दुनिया मेरी नज़र से - world from my eyes!!

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ये मौसम….. ये नज़ारे…..

October 25, 2007 · 16 Comments

कई बार प्रयास रहता है कि हर सप्ताहांत कम से कम एक बार दिल्ली या उसके आसपास कहीं सुबह जाया जाए घूमने, फोटोग्राफ़ी करने और उस जगह को जानने के लिए। दिल्ली में और आसपास बहुत सी ऐतिहासिक जगह हैं जो कि मशहूर नहीं हैं और जिनके बारे में कम लोग जानते हैं, ऐसी जगहों पर जाना और इनके बारे में जानना काफ़ी ज्ञानवर्धक रहता है। अन्य भी कई जगह हैं जैसे कि कोई पक्षी विहार या वाइल्ड लाइफ़ सैंक्चुअरी (wild life sactuary) आदि जहाँ जाया जा सकता है और वन्य जीवों पर भी ज्ञान पाया जा सकता है, साथ ही अच्छे फोटो भी मिल जाते हैं।

तो ऐसे ही बीते शनिवार सुबह सवेरे मैं और संतोष पहुँच गए ओखला पक्षी विहार जहाँ कई तरह के पक्षी मैंने पहली बार अपनी आँखों से सजीव देखे।

Black winged Stilt

एक तोता

रंग बिरंगे फूल

a Hoopoe

यमुना के किनारे पर बंधी एक नाव

ओखला पक्षी विहार में ली अन्य तस्वीरें यहाँ देखें

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गुलाबी शहर

October 23, 2007 · 14 Comments

तकरीबन चार दिन से घर में ही था, मन बेचैन था तो पिछले से पिछले बृहसपति-वार की शाम को मन हुआ कि कहीं लम्बी ड्राईव पर चला जाए। आशीष को फोन कर पूछा कि क्या एक लम्बी ड्राईव पर साथ चलना चाहेगा तो उसने कहा कि उस दिन जाने की जगह अगले दिन(शुक्रवार) को शाम को जल्दी निकल लेते हैं जयपुर की तरफ़ और वहाँ चोखी ढाणी में खाना खा के वापस आ जाएँगे देर रात तक। आईडिया मुझे जंचा तो मैंने हाँ कर दी और फिर योगेश को फोन लगाया। चलने को योगेश भी तैयार लेकिन उसने सुझाव दिया कि रात को वापस न आकर रात वहीं बिताते हैं और अगले दिन एकाध किला वगैरह देख वापस आते हैं। अपने को ये बात बेहतर लगी, इसलिए आशीष को फाईनल प्रोग्राम बता दिया और उसने भी सहमति जता दी। अगले दिन यानि कि शुक्रवार को दोपहर में मैं और योगेश मेरी मोटरसाइकिल पर लद के गुड़गाँव पहुँचे और वहाँ से आशीष की गाड़ी में हम तीनों लद के जयपुर की ओर रवाना हो गए। पिछले ही दिन गाड़ी में लगाए सोनी(sony) के नए सीडी प्लेयर(CD Player) और जेबीएल(JBL) के स्पीकरों से मस्त संगीत बज रहा था और गति से हम जयपुर की ओर चल पड़े।

शाम घिर आई, अंधेरा हो गया, मैंने घड़ी में समय देखा तो कोई खास नहीं हुआ था, मैंने सोचा कि कुछ जल्दी ही अंधेरा हो गया, लगता है वाकई सर्दियाँ आ गई हैं और दिन छोटे हो गए हैं। लेकिन फिर आशीष ने कहा कि अब तो चश्मा उतार दूँ, तो तब एहसास हुआ कि आँखों पर धूप का चश्मा चढ़ा हुआ था और इस कारण मुझे लगा कि अंधेरा हो गया है, वैसे असल में अंधेरा होने में समय था!! ;) बहरहाल, मैंने धूप का चश्मा उतार अपना रेगुलर वाला लगा लिया और इधर असली में अंधेरा हुआ उधर पीछे की सीट पर आराम फ़रमा रहे योगेश बाबू को बीयर (beer) की तलब लग आई और वे बोले कि बीयर लेनी है। रास्ते में जो भी छोटा कस्बा आदि पड़ता, और कुछ हो या ना हो लेकिन उनको अंग्रेज़ी का ठेका अवश्य दिख जाता!! ;) काफ़ी देर तक तो हमने उनको कंट्रोल करवाए रखा लेकिन आखिर कब तक करवाते, आखिरकार एक पेट्रोल पंप पर हल्का होने की गरज़ से गाड़ी रोकी और योगेश बाबू काम निपटा बीयर की बोतलें भी ले आए अपने लिए!! ;)

तकरीबन साढ़े पाँच घंटे में हमने जयपुर में प्रवेश किया, लेकिन यातायात की बड़ी समस्या थी, बहुत से मार्ग इसलिए बंद थे क्योंकि कोई रैली निकल रही थी, पहले हम रेलवे स्टेशन का रास्ता पूछ भटकते रहे, जिस सरकारी होटल में हमने रात गुजारनी थी वह रेलवे स्टेशन के पास ही है यह जानकारी राजस्थान टूरिज़म की वेबसाईट मोबाइल पर खोल हासिल की थी!! पर जब हमको आधा घंटा हो गया छोटी गलियों से निकलते और इधर-उधर भटकते तो हमने निश्चय किया कि पहले चोखीढाणी चलते हैं वापसी पर रात हो जाएगी और तब तक सड़कें खाली हो जाएँगी, तो हमने एक-दो ट्रैफ़िक पुलिस वालों से रास्ता पूछा और चोखीढाणी पहुँच गए। पिछली बार चोखीढाणी मैं पिछले वर्ष जुलाई में आया था। एक वर्ष के अरसे में चोखीढाणी में काफ़ी बदलाव आए ऐसा महसूस हुआ,काफ़ी कुछ नया सा लगा।

एक लालटेन

कुछ दुकान

वैसे इस एक वर्ष के अरसे में मुझमें भी कुछ सुधार हुए हैं, पिछली बार जब वहाँ एक स्टॉल पर तीर-कमान से निशाने लगाए थे तो एकाध ही निशाने वाले गोल बोर्ड पर लगा था बाकी तो दाँए-बाँए निकल गए थे!! ;) इस बार लगता है कि तरकश वाले संजय भाई का आशीर्वाद साथ था, एक ही तीर बस निशाने से पहले गिर गया बाकी चारों बोर्ड पर लगे और उनमें से तीन सम्मानजनक थे। :D

तीरांदाज़ी अठ??यास

योगेश बाबू ने भी अपना हाथ तीरांदाज़ी पर आज़माया और वह मुझसे अधिक सफ़ल रहे!! वहीं लगी दुकानों में से एक में सुंदर रंगी गई तस्वीरें भी दिखी।

एक सुंदर हस्त रंगित चित्र

भोजन के स्तर में भी काफ़ी अंतर आ गया था, पिछले वर्ष किए गए भोजन को यदि मैं अति लज़ीज़ की संज्ञा दूँगा तो इस बार के भोजन को साधारण की श्रेणी में ही रखूँगा। हम सभी को काफ़ी भूख लगी थी लेकिन फिर भी भोजन में वो बात नहीं आई जिसकी अपेक्षा थी, यहाँ तक कि अंत में परोसे गए मालपुए भी उतने बढ़िया नहीं थे!! खैर, हम लोग भोजन उपरांत थोड़ा और घूमे और उसके बाद वापस जयपुर की ओर चल दिए। सड़के हर तरह की भीड़ से रिक्त हो चुकीं थी और हम आराम से सदर थाने के निकट स्थित होटल स्वागतम पहुँच गए।

अगले दिन थोड़ा जल्दी निकलने का प्रोग्राम था क्योंकि योगेश को शाम पाँच बजे तक घर पहुँचना था, लेकिन आशीष बिस्तर पर पड़ा सोता रहा और हम लोग होटल से लेट निकले। खैर, सबसे पहले हम लोग पहुँचे बस अड्डे के निकट स्थित मशहूर रावत कचौड़ी वाले के जहाँ कुछ हल्का फुल्का नाश्ता किया गया। तत्पश्चात हम लोग निकल चले किलों की ओर, समय कम था इसलिए तय किया गया कि एक ही किला देखेंगे और नाहरगढ़ किले के रास्ते पर निकल चले(पिछली बार जयगढ़ और आम्बेर के किले देखे थे, नाहरगढ़ छूट गया था)। इस बार एक बदलाव यह देखा कि पिछली बार सूखी भूमि पर स्थित जल-महल के चारों ओर इस बार काफ़ी जल था!! ;) खैर, हम लोगों के साथ पंगा हो गया और हम नाहरगढ़ की जगह जयगढ़ पहुँच गए। अब पहुँच गए तो पहुँच गए, शराफ़त से तीन प्रवेश टिकट लिए और तीन कैमरों के, लेकिन टिकट खिड़की में मौजूद साहब का या तो गणित कमज़ोर था या वो कुछ अधिक ही स्याने थे, हर किसी से फालतू पैसे ले रहे थे। मैंने और योगेश ने गेट के अंदर जाते ही पैसों का हिसाब लगाया तो पाया कि उन साहब ने हमसे चालीस रूपए अधिक वसूल लिए थे, तो इसलिए मैं वापस गया और उनसे वो चालीस रूपए वापस ले आया। लेकिन बाकी लोगों में कुछ तो विचार करते दिखे कि टिकट वाले बाबू ने पैसे अधिक लिए लेकिन वापस लेने कोई नहीं गया(हमारे सामने तो कोई नहीं गया, बाद में गया तो पता नहीं)!! ;)

अरावली की पहाड़ियों का सुंदर नज़ारा

जयगढ़ किले में जब हम लोग घूम रहे थे तो एक मौसी जी भी अपने दो छोटे भाँजों और बहन के साथ हमारे पीछे ही थीं। ये मौसी जी फिल्म शोले जैसी नहीं थीं, ये तो जवान भी थीं और सुंदर भी और अविवाहित भी!! ;) बहरहाल, मौसी जी की कुछ ज्ञान भरी बातें हम लोगों के कान में भी पड़ रही थीं, जैसे कि वे अपने भाँजों और बहन को बता रहीं थी कि जयगढ़ किला कोई तीन-चार सौ वर्ष पहले बना था(थोड़ी कन्फ्यूज़िया गई थीं मौसी जी क्योंकि जयगढ़ किला तकरीबन हज़ार वर्ष पहले बना था और उसके नीचे स्थित आम्बेर किला लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व बना था)। मौसी जी अपनी बहन जी को फोटोग्राफ़ी भी सिखा रहीं थी, भरी धूप में छोटी फ्लैश वाले छोटे डिजिटल कैमरे से फोटो खींचती अपनी बहन को सलाह दे रही थीं कि फ्लैश का प्रयोग करें!! ;)

बहरहाल हम लोग मौसी जी और उनके ग्रुप को पीछे छोड़ आगे निकल लिए। हम लोगों के पास समय का अभाव था इसलिए जल्दी ही सब निपटा वापसी की राह पकड़नी थी।

Watchtower

तो सारा मामला निपटा हम गुड़गाँव की राह पकड़ लिए, देर तो हो ही गई थी, तकरीबन सवा छह बजे गुड़गाँव पहुँचे और फिर मोटरसाइकिल पर सवार हो सात बजे तक योगेश को घर पहुँचाया!!

इस यात्रा में लिए गए सभी फोटो यहाँ हैं

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कुछ लम्हें पालमपुर यात्रा से

September 5, 2007 · 9 Comments

चार महीने हुए जब पिछली बार कहीं घूमने फिरने गया था, मन व्याकुल हो रहा था, तो प्रोग्राम बना पालमपुर जाने का। जी, यह वही पालमपुर है जहाँ जाने का कार्यक्रम जुलाई में मैंने प्रस्तावित किया था लेकिन वह यात्रा उस समय हो नहीं पाई थी!! बहरहाल, उस समय न सही तो अब सही, पिछले सप्ताहांत का कार्यक्रम बना और हम 6 लोग निकल लिए अगस्त के आखिरी दिन की रात्रि को अपनी चौदह घंटे की ड्राईव पर!! ;)

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[ हमारे होटल टी-बड(Tea Bud) से निकलते ही थोड़ा आगे बाज़ार के रास्ते में स्थित पुराना मकान ]

ईसाई कब्रिस्तान - बड़ी तस्वीर के लिए क्लिक करें
[ थोड़ा आगे जाने पर दिखा यह ईसाई कब्रिस्तान ]

मेजर सोमनाथ शर्मा - बड़ी तस्वीर के लिए क्लिक करें
[ परमवीर चक्र से (मरणोपरांत)सम्मानित होने वाले पहले व्यक्ति, मेजर सोमनाथ शर्मा, की मूर्ति। इत्तेफ़ाक की बात है कि परमवीर चक्र के तमगे का डिज़ाइन श्रीमति सावित्री खानोलंकर ने बनाया था जो कि मेजर सोमनाथ शर्मा की सास थीं। ]

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[ क्रिकेट बसा है देश की नस-२ में ]

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[ यह नाम है होटल टी बड के मौजूदा सहायक मैनेजर का, इस नाम ने याद दिलाई फिल्म लगान। :) ]

बैजनाथ मंदिर - बड़ी तस्वीर के लिए क्लिक करें
[ बैजनाथ मंदिर ]

बैजनाथ मंदिर - बड़ी तस्वीर के लिए क्लिक करें
[ बैजनाथ मंदिर ]

गिरगिट - बड़ी तस्वीर के लिए क्लिक करें
[ बैजनाथ मंदिर की पिछली दीवार पर चहलकदमी कर रही थी एक गिरगिट ]

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[ बैजनाथ मंदिर के परिसर में दोपहर का भोजन करता एक बंदर ]

पालमपुर में मौजूद चाय बाग़ान - बड़ी तस्वीर के लिए क्लिक करें
[ अब यूँ ही तो पालमपुर को हिमांचल का दार्जीलिंग नहीं कहते ना!! पालमपुर में मौजूद चाय बाग़ान जहाँ पैदा होती है कांगड़ा चाय। ]

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आनंदपुर साहिब - बड़ी तस्वीर के लिए क्लिक करें
[ वापसी में हम रूके आनंदपुर साहिब जहाँ रात्रि भोज किया लंगर में। ]

पालमपुर कांगड़ा वादी में स्थित एक हरा-भरा शहर है और मानसून के बाद का समय यहाँ जाने के लिए अति उत्तम है जब आपको भरपूर हरियाली देखने को मिलेगी, वैसे यहाँ साल के किसी भी समय जा सकते हैं। रहने के लिए फिलहाल एक ही ठीक-ठाक जुगाड़ है यहाँ, हिमांचल पर्यटन विभाग का होटल टी बड(Tea Bud)। यदि यहाँ जाने का इरादा है तो पहले ही फोन द्वारा हिमांचल पर्यटन विभाग में पता कर लें कि कमरे उपलब्ध हैं कि नहीं। कमरों की उपलब्धता आप एचपीटीडीसी(HPTDC) की वेबसाइट पर भी देख सकते हैं और यदि चाहें तो ऑनलाईन ही भुगतान कर आरक्षण भी करवा सकते हैं। यदि आप शहर की चिल्लपों से दूर एक-दो दिन बिताना चाहते हैं तो पालमपुर जा सकते हैं, वहाँ वाहन में न घूम पैदल घूमिए, हरियाली और स्वच्छ हवा का आनंद लीजिए। लेकिन यदि आप एक पर्यटक हैं तो यह जगह आपके लिए नहीं है क्योंकि देखने लायक इस जगह पर खास कुछ नहीं है।

इस यात्रा की मेरे कैमरे द्वारा ली गई शेष सभी तस्वीरें यहाँ देखी जा सकती हैं।

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तुन्गनाथ - भाग २

June 22, 2007 · 6 Comments

पिछले भाग से आगे …..

समीर जी ने पूछा कि नए स्लीपिंग बैग में ठंड झेल पाए कि नहीं, तो उसके संबन्ध में भी एक रोचक वाक्या हुआ। अब हुआ यूँ कि अपन नए स्लीपिंग बैग का कुछ अधिक ही भाव खा गए, और शुक्रवार की रात को केवल एक पतली सी टी-शर्ट और ट्रैक पैन्ट पहने ही घुस गए उसमें। थोड़ी देर बाद शरीर के ऊपरी भाग में ठंड सी लगने लगी, क्योंकि ऊपर से स्लीपिंग बैग खुला था!! जैकेट आदि पहन इसलिए नहीं सोया था कि सोचा स्लीपिंग बैग ही काफ़ी रहेगा!! ;) तो गलती में कुछ सुधार करते हुए जैकेट को ओढ़ लिया और उसके बाद ठंड नहीं लगी!! :) शनिवार की रात जो ऊपर तुन्गनाथ पर बिताई, तब तक समझ आ गई थी, इसलिए जैकेट और जुराब पहन के सोया था, बहुत गर्म सा रहा और अच्छी नींद आई, रविवार सुबह जल्दी ही उठ गया(बाकी सब मेरे से पहले उठ चुके थे) और अपने को बहुत तरोताज़ा महसूस किया। :D


( हमारे दो तंबुओं के सामने प्रसन्नचित माइक। )
चोपता में शुक्रवार की रात को एक अजब वाक्या हुआ था। हम तकरीबन दस बजे अपने-२ तंबुओ में अपने स्लीपिंग बैग बिछा सो गए थे। ग्यारह-बारह के आसपास रमित अचानक उठ गया, पूछने पर बोला कि बाहर तंबू के पास कोई घूम रहा है। ध्यान से सुनने पर कदमों की आहट सुनाई दी, टॉर्च आदि जला के ऊँची आवाज़ में पूछा भी गया कि कौन है लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला और आवाज़ आनी बन्द हो गई। हम सो गए, थोड़ी देर बाद पुनः आवाज़ आने लगी और रमित फिर जाग गया और साथ ही मैं भी। बाहर झांक के भी देख लिया लेकिन कोई दिखाई नहीं दिया, बड़ी टॉर्च की रोशनी भी किसी काम की नहीं थी, घुप्प अंधेरा था। अंदर आकर पुनः सो गए, मन में अजीब से ख्याल आ रहे थे कि कोई वाकई में तो नहीं है, यदि है तो अगर कोई चोर हुआ तो तम्बू को चाकू आदि से काट सामान लेकर चलता बनेगा!! किसी तरह सुबह हुई, साढ़े चार के करीब रोशनी हुई और रमित चिल्ला पड़ा कि किस पागल ने टॉर्च जलाई है, उसको सोने दिया जाए!! ;) बहरहाल, सुबह उठ हम लोगों को पता चला कि रात कोई नहीं था, हवा वेग से चल रही थी और तम्बू से तकराने के कारण आवाज़ हो रही थी!! ;)


( सुबह इतना बढ़िया नज़ारा दिखाई दिया, मन प्रसन्न हो गया। )


( ऊपर तुन्गनाथ तक पहुँचते ही ओलों की बरसात हो गई, इतने ओले गिरे कि बरसात थमने के बाद ऐसा लग रहा था कि बर्फ़ गिरी हो। ओले पड़ने के कारण हमारा कार्यक्रम बिगड़ गया, तुन्गनाथ पर अब तम्बू नहीं लगा सकते थे, इसलिए एक धर्मशाला में दो बड़े कमरे लिए। )


( रविवार की सुबह, जिस दिन हमको वापस लौटना था। )

इस बार तुन्गनाथ की चढ़ाई में मेरा उतना बुरा हाल नहीं हुआ जितना पिछली बार हुआ था। इस बार स्निग्धा साथ नहीं थी कि हौसला दे साथ चले, इस बार अपने आप करना था और किया। पिछली बार के मुकाबले इस बार चढ़ने में एक घंटा कम लिया, उतना कठिन नहीं लगा जितना पिछली बार लगा था(क्योंकि इस बार शर्मा जी और वनराज भाटिया साहब को सुनते हुए चढ़ाई की)। उतरते समय भी पिछली बार के मुकाबले एक घंटा कम लिया, आधा रास्ता सुबोश्री से बात करते हुए कटा और आधा रास्ता शर्मा जी को सुनते और खूबसूरत नज़ारों को निहारते हुए। :)

इस यात्रा के दौरान लिए गए सभी चित्र यहाँ देख सकते हैं।

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तुन्गनाथ - भाग १

June 21, 2007 · 7 Comments

मई 2007 के दूसरे सप्ताहांत पर पुनः तुन्गनाथ जाने का कार्यक्रम बना। पिछली बार का हादसा याद था, लेकिन जोश बरकरार था और मन में नई उमंग थी। इस बार की अपनी यात्रा भी अलग होनी थी, इस बार तम्बू वगैरह लेकर चल रहे थे, पैक्ड रेडी-टू-ईट(ready-to-eat) खाना साथ था जो कि तुरन्त बनने वाली किस्म का था। तुन्गनाथ पर पिछली बार की ठंड का अनुभव होने के कारण मैंने यात्रा पर निकलने से पहले ला-फूमा का नया स्लीपिंग बैग खरीदा जो कि 5 डिग्री सेल्सियस से 0 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान आराम से झेल लेता है; पहली रात तम्बू चोपता में लगाना था और समुद्र स्तर से लगभग साढ़े बारह हज़ार फीट की ऊँचाई पर रात को तापमान कम होने की पूरी आशा थी, मई में भी, क्योंकि इतनी उँचाई पर सारा साल ही ठंड रहती है। एक और खास बात यह थी कि यह व्हर्लविन्ड(whirlwind) यात्रा होनी थी क्योंकि यदि इसको आराम से करना हो तो चार दिन लगते हैं और हमे इसको तीन दिन में निपटाना था। ;) इस बार दिल्ली से गाड़ी ले जाने की जगह हम हरिद्वार तक ट्रेन से गए और वहाँ से आगे जाने के लिए टाटा सूमो ली। केवल योगेश और मेरी ही यह तुन्गनाथ की दूसरी यात्रा थी, बाकी के पाँचों साथी पहली बार जा रहे थे।

चूँकि इस यात्रा के फोटो मैंने पिछली बार लिए थे, इसलिए लेने के लिए इस बार कुछ खास नहीं था।


( देवप्रयाग में भगीरथी और अलकनंदा का संगम )


( ऋषिकेश की ओर जाती गंगा )


( सियालसौर पर सड़क किनारे एक रेस्तरां में दोपहर भोजन के लिए रूके थे। वहीं बगल में ऊपर से बह कर आ रही थी मंदाकिनी। )


( चोपता पहुँच हमारी कैम्पसाइट से दिखाई देती हिम से ढकी पर्वत शृंखला )


( दो-तीन सप्ताह पूर्व तक तो तुन्गनाथ पर भी बर्फ़ थी जो कि पिघली नहीं थी, यानि कि अप्रैल के महीने में जब हम मुक्तेश्वर की यात्रा पर थे। )


( यदि मेरा कैमरे पर पोलराइज़र लगा होता तो यह फोटो और बढ़िया आता )


( इस पर्वत ने और दृश्य ने तो मेरा मन मोह लिया था )

अगले भाग में जारी …..

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मुक्तेश्वर - भाग ४

June 17, 2007 · 11 Comments

पिछले भाग से आगे …..

रविवार सुबह जल्द ही आँख खुल गई। लगभग सभी जाग गए थे; बाहर बाल्कनी में आकर देखा तो आज की सुबह आकाश पिछली सुबह के मुकाबले काफ़ी साफ था। इसलिए आज सामने स्थित पर्वत शिखरों की तस्वीरें बेहतर आईं। इतनी दूर होने पर भी नंदा देवी, चौखम्बा, त्रिशूल आदि इतनी पास लग रही थी कि मन कर रहा था कि हनुमान की भांति एक ही छलांग लगा किसी एक के शिखर पर लैंड कर जाओ। ;)

बहरहाल आज समय अधिक नहीं था, हमको जल्द ही निकलना था ताकि मुक्तेश्वर में एकाध जगह देख वापसी की जाए, नौकुछियाताल आदि देख सांय जल्दी हल्द्वानी पहुँच अच्छी डीलक्स बस में सवार हो दिल्ली पहुँचें। तो फटाफट तैयार हो, नाश्ता कर और यात्री निवास का बकाया भुगतान कर हम लोग चौली की जाली की ओर पैदल ही चल पड़े, गाड़ी के ड्राईवर को बोल दिया कि मंदिर के पास पहुँच हमारी प्रतीक्षा करे। चौली की जाली यात्री निवास के पीछे से होकर जाती एक पगडंडी के अंत पर है, एकाध पत्थर की शिलाएँ हैं जिनके आगे गहरी खाई है। मुक्तेश्वर में एक एडवेन्चर कैम्प मौजूद है जिसका नाम “कैम्प पर्पल” है। वे लोग यहाँ चौली की जाली पर रैप्पलिंग(rappelling) करवाते हैं। जब हम लोग वहाँ पहुँचे तो कुछ लोगों का एक फैमिली ग्रुप वहाँ था और जीन्स पहने एक मोहक सी कन्या बैठी थी(जो कि उस फैमिली ग्रुप की सदस्या नहीं थी)। वहाँ एक शिला पर हम भी कुछ मिनट बैठे, तस्वीरें आदि ली गईं। अब सबकी एकसाथ तस्वीर भी चाहिए थी, लेकिन किससे कहते लेने को, इसलिए एक पत्थर पर मैंने अपना कैमरा टिका ऑटो टाईमर ऑन किया जिससे हम सब लोगों की एक साथ वाली तस्वीर आ गई।

धूप बहुत तेज़ी से निकल आई थी, लेकिन अधिक नहीं चुभनी आरम्भ हुई थी। लेकिन धूप निकल आने का एक लाभ यह हुआ कि उस जगह से दूर-२ तक साफ़ दिखाई दे रहा था।

योगेश और मनोज को कुछ और नहीं सूझा तो दोनो पेड़ पर ही चढ़ बैठ गए और मुझसे बोला गया कि लो तस्वीर। अब अपना क्या घिसता था जब दो लंगूर…..अरर….. मेरा मतलब दो मॉडल बैठे बिठाए मिल गए तो!! ;)

लेकिन कदाचित्‌ हितेश को लगा कि पेड़ पर चढ़ना इतना कूल नहीं है, इससे आगे जाना होगा। वहाँ कैम्प पर्पल वाले आ चुके थे अपने अतिथियों के साथ जो रैप्पलिंग करना चाहते थे। उनसे बात की गई और वे हितेश को रैप्पलिंग करवाने को तैयार हो गए। तुरंत ही अपने बांका जवान को सजा दिया गया और एक ओर शिला से नीचे खाई में उतारा गया।

उसको करीब 80 फ़ीट नीचे उतारा गया जहाँ पत्थरीली दीवार का एक हिस्सा बाहर आया हुआ था और एक प्रकार की लैंडिंग बनी हुई थी। अब नीचे उतरना तो आसान था लेकिन वापस ऊपर चढ़ना कठिन। लेकिन कुछ देर के प्रयास के बाद हितेश वापस ऊपर आ गया। उसका मन प्रसन्न था कि मज़े ले लिए, हम प्रसन्न थे कि बिना दुर्घटना के एडवेन्चर पूरा हुआ। ;) अब इसके बाद शायद योगेश भी जाना चाहता था लेकिन कैम्प पर्पल वालों का अपना समूह तैयार था इसलिए उन्होंने खेद जताते हुए मना किया कि किसी और को नहीं करवा पाएँगे। अब धूप में रूकने का कोई कारण नहीं था, इसलिए सब दूसरे रास्ते पर आगे बढ़ लिए जो कि मंदिर तक जाता था जहाँ हमारी गाड़ी और ड्राईवर हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। मंदिर पहुँच सभी मंदिर में दर्शन करने चले गए और मैं गाड़ी की ओर बढ़ गया। थोड़ी देर बाद बाकी के साथी भी आ गए तो हम लोग गाड़ी में लद नौकुछियाताल की ओर बढ़ लिए। ड्राईवर गाइड का भी काम कर रहा था और कई रोचक बातें बताता जा रहा था।

नौकुछियाताल के पास एक पहाड़ी पर पैरा-ग्लाईडिन्ग होती है, तो सभी का मन था कि वहाँ चल उसका आनंद भी लिया जाए, आखिर केवल हितेश की काहे मजे ले!! ;) जल्द ही हम लोग उस पहाड़ी पर पहुँच गए जहाँ पैरा-ग्लाईडिन्ग कराई जाती है। एक बड़े और चौड़े पैराशूट से लटककर व्यक्ति उँचाई से नीचे कूदता है और हवाओं के धक्के से आगे ग्लाईड करता लैन्डिन्ग स्थल पर लैन्ड करता है जो कि वहाँ से 2 किलोमीटर दूर था। वहाँ प्रतीक्षारत व्यक्ति उसको जीप में बिठा वापस पहाड़ी पर लाकर छोड़ देते हैं। हमारी गाड़ी एक निश्चित स्थान तक ही गई, उसके बाद ऊपर हमको पैदल ही चढ़ना था जहाँ पैरा-ग्लाईडिन्ग हो रही थी। इस चढ़ाई ने तुन्गनाथ वाली चढ़ाई की याद दिला दी, हालांकि यह चढ़ाई तो बहुत छोटी थी!! ;) ऊपर पहुँच देखा तो पता चला कि काफ़ी भीड़ है। एक जवान पैराशूट से बंधा अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहा था और उसकी सुन्दर नई नवेली पत्नी उसको निहार रही थी। अब इसको किसी गलत सेन्स में नहीं लिया जाए, वो मोहतरमा सुन्दर थीं तो इसलिए मैंने सुन्दर लिखा है। :) हम लोग पीछे की ओर पत्थर पर बैठ गए। हवा का मन नहीं था इसलिए आराम से चल रही थी बिना वेग के, थककर बेचारा जवान भी बैठ गया। वहाँ उपर से नौकुछियाताल बहुत अच्छा लग रहा था। हमारे ड्राईवर ने बताया कि इस ताल के नौ कोने हैं और सभी एक साथ नहीं दिखते, दंत कथा है कि यदि कोई इसके सारे नौ कोने एक साथ देख ले तो उसकी तुरंत मृत्यु हो जाएगी।

किसी को उस जवान की बारी आती नहीं दिख रही थी, और उसके बाद 7-8 लोग और लाइन में थे, तो हम लोगों ने सोचा कि चला जाए, पैरा-ग्लाईडिन्ग उस रोज़ संभव नहीं। उतर कर नीचे गाड़ी के पास आए तो वहाँ से नौकुछियाताल की एक बढ़िया तस्वीर मिल गई।

कुछ ही देर में हम लोग नौकुछियाताल पहुँच गए। सबने निर्णय लिया कि पहले नौका विहार किया जाए और उसके बाद दोपहर का भोजन। मेरा मन हंस के आकार वाली एक नौका में विहार करने का था, लान्सडौन में हितेश और शोभना ने उस में बैठ पता नहीं क्या आनंद लिया था!! ;) तो मेरे साथ मनोज हंस वाली नौका में आ गया और बाकी के लोग चार सीट वाली दूसरी नौका में चले गए जिसमें पहले हितेश और दीपक पीछे बैठ पैडल चला रहे थे। मैंने अपनी नौका इन लोगों की नौका के पीछे साईड में लगा ली और पास पहुँच मनोज ने पीछे से इनकी नौका पकड़ ली और मैंने पैडल चलाना बन्द कर दिया। अब उन लोगों की नौका के साथ ही अपनी नौका भी धीरे-२ बढ़ रही थी। :D हितेश को एकाएक लगा कि उन लोगों की नौका थोड़ी भारी हो गई है, पैडल चलाने में दिक्कत हो रही थी। दीपक ने पीछे मुड़ के देखा तो पाया कि मनोज उनकी नौका को पकड़े दांत फाड़ रहा था। ;) तुरंत ही हम लोगों को उन दोनों से सुनने को स्तुति गान मिला और हमने हंसते हुए उनकी नौका छोड़ी और अलग हो फटाफट निकल लिए(क्योंकि हितेश खड़ा हो हमारी नौका में आने की तैयारी कर रहा था)!! ;) वे लोग अलग निकल लिए और हम उनसे आगे अलग निकल लिए। इस बड़े ताल में बहुत से जोड़े भी विहार कर रहे थे। हम थोड़ा आगे गए तो एक सुनसान किनारे पर एक नौका को खड़े देखा जिसमें तोता-मैना का एक जोड़ा चोंच लड़ाने में व्यस्त था। आगे एक किनारा थोड़ी उँचाई पर था और वहाँ कुछ मकान बने थे, मन यह सोच रहा था कि यदि ऐसे मकान में रहा जाए तो कितना आनंद आएगा। अभी हम लोग मुड़कर दूसरी ओर आए कि आगे एक और नौका दिखी जिसमें एक और तोता-मैना का जोड़ा चोंच लड़ा रहा था। खैर यह तो आम बात है, इसलिए नज़रअंदाज़ कर हम लोग आगे निकल लिए। बाकी के साथी पूरे ताल की परिक्रमा करने का इरादा रखे हुए थे, जबकि हम लोग ताल के बीच में ही टाइमपास कर रहे थे। जब वे लोग वापस हो हमारे पास आए तो हमने अपनी नौका उनके बाजू में लगा ली। उनको लगा कि हम पुनः वही हरकत करने वाले हैं इसलिए हमको चेतावनी दी गई और हमारे सफ़ेद झंडा दिखाने के पश्चात ही हमको उनके बगल में नौका लगाने की अनुमति मिली। तकरीबन 20-25 मिनट के विहार के बाद हम लोग किनारे पर पहुँच बाहर आ गए।

बाहर आते ही एक मज़ेदार वाक्या हुआ। सोनी के एक बेसिक साइबरशॉट डिजिटल कैमरा लिए एक फोटोग्राफ़र ने हमको घेर लिया और फोटो खिंचवाने के लिए बोलने लगा। हमारे मना करने पर भी नहीं टला और जबरन अपनी एल्बम हितेश के हाथ में थमा दी। यार लोग भी अब मूड में आ गए थे कि मजा लिया जाए, इसलिए उसके द्वारा खींची तस्वीरें देखने लगे जो कि कोई खास नहीं थी, ऐसी तो हम ही खींच सकते थे!! ;) तो जब उन साहब को एल्बम वापस की गई तो वे पुनः बोले। इस बार हम सबने अपने-२ औज़ार निकाल लिए। सबके पास उन साहब के कैमरे से महँगे और बेहतर कैमरे थे, और योगेश के पास तो निकोन का एसएलआर था!! ;) वो साहब थोड़ा चकित हुए तो हमने आगे उनको और घेरा। हितेश की ओर इशारा कर उनको बताया गया कि इन साहब(हितेश) के दिल्ली में दो फोटो स्टूडियो हैं। अब वो फोटोग्राफ़र नीचे आ गिरा, बोला कि उसको भी नौकरी दे दी जाए, तो हम लोग मुस्कुराते हुए सामने मौजूद ढाबे पर बढ़ लिए और वो फोटोग्राफ़र साहब अपने रास्ते। घोड़े देख हितेश का मन सवारी करने का हुआ, पट्ठा एक ही दिन में पूरी मौज लेना चाहता था!! तो उसने एक नहीं वरन्‌ दो-दो चक्कर काटे सुल्तान नाम के एक बढ़िया श्यामवर्ण घोड़े पर।

इसके बाद आखिरकार भोजन किया गया। सभी को अच्छी खासी भूख लग आई थी और खाना भी स्वादिष्ट था। भोजन उपरांत हम लोग भीमताल की ओर बढ़ लिए। यह ताल नौकुछियाताल से भी बड़ा है और यहाँ भी नौका विहार होता है लेकिन चूंकि हम लोग नौकुछियाताल में विहार कर चुके थे इसलिए यहाँ करने की कोई इच्छा नहीं थी। तो कोई फोन पर व्यस्त था तो कोई हल्का होने चला गया, मैं, दीपक और योगेश ताल के किनारे एक पत्थर की छतरी के नीचे ताश खेलने लगे।

कुछ देर पश्चात एक रेस्तरां में हमने चाय-कॉफ़ी आदि ली और उसके बाद ताज़ादम हो वापस हल्द्वानी की ओर बढ़ लिए। हल्द्वानी पहुँचे तब तक अंधेरा हो गया था। ड्राईवर को बकाया पैसे और अच्छी सी टिप देकर हमने विदा किया और बस स्टैन्ड की ओर बढ़ लिए। एक बात देखकर बहुत खीज हुई, पूछताछ काउंटर पर कोई उपस्थित नहीं था और अन्य किसी को डीलक्स बस की सही जानकारी नहीं थी या सही बताना नहीं चाहता था। जिससे पूछो यही कहता कि सामने जो उत्तरांचल परिवाहन की बस जा रही है वही है दिल्ली के लिए, उसी में निकल लो। अब वह तो हमको भी दिख रहा था लेकिन दो-ढाई सौ किलोमीटर का रात का सफ़र हम उस थकी हुई बस में नहीं करना चाहते थे। डिलक्स बस के दोगुने पैसे देने में हमे कोई ऐतराज़ नहीं था लेकिन सफ़र आराम से करना चाहते थे क्योंकि सभी थके हुए थे और थोड़ी नींद लेना चाहते थे। लेकिन जब डीलक्स बस का कोई पता नहीं चला तो हमने सोचा कि उस थकी हुई बस में ही आराम से जाएँगे, इसलिए तीन वाली बड़ी तीन सीटें ली और बकायदा नंबर लिखवा बुक करा ली। उसके बाद पास ही की एक मिठाई की दुकान में गए जिसमें खान-पीने की व्यवस्था भी थी। मेनू तो लंबा चौड़ा था लेकिन जो भी चीज़ पूछो उसी के लिए उत्तर मिलता कि उपलब्ध नहीं है। आखिर में मैंने पूछा कि भई जो है वही बता दे और इस प्रकार ठीक-ठाक बने वेज फ्राईड चावल से पेट भरा गया, क्या करते, भूख में तो चने भी मेवा लगते हैं!! तो दाना चुगने के बाद हम अपनी बस में आकर बैठ गए, और थोड़ी ही देर में बस चल पड़ी।

हितेश और मैं आगे एक सीट पर बैठे थे और अपने बैग हमने बीच में रखे हुए थे, बाकी लोग पीछे की दो सीटों पर विराज रहे थे। नींद लेने की कोशिश की गई लेकिन आई नहीं। आगे एक स्टैन्ड पर कुछ लोग चढ़े, एक साहब अकड़ के बोले कि बैग उठाकर अपनी गोद में रखूँ और उनको बैठने दूँ, तो मैंने भी अकड़कर उत्तर दे दिया कि पूरी सीट(तीन लोगों) के पैसे दिए हैं, इसलिए आराम से खड़ा रह। उनको यकीन नहीं आया तो कंडक्टर को बुला लिया और जब कंडक्टर ने मुझसे पूछा तो मैंने टिकट दिखा दिए जिसके बाद वो साहब बुरा सा मुँह बना बस के बोनट पर बैठ गए। पता नहीं कितना समय बीत गया, बस ठीक-ठाक रफ़्तार से बढ़ रही थी लेकिन उस कड़ी सीट पर बैठना कष्टदायी हो रहा था, सारा दिन टाटा सूमों में सफ़र किया था जिसकी सीट भी कुछ खास नहीं थी लेकिन बस की सीट से बढ़िया थी, लेकिन बैठे-२ वाट तो लग ही जाती है। एक बड़े से बस अड्डे पर बस रूकी, जहाँ ड्राईवर को चाय वगैरह पीनी थी। तो हम लोग भी टाँग सीधी करने की गरज से नीचे उतर आए। वहीं बाजू में जेबीसीएल की एक उत्तर प्रदेश परिवाहन की वातानुकूलित 2×2 डीलक्स बस देखी जो कि हल्द्वानी से आ रही थी(हमारी बस के पीछे-२ ही चली दिख रही थी) और दिल्ली जा रही थी। हमको उन दोनों बस वालों पर बहुत क्रोध आया जिन्होंने हल्द्वानी बस स्टैन्ड पर हमको कहा था कि रविवार को कोई डीलक्स बस नहीं चलती दिल्ली के लिए। यकीनन उन्होंने इसलिए गलत बताया था क्योंकि डीलक्स बस उत्तरांचल परिवाहन की न होकर उत्तर प्रदेश परिवाहन की थी। पर अब क्या कर सकते थे, जी-भर कर उन दोनों को गालियाँ देने के बाद हम वापस अपनी बस में आकर बैठ गए, अब तो बैठना और भी कष्टदायी हो गया था। थोड़ी देर बाद बस चल पड़ी, आखिरकार थके हुए मस्तिष्क पर नींद हावी हुई और एक झपकी आ गई, कुछ देर बाद आँख गर्मी के कारण खुली और देखा कि अपनी बस लगभग 20-30 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से रेंग रही है। आखिरकार किसी तरह उस नारकीय बस यात्रा का अंत हुआ और हम दिल्ली पहुँच गए। एक बात जो मेरे ध्यान में आई वह यह कि इस यात्रा पर ठीक तरीके से सोना नसीब नहीं हुआ, न जाते समय, न यात्रा के दौरान और न ही आते समय।

इस यात्रा के दौरान ली गई तस्वीरें यहाँ उपलब्ध हैं।

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मुक्तेश्वर - भाग ३

June 8, 2007 · 7 Comments

पिछले भाग से आगे …..

अगले दिन की सुबह बढ़िया थी, लेकिन हमारे पहली मंज़िल पर स्थित कमरे की बाल्कनी से सामने नंदादेवी, पूर्वी नंदादेवी, चौखम्बा, त्रिशूल आदि साफ़ नज़र नहीं आ रहे थे, उनकी शिखाओं को बादलों और धुंध ने घेर रखा था, बर्फ़ ने अपनी चादर से तो वैसे ढक ही रखा था। सुबह जल्दी ही निकलने का कार्यक्रम था, मेरे को नींद आ रही थी, जाने का मन नहीं था लेकिन मेरी एक नहीं चली, कह दिया गया कि यदि नींद आ रही है तो गाड़ी में सो जाउँ, जंगल वाले शॉर्टकट से जाने पर भी अल्मोड़ा पहुँचने में एक-डेढ़ घंटा तो लगेगा ही, तो हम लोग पौने आठ तक निकल लिए। लेकिन मेरा मन कुछ अजीब सा हो रहा था, उल्टी सी आने को हो रही थी, तबियत खराब लग रही थी। :(

किसी ने सुबह नाश्ता नहीं किया था इसलिए थोड़ी आगे जाने पर एक चाय की दुकान पर गाड़ी रोकी गई और सभी निकल चाय पीने चले गए। मैं गाड़ी में ही आँखें बन्द किए बैठा रहा,तबीयत वाकई खराब लग रही थी, कदाचित्‌ ठंड लग गई थी। मोन्टू और मनोज को लगा कि तबीयत खराब सी है तो वो पूछने भी आए और बोले कि यदि अधिक खराब नहीं है तो साथ ही चल लूँ, थोड़ी देर में ठीक हो जाएगी, नहीं तो वापस जा आराम करूँ। अब मेरे भी दो मन थे, एक कहता कि वापस जाउँ और एक कहता बढ़े चलो वीर जवान। मन किया कि घर फोन कर माँ से बात करूँ, लेकिन गले से भारी सी आवाज़ निकल रही थी। माँ ने छूटते ही पूछा कि आवाज़ को क्या हुआ, पिछली रात को बोतल वगैरह लगाई थी क्या!! ;) तब मैंने बताया कि नहीं बोतल तो नहीं लगाई थी, लेकिन तबीयत खराब लग रही है। तुरंत सलाह मिली कि एक लौंग दाढ़ में दबा लूँ और कुछ गर्म दूध या कॉफ़ी पी लूँ। अब चाय मैं पीता नहीं इसलिए माँ ने वो पीने को नहीं कहा। तो मैंने सलाह पर अमल करते हुए मनोज से कहा कि आसपास देखे लौंग मिले तो ले आए और चूँकि कॉफ़ी उपल्ब्ध नहीं थी, मैंने इसलिए इलायची वाली चाय पी। चाय पीते ही और लौंग मुँह में दबाते ही चमत्कारी असर हुआ, तबीयत सुधरने लगी। :)

बाकियों ने भी मेरी तबियत में सुधार देख राहत की साँस ली होगी, क्योंकि साथ चलने वालों में किसी एक की भी तबियत खराब हो जाए तो बाकियों को भी भुगतना पड़ता है। तो इस सुधरती तबीयत के साथ हम लोग आगे बढ़ चले, जंगल के बीच से निकलती सड़क से अल्मोड़ा की ओर। जंगल में एकाध जगह बीच में हम रूके भी, जहाँ लोग कुछ टहल लिए और हल्के हो लिए। हितेश को पता ही नहीं चला कि कब उसके पीछे से आकर मैंने उसकी उस समय तस्वीर ले ली जब वह एक पेड़ की सिंचाई में व्यस्त था!! ;)

थोड़े समय बाद हम लोग अल्मोड़ा को पार कर कटारमल की ओर बढ़ रहे थे, मार्ग में कोसी पड़ा जहाँ नदी किनारे हम लोगों ने दोपहर का भोजन करने की सोची। कुछ ही देर में कटारमल भी पहुँच गए। यहाँ का सूर्यमंदिर कभी भव्य रहा होगा, लेकिन वर्षों से अपेक्षित पड़े रहने के कारण खंडहर हो गया।

लेकिन फिर कुछ समय पहले एएसआई को सुध आई होगी और इसके रीस्टोरेशन का कार्य आरम्भ हुआ, जब हम गए तब भी चल रहा था।

इसके कॉमप्लेक्स में एक बड़े मंदिर को घेरे 45 छोटे मंदिर हैं, जिनमें अब मूर्तियाँ आदि नहीं हैं, केवल ढांचे ही हैं।

थोड़ा समय वहाँ व्यतीत कर हम लोग वापस हो लिए। कोसी पहुँच सभी का नदी में बैठने का मन हुआ। आसपास के कुछ स्थानीय लोग भी स्नान कर रहे थे। एक स्थान पर जहाँ पत्थर अधिक थे और पानी केवल घुटनों से नीचे था, वहाँ सभी लोग अपनी-२ बीयर की बोतलें खोल के बैठ गए। अब न मेरा बीयर का मन था और न ही नदी में जाने का, इसलिए मैं किनारे पर ही एक शिला पर बैठ बाकी लोगों की अर्ध नग्न तस्वीरें लेने लगा, एकाध वीडियो भी बना डाले। ;) वे लोग जब बाहर आ कपड़े बदल रहे थे तो तब भी अपने मोबाइल से उन सबका वीडियो उतारा जा रहा था जिसकी उनको भनक भी न थी। दीपक ने सोचा कि मैं तस्वीर लेने जा रहा हूँ तो अपनी-२ चड्ढी और अंगोछे संभाल सभी एक दूसरे के कंधों पर हाथ रख एक कतार में पोज़ बना के खड़े हो गए। झटका तो उनको तब लगा जब मैंने खुलासा किया कि उनका तो वीडियो बन रहा है और काफ़ी देर से बन रहा है!! ;)

आखिरकार अपने-२ कपड़े पहन सभी रेस्तरां में पहुँचे और वहाँ दोपहर का भोजन निपटाया गया। उसके बाद वापस मुक्तेश्वर की ओर चल दिए। रास्ते में एक जगह बढ़िया कैम्पसाइट दिखी, सड़क के बाजू में ही घास का मैदान और उसपर उगे हुए लम्बे पेड़। वहाँ बड़े ही टशन में फोटो खिंचवाई गई।

उसके बाद अगला पड़ाव अल्मोड़ा था। मोन्टू का कहना था कि बाज़ार बहुत अच्छा है वो देखना है तो हम उसके कहने पर बाज़ार भी देख लिए, कुछ खास न था, मोन्टू की सभी ने खूब चिकाई करी!! और वहाँ की नगर पालिका की स्थापना सन्‌ 1864 में हुई थी यह देख वाकई हैरानी हुई।

अल्मोड़ा से भी एकाध जगह से सुन्दर दृश्य दिखे।

तत्पश्चात हम लोग वापस मुक्तेश्वर आ गए। यात्री निवास की ओर जाते समय सूर्यास्त हो रहा था, तो उसकी एक और अच्छी तस्वीर मिल गई।

थके होने के कारण सभी आराम करना चाहते थे, इसलिए बोतल वगैरह को अधिक तवज्जो नहीं दी गई। लेकिन ताश का जो खेल पिछली रात्रि खेला था उसमें मज़ा आ गया था इसलिए मनोज और मैंने योगेश तथा हितेश को थोड़ी देर खेलने के लिए तो पकड़ ही लिया। मैं मन ही मन सोच रहा था कि अच्छा हुआ जो सुबह यात्री निवास में नहीं रूका और वापस आने से पहले माँ को फोन कर लिया, तबीयत में सुधार हो गया और बाकी का दिन मौज-मस्ती से बीता वर्ना में पूरा दिन खामखा बेकार तो होता ही, अकेले मैं बोर भी हो जाता!! ;)

अगले भाग में जारी …..

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मुक्तेश्वर - भाग २

June 2, 2007 · 7 Comments

पिछले भाग से आगे …..

सारी रात शर्मा जी का संगीत सुनते-२ बीती, जब भी नींद आने लगती, एरिस के दूत मच्छर कान के पास अपनी म्यूज़िकल नाइट का आयोजन करने लगते। खैर, किसी तरह रात्रि बीती। सुबह हलद्वानी पर गाड़ी रूकी तो हम लोग भी उतर लिए। बस अड्डा रेलवे स्टेशन से लगभग एक किलोमीटर ही दूर है, लेकिन पता न होने के कारण ऑटो वाले ने हम लोगों से चालीस रूपए ऐंठ लिए। बस अड्डे पर पहुँच सभी ने थोड़ी पेट पूजा की, तकरीबन एक घंटा प्रतीक्षा के बाद दीपक का दोस्त मनोज भी चण्डीगढ़ से पहुँच गया। अब आगे जाने के लिए हम लोगों को एक गाड़ी चाहिए थी, मोलभाव के बाद आठ सौ रूपए प्रतिदिन(डीज़ल का खर्च अलग) पर एक टाटा सूमो मिल गई और हम लोग अपने रास्ते लग लिए।

कुछ देर बाद हम लोग भीमताल पहुँचे। यहाँ रूक सभी ने कुछ तस्वीरें ली। अब मेरा कैमरा तो घर से निकलते समय नाराज़ हो गया था, लेकिन इस बार चल गया, कदाचित्‌ प्रसन्न था कि उसको किसी बेकार जगह की तस्वीर नहीं लेनी पड़ेगी!! ;)

लगभग दस बजे हम लोग मुक्तेश्वर स्थित कुमाउँ मण्डल विकास निगम के यात्री निवास पहुँच गए। वहाँ से सामने हिमालय की पहाड़ियों का बहुत ही सुन्दर नज़ारा था।

यात्री निवास वालों की पानी की टंकी खाली थी। पास ही एक बड़ी टंकी थी जिसमें ऊपर चोटी से पानी की एक धार बहकर आती थी और टंकी में पानी एकत्र होता था। आसपास वालों के लिए पानी का एक वही स्रोत है। उसी टंकी में से हम लोगों ने थोड़ा बर्फ़ीला पानी लिया और हर गंगे का उच्चारण किया!! ;) पहले दिन का कोई एजेन्डा नहीं था, इसलिए पेट पूजा कर हम सभी पास के जंगली मार्ग पर पैदल ही पाँच किलोमीटर दूर सीतला गाँव की ओर चल दिए। जंगल में लाल रंग के अति सुन्दर फूलों के कई पेड़ थे।

जंगल से होकर गुज़रते इस मार्ग को देखने से ऐसा लग रहा था कि मानो नज़ारा किसी परी-कथा से कोई दृश्य जीवित हो उठा हो।

थोड़ी दूर पर एक खंडहर इमारत दिखाई पड़ी तो वहाँ थोड़ी देर रूके, तस्वीरें आदि ली गई और फिर अपनी राह लग लिए। तकरीबन डेढ़-दो घंटे में सीतला पहुँच गए। वहाँ सीतला एस्टेट(एक पुरानी हवेली, अब एक छोटा हेरिटेज होटल है) के बाजू में मौजूद दुकान पर शीतल पेय आदि पिया गया, थोड़ी देर बैठे और दुकान पर बैठे बुजुर्गवार से बात की गई। उसके बाद वापस मुक्तेश्वर की ओर चल पड़े। मन में आया की सीतला एस्टेट भी देख ली जाए तो मैं, हितेश और मोन्टू उसको अंदर से देखने गए। वहाँ मौजूद कर्मचारी ने बताया कि इसकी बुकिंग दिल्ली से होती है। वहाँ दो सुइट और एक कमरा है जिनका एक दिन का किराया 4500, 4000 और 3500 रूपए है। 4500 और 4000 रूपए वाले दो सुइट हैं, जो कि बहुत अच्छे बने हुए हैं और 3500 रूपए वाला कमरा है। सभी की सजावट पुराने ज़माने जैसी राजसी प्रकार की है, और किराए में ही आपका तीन समय का भोजन और दो समय की चाय भी सम्मिलित है। मुझे 4000 रूपए वाला सुइट सबसे अधिक पसंद आया क्योंकि उसका वादी की ओर रूख है और बिस्तर के बिलकुल सामने एक बहुत बड़ी पारदर्शी शीशे की खिड़की है जिससे पूरी वादी का लुभावना नज़ारा होता है। समझने वाले समझ सकते हैं कि यहाँ ठहरने का फायदा कब है!! ;)

बहरहाल, एस्टेट देखने के बाद हम लोग मुक्तेश्वर के रास्ते पुनः लग लिए। शाम हो आई थी, सूर्यास्त होने ही वाला था। तकरीबन ढाई घंटे में हम लोग वापस पहुँच गए। जाते समय तो केवल एक पतली सी टी-शर्ट डाल रखी थी क्योंकि बहुत गर्मी लग रही थी, लेकिन अब वापस ऊपर मुक्तेश्वर पहुँचे के बाद ठंड लगनी आरंभ हो गई थी, पसीना सूख रहा था, सूर्यास्त हो गया था!!

वापस पहुँच सभी बिस्तर पर पड़ गए, काफी थकान हो रही थी। हितेश ने एक बाल्टी गर्म पानी मंगवा लिया और आधा पानी मेरे लिए छोड़ बाल्टी में पैर डाल उनकी सिकाई करने लगा। इधर सांय सूर्यास्त से पहले मैं और मनोज पास के बाज़ार में जाकर नाश्ते का सामान ले आए थे। तो अंधेरा होते ही हमारे कमरे में महफ़िल जमी, मैं, योगेश, मनोज और हितेश समय व्यतीत करने के लिए ताश खेलने लगे। कोई नया खेल था जो मैंने कभी पहले खेला नहीं था, मनोज भी इसमें नया था, हितेश और योगेश पुराने खिलाड़ी हैं, लेकिन मज़ा खूब आया इसमे कोई शक नहीं।

अगले दिन के बारे में निर्णय हुआ कि सुबहे सवेरे अल्मोड़ा के आगे कोसी और कटारमल की ओर निकल पड़ेंगे।

अगले भाग में जारी …..

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मुक्तेश्वर - भ