देखूँगा। ;)

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बदलता समय ….. बदलते त्योहार

December 23, 2006 · 7 Comments

परसों मैं टीडीआई मॉल में स्थित प्लैनेट एम से फ़िल्मों की कुछ वीसीडी और डीवीडी लाया था, परन्तु कल जब “क्राऊचिंग टाईगर हिड्डन ड्रैगन” की डीवीडी चलाई तो वह चली नहीं। यानि कि उसमें कुछ लोचा था इसलिए आज उसे वापस दे दूसरी लाने की सोची। लेकिन सप्ताहांत होने के कारण देर से सोया सुबह को जिस कारण दोपहर में देर से उठना हुआ। प्लैनेट एम के लिए निकलने तक सांय हो चुकी थी। (आने वाले)परसों यानि कि सोमवार को क्रिसमस है, लेकिन बहुत सी बड़ी बड़ी दुकानों में 2-3 हफ़्ते पहले से ही चहल-पहल आरंभ हो जाती है। बहरहाल जब मैं मॉल में पहुँचा तो देखा कि उसके मध्य भाग में कुछ हो रहा है, मतलब ऑरकेस्ट्रा आदि बज रहा था, गाने वगैरह चल रहे थे और भीड़ जमा थी। लेकिन मैंने पहले जिस कार्य से आया था उसे निबटाने की सोची और प्लैनेट एम में चला गया। वहाँ उनके पास उसी फ़िल्म की दूसरी डीवीडी नहीं थी, तो उतनी कीमत की मैंने दो फ़िल्मों की वीसीडी ले ली और बाहर आ पहली मंज़िल की बाल्कनी के मध्य में पहुँच गया यह देखने कि काहे का मज़मा लगा हुआ था।

देखने पर पता चला कि किसी प्रकार का कार्यक्रम हो रहा है जिसे कुछ कंपनियाँ आदि प्रायोजित कर रही हैं जैसे शहनाज़ हुसैन की सौंदर्य प्रसाधन कंपनी, 94.1FM वगैरह। यह सब क्रिसमस के अवसर पर हो रहा था और अगले दो दिन भी चलना था। मॉल को सजाया हुआ था। कार्यक्रम का मेज़बान अलग अलग तरह के खेल आदि करवा रहा था और जीतने वालों को पुरस्कार दिए जा रहे थे।

लोग इन खेलों आदि का खूब मज़ा ले रहे थे, वाकई अच्छा मनोरंजन हो रहा था। पर कुछ देर बाद लगा कि अब चलना चाहिए। चलते समय सजे धजे क्रिसमस ट्री पर भी नज़र पड़ी।

यह सिर्फ़ यहाँ ही नहीं वरन्‌ आस पास के अन्य दो मॉल सिटी स्क्वेयर और वेस्ट गेट का भी है। इसे देख मन में ख्याल आया कि क्या हमारा समाज इस तरह के बदलाव पर भी है? क्रिसमस और वेलेन्टाईन डे पर बड़ी दुकाने और बाज़ार सज जाते हैं, चहल पहल होती है, परन्तु दीपावली और ईद जैसे त्योहारों पर ऐसी कोई खासी चहल पहल नहीं होती इन बड़ी दुकानों और बाज़ारों में। या केवल मुझे ही ऐसा लग रहा है? क्योंकि मुझे अच्छी तरह याद है कि दीपावली और ईद के दिनों में भी मैं एकाध बार इन मॉलों में गया लेकिन त्योहार वाली चहल पहल मुझे न दिखाई दी जो आज दिखाई दी।

मुझे क्रिसमस पर कोई आपत्ति नहीं है, त्योहारों का मकसद खुशियाँ मनाना होता है, और खुशियाँ किसी एक संप्रदाय या धर्म आदि की जाग़ीर नहीं। उन पर सभी का अधिकार है। इसलिए चाहे दीपावली हो या ईद या क्रिसमस, अपन तो हर वक्त खुशी मनाते हैं। लेकिन यह बर्ताव थोड़ा अजीब सा लगा कि ये तथाकथित हाई-फ़ाई बड़ी दुकानें केवल पाश्चात्य संस्कृति का अनुसरण करते हैं। जिस बाज़ार में हैं वहाँ के लोकल ज़ायके का भी ख़्याल रखना चाहिए। या केवल मुझे ऐसा लग रहा है? मैं निश्चय नहीं कर पाया और घर वापसी के दौरान सारे रास्ते इसी उधेड़बुन में रहा।

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क्यों ना भागें पैसे के पीछे!!

June 20, 2006 · 21 Comments

जब कोई व्यक्ति यह कह किसी पर तंज कसता है कि फ़लाना बन्दा पैसों के पीछे भाग रहा है तो मुझे उस व्यक्ति की सोच और बोल पर तरस भी आता है और गुस्सा भी आता है। अरे भई, पैसों के पीछे कौन नहीं भाग रहा? क्या पैसों के बिना गुजर बसर संभव है? हर कोई यह चाहता है कि वह अच्छे मकान में रहे, अच्छा खाए, अच्छा पहने, बढ़िया जगहों पर घूमने फ़िरने जाए, थोड़ा अपने आने वाले कल के लिए बचा के रखे, अपने बच्चों को अच्छी परवरिश दे, अपने माता पिता के बुढ़ापे को सुखमयी बनाए। तो क्या यह सोचना और इस सोच को साकार करना बुरा है? और कोई क्यों ना पैसे कमाए? किसी दूसरे के पैसे कमाने से लोगों को क्यों चिढ़ होती है? क्या उन्हें पैसे कमाना बुरा लगता है? क्या वे फ़ोकट में नौकरी आदि करते हैं? अरे यदि आपको पैसे कमाना अच्छा लगता है तो क्यों नहीं आप समय का सदुपयोग कर अपना समय पैसे कमाने में लगाते बजाय दूसरे व्यक्ति से कुढ़ने और उसपर तंज कसने के?

अब यहाँ मैं स्पष्ट करना चाहूँगा कि मैं किसी व्यक्ति पर कोई व्यंग्य नहीं कर रहा ना ही कुछ भला बुरा कह रहा हूँ। मैं एक आम संदर्भ में बात कह रहा हूँ क्योंकि फ़लाना बन्दा पैसे के पीछे भाग रहा है कह तंज कसने वाले बहुत हैं, भूतकाल में मुझे भी “पैसे के पीछे भागने वाला” के संबोधन से अलंकरित किया गया है, और वह भी उन व्यक्तियों द्वारा जो सोते जागते केवल पैसे बनाने के बारे में सोचते हैं, जो स्वयं तो बिना पैसे लिए एक काम नहीं करते और मुझ पर तंज कसा करते थे कि मैं पैसे के पीछे भागता हूँ, मात्र इसलिए कि मैं उन लोगों के साथ किसी मौके को हाथ से नहीं छोड़ता था और बिना अपना जायज़ मेहनताना लिए एक काम न करके देता था।

अभी परिचर्चा पर नीरज जी ने एक थ्रेड चालू किया, महेश भट्ट - भटका फ़िल्मकार। अब वह भटका है कि नहीं यह तो मैं नहीं जानता, परन्तु एक विषय जो वहाँ पर उठाया गया है उसके मैं विरोध में हूँ। जैसे कि नीरज जी ने थ्रेड की आरम्भिक पोस्ट में कहा:

महेश भट्ट एक निष्णात फ़िल्मकार हैं. जनम, सारांश, अर्थ, ज़ख़्म जैसी बेहतरीन फ़िल्में देने वाले भट्ट पिछले दस सालों में बेतुकी फ़िल्में बना रहे हैं. वे कहते हैं कि मैं वहीं महेश भट्ट हूं जिन्होंने सारांश और अर्थ जैसी फ़िल्में बनाईं लेकिन मुझे क्या मिला. एक नेशनल अवार्ड और साठ हज़ार रूपए. अब यह फ़िल्मकार पैसों के पीछे भाग रहा है.

इस पर सागर जी ने टिप्पणी दी:

मेरा भी यही मानना है कि एक रचनाकार चंद रुपयों के लिये अपनी प्रतिभा के साथ अपनी फ़िल्मों के लाखों चाहकों, प्रशंषकों के साथ अन्याय कर रहा है, भट्ट साहब की फ़िल्में तो पहले भी हिट होती थी रुपये तो पहले भी मिला करते थे; और क्या रुपये इस तरह की घटिया फ़िल्मों से ही मिलेंगे?

पीछे नहीं रहे प्रतीक भाई भी, उन्होंने भी टिप्पणी दन दना दी:

महेश भट्ट बहुत ही उम्दा निर्देशक हैं। उनकी इस माध्यम पर ग़ज़ब की पकड़ है। लेकिन बहुत से दूसरे निर्देशकों की ही तरह उन्होनें भी सामाजिक सरोकारों को एक तरफ़ कर पैसा कमाने की राह पकड़ ली है।

तो मेरा कहना है बन्धुओं, क्या पैसा कमाना बुरा है यदि वह गैरकानूनी रूप से ना कमाया जाए? सागर जी कहते हैं कि क्या जिस्म, मर्डर, कलयुग जैसी फ़िल्मों से ही पैसा बनाया जा सकता है? तो मैं कहूँगा कि नहीं, सिर्फ़ इन जैसी फ़िल्मों से ही पैसा नहीं कमाया जा सकता, और फ़िल्में भी पैसा कमाती हैं, पर यह फ़िल्में भी चलती हैं, और खूब चलती हैं। क्यों? यह तो आप देखने वालों से पूछो जिन्होंने एक नहीं दो नहीं वरन्‌ कई कई बार यह फ़िल्में चाव से देखी हैं। बाज़ार का सदियों से आवश्यकता-आपूर्ति का उसूल रहा है। यदि खरीददार हैं तो ही माल बाज़ार में आता है। अब ड्रग डीलरों की तरह फ़िल्म निर्माताओं ने तो इस तरह की फ़िल्में लोगों को फ़ोकट में दिखा इनका आदि नहीं ना बनाया। और इससे भी अधिक गहन फ़िल्में या कह लो पॉर्नोग्राफ़िक फ़िल्में बाज़ार में उपलब्ध हैं, तो फ़िर इस तरह की फ़िल्मों पर हल्ला क्यों? समस्या यही है कि मनुष्य सदैव से ही पाखंडी(hypocrite) रहा है, जहाँ एक चीज़ को वह नकारता है वहीं चोरी छुपे उसी चीज़ का उपयोग करता है।

मैं भारतीय संस्कृति का ढोल पीटने और उन तथाकथित सामाजिक पुलिस से पूछना चाहूँगा कि क्या औरतों को पर्दे में रखना, सेक्स आदि की बात करने का वर्जित(taboo) होना आदि, क्या यह वास्तव में भारतीय संस्कृति है?? क्या हम उसी भारतीय समाज के उत्तराधिकारी हैं जहाँ कन्याएँ अपनी पसंद का वर चुनती थीं? क्या हम उसी भारतीय संस्कृति के उत्तराधिकारी हैं जिसने कामसूत्र की रचना की, जिसने अजंता और खजुराहो की गुफ़ाओं की दीवारों पर अपनी हस्तकला द्वारा अपने ज्ञान और सोच की छाप छोड़ी? क्या मर्डर जैसी फ़िल्म आज के समाज की तस्वीर नहीं दिखाती?

बहरहाल, बात पैसे के पीछे भागने की हो रही थी और मैं संस्कृति के मुद्दे पर पहुँच गया। लोग कहते हैं कि बहुत बुरा लगता है कि फ़लाना कलाकार चंद पैसों के लिए अपनी कला के चाहने वालों के साथ अन्याय करता है, उसे बेच देता है आदि आदि। क्या चाहने वालों की गिनती से ही कलाकार की आर्थिक आवश्यकताएँ पूरी हो जाएँगी? पिकासो को मान सम्मान उनके मरने के बाद मिला, जीवन आर्थिक कठिनाईयों में प्रेमचन्द ने भी काटा जो आज पिछली शताब्दी के हिन्दी साहित्य के एक मज़बूत स्तंभ माने जाते हैं। क्या मिला ऐसे कलाकारों को? जीते जी तो कुछ हासिल हुआ नहीं, मरने के बाद किसने देखा है कि क्या पाया और क्या खोया? क्या एक कलाकार होना अभिशाप है? क्या एक कलाकार होने के अर्थ यह है कि वह व्यक्ति जीवन के भौतिक सुखों से वंचित रहे? और केवल कलाकार ही क्यों, यह बात तो हर व्यक्ति विशेष पर लागू होती है। मैं नहीं समझता कि किसी भी व्यक्ति को किसी अन्य पर यह तंज कसना शोभा देता है कि वह पैसे के पीछे भाग रहा है, यदि वह व्यक्ति कोई गैरकानूनी कार्य नहीं कर रहा तो।

मुझे अब कोई कहता है तो मेरा उत्तर यही होता है कि हाँ, मैं पैसे के पीछे भाग रहा हूँ, पर तुम उन बदनसीबों में से हो जो यह दौड़ नहीं लगा सकते, आखिर हर कोई तो पैसे के पीछे नहीं भाग सकता और बहुत कम होते हैं जो उसे पकड़ पाते हैं। यह उत्तर ठीक वैसा ही है जैसा महाभारत में हस्तिनापुर के बंटवारे से पहले श्रीकृष्ण ने द्रोणाचार्य से कहा था जब द्रोणाचार्य ने पूछा कि पांडवों का यह कैसा दुर्भाग्य है, तो श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि किसी नए नगर के निर्माण का अवसर मिलना दुर्भाग्य कहाँ है, यह तो प्रगति का मार्ग है, दुर्भाग्य तो यह दुर्योधन का है क्योंकि वह यह प्रगति की यात्रा नहीं कर सकता।

तो जो लोग सामाजिक दायित्वों और ज़िम्मेदारियों का भी प्रश्न उठाते हैं, उनसे भी मैं यह कहना चाहूँगा कि पैसे के बिना कोई कार्य नहीं हो सकता, चाहे वह निज उद्धार का हो या समाज के उद्धार का। भूखा नंगा व्यक्ति जिसके पास अपने खाने के लिए कुछ नहीं है, वह समाज का क्या उद्धार करेगा? बिल गेट्स आज विश्व के सबसे बड़े लोकोपकारी व्यक्तियों में से एक हैं जो करोड़ों डॉलर चन्दा देते हैं लोकोपकारी कार्यों के लिए। क्या यह संभव हो पाता यदि वह धनाढ्य व्यक्ति ना होते?

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बुराई है आवश्यक …..

April 6, 2006 · 7 Comments

बुराई, अनाचार, अधर्म, अज्ञानता आदि सभी ऐसे भाव हैं जिन्हें कोई व्यक्ति अपने आसपास नहीं फ़टकने देना चाहता। परन्तु फ़िर भी इनका समावेश प्रत्येक व्यक्ति में है!! हर कोई इनका नामोनिशान मिटा देना चाहता है, परन्तु आजतक सफ़ल कोई न हो सका, और वह दिन बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण होगा जिस दिन इनका नाश हो जाएगा!!

क्यों? क्या आश्चर्य हो रहा है कि मैं अब धर्म की आलोचना के बाद बुराई की वकालत क्यों कर रहा हूँ? ;) नहीं, मैं शैतान या इबलीस का उपासक नहीं बन गया हूँ। इस वकालत के पीछे भी एक कारण है, बहुत गूढ़ कारण है, और दुर्भाग्यवश बहुत से लोगों को इसका ज्ञान नहीं है।

पहली बात तो यह कि “शैतान” या “इबलीस” क्या है? यह बुराई का प्रतीक है, आम भाषा में कहा जाए तो यह सभी बुरे कर्म करने वालों का स्वामी है, ईश्वर का प्रतिद्वन्द्वी है, उसकी विपरीत शक्ति है। जिस तरह ईश्वर के उपासक सद्कर्मों में अपना समय लगाते हैं, वहीं शैतान के उपासक बुरे कर्मों में अपना समय और ऊर्जा व्यतीत करते हैं।

पर क्या कभी सोचा है कि यह शैतान कहाँ से आया? इसकी उत्पत्ति कैसे हुई? कई विद्वानों का मानना है कि इसकी उत्पत्ति नहीं हुई, यह भी ईश्वर की तरह ही अनश्वर और अनंत है, तो कुछ अन्य विद्वानों का मानना है कि ईश्वर ने ही शैतान की उत्पत्ति की थी। हिन्दु पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि सुर और असुर एक ही पिता की सन्तानें थीं, जो सदाचार की ओर मुड़ गए वे सुर(देवता) कहलाए, जिन्होंने अनाचार को अपना लिया वे असुर कहलाए।

पर प्रश्न है कि बुराई कभी समाप्त क्यों नहीं होती, क्यों नहीं शैतान खत्म होता और क्यों नहीं सभी ईश्वर के उपासक बन सदाचार की ओर मुड़ते?

इसका उत्तर सरल भी है और पेचीदा भी। एक पल के लिए कल्पना कीजिए कि बुराई का अन्त हो जाता है, शैतान तथा दुष्कर्म समाप्त हो जाते हैं, चारों ओर सच्चाई का बोलबाला है। यदि ऐसा हो जाता है तो क्या कोई सच्चाई को पहचान पाएगा? क्या उसका कोई मूल्य रह जाएगा? नहीं, क्योंकि उस समय हमें सच्चाई की कोई आवश्यकता नहीं रह जाएगी, ईश्वर की शरण में कोई नहीं जाएगा, क्योंकि बुराई तो है नहीं, झूठ कोई बोलता नहीं। यह ठीक वैसा ही है जिस तरह कोई भी एक सा भोजन सदैव नहीं कर सकता, क्योंकि कुछ समय बाद वह ऊब जाता है।

इसी तरह अज्ञानता भी कभी समाप्त नहीं हो सकती, प्रत्येक व्यक्ति ज्ञानी नहीं हो सकता। सम्पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति किसी को नहीं हो सकती, कुछ न कुछ तो ऐसा रह ही जाता है। अज्ञानता के कारण ही हमें ज्ञान की कद्र है, उससे लगाव है तथा उसे पाने का प्रयत्न करते हैं।

हम दोषहीन अथवा “परफ़ेक्ट” संसार में नहीं रहते। जिस दिन ऐसा हो गया, उस दिन जीवन का अर्थ समाप्त हो जाएगा, विकास रूक जाएगा और मनुष्य की जीवन के प्रति रूचि समाप्त हो जाएगी।

अच्छाई और बुराई एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, एक के बिना दूसरा निरर्थक है। इन दोनों का ही प्रभाव कम ज्यादा अवश्य हो सकता है परन्तु नाश किसी का नहीं हो सकता। ये हमेशा से ही हाथ में हाथ डाले साथ चलती आई हैं, और सदैव ही चलती रहेंगी। मनुष्य भी कोई अच्छा या बुरा नहीं होता। व्यक्ति के अन्दर अच्छाई और बुराई, दोनों का ही समावेश होता है, बात सिर्फ़ यह होती है कि इनमें से किसी एक का प्रभाव उस पर दूसरे से अधिक होता है, जिसके कारण व्यक्ति अच्छे या बुरे कर्म करता है।

तो जो लोग बुराई का नाश करने का नारा लगाते हैं, उन्होंने अज्ञान की चादर ओढ़ रखी है, वे नहीं जानते कि वे क्या कह रहे हैं और वह सम्भव है भी या नहीं!!

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नौकरी न मिलने के निश्चित कारण!!

February 14, 2006 · 3 Comments

आज के समय में नौकरी पाना बहुत कठिन कार्य हो गया है, और अच्छी नौकरी पाना और भी कठिन। कई कंपनियाँ अच्छे शिक्षण संस्थानों से बढ़िया छात्रों की अपने यहाँ सीधे भरती कर लेती हैं। पर उनका क्या जिनके यहाँ ऐसा नहीं होता? या फ़िर वे लोग जो अपनी मौजूदा नौकरी छोड़कर नई और अधिक अच्छी नौकरी तलाश करना चाहते हैं? बड़ी मुश्किल से आपको एकाध अच्छी वैकेन्सी के बारे में पता चलता है और आप अपनी अर्ज़ी भी लगा देते हैं, परन्तु यह सुन कर बड़ी झल्लाहट होती है कि आपको साक्षात्कार तक के लिए नहीं बुलाया जाता या फ़िर साक्षात्कार के बाद कहा जाता है कि आपसे बाद में संपर्क किया जाएगा और फ़िर कुछ नहीं होता। मतलब कि इतनी बढ़िया नौकरी हाथ से निकल गई और आप हाथ मलते रह गए। पर क्या आप जानते हैं कि कई बार या अधिकतर ऐसा कुछ उन मामूली त्रुटियों के कारण होता है जिन्हें अनदेखा करने का आपको इतना बड़ा मोल चुकाना पड़ता है? तो क्या हैं वे त्रुटियाँ?

  1. प्रावरण पत्र न भेजना : कई बार लोग यह गलती कर जाते हैं, किसी पद के लिए अर्ज़ी देते समय अपना रिज्यूमे(resumé) तो शान से भेज देते हैं परन्तु प्रावरण पत्र(cover letter) नहीं भेजते। या तो उन्हें मालूम नहीं होता कि प्रावरण पत्र किस चिड़िया का नाम है अथवा वे उसे भेजना भूल जाते हैं। दोनों ही स्थिति में हानि स्वयं उन्हीं की होती है। वैसे प्रावरण पत्र संलग्न करना कोई आवश्यक नहीं है परन्तु न भेजने से बुरा प्रभाव पड़ता है। यदि आप प्रावरण पत्र भेज रहे हैं तो कुछ समय निवेश करके उसमें कुछ लिखिए, जैसे कि क्योंकर आप उस पद के लिए उचित उम्मीदवार हैं जिसके लिए आप आवेदन दे रहे हैं। केवल यह लिखने से कि आप फ़लां पद के लिए आवेदन दे रहे हैं, आपका कोई मकसद हल नहीं होता, क्योंकि यह लिखना और प्रावरण पत्र बिलकुल न भेजना एक समान है।
  2. रिज्यूमे अथवा प्रावरण पत्र में आक्षरिक त्रुटियाँ : लगभग हर कोई अपने रिज्यूमे(resumé) और प्रावरण पत्र(cover letter) को किसी न किसी वर्ड प्रोसेसिंग सॉफ़्टवेयर में टाईप करता है और सभी में “स्पैल चैक” नामक सुविधा उपलब्ध होती है जिसे कि अधिकतर लोग प्रयोग न करके शब्द गलत लिख जाते हैं। इससे रिज्यूमे पढ़ने वाले व्यक्ति पर आपका गलत प्रभाव पड़ता है, साक्षात्कार से पहले ही, तो बाकी की तो आप सोच ही सकते हैं। एक अंग्रेज़ी की कहावत है:

    first impression is the last impression

    जिसका हिन्दी अनुवाद है:

    पहला प्रभाव ही अन्तिम प्रभाव होता है

    अब यदि इसका आक्षरिक अर्थ न लेकर इसे समझने का प्रयत्न करें तो इसका अर्थ यह है कि आपका जो प्रभाव पहले पहल पड़ता है, वही दूसरे व्यक्ति के दिमाग में घर कर जाता है। यदि आपका अच्छा प्रभाव पड़ा है तो उसे गलत प्रभाव में तब्दील करने में तो अधिक समय नहीं लगता परन्तु यदि पहला प्रभाव गलत पड़ा है तो उसे अच्छे प्रभाव में तब्दील करने में बहुत कठिनाई आती है। और फ़िर जहाँ आप नौकरी के लिए आवेदन दे रहे हैं, वहाँ तो आपके पास एक ही अवसर होता है।

  3. गलत शब्दों का प्रयोग : यदि आपने रिज्यूमे अथवा प्रावरण पत्र में सही शब्दों का प्रयोग नहीं किया है तो समझिए कि नौकरी मिलने की बहुत कम संभावना है क्योंकि अभ्यस्त निगाहों को गलत शब्द बहुत शीघ्र दिखाई पड़ जाते हैं। गलत शब्दों से मेरा मतलब किसी ऐसे वैसे शब्द से नहीं वरन् सही आक्षरिक शब्द न होने से है। जैसे यदि आप “नेटवर्क एडमिनिस्ट्रेटर” के पद के लिए आवेदन दे रहे हैं और cache server की जगह cash server लिख दिया तो गड़बड़ तो हो ही जाएगी क्योंकि आपकी इस त्रुटि को “स्पैल चैक” भी न पकड़ पाएगा।
  4. पुरानी कंपनी के नाम में गलती : यदि आप पहले कहीं नौकरी कर चुके हैं तो अवश्य ही इस बात का अपने रिज्यूमे में वर्णन करेंगे। और यदि आपने अपनी पुरानी कंपनी अथवा मालिक के नाम में गलती कर दी तो ….. तो पंगा तो हो ही जाएगा न!!
  5. रिज्यूमे अथवा प्रावरण पत्र में भाषा की त्रुटियाँ : आप यदि अपने रिज्यूमे और प्रावरण पत्र को बोल कर पढ़ेंगे तो यदि उनमें कोई भाषा संबन्धी गलतियाँ हैं तो वे आपके समक्ष उजागर हो जाएँगी ताकि आप उन्हें सुधार सकें। यदि भाषा सही रखी जाए तो साक्षात्कार लेने वाले व्यक्ति पर अच्छा प्रभाव पड़ता है जो कि आपके हित में होता है।
  6. फ़ोन अथवा ईमेल का उत्तर न देना : जिस कंपनी में आपने आवेदन दिया है, यदि वहाँ से आपको फ़ोन आता है और आप उस समय बात करने की स्थिति में नहीं हैं तो यह बात फ़ोन करने वाले व्यक्ति से कह दें। यदि आप फ़ोन करने का वायदा करके फ़ोन नहीं करते या बहुत दिन बाद करते हैं, अथवा यदि आपको उस कंपनी से कोई ईमेल आती है और उसका उत्तर देने में कई दिन लगा देते हैं तो इससे आप अपना बहुत बुरा प्रभाव डाल रहे हैं। यदि आपकी कहीं और नौकरी लग गई है तो भी आपको यह तो बता ही देना चाहिए कि आपने दूसरी कंपनी में पद स्वीकार कर लिया है, ताकि आपकी छवि उस व्यक्ति/कंपनी की नज़रों में अच्छी बनी रहे, क्योंकि यह दुनिया बहुत छोटी जगह है, हो सकता है कुछ समय बाद आप पुन: नौकरी तलाश रहे हों!!
  7. अनुचित स्थान से फ़ोन पर बात करना : जिस कंपनी में आपने आवेदन दिया है, यदि वहाँ से आपको फ़ोन आता है, तो आपको यह निश्चित कर लेना चाहिए कि आपके आसपास शोरगुल अथवा कोई विघ्न डालने वाला न हो। साधारणतया फ़ोन करने वाला आपसे अवश्य पूछता है कि क्या आप उस समय बात कर सकते हैं या नहीं। यदि आप कहीं बाहर हैं, जैसे किसी रेस्तरां, सिनेमा, आफ़िस मीटिंग आदि में या सड़क पर, अथवा बात करने की स्थिति में नहीं हैं तो यह कह देना बेहतर है कि आप उस समय बात नहीं कर सकते, और जिस समय बात कर सकते हैं वह बता दें तो वह व्यक्ति आपको पुन: फ़ोन करेगा। शोरगुल आदि में बात करना या बात करते समय बीच में विघ्न पड़ना असभ्य लगता है और यह यकीनन आपके हित में नहीं है।
  8. लंबे वार्तालाप के लिए मोबाईल का प्रयोग करना : मोबाईल फ़ोन बात करने के लिए ही होता है। परन्तु संभावित कंपनी के फ़ोन करने वाले से यदि संभव हो तो मोबाईल फ़ोन पर बात न करके साधारण फ़ोन पर बात करें, क्योंकि टेक्नॉलोजी चाहे कितनी ही विकसित हो गई हो, नेटवर्क सिग्नल का कम होना अथवा चले जाना आम बात है। दूसरे कई बार मोबाईल फ़ोन से बात करते समय दूसरे व्यक्ति को ठीक से आपकी आवाज़ सुनाई नहीं पड़ने की संभावना को भी नकारा जा सकता। इसलिए यदि संभव हो तो साधारण फ़ोन से बात करें, ताकि वार्तालाप में कोई अनचाहा विघ्न न पड़े। वैसे यह कोई अत्यधिक महत्वपूर्ण बात नहीं है परन्तु फ़िर भी इसका ध्यान रखना आपके हित में ही है।
  9. साक्षात्कार के लिए देरी से पहुँचना अथवा पहुँचना ही नहीं : यदि आप निर्धारित समय पर नहीं पहुँच सकते तो सुसभ्यता का तकाज़ा यही है कि आप फ़ोन कर बता दें कि आपको पहुँचने में देर हो जाएगी या फ़िर आप पहुँच ही नहीं पाएँगे, ताकि दूसरा दिन अथवा समय निर्धारित किया जा सके। साक्षात्कार लेने वाले को प्रतीक्षा कराना निश्चित रूप से आपके पक्ष में नहीं है क्योंकि जितना आप लेट होंगे उतनी ही बुरी छवि आपके प्रति उसके मन में बन जाएगी जिसको सुधारना असंभव हो जाएगा।

यह कुछ बहुत मामूली सी त्रुटियाँ हैं जिनको थोड़ी सी सावधानी बरतने से हटाया जा सकता है, और यदि इन्हें रहने दिया जाता है तो ये छोटी छोटी गलतियाँ ही इस बात का प्रबन्ध कर देती हैं कि योग्य होने पर भी आपको नौकरी नहीं मिलती। तो इसलिए सावधान रहिए कि यही आपके हित में है। :)

ऊपरलिखित सूचि डग हैम्पशायर की इस पोस्ट से प्रेरित है।

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वोट दो वरना …..

January 25, 2006 · 3 Comments

अमेरिका आखिर अपने को समझता क्या है? कहता है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम के खिलाफ़ वोट दो वरना भारत-अमेरिका के परमाणु समझौते को नमस्ते कह लो!! (स्रोत) मतलब कि भईये यह तो सीधी सीधी धमकी है, कल को कहेंगे कि फ़लां देश पर हमला करना है, ब्रिटेन की तरह हमारे चमचे बन जाओ वरना तुम्हारी फ़लां स्वीकृति पर रोक लगवा देंगे, या कुछ और कर देंगे!! यानि कि यह तो खुलम-खुला दादागिरी है। साथ ही अमेरिका कहता है कि भारत ने अपने सैन्य और असैन्य परमाणु प्रतिष्ठानों में जो अंतर बताएँ हैं वे विश्वसनीय नहीं हैं।

एक भारतीय दिल से पूछा जाए तो वह कहेगा कि भारतीय प्रधानमंत्री को अमेरिका को साफ़ कर देना चाहिए कि चाहे भारत ईरान के खिलाफ़ ही वोट दे पर यह भारत का अपना स्वतंत्र निर्णय होगा क्योंकि भारत एक स्वतंत्र देश है, अमेरिका भारत को ब्रिटेन समझने की भूल न करे जो उसकी हर जायज़-नाजायज़ बात को स्वीकार लेगा, इसलिए अमेरिका भारत को धमकी देने की भूल न करे। और भारत अपने यहाँ जो भी करता है, वह उसका निजी मामला है। अमेरिका कितने हथियार बनाता है, उसकी सैन्य और असैन्य परमाणु शक्ति कैसी और कितनी है, वह यह सबको नहीं बताता फ़िरता, तो इसलिए अपने काम से मतलब रखे और खाली-पीली दूसरों को डंडा देना छोड़ दे। यदि वह भारत-अमेरिका के परमाणु समझौते को तोड़ना चाहता है तो बेशक तोड़ दे, भारत अपने आप कार्य करने में भी सक्षम है और भारतीय रक्षा प्रणाली ने अमेरिकी उच्च तकनीक के हथियारों की पाकिस्तान के साथ हुई 1971 की लड़ाई में खूब धज्जियाँ उड़ाई हैं, क्योंकि बेहतर हथियार कभी कोई लड़ाई नहीं जीतते, लड़ाई जीती जाती है बढ़िया रणकौशल, तेज़ दिमाग और जीतने के बुलंद हौसले द्वारा।

पर यदि इस बात पर एक दिमाग से सलाह ली जाए, तो वह कहता है कि भारत को अमेरिका की बात मान लेनी चाहिए। ईरान भारत का कोई खास हमदर्द भी नहीं है और वहाँ जिन ईस्लामी कट्टरपंथियों की हुकूमत है वे भारत के समर्थन में तो नहीं, विरोध में अवश्य खड़े हो सकते हैं। और वैसे भी इस समय भारत को अपने लाभ की सोच कर अमेरिका का साथ देना चाहिए। जब भारत अमेरिका से अपना मतलब निकाल समर्थ हो जाए, तो तब भारत को उसके आगे झुकने से मना कर देना चाहिए। क्योंकि दिमाग ही कहता है कि

“अपना मतलब निकालने के लिए यदि गधे को भी बाप बनाना पड़े तो बना लेना चाहिए”

और जहाँ तक मैंने पढ़ा है, समझा है और जहाँ तक मेरी बुद्धि कहती है यह सही भी है, और इसी को आजकल दुनियादारी भी कहते हैं। इतिहास इसके उदाहरणों से भरा पड़ा है।

तो अब सोचने वाली बात है कि हमारे प्रधानमंत्री महोदय क्या उत्तर देते हैं!!

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वीडियो ब्लॉगिंग …..

January 20, 2006 · 5 Comments

जब से मैंने डिजिटल कैमरा लिया है, मैं उसे प्रयोग करने का अवसर तलाशता रहता हूँ!! और ऐसा हो भी क्यों न, आख़िरकार आधे महीने के वेतन से भी ज्यादा का यह कैमरा आख़िरकार मुझे पड़ा, बुरा हो आलसी-निठल्ले कस्टम अधिकारियों का!!

बहरहाल, आजकल वीडियो ब्लॉगिंग का चलन निकल पड़ा है। इससे पहले आए आडियो ब्लॉग जहाँ ब्लॉगर कुछ लिखने के बजाय एक आडियो फ़ाईल अपने ब्लॉग पर डाल देता था जिसे कि लोग सुन सकें, तो ब्लॉगर के विचार पढ़ने के बजाय दर्शक उन्हे सुन सकते थे। परन्तु यदि ब्लॉगर चाहे तो कुछ लिख भी सकता था, न लिखने का कोई नियम नहीं है!! ठीक ऐसी ही प्रणाली वीडियो ब्लॉगिंग की है, फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि आडियो की जगह ले लेता है वीडियो।

मैं अभी सोने ही जा रहा था कि मेरे दिमाग में एक विचार कौंधा, क्यों न मैं भी वीडियो ब्लॉगिंग शुरू करूँ!! जहाँ तक मेरी जानकारी है, भारत में अभी इसने चलन नहीं पकड़ा है जिसका एक कारण संभवत: यह भी है कि यहाँ अधिक गति वाले ईन्टरनेट संपर्क का ख़र्च वहन करने की क्षमता हर उपयोगकर्ता में नहीं है जैसी कि पश्चिमी देशों(अमेरिका, ब्रिटेन, स्वीडन आदि) और पूर्वी देशों(जापान, दक्षिणी कोरिया, मलेशिया आदि) में है, क्योंकि वहाँ ईन्टरनेट कंपनियाँ ऐसी ठगाई नहीं करती जैसी यहाँ की कंपनियाँ करती हैं!! दूसरा कारण हो सकता है सर्वर और बैंडविडत्थ की समस्या, क्योंकि आमतौर पर वीडियो अधिक भारी होती हैं(कुछ से लेकर कई मेगाबाईट तक)।

मेरे सामने हैं तो यही दो समस्याएँ परन्तु पहली कठिनाई का हल तो यह है कि मेरे पास 128 किलो बिट्स प्रति सेकंड का ईन्टरनेट कनेक्शन है और मैं वीडियो रात्रि को सर्वर पर चढ़ने के लिए लगाकर सो सकता हूँ, सुबह तक मामला निपट जाने के अधिकतम आसार हैं यदि संपर्क रात्रि में टूटता नहीं है। अब रही दूसरी समस्या, तो उसका समाधान यह है कि आजकल बहुत सी ऐसी वेबसाईटें हैं जो कि मुफ़्त में आपको अपने आडियो-वीडियो आदि अपने सर्वर पर च