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मैक्रो के खेल निराले …..

October 10, 2007 · 3 Comments

अभी हाल ही में मैक्रो(macro) तस्वीरों का विचार मन में समाया, कि मैक्रो(macro) पर हाथ आज़माया जाए। कुछेक मैक्रो तस्वीरें ली, लेकिन वो बात नहीं आ रही थी, अपने कैमरे के मैक्रो ऑटोफोकस में मैं सब्जैक्ट के सिर्फ़ पाँच सेन्टीमीटर निकट जा सकता था और ज़ूम बिलकुल नहीं कर सकता था, यह आम मामलों में बहुत अच्छा है लेकिन यदि आप किसी फूल के मध्य भाग का मैक्रो(macro) लेने का प्रयास कर रहे हैं तो दिक्कत है अथवा थोड़ी दूर से किसी चीज़ का फोटो लेने की सोच रहे हैं तब भी दिक्कत आ सकती है। जैसे यह निम्न फोटो मैंने बिना किसी मैक्रो(macro) लेन्स की सहायता के पिछले माह पालमपुर यात्रा के दौरान ली थी।

फूल

इन कामों के लिए होते हैं मैक्रो(macro) लेन्स(lens) जो निकट की वस्तु पर भी फोकस करने देते हैं। हर लेन्स की भांति ये भी एक-एलीमेन्ट और बहु-एलीमेन्ट में आते हैं और बहु-एलीमेन्ट के लेन्स बेहतर और साफ़ फोटो देते हैं। चूंकि मेरा कैमरा डीएसएलआर(dslr) नहीं है इसलिए इसके लिए लेन्स मिलना थोड़ा कठिन, लेकिन आखिरकार क्नॉट प्लेस में स्थिट महाटा एण्ड कंपनी के पास मारूमी(marumi) ब्रांड के (अलग-२ पॉवर के चार)लेन्स का सैट मिला जो कि ढाई हज़ार रूपए का था। लेन्स के हिसाब से देखा जाए तो महंगा नहीं था लेकिन वह एक-एलीमेन्ट के लेन्स का सैट था और मैं उसको सिर्फ़ प्रयोग के लिए लेना चाहता था ताकि यह निश्चय कर सकूं कि कितनी पॉवर का लेन्स मेरे लिए उपयुक्त रहेगा और फिर मैं उतनी पॉवर का बहु-एलीमेन्ट लेन्स अमेरिका से किसी मित्र आदि के हाथ मंगवा सकता हूँ। इससे पहले फोन कर मैंने पता कर लिया था, चांदनी चौक में मदन जी के पास सोनिया ब्रांड का (अलग-२ पॉवर के चार)लेन्स का सैट था जो कि तीन सौ रूपए का था, इसलिए निश्चय किया कि उसी को लिया जाए!! ;)

लगभग एक माह हो गया है मुझे वे लेन्स लाए हुए, उम्मीद से अधिक अच्छे नतीजे मिले हैं इन लेन्सों से। इसी सैट के एक लेन्स की मदद से ली यह निम्न फोटो।

ततैया

यह फोटो कैमरे से ऐसा नहीं आया था!! ;) इसको बाद में कंप्यूटर पर ऐसा करा कि ततैये को रंगीन रहने दिया और बाकी उसके चारो ओर की पत्तियों आदि को श्वेत-श्याम कर दिया। इसकी ओरिजिनल फोटो निम्न है।

ततैया

यह फोटो +4d के मैक्रो(macro) लेन्स की सहायता से ली थी। लेन्स की पॉवर डायोप्टर(diopter) में आंकी जाती है, जितने अधिक डायोप्टर(diopter) उतना अधिक ताकतवर लेन्स, लेकिन इसके साथ यह समस्या भी है कि जितने अधिक डायोप्टर(diopter) का लेन्स होता आपको लेन्स सब्जैक्ट के उतना ही पास रखना होगा। सब्जैक्ट और लेन्स के बीच उचित दूरी क्या हो यह जानने का एक बहुत ही आसान फॉर्मूला है:

दूरी = (1/d * 39.37) इंच

यानि कि यदि आपको लेन्स के डायोप्टर(diopter) पता हैं तो आप एक को डायोप्टर(diopter) से भाग कर 39.37 से उसको गुणा करेंगे तो उचित दूरी इंच में आपको मिल जाएगी जिसको बनाने पर आप कैमरे से आराम से ऑटो-फोकस कर पाएँगे, कम-ज़्यादा होने पर आपको मैनुअल(manual) फोकस का सहारा लेना होगा।

यह एक अन्य फोटो +4d के मैक्रो(macro) लेन्स की सहायता से लिया था।

फूल

मैक्रो(macro) फोटोग्राफ़ी के खेल निराले हैं, इससे आपके कैमरे के लिए एक नई दुनिया खुल जाती है। :)

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लोमो

September 22, 2007 · 2 Comments

नहीं-२, यह कोई मोमो (momo) जैसा व्यंजन नहीं है जिसको बनाया और खाया। ;) यह दरअसल नाम है रूस के एक कैमरा निर्माता का जो इसी नाम के कैमरे बाज़ार में लगभग पिछले सत्तर वर्षों से निकाल रहा है। शुरुआती दौर में सरकारी रही और 1993 में पब्लिक हुई यह कंपनी कहने को तो रूस की सबसे बड़ी ऑप्टिक निर्माता है लेकिन इसके कैमरे ज़रा अलग तरह के होते हैं। इसके कैमरे बहुत ही घटिया दर्जे के लेन्स प्रयोग करते हैं जिस कारण उनके द्वारा ली गई तस्वीरों में एक अलग बात होती है। इसके द्वारा ली गई तस्वीरें बहुत अच्छी क्या अच्छी भी नहीं आती, विग्नेटिंग दिखाई पड़ती है (यानि कि तस्वीर के बॉर्डर स्पष्ट नहीं होते, काले से होते हैं) और काफ़ी सैचुरेटिड (saturated) होती हैं यानि कि उनमें रंगों के कुछ शेड बहुत तीव्र होते हैं और तस्वीर बीच में से कुछ अधिक ही शॉर्प (sharp) होती है। लोमोग्राफ़ी के ऑस्ट्रियाई संस्थापक 1991 में चेकोस्लोवाकिया (czechoslovakia) की राजधानी प्राग (prague) के दौरे के दौरान लोमो कैमरे से रूबरू हुए और इस कैमरे से निकली धुंधली सी तस्वीरें उनको बहुत भा गई। उन्होंने इस तरह की तस्वीरों को कला के तौर पर बाज़ार में स्थापित किया और फिर लोमो कंपनी से एक करार किया जिसके तहत रूस के बाहर यह ऑस्ट्रियाई कंपनी लोमो कैमरों की एकलौती वितरक बनी।

डिजिटल कैमरों के दौर से पहले फिल्म पर उतारी गई तस्वीरों में अधिक सैचुरेशन (saturation) पाने के लिए क्रॉस प्रोसेसिंग (cross processing) भी की जाती थी जिसके तहत रंगीन स्लाईड फिल्म को उसके लिए बने रसायन घोल E6 में डेवेलप (develop) करने की जगह साधारण फिल्म के रसायन घोल C41 में डेवेलप किया जाता था। इस तरह की तस्वीरों ने जल्द ही एक पंथ (cult) का रूप ले लिया और डिजिटल कैमरों के आने के बाद तो लोमो फोटो के लिए आपके पास लोमो कैमरा होने की भी आवश्यकता नहीं रह गई, आप अपने किसी भी डिजिटल कैमरे से फोटो लेकर कंप्यूटर पर ही उसको लोमो बना सकते हैं।

जैसे यह देखिए मेरे कैमरे द्वारा ली गई असली तस्वीर:

Plain Tiger

और डम्पर के लोमो टूल द्वारा बनाया गया इसका लोमो यह है:

Plain Tiger Butterfly - Lomo 1

स्वयं मैंने पंगेबाज़ी कर यह एक हल्का लोमो बनाया जिसमे सैचुरेशन (saturation) इतना नहीं है:

Plain Tiger Butterfly - Lomo Light

और इसी फोटो में जब सैचुरेशन (saturation) बढ़ा दिया तो यह नतीजा निकला:

Plain Tiger Butterfly - Lomo Saturated

फोटो को लोमो बनाने के बहुत तरीके हैं, यदि सिर्फ़ फोटोशॉप (photoshop) को ही लें तो उसमें भी आप कई अलग-२ तरीकों से लोमो बना सकते हैं। इंटरनेट पर इसके लिए बहुत से ट्यूटोरियल (tutorial) मिल जाएँगे और कोई आवश्यक नहीं कि जैसा उनमें बताया गया है आप बिलकुल वैसा ही करें क्योंकि प्रत्येक फोटो अलग होती है और उसके रंग आदि भी अलग होते हैं। तो आप स्वयं पंगेबाज़ी करके देख सकते हैं और जो नतीजे आपको अच्छे लगें उन्हीं को अपनाएँ, आखिर यह सब सृजनात्मक कार्य है, अपनी क्रिएटिविटी (creativity) को कार्य पर लगाईये और नतीजे देखिए। :)

जो लोग फोटोशॉप (photoshop) जैसे किसी एडिटर (editor) में पंगेबाज़ी नहीं कर सकते या जिनको तुरंत नतीजे चाहिए वे डम्पर के इस लोमो जुगाड़ का भी प्रयोग कर सकते हैं, बस अपनी फोटो अपलोड करिए और उसका लोमो रूप प्राप्त कीजिए!! लोमोग्राफ़ी पर थोड़ा अधिक विस्तार से अंग्रेज़ी में यहाँ पढ़िए

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विजेट ही विजेट

August 22, 2007 · 5 Comments


इधर काफी समय हो गया था मोबाइल फोन से पंगे लिए, अभी-२ हाल ही में शायद इसलिए नाराज़ हो गया था!! ;) आज थोड़ा समय मिलने पर ट्विट्टर(twitter) देख रहा था और सोच रहा था कि मेरे लिए इसका क्या उपयोग हो सकता है। एक उपयोग जो दिमाग में आया वह यह था कि कहीं बाहर जाने पर या घूमने-फिरने जाने पर अपने ट्विट्टर को अपडेट किया जा सकता है, कोई अन्य पढ़े या ना पढ़े, अपने रिकॉर्ड के लिए भी यह काम का हो सकता है। लेकिन इसमें एक दिक्कत वाला कार्य यह है कि इसको मोबाइल से अपडेट करने का सरलतम तरीका एसएमएस(sms) द्वारा है और यह ब्रिटेन में बसी सेवा है, यानि कि इसका जो नंबर है(जिस पर मोबाइल से संदेश भेजना होगा) वह भी ब्रिटेन का है, यानि कि हर बार अंतर्राष्ट्रिय एसएमएस लगेगा। अब मेरा रेगुलर मोबाइल कनेक्शन एमटीएनएल(mtnl) का है और पोस्टपेड है, तो एक अंतर्राष्ट्रीय एसएमएस मुझे ढाई रूपए का पड़ता है। इस तरह तो कुछ बार अपडेट करने में मेरी वाट लग जाएगी, जेब में बड़े वाला छेद हो जाएगा, पहले से ही आने वाला कई पन्नों का बिल और बड़ा हो जाएगा!! :( और जिन लोगों का दूसरा कनेक्शन है उसमें तो और अधिक दर होगी अंतर्राष्ट्रीय एसएमएस की, एयरटेल वाले शायद चार रूपए काटते हैं, तो यदि किसी के पास उनका कनेक्शन है और वो इसको ऐसे अपडेट करता है तो उसकी तो और भी ज़्यादा वाट लगेगी!! तो कैसे बचा जाए वाट लगने से?


जब मैंने देखा कि इन लोगों की API भी है तो सोचा किसी न किसी ने सॉफ़्टवेयर, प्लगिन आदि बनाए होंगे इसके लिए। आशा थी कि मोबाइल के लिए भी कोई न कोई सिम्बिअन या जावा का सॉफ़्टवेयर होगा जिससे एसएमएस के पैसे बचेंगे, मोबाइल पर इंटरनेट जितना मर्ज़ी प्रयोग हो उसकी टेन्शन नहीं, क्योंकि मोबाइल पर मेरा असीमित उपयोग(unlimited usage) वाला प्लान है, जितना मर्ज़ी इंटरनेट पेलो, सुबह-शाम रात दिन चौबीसों घंटे!! ;) वैसे भी मैं सोचता रहता हूँ कि किस तरह नियमित उपयोग कर एमटीएनएल वालों से जीपीआरएस(gprs) का साढ़े तीन सौ रूपए माहवार वसूला जाए। तो ढूँढते-२ पहुँच गया विडसैट्स.कॉम(widsets.com) पर। यह जावा में बना एक झकास सा फोकटी सॉफ़्टवेयर है जिसके लिए कई तरह की विजेट उपलब्ध हैं जो तमाम तरह की वेब-सेवाओं(web services) के साथ कार्य कर सकती हैं। इसको कुछ-२ याहू विजेट जैसा समझ सकते हैं मोबाइल के लिए!! वैसे जिन लोगों के जीपीआरएस प्लान असीमित उपयोग वाले नहीं हैं उनको भी टेन्शन लेने की कोई खास आवश्यकता नहीं है, विडसैट्स सेवा आपको डॉटा ट्रान्स्फ़र मीटर(data transfer meter) में यह भी दिखाएगी कि अब तक आपने कितना डॉटा आर-पार किया है, ताकि आपको पता रहे कि कितने पैसे अब तक आप फूँक चुके हो!! ;)


बस फिर क्या था, तुरंत ट्विट्टर और विडसैट्स पर खाते खोले, विडसैट्स को मोबाइल पर डाऊनलोड कर इंस्टॉल कर डाला। विडसैट्स पर रजिस्टर करने के बाद डाऊनलोड के कई विकल्प होते हैं; वे एसएमएस द्वारा आपके लिए लिंक भेज देंगे जिससे आप डाऊनलोड कर सकें, या वो लिंक आपको कंप्यूटर स्क्रीन पर दिखा देंगे ताकि आप मोबाइल पर सीधे ही उसको खोल सकें या फिर कंप्यूटर पर डाऊनलोड कर अपने मोबाइल पर स्थानांतरित भी कर सकते हैं। आप जो भी विजेट विडसैट्स.कॉम पर चुनेंगे उनको अपने मोबाइल पर वहीं से सिंक्रोनाइज़(synchronise) कर सकते हैं और वे अपने आप आपके मोबाइल पर रिफ्रेश हो जाएँगी।


विडसैट्स.कॉम पर (उनके कथन अनुसार)1000 से भी अधिक तरह-२ की विजेट विभिन्न श्रेणियों में उपलब्ध हैं। विकिपीडिया(wikipedia), ईबे(ebay), फोरेका वेदर(foreca weather) द्वारा मौसम की जानकारी, ट्विट्टर(twitter), बीबीसी न्यूज़(bbc news), फ्लिकर(flickr) आदि कई वेब-सेवाओं के विजेट तो हैं ही, खेल आदि के विजेट भी हैं जिनके द्वारा आप खेलकर अपना मनोरंजन या टाइमपास कर सकते हैं। ;) और यदि आपको अपनी पसंद की वेब-सेवा का विजेट नहीं मिलता तो आप उसको विडसैट्स स्टूडियो(widsets studio) में स्वयं बना सकते हैं या पहले से बनी किसी भी विजेट को अपने अनुसार बदल भी सकते हैं। इनमें कई काम की विजेट भी हैं, जैसे ईमेल विजेट(email widget) द्वारा आप अपनी जीमेल और अन्य pop3 और imap ईमेल पढ़ सकते हैं और उनके उत्तर भी दे सकते हैं। ट्विट्टर की तरह ही एक अन्य वेब-सेवा है जाएकू(jaiku) जिसके लिए भी एक विजेट उपलब्ध है जिसके द्वारा जाएकू पर आप अपने मित्रों आदि के जाएकू देख भी सकते हैं और अपने जाएकू पोस्ट भी कर सकते हैं।


तो मैंने भी अपने मोबाइल पर विडसैट्स को इंस्टॉल कर अपने ट्विट्टर पर पोस्ट डाल देख लिया कि यह वाकई काम करता है कि यूं ही खामखा का शोर है। काम तो बकायदा करता है, कोई शक नहीं। :D

जैसा कि कई वेब-सेवाओं आदि में होता है कि आपको एक लिंक थमा देते हैं जिससे आप अपने मित्रों आदि को उस सेवा के बारे में ईमेल द्वारा बता सको, तो कुछ-२ वैसा ही इसमें भी है। इसमें आप किसी भी विजेट को अपने मित्र को भेज सकते हैं। किसी भी विजेट को(जिसे आप भेजना चाहते हैं) सेलेक्ट(select) कीजिए और अपने मित्र का मोबाइल फोन नंबर डालिए और आपके मित्र के पास वह विजेट पहुँच जाएगी जिसको वह इंस्टॉल कर सकता है। यह तरीका खास तौर पर सहयोगी है प्राईवेट चैट(private chat) नामक विजेट के लिए जिसमें आप अपना एक चैटरूम(chatroom) बना उस विजेट को अपने मित्र के पास भेज सकते हैं और फिर दोनों आराम से बात कर सकते हैं। वैसे इस इतना ताम-झाम करने का लाभ तभी है जब आप किसी अन्जान से कुछ बातचीत तुरत-फुरत करना चाहते हों, अन्यथा ये सब तो याहू(yahoo), जीटॉक(gtalk), ऐओएल(aol), आईसीक्यू(icq) जैसे किसी इंस्टेन्ट मैसेन्जर(instant messenger) द्वारा भी हो सकता है।

वैसे कुछ भी हो, इन सोशल नेटवर्किंग(social networking) वेब-सेवाओं के चलते कई नई चीज़ें आ रही हैं, टेक्नॉलोजी का बढ़िया उपयोग हो रहा है और यह सिर्फ़ कंप्यूटर पर ही नहीं, मोबाइल पर भी हो रहा है। तो आप भी इस फ्री के जुगाड़ का लाभ उठाईये और यदि तकनीकी पंगेबाज़ हैं तो कुछ विजेट वगैरह बना डालिए। :)

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डिजिटल कैमरा ….. - भाग ४

August 16, 2007 · 25 Comments

पिछले भाग से आगे …..

camera
पिछले भाग में हमने एक सरसरी नज़र डाली थी डीएसएलाआर(dSLR), ब्रिज(bridge)/प्रोज़्यूमर(prosumer) और प्वाइंट एण्ड शूट(point and shoot) कैमरों के फर्क, खूबियों और खामियों पर और एक नई फीचर इमेज स्टेबिलाईज़ेशन(image stabilization) पर।

कैमरा पसंद करते समय एक चीज़ और देखते हैं, कैमरा निर्माता। किसी भी विषय के संबन्ध में साधारणतया तीन तरह के लोग होते हैं:

  1. जिनको बिलकुल जानकारी नहीं होती
  2. जिनको थोड़ी बहुत जानकारी होती है
  3. एक्सपर्ट लोग, जिनको बहुत जानकारी होती है

तीसरे नंबर वाले लोगों के लिए यह लेख नहीं है, वे अपने निर्णय लेने में सक्षम हैं, उनको मुझसे बहुत अधिक जानकारी होती है, क्योंकि यहाँ कैमरों के मामले में मैं दूसरे नंबर की श्रेणी में आता हूँ; थोड़ी जानकारी है, अधिक पाने की चाह है।

पहली श्रेणी वाले लोग विज्ञापनों से अधिक प्रभावित होते हैं, जिस कंपनी का विज्ञापन जानदार, उनकी नज़र में वही कंपनी और उसका माल सबसे बढ़िया!! ऐसे लोग यदि समझ(अपनी नहीं, दूसरे जानकार व्यक्ति की) से काम नहीं लेते तो कई बार नुकसान उठाते हैं; अनुभव से बढ़िया तो कोई आचार्य आज तक हुआ नहीं!! भाग-२ में मैंने मेगापिक्सल भ्रांति के बारे में लिखा था कि कैसे कैमरा निर्माता मेगापिक्सल के दम पर कैमरे बेचने में लगे हैं। इस भ्रांति का शिकार अधिकतर पहली श्रेणी वाले लोग ही होते हैं। यदि आप पहली श्रेणी के हैं तो इसमें शरमाने वाली कोई बात नहीं है, हर कोई पहली सीढ़ी से ही शुरुआत करता है, जो तीसरी श्रेणी में आते हैं वे भी कभी पहली श्रेणी में ही थे। कोई चीज़ यदि मायने रखती है तो वह यह कि आप कितनी जल्दी पहली से दूसरी और दूसरी से तीसरी श्रेणी में जाते हैं।

तो पहले अब विज्ञापनों को ही देखते हैं। विज्ञापनों के मामले में यदि भारतीय टीवी को लें तो सोनी के साइबरशॉट कैमरों के विज्ञापन ही आप पाएँगे। दो-तीन वर्ष पहले तक कोडेक के फिल्म वाले कैमरों के विज्ञापन बहुत आते थे लेकिन अब आने बंद हो गए हैं, कोडेक को दिखाई दे रहा है कि फिल्म वाले साधारण कैमरे अब बिकने बंद हो रहे हैं, लोग डिजिटल कैमरे लेने पसंद कर रहे हैं। तो आज के समय में सोनी के विज्ञापन दिखाई देते हैं, जिस भी पहली श्रेणी वाले से पूछो, प्रायः सोनी का नाम ही भजता हुआ पाया जाएगा। क्या सोनी के कैमरे अच्छे होते हैं? इसका उत्तर प्रत्येक व्यक्ति अपने अनुसार देगा, मेरे अनुसार सोनी को कैमरे बनाने नहीं आते, इसलिए मैंने कभी सोनी के कैमरे को अपनी लिस्ट में नहीं डाला, क्योंकि अब तक सोनी का कोई कैमरा मेरी वांछित श्रेणी में मौजूद अन्य कैमरों के मुकाबले पर मुझे खरा उतरता नहीं दिखाई दिया। अभी कुछ दिन पहले की बात है, एक परिचित ने मुझसे पूछा कि सोनी का कौन सा कैमरा लें। मैं थोड़ा हैरान रह गया क्योंकि मैं अपेक्षा कर रहा था कि वे मुझसे पूछेंगे कि कौन सा कैमरा लें, लेकिन उन्होंने ब्रांड तो पहले से ही निर्धारित कर ली थी। जब मैंने पूछा कि सोनी का ही कैमरा क्यों लेना चाहते हैं तो पता चला कि उनको पता ही नहीं कि सोनी के अतिरिक्त भी कोई डिजिटल कैमरा बनाता है, उनको तो डिजिटल कैमरों का सोनी तक और फिल्म कैमरों का कोडेक तक ही ज्ञान था। फिर भी मैंने कहा कि सोनी के अतिरिक्त और भी कंपनियाँ हैं, तो वे बोले कि सोनी जितनी अच्छी तो नहीं होंगी, जब वो अपना विज्ञापन टीवी पर दिखाना अफ़ोर्ड(afford) नहीं कर सकतीं तो फिर ऐरी-गैरी कंपनियाँ होंगी जो सोनी जितनी अच्छी सर्विस न दे पाएँ। देखा जाए तो इसमें उनकी गलती नहीं है, कैमरा निर्माता ही भारत में अपना प्रचार अभी ठीक से नहीं कर रहे हैं, क्योंकि कदाचित्‌ उनके अनुसार भारत में अभी डिजिटल कैमरे का कोई खास बाज़ार नहीं है। लेकिन यहाँ एक दूसरा पहलू विचारणीय है, सर्विस। सोनी की सर्विस अच्छी है इस पर लोगों से हर तरह के विचार जानने को मिल सकते हैं, कुछ इसके नाम की कसम खाने को तैयार हो जाएँ तो कुछ इसके इतने खिलाफ़ मिल जाएँगे कि आपने भी क्या किसी की खिलाफ़त देखी होगी!!

डिजिटल कैमरों की दुनिया में आजकल कुछ आम नाम हैं; कोडेक(kodak), सोनी(sony), कैनन(canon), निकोन(nikon), ओलम्पस(olympus) और पैनासोनिक(panasonic)। कुछ अन्य नाम भी मिल जाएँगे जैसे कि कैसिओ(casio), सैमसंग(samsung) और एचपी(HP)। जो लोग थोड़ी अधिक जानकारी रखते हैं उन्होंने कुछ और नाम भी पढ़/सुन रखे होंगे; रीको(ricoh), पेन्टैक्स(pentax), मिनोल्टा(minolta), लेएका(leica), सिग्मा(sigma)।

आम नामों में, कोडेक तो फिलहाल जगह हासिल करने की कोशिश कर रहा है, सोनी और पैनासोनिक ने कुछ जगह हासिल की है और तेज़ी से उभर कर आ रहे हैं, ओलम्पस इनसे आगे है और सबसे स्थापित खिलाड़ी हैं कैनन और निकोन। कैसिओ, सैमसंग और एचपी अभी फिलहाल दूसरी श्रेणी में हैं और इनको काफ़ी रास्ता तय करना है पहली श्रेणी में आने के लिए। रीको का अपना अलग मुकाम है, पेन्टैक्स और मिनोल्टा के डीएसएलआर चलते हैं(सोनी ने कुछ समय पहले मिनोल्टा की कैमरा कंपनी को खरीद अपना पहला डीएसएलआर बाज़ार में निकाला है), लेएका और सिग्मा वास्तव में लेन्स बनाने के लिए प्रसिद्ध हैं। सिग्मा निकोन/कैनन और अपने कैमरों के लिए सस्ते लेन्स बनाता है जिनको लेने वाले फोटोग्राफ़रों की जेबें प्रायः बड़ी नहीं होती। लेएका एक काफ़ी पुरानी जर्मन कंपनी है जिसके लेन्स की क्वालिटी(quality) का सिक्का सबसे अधिक खरा माना जाता है, यदि आपके पास इसका लेन्स है तो अपनी पसंद(taste) और जेब(लेएका के लेन्स काफी महंगे होते हैं) के कारण आपकी औकात दूसरों की नज़र में अपने आप बढ़ जाती है!! लेएका से बढ़िया लेन्स बनाने वाले के बारे में मुझे नहीं पता, हो सकता है कि कोई हो या न हो। कुछ कैमरा निर्माता अपने लेन्स स्वयं बनाते हैं या कदाचित्‌ ऑऊटसोर्स करते हैं, लेकिन लेन्स उनके नाम से ही बिकता है, जैसे कैनन, निकोन, ओलम्पस। लेकिन कुछ कैमरा निर्माता एक(या एक से अधिक) प्रसिद्ध लेन्स निर्माता के साथ गठबंधन करते हैं और उनके लेन्स उनके नाम के ठप्पे के साथ ही प्रयोग करते हैं, जैसे कोडेक श्नेडर-क्रूज़नैक(Schneider-Kreuznach) के लेन्स प्रयोग करता है, सोनी कार्ल ज़ाइस(Carl Zeiss) के और पैनासोनिक प्रयोग करता लेएका(Leica) के लेन्स। लेकिन पैनासोनिक सिर्फ़ लेएका के लेन्स ही प्रयोग नहीं करता, वह उसके लिए कैमरे भी बनाता है जिनमें लेएका के मुताबिक थोड़ा फेर-बदल होता है और उस पर पैनासोनिक की जगह लेएका का ठप्पा होता है। वैसे कोई आवश्यक नहीं कि इन कैमरा निर्माताओं के प्रत्येक कैमरे में इन लेन्स निर्माताओं के लेन्स लगे हों, कुछेक सस्ते कैमरों में इनके लेन्स नहीं लगे होते क्योंकि कीमत पर वे माफ़िक नहीं बैठते। गौर करने वाली बात यह है कि ये तीनों लेन्स निर्माता जर्मन मूल के हैं, और जर्मन दक्षता और परिशुद्धता का लोहा लगभग सभी मानते हैं!! :)

तो बात यदि निजी सलाह की आती है तो मैं कैसिओ, सैमसंग और एचपी से दूर रहने की सलाह दूँगा, अभी इनके कैमरों को बहुत सफ़र करना है कि वे उस मुकाम पर पहुँच सकें कि कोई समझदार व्यक्ति इनको लेने की सोचे। अभी ये लोग दुबले-पतले कैमरे बनाने में लगे हैं, लेकिन हर चीज़ स्लिम अच्छी नहीं होती यह इनको समझना होगा। प्वाइंट एण्ड शूट कैमरों में सोनी को भी फिलहाल नज़रांदाज़ करना ही ठीक है, उसको अभी सुधार की आवश्यकता है। बेसिक प्वाइंट एण्ड शूट में कोडेक, कैनन और पैनासोनिक के कैमरे देखें। कोडेक एक पुराना नाम है, इसके कैमरों की जो एक खासियत है वह यह कि इसके कैमरों द्वारा ली गई तस्वीरों में रंगों की गहराई गजब की होती है, इस कंपनी ने लगभग पूरी बीसवीं शताब्दी रंगों के विज्ञान में रिसर्च की है, उसका फल तो मिलेगा ही, इसलिए बाकी कोई खासियत हो या न हो, रंगों की गहराई लगभग अद्वितीय होती है। अन्य निर्माता भी अब उसके निकट पहुँच रहे हैं, कैनन ने अपने निचले दर्जे के कैमरों पर भी ध्यान देना आरम्भ किया है और उसके कैमरे भी बेहतर होते जा रहे हैं। पैनासोनिक के पक्ष में जो बात है वह यह कि उसके कैमरों में उच्च क्वालिटी के लिए प्रसिद्ध लेएका के लेन्स प्रयोग होते हैं और उसके कैमरों का ऑप्टिकल इमेज स्टेबिलाईज़ेशन अद्वितीय है, इस श्रेणी के अन्य कैमरों में से किसी में इसकी बराबरी करने वाला इमेज स्टेबिलाईज़ेशन मिलना अति कठिन है, कैनन आदि का इमेज स्टेबिलाईज़ेशन इसके सामने मज़ाक लगता है!! निकोन के कैमरे ठीक हैं, लेकिन इनको सोनी के साथ मैं द्वितीय श्रेणी में रखना ठीक समझूँगा क्योंकि इसके कूलपिक्स सीरीज़ के प्वाइंट एण्ड शूट कैमरों में अभी उस तरह की क्वालिटी नज़र नहीं आती जो इस सेगमेन्ट की अन्य नामी ब्रांडों के कैमरों में दिखाई देती है, हालांकि इसको प्रयोग करने वाले बहुत से लोग इस बात से सहमत नहीं होंगे(क्यों जीतू भाई?)।

ब्रिज/प्रोज़्यूमर कैमरों में दो नाम शीर्ष पर हैं, कैनन और पैनासोनिक। जहाँ कैनन के पॉवरशॉट S3IS ने सस्ते मामले में प्रोज़्यूमर कैमरा लेने वालों को लुभाया है वहीं जो थोड़ा अधिक रोकड़ा खर्च करने से नहीं हिचके उनकी पसंद बिग बॉस प्रोज़्यूमर कैमरा, पैनासोनिक ल्यूमिक्स FZ50 रहा है जिसके 35mm से 420mm के 12x ऑप्टिकल ज़ूम वाले लेएका लेन्स ने और गजब की प्रभावशाली इमेज स्टेबिलाईज़ेशन ने बहुत से एक्सपर्ट्स को लुभाया है, हालांकि इन दोनो ही में अपनी-२ खामियाँ भी हैं। जून 2007 में कैनन ने अपने S3IS का अगला वर्जन S5IS निकाला, वहीं पैनासोनिक ने एक सस्ता प्रोज़्यूमर कैमरा FZ8 निकाला है और दूसरे बिग-बॉस FZ18 को सितंबर में निकालने वाला है जिसकी स्पेसिफ़िकेशन(specification) आदि देख लग रहा है कि यह कैमरा धूम मचा देगा। कैमरों की यह प्रोज़्यूमर श्रेणी तेज़ी से गर्माती जा रही है, कैमरा निर्माता इस श्रेणी के फोटोग्राफ़रों की ज़रूरतों को समझ रहे हैं और यह भी समझ रहे हैं कि बहुत से लोग प्वाइंट एण्ड शूट के ऊपर कुछ चाहते हैं लेकिन डीएसएलआर की सिरदर्दी नहीं चाहते!! इस श्रेणी में ओलम्पस भी उभरकर आ रहा है, सोनी तो खैर अपने पैर जमाने की कोशिश कर ही रहा है, कोडेक भी पीछे नहीं रहना चाहता।

डीएसएलआर श्रेणी में कैनन और निकोन छाए हुए हैं, इनका कोई जवाब नहीं। लेकिन यदि किसी को अन्य विकल्प देखने हैं तो ओलम्पस एक सस्ता विकल्प है जिसके कैमरे अच्छे होते हैं, पेन्टैक्स भी बाज़ार में है। पैनासोनिक ने कुछ समय पहले ही अपना पहला डीएसएलआर निकाला था और इधर कोनिका-मिनोल्टा की कैमरा डिविज़न को खरीद सोनी ने मिनोल्टा के एक डीएसएलआर में थोड़े से फेर-बदल कर अपना भी पहला डीएसएलआर कैमरा बाज़ार में उतारा। और इनके साथ ही लेएका भी बाज़ार में है, जिसका कैमरा तो पैनासोनिक बनाता है और लेन्स लेएका का अपना होता है।

इस श्रृंखला के इस अंतिम भाग में यही कहना चाह रहा हूँ कि विज्ञापनों के आगे भी बाज़ार है, इसलिए सिर्फ़ विज्ञापनों पर मत जाईये। मेरे पास पूरे दो माह का समय था अपने नए कैमरे के बारे में निश्चय करने का, क्योंकि दो महीने बाद मेरा एक मित्र ऑफिस टूर पर अमेरिका जा रहा था और मैंने सोच रखा था कि उसके हाथ ही अमेरिका से मंगवा लूँगा अपना कैमरा, सस्ता भी मिलेगा(यहाँ दिल्ली के मुकाबले आधे से कम दाम में मिला आखिरकार) और मंगवाने में लगने वाले पैसे भी बचेंगे!! ;) इसलिए मैंने दो माह तसल्ली से रिसर्च की थी, कई कैमरे देखे, डीएसएलआर लेने के बारे में भी सोचा, कई रिव्यू पढ़े, लोगों से उनकी राय जानी, कैमरों की लिस्ट फाइनल की तो यहाँ एकाध बड़ी दुकानों में जाकर कैमरे हाथ में ले चला कर भी देखे और अंत में पैनासोनिक ल्यूमिक्स FZ50 को लेना तय किया। डिजिटल कैमरा खरीद आप एक तरह से अपना पैसा उसमें निवेश कर रहे हैं, इसलिए अच्छी तरह से रिसर्च करें कि क्या उपलब्ध है और कितने का उपलब्ध है, बाज़ार की उसके बारे में क्या प्रतिक्रिया है, एक्सपर्ट्स का क्या कहना है, खूबियों और खामियों का विशलेषण करें, हो सके तो दुकानों में जाकर कैमरा चला कर देखें और सोच समझ कर अपना पैसा लगाएँ। इस तरह से कदाचित्‌ थोड़ा समय लग जाए लेकिन नतीजे आपको अच्छे ही मिलेंगे।

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बैकअप जो लिया होता …..

August 14, 2007 · 14 Comments

कल मेरे मोबाइल को पता नही क्या हुआ, रेडियो सुनते-२ अचानक अटक गया। मैंने सोचा कि बंद कर दोबारा चालू कर लेता हूँ, तो बंद किया, लेकिन बंद होते के बाद चालू न हो कर दिया और एरर(error) संदेश टिका दिया स्क्रीन पर कि फोन चालू होने में समस्या है और मुझे रिटेलर(retailer) को संपर्क करना चाहिए। फोन लेकर मैं नोकिआ के उस डीलर(dealer) के पास पहुँचा जिससे फोन पिछले दिसंबर में लिया था, फोन जाँचने के बाद उसने कहा कि पास ही स्थित नोकिआ केयर(nokia care) में ले जाना चाहिए, फोन के सॉफ़्टवेयर में दिक्कत है जिसको वे कुछ ही मिनट में ठीक कर दे देंगे। यानि कि फोन के सिम्बिअन ऑपरेटिंग सिस्टम(symbian operating system) में कुछ लफ़ड़ा हो गया था। शायद मैंने कुछ दिन पहले जो फर्मवेयर अपडेट(firmware update) किया था वह सही से नहीं हुआ था।

बहरहाल, मैं फोन लेकर नोकिआ केयर में पहुँचा तो मुझे वहाँ बोला गया कि मामला कुछ ही मिनट में वे सही कर देंगे लेकिन फोन की मेमोरी में जो है वो सब मिट जाएगा, यानि कि पूरी एड्रेस बुक(address book), एसएमएस संदेश(sms messages), नोट्स(notes) आदि!! मैंने उनसे कहा कि यदि वे बैकअप ले सकते हैं तो कृपया ले लें लेकिन उन्होंने असमर्थता जताई। कोई और चारा न था, सो मैंने कह दिया कि जो कर सकें कर दें। दस मिनट बाद फोन चालू हालत में फर्मवेयर अपडेट के साथ मुझे सौंप दिया गया, बिना किसी डाटा के!! अब एक बात का शुक्र यह था कि लगभग पूरी एड्रेस बुक मेरे सिम कार्ड में भी थी, तो वे नंबर तो वहाँ से कॉपी हो गए, जो नए नंबर हाल ही में पिछले तीन महीनों में डाले थे वे उड़ गए थे!! एसएमएस संदेश और नोट्स का कोई बैकअप नहीं था, इसलिए वे हमेशा के लिए चले गए। नोट्स तो कोई खास नहीं थे लेकिन 200 एसएमएस संदेशों में कुछ काम के थे। सॉफ़्टवेयर आदि भी उड़ गए, लेकिन उनको तो दोबारा डाल लिया।

Backup!!

सबक: अपने फोन में मौजूद डाटा का भी बैकअप लेकर रखें, खासतौर से एड्रेस बुक और एसएमएस संदेशों का। यदि आपके फोन में मेमोरी कार्ड लगता है तो आप फोन मेमोरी का बैकअप वहाँ भी रख सकते हैं, लेकिन मेरा सुझाव है कि इन दोनों(फोन मेमोरी और मेमोरी कार्ड) का बैकअप अपने कंप्यूटर पर भी अवश्य रखें।

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डिजिटल कैमरा ….. - भाग ३

August 13, 2007 · 10 Comments

पिछले भाग से आगे …..

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पिछले भाग में मैंने सुझाव दिया एक नई सूचि बनाएँ जिसमें हो कि आपको कैमरे में क्या-२ चाहिए या आप कैमरे का प्रयोग कैसे करेंगे। साथ ही रिव्यू आदि पढ़ने का सुझाव दिया, मेगापिक्सल मिथ(myth) से सावधान रहने का मश्वरा दिया और ऑप्टिकल ज़ूम(optical zoom) की बात की। इससे पहले कि आगे बढ़े, पिछली पोस्ट की कुछ रोचक टिप्पणियों पर एक नज़र डाली जाए।

शास्त्री जी ने टिप्पणी की

अधिकतर छायाचित्र सिर्फ 1.3 मेगापिक्सल से लिये गये है, लेकिन चित्रों का स्तर बहुत अच्छा है. इसका एक रहस्य है. केमरा में 16x ऑप्टिकल ज़ूम है

अब मैं ज़रा असमंजस में पड़ गया, 1.3 मेगापिक्सल का कैमरा और 16x का ऑप्टिकल ज़ूम? ऐसा कैसे हो सकता है? मैंने गूगलवा पर ढूँढने की कोशिश भी की लेकिन नहीं मिला ऐसा कोई कैमरा। या तो ऐसा होगा कि शास्त्री जी के पास डिजिटल कैमरा न होकर वीडियो कैमरा/कैमकॉर्डर होगा क्योंकि उनमें ऑप्टिकल ज़ूम काफ़ी अधिक होता है लेकिन शुरुआती मॉडल कम मेगापिक्सल के आ रहे थे, या फिर शास्त्रीजी के कैमरे का कुल ज़ूम(ऑप्टिकल गुणा डिजिटल ज़ूम) 16x होगा और वे मेरे खुलासा करने के बाद भी गलती से ऐसा लिख गए। बहरहाल, मैंने शास्त्री जी की टिप्पणी पर उनसे निवेदन किया था कि वे अपने कैमरे का मॉडल और कंपनी आदि बताएँ, मैं जानने के लिए उत्सुक हूँ लेकिन शास्त्री जी ने हमेशा की भांति टिप्पणी का उत्तर नहीं दिया।

बहरहाल, इसके बाद अक्स ने पूछा

and how much optical zoom is ok?

यानि कि “कितना ऑप्टिकल ज़ूम ठीक रहता है?”। तो अब इसका उत्तर मैंने यह दिया

कितना ऑप्टिकल ज़ूम लेना है यह आप पर निर्भर करता है। आपने किस तरह कि फोटोग्राफ़ी करनी है उस पर तो निर्भर करता ही है, आपकी जेब पर भी निर्भर करता है। जैसे यदि आम फोटोग्राफ़ी करनी है और आप घूमने फिरने जाते हैं तो सामान्यतः 3x का ज़ूम काफ़ी रहता है। आजकल 5x-6x ज़ूम वाले कैमरे भी सस्ते हो गए हैं। तो यदि कितना ज़ूम होता है इसका अंदाज़ा नहीं है तो किसी भी कैमरे की बड़ी दुकान में जाकर दो-तीन अलग-२ ज़ूम वाले कैमरे चला के देख लो। खरीदना कोई आवश्यक नहीं है, वहाँ सिर्फ़ देख के भी आ सकते हो। तो उन कैमरों को ट्राई करने से अंदाज़ा हो जाएगा कि 3x में कितना ज़ूम मिल रहा है और 6x में कितना, फिर उसके बाद अपने हिसाब से निर्णय कर सकते हो कि कितने ज़ूम वाला कैमरा लेना है।

मैं समझता हूँ कि जो अन्य भी इस दुविधा में होंगे उनकी दुविधा का समाधान हो गया होगा। तो अपने कैमरा कैसे पसंद करें वाली कड़ी पर आगे बढ़ते हैं।

ऑप्टिकल ज़ूम के साथ-२ आजकल एक नई फीचर बाज़ार में अपनी जड़े मज़बूत कर रही है, इमेज स्टेबिलाईज़ेशन (image stabilization)। जो लोग इससे अंजान हैं उनके लिए आम शब्दों में इसका अर्थ है - एक ऐसी तकनीक जिससे कैमरे को पकड़ने वाले हाथों के कंपन के कारण फोटो जो थोड़ी सी हिल जाती है उसको रोकना/प्रभाव कम करना। हाथों में कंपन लगभग हर किसी के होता है, किसी के हाथों में कम होता है तो किसी के में अधिक। डिजिटल कैमरे को यदि पकड़े हुए हैं और फोटो ले रहे हैं तो कभी कैमरा इस कंपन के कारण थोड़ा हिल जाता है और फोटो उतनी शॉर्प(sharp) नहीं आती जितनी आनी चाहिए वरन्‌ थोड़ी धुंधला जाती है, जो कि खास तौर पर तब दिखाई देता है जब आप बड़ा प्रिंट निकालें या कम शटर स्पीड(shutter speed) पर कम रोशनी में तस्वीर लेते हैं। यह तकनीक आजकल कैमरों में आम होती जा रही है, इससे लैस बहुत से कैमरे आए दिन बाज़ार में आ रहे हैं। तो क्या हर कैमरे की इमेज स्टेबिलाईज़ेशन बढ़िया होती है? नहीं!! आम प्रचलन में आजकल बाज़ार में एक से अधिक तरह की इमेज स्टेबिलाईज़ेशन आज बाज़ार में है। पहले तरह की है ऑप्टिकल इमेज स्टेबिलाईज़ेशन(optical image stabilization) जिसमें कैमरे के लेन्स में सेन्सर आदि लगे होते हैं जो कि कंपन को पहचान लेन्स के अंदर मौजूद तत्वों को पोजीशन कर कंपन का प्रभाव कम करने का प्रयास करते हैं। दूसरे तरह की इमेज स्टेबिलाईज़ेशन को एन्टी ब्लर तकनीक(anti blur technology) के नाम से जाना जाता है जिसमें कैमरे की बॉडी(body) के भीतर उसके फोटो सेन्सर के साथ इसको लगाया जाता है जो कि सेन्सर को पोजीशन कर उसको कंपन का प्रभाव कम करने को कहता है। एक और तरह की इमेज स्टेबिलाईज़ेशन चल रही है जिसको डिजिटल इमेज स्टेबिलाईज़ेशन(digital image stabilization) कहते हैं। इसमें कैमरे के अंदर का सॉफ़्टवेयर डिजिटली कंपन के प्रभाव को कम करने का प्रयत्न करता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि ऑप्टिकल इमेज स्टेबिलाईज़ेशन सबसे बेहतरीन होती है, उससे बेहतर और प्रभावकारी कोई नहीं, और सबसे घटिया(न होने से भी बेकार) डिजिटल इमेज स्टेबिलाईज़ेशन होती है। एन्टी ब्लर तकनीक आदि ठीक काम करती है, लेकिन ऑप्टिकल इमेज स्टेबिलाईज़ेशन जितनी प्रभावशाली नहीं होती। एक बात जो यहाँ गौर करने वाली है वह यह कि हर कंपनी की ऑप्टिकल इमेज स्टेबिलाईज़ेशन भी एक जैसी नहीं होती, किसी की बिलकुल प्रभावशाली नहीं होती तो किसी की बहुत प्रभावशाली होती है। इस पर मैं अपने विचार बाद में रखूँगा जब मैं कंपनियों के बारे में बात करूँगा।

एक महत्वपूर्ण बात यह निर्णय लेने की है कि आपको बेसिक प्वाइंट एण्ड शूट(point and shoot) कैमरा लेना है कि ब्रिज(bridge)/प्रोज़्यूमर(prosumer) कैमरा लेना है या डीएसएलआर(dslr) लेना है। प्वाइंट एण्ड शूट हुए वे कैमरे जो कि आम कैमरे होते हैं, प्रायः छोटे साइज़ के साधारण कैमरे जिसको आप लक्ष्य की ओर साधें और शटर(shutter) दबा फोटो ले लें। उसमें आपको पहले से ही सैट कई तरह के सीन(scene) मोड(mode) मिल जाएँगे अलग-२ तरह की फोटो लेने के लिए, जैसे लैन्डस्केप(landscape), पोर्ट्रेट(portrait), पार्टी(party), मैक्रो(macro), नाईट लैन्डस्केप(night landscape), नाईट पोर्ट्रेट(night portrait) आदि। इस तरह के कैमरों में मैनुअल(manual) कंट्रोल बहुत कम(न के बराबर) होता है और लगभग सभी कुछ ऑटोमैटिक होता है। ये कैमरे आम जन(जिनको फोटोग्राफ़ी की तकनीकी जानकारी नहीं होती) के लिए होते हैं। ये कैमरे सबसे सस्ते आते हैं और इनको प्रयोग करना बहुत आसान होता है तथा रख-रखाव का कोई खास झंझट नहीं होता। डीएसएलआर प्रोफेशनल कैमरे होते हैं उन लोगों के लिए जो कि फोटोग्राफी में काफ़ी दक्ष हैं और उसकी तकनीकी जानकारी रखते हैं तथा जो अपने कैमरों में लगभग हर चीज़ को स्वयं निर्धारित करना चाहते हैं, जैसे शटर स्पीड, आपर्चर(aperture), आईएसओ(iso) आदि। इन कैमरों की खासियत यह है कि ये आपको अधिकतम कंट्रोल देते हैं, आप कैमरे के लेन्स आदि भी आवश्यकता अनुसार बदल सकते हैं, लेकिन ये कैमरे सबसे महंगे आते हैं और इनको काफ़ी अच्छे रख-रखाव की आवश्यकता होती है। डीएसएलआर के बारे में तकनीकी रूप से जानने के लिए अंग्रेज़ी विकिपीडिया पर यह लेख देखें। लेकिन बहुत से ऐसे लोग भी है जो कि डीएसएलआर और प्वाइंट एण्ड शूट की खूबियाँ चाहते हैं लेकिन इन दोनों की खामियाँ नहीं चाहते। तो ऐसे लोगों के लिए कैमरा निर्माताओं ने उन्नत प्वाइंट एण्ड शूट कैमरे निकाले जिनमें डीएसएलआर और प्वाइंट एण्ड शूट की लगभग सभी खूबियाँ थीं और खामियाँ न के बराबर, इन कैमरों को ब्रिज अथवा प्रोज़्यूमर कैमरे कहते हैं। ये कैमरे साधारणतया डीएसएलआर से कुछ चीज़ों में ही कम होते हैं(जैसे लेन्स बदल नहीं सकते, कैमरे का सेन्सर डीएसएलआर से छोटा होता है) और ये प्वाइंट एण्ड शूट से महँगे और डीएसएलआर से सस्ते होते हैं।

यदि आप अभी फोटोग्राफी में नए हैं या कोई खास जानकारी नहीं रखते या हल्का-फुल्का छोटा कैमरा चाहते हैं तो आपके लिए बेसिक प्वाइंट एण्ड शूट ही सही है। यदि आप फोटोग्राफी की अच्छी जानकारी रखते हैं अथवा उसको सीखने के इच्छुक हैं तो ब्रिज/प्रोज़्यूमर कैमरे में निवेश करना अच्छा रहेगा। और यदि आप बहुत अच्छी जानकारी रखते हैं तो फिर तो आपके लिए डीएसएलआर ही चंगा है। हर तरह के लोगों और हर तरह की इच्छाओं के अनुरूप आजकल कैमरे मिल जाते हैं। तो आपको यह निश्चय करना है कि आपको किस प्रकार का कैमरा लेना है।

अगले भाग में जारी …..

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डिजिटल कैमरा ….. - भाग २

August 7, 2007 · 15 Comments

पिछले भाग से आगे …..

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पिछले भाग में मैंने सुझाव दिया था कि आपको डिजिटल कैमरा किसलिए चाहिए उन कारणों की सूचि बना लें, आगे कैमरे का चुनाव करने में भी सहायक होगी। तो उस सूचि से अब उन कारणों को लेकर एक नई सूचि बनाएँ जिसमें हो कि आपको कैमरे में क्या-२ चाहिए या आप कैमरे का प्रयोग कैसे करेंगे। उदाहरणार्थ, आप अधिकतर किस तरह की फोटोग्राफी करेंगे; पोर्ट्रेट(portrait) लेंगे या लैन्डस्केप(landscape), खेलों(sports) आदि की फोटो लेंगे या मैक्रो(macro) लेंगे, या फिर इस बारे में अनिश्चित हैं और सभी प्रकार की फोटोग्राफी करेंगे? क्या आप प्रोफेशनल फोटोग्राफर हैं/बनना चाहते हैं? या सिर्फ़ शौकिया फोटोग्राफी करेंगे? क्या आप सिर्फ़ कुछ अवसरों(घर आदि में किसी पार्टी फंक्शन या कहीं सैर-सपाटे पर गए) पर ही तस्वीरें लेना चाहेंगे या फोटोग्राफी की कला को सीखना चाहेंगे? क्या आपके लिए कैमरे का आकार और वज़न अधिक मायने रखता है; क्या आपको छोटा और हल्का कैमरा चाहिए या आप अच्छे फीचर(features) वाले बड़े कैमरे को लेना पसंद करेंगे? क्या आपको कैमरों और फोटोग्राफी का कोई पूर्व अनुभव है? यदि अनुभव है तो कितना है? आप कैमरे में किन खास फीचर्स(features) को चाहेंगे? और सबसे महत्वपूर्ण, आपका बजट कितना है?

इन सब के बारे में विचार करें, यदि किसी अच्छे से कैमरे की दुकान में जाते हैं(पड़ोस की छोटी इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान में नहीं जिसने 2-3 चलतऊ चीनी कैमरे रखे हुए हैं) तो वहाँ भी सेल्समैन आपसे कुछ इसी तरह के प्रश्न कर सकता है, यदि आप उससे राय लेंगे कि कौन सा कैमरा लिया जाए। लेकिन उसकी राय केवल और केवल एक सुझाव के तौर पर ही लें, उस पर पूर्ण विश्वास कर उसके द्वारा सुझाया कैमरा न लें ले क्योंकि (जैसा मैंने अधिकतर देखा है)वह आपको सबसे महँगा कैमरा टिकाने का प्रयास करेगा, कोई आवश्यक भी नहीं कि उसे कुछ खास पता हो इन चीज़ों के बारे में।

बेहतर विकल्पों और सुझावों के लिए ऑनलाईन कैमरा रिव्यू वेबसाइटों पर सर्च करें। डीपीरिव्यू.कॉम कैमरों के बारे में जानने के लिए एक अति उत्तम वेबसाइट है, मैं भी इसकी सलाह पर अधिक भरोसा करता हूँ। इस तरह कुछ और वेबसाइटें भी मिल जाएँगी आपको जहाँ आप अपने बजट और फीचर की आवश्यकता अनुसार कैमरे देख सकते हैं। भारत में रहने वाले बंधुओं को व्यक्तिगत तौर पर सुझाव दूँगा कि यहाँ छपने वाली तकनीकी पत्रिकाओं में यदा-कदा छपने वाले कैमरा रिव्यू आदि को कोई भाव न दें, उनमें सुझाव इतने बेतुके होते हैं कि साफ़ दिखता है कि सारा मामला प्रायोजित है!! भारत में फिलहाल फोटोग्राफी संबन्धी कोई खास पत्रिकाएँ नहीं हैं, लेकिन योरोप और अमेरिका आदि में कुछेक अच्छी पत्रिकाएँ छपती हैं इस विषय पर भी। यहाँ भारत में जो एकाध फोटोग्राफी संबन्धी पत्रिकाएँ निकलती हैं उनमें बेहतर फोटोग्राफी करने संबन्धी तो कदाचित्‌ कुछ अच्छे सुझाव मिल जाएँ लेकिन कैमरा लेने संबन्धी अच्छे सुझावों की अपेक्षा न ही करें तो बेहतर है, क्योंकि जितना मैंने देखा है, उनमे रिव्यू(review) करने वाले या तो सालों पुराने मॉडल को नया समझते हैं(क्योंकि भारत में वह हाल ही में आया होता है) या मेगापिक्सल(megapixel) के पीछे भाग रहे होते हैं!!

मेगापिक्सल सब कुछ नहीं है, इसलिए उसके पीछे मत भागिए!! कैमरा निर्माता भी वही कर रहे हैं आजकल जो पर्सनल कंप्यूटर निर्माता(personal computer) करते आए हैं। जिस तरह पर्सनल कंप्यूटर निर्माता अपने टीवी/प्रिंट आदि विज्ञापनों में सिर्फ़ प्रोसेसर और एलसीडी स्क्रीन(LCD Screen) आदि के बारे में ही बताते हैं और अंदर दूसरे महत्वपूर्ण पुर्ज़ों(parts/components) में खेल खेल जाते हैं, उसी प्रकार कैमरा निर्माता भी आजकल सिर्फ़ मेगापिक्सल का खेल खेल रहे हैं, नए वर्ज़न/अपडेट में मेगापिक्सल बढ़ाओ और कैमरा बेचो। अज्ञानी जनता भी इस मेगापिक्सल के झांसे में आ जाती है यह जाने बिना कि मेगापिक्सल सब कुछ नहीं होता!!

मेरे सबसे बड़े ममेरे भाई, जो कि अभी बारहवीं कक्षा में पढ़ रहा है, को गैजेट्स(gadgets) में बड़ी रूचि है ,इधर उधर से अपने अज्ञानी मित्रों से प्राप्त जानकारियाँ आदि मुझे बताता रहता है; मैं भी बड़े मज़े से सुनता हूँ क्योंकि कई बार किसी चीज़ के बाज़ार में आने की जानकारी मुझे ऐसे ही मिलती है, बाकी जानकारी बेशक गलत हो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि सही जानकारी प्राप्त करने के मेरे पास उससे अधिक साधन हैं!! ;) तो ऐसे ही एक बार उसको किसी ने डिजिटल कैमरों और मेगापिक्सल के बारे में बताया होगा कि जितना गुड़ उतना ही मीठा, तो तब से वो यह अवधारणा लेकर बैठ गया है कि मेगापिक्सल जितने अधिक हों उतना ही बढ़िया कैमरा!! जब 2 मेगापिक्सल वाले कैमरा फोन आए तो भजने लगा कि बहुत बढ़िया हैं, जब मैंने नोकिआ एन70(Nokia N70) म्यूज़िक एडिशन फोन लिया जिसमें 2 मेगापिक्सल वाला कैमरा है तो मेरे को शाबासी सी दी कि अब ढंग का कैमरा फोन लिया है, कुछ दिन बाद चहक के मुझे बता रहा था कि फलां फोन आया है 5 मेगापिक्सल वाले कैमरा के साथ तो उसको लेने वाले को डिजिटल कैमरे की तो कोई आवश्यकता ही नहीं होगी!! मैंने उसको समझाया कि कैमरा फोन अपनी जगह है और पूर्ण कैमरा अपनी जगह, दोनों में बहुत अंतर होता है। मेगापिक्सल से कुछ नहीं होता, अधिक मेगापिक्सल वाले सस्ते चीनी कैमरे(1000 से 4000 रूपए के बीच) भी मिल जाते हैं बाज़ार में लेकिन उनकी गुणवत्ता उनसे कम मेगापिक्सल वाले दूसरे स्थापित ब्रांड के कैमरे के सामने कहीं नहीं होती!! स्थापित ब्रांड वाले कैमरे को छोड़िए, मैंने तो उन सस्ते जुगाड़ों की गुणवत्ता अपने नोकिआ एन70(Nokia N70) के आगे भी टिकती नहीं देखी!!

मेगापिक्सल सिर्फ़ फोटो के रेज़ोल्यूशन(resolution) से संबन्ध रखता है, कि फोटो का आकार कितना बड़ा है और उसमें कितनी डिटेल/गहराई(depth) है। आम शब्दों में कहें तो ज़्यादा मेगापिक्सल का लाभ तभी है जब आपने प्रिंट निकालने हों, यदि कंप्यूटर पर ही फोटो रखने हैं तो कोई खास लाभ नहीं। प्रिंट भी यदि 4×6 या 8×12 तक के निकालने हैं तो 5-6 मेगापिक्सल पर ली फोटो काफी है, 10 मेगापिक्सल पर लेने से कोई अधिक अच्छी नहीं आ जाएगी। तो इसलिए मेगापिक्सल के अतिरिक्त भी कैमरे में कुछ होना चाहिए!!

ऑप्टिकल ज़ूम (optical zoom) किसी भी कैमरे का मेरे अनुसार अति महत्वपूर्ण पहलू होता है। अधिकतर डिजिटल कैमरों में दो तरह का ज़ूम(zoom) होता है, ऑप्टिकल ज़ूम और डिजिटल ज़ूम(digital zoom)। इन दोनों में डिजिटल ज़ूम पर ध्यान न ही दें तो बेहतर है क्योंकि डिजिटल ज़ूम और कुछ नहीं करता सिर्फ़ आपकी फोटो को डिजिटली बड़ा कर देता है(यानि कि जैसे रबड़ को खींच दिया हो) जिससे फोटो फट सी जाती है, जबकि ऑप्टिकल ज़ूम असल ज़ूम होता है जो कि लेन्स(lens) को पोज़ीशन कर प्राप्त किया जाता है और जिससे फोटो की क्वालिटी में कोई अंतर नहीं आता। कुछ कैमरा निर्माता(प्रायः निचले दर्जे के) आपको एक ही ज़ूम का आंकड़ा बताएँगे; कि कैमरे में 12x का ज़ूम है, जिसका अर्थ यह भी हो सकता है कि उसमें 3x का ऑप्टिकल ज़ूम है और 4x का डिजिटल ज़ूम - 3 गुणा 4 हुआ 12। अब इसमें आपके लिए 3x का ही ज़ूम काम का है, बाकी बेकार है। सस्ते कैमरे में अधिक ऑप्टिकल ज़ूम नहीं मिलता, क्योंकि अधिक ऑप्टिकल ज़ूम के लिए लेन्स की गुणवत्ता अधिक होनी चाहिए जिस कारण लेन्स की कीमत बढ़ जाती है और नतीजन कैमरे की कीमत बढ़ती है। इसलिए कैमरा लेते समय यह देखें कि उसका ऑप्टिकल ज़ूम कितना है, 3x का ऑप्टिकल ज़ूम आजकल सामान्य है और न्यूनतम अपेक्षा होती है, इससे कम वाले कैमरे को नज़रअंदाज़ करना ही बेहतर होगा आपके लिए।

अगले भाग में जारी …..

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डिजिटल कैमरा …..

August 4, 2007 · 9 Comments

….. अब लें कि बाद में? कौन सा लें? कैसे पसंद करें?

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यदि ये प्रश्न आपके दिमाग में घर किए हुए हैं तो इसका अर्थ है कि आप भी डिजिटल कैमरा लेना चाहते हैं और फिलहाल उधेड़बुन में हैं। घबराईये नहीं, कोई नई बात नहीं है, लगभग हर डिजिटल कैमरा लेने वाला इसका शिकार होता है। इसका समाधान बहुत आसान है, बस कुछ बातें ध्यान में रखनी चाहिए। जैसे कि कैमरा कब लेना चाहिए? अब यह कोई मौसम पर तो निर्भर करता नहीं है!! यदि आपको डिजिटल कैमरे की आवश्यकता महसूस हो रही है और जेब में माल है तो खरीद लीजिए, किसी मौसम की प्रतीक्षा मत कीजिए। साधारणतया लोग ऐसी चीज़ों की खरीददारी तब करते हैं जब कंपनियाँ भारी डिस्काऊँट आदि देती हैं। जैसे भारत में दीपावली के आसपास बहुत कंपनियाँ अपने उत्पादों पर तरह-२ की छूट और गिफ़्ट आदि देती हैं, अमेरिका में क्रिसमस के समय पर बहुत बढ़िया ऑफ़र आदी मिलते हैं। तो आप कहाँ से अपना कैमरा ले रहे हैं इस पर भी निर्भर करेगा आपकी खरीद का समय; यदि स्वयं या किसी के द्वारा अमेरिका से मंगवा रहे हैं तो क्रिसमस का समय उपयुक्त रहेगा, पर ध्यान रहे कि उस समय कुछ उत्पादों का स्टॉक जल्दी समाप्त हो जाता है, इसलिए इस बात के लिए तैयार रहें। यदि भारत में खरीद रहे हैं तो फिलहाल तो दीपावली की प्रतीक्षा करना कोई खास लाभकारी नहीं होता क्योंकि (मेरी जानकारी अनुसार)डिजिटल कैमरों पर अभी कोई खास ऑफ़र नहीं मिलते कंपनियों से। यदि सिंगापुर या दुबई से खरीद रहे हैं तो ध्यान रखें कि इन जगहों पर लोगों को आकर्षित करने के लिए हर साल शॉपिंग फेस्टिवल होते हैं जिस दौरान बहुत से अच्छे-२ ऑफ़र सामने आते हैं।

लेकिन, कैमरा लेने से पहले यह निश्चय करें कि क्या आपको वाकई कैमरा चाहिए? यदि हाँ तो क्या कारण हैं जिनकी वजह से आपको डिजिटल कैमरा चाहिए? इन कारणों की एक सूचि बना लें(आगे भी काम आएगी, कैमरा मॉडल निर्धारित करने में)। इससे यदि आपको नहीं लगता कि आपको डिजिटल कैमरे की आवश्यकता है तो मत खरीदिए, यदि माल जेब में है तो उसको संभाल के अलग रख दीजिए, बाद में जब वाकई आपको कैमरे की आवश्यकता महसूस होगी तब काम आएगा। मैं समझता हूँ कि बिना आवश्यकता के कैमरा लेने से अच्छा है कि जब आवश्यकता हो तभी उस समय उपलब्ध आवश्यकताओं अनुसार कैमरा लिया जाए।

अब जब निश्चय कर ही लिया है कि कैमरा लेना है तो निन्यानवें के फेर से बचने का प्रयत्न कीजिए। बहुत से लोग(मैं भी) कोई चीज़ लेने से पहले अलग-२ कंपनियों के कुछ मॉडलों की एक सूचि बनाते हैं और फिर उसमें से एक(या अधिक, जैसी आवश्यकता/उत्पाद) को चुनते हैं। तो डिजिटल कैमरा लेते समय भी सूचि बनाते हैं, एक मॉडल पसंद करते हैं और यदि उसको लांच हुए थोड़ा समय हो चुका है तो उसके अगले वर्जन की प्रतीक्षा करते हैं क्योंकि उसमें कुछ नया आ रहा है। जब वो आ जाएगा तो फिर कुछ और चीज़ है जो पसंद नहीं, तो उसके बाद अगले की प्रतीक्षा। यही है निन्यानवें का फेर, एक चक्र है जिसमें आप घूमते ही रहोगे। मैं यह नहीं कहता कि प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए, लेकिन हर चीज़ की एक हद होती है भई!! यदि आप बेसिक प्वाइंट एण्ड शूट(point and shoot) वाला कैमरा ले रहे हैं तो थोड़ी प्रतीक्षा करने पर आपको नया वर्जन मिल सकता है लेकिन यहाँ निन्यान्वें के फेर में पड़ने के चान्स अधिक होते हैं। क्यों? वह इसलिए क्योंकि प्रायः कैमरा कंपनियाँ साल के आरम्भ में नए कैमरों की घोषणा करती हैं और तीन-चार महीने के भीतर उस मॉडल को बाज़ार में उतार देती हैं। इसके बाद साल के मध्य में भी नए वर्जन/अपग्रेड(upgrade) आदि की घोषणाएँ होती हैं जिनको क्रिसमस के पहले(सितंबर से नवंबर के बीच) बाज़ार में उतार दिया जाता है। अब जैसे कि मैंने देखा है, डिजिटल कैमरे यहाँ भारत में तुरंत नहीं आते, कम से कम रिटेल बाज़ार में तो नहीं, ग्रे मार्किट में भले ही आ जाएँ। तो यदि आप भारत में ही खरीदने की सोच रहे हैं तो अपनी आशाएँ कम ही रखें। जो लोग डीएसएलआर(dslr) या ब्रिज(bridge)/प्रोज़्यूमर(prosumer) कैमरा लेने की सोच रहे हैं उनके लिए आसानी है, निन्यानवें के फेर में पड़ने के चान्स कम हैं क्योंकि इन कैमरों के नए वर्जन जल्दी-२ नहीं आते, प्राय: 3-4 वर्षों के अंतराल पर आते हैं।

यह निर्णय करना भी आवश्यक है कि क्या आपको लेटेस्ट(latest) ही लेना है? बहुतया ऐसा भी होता है कि नवीनतम मॉडल में पिछले मॉडल के अनुपात कोई नई फीचर आदि नहीं डाली गई, सिर्फ़ थोड़ा बहुत ही फेर बदल किया गया है। ऐसी स्थिति में बेहतर है कि आप नवीनतम मॉडल की ओर ध्यान न दें क्योंकि उसके और पिछले मॉडल की कीमत में जो अंतर होगा वह उन बदलावों के लिए कहीं से जस्टीफाईड(justified), यानि कि उचित, नहीं होगा। तो नया वर्जन आने से आपको यह लाभ मिलेगा कि पिछले वर्जन की कीमत काफी नीचे आ जाएगी; यह आपके लिए खासतौर से तब बेहतर होगा जब आपकी जेब बहुत सीमित होगी क्योंकि ऐसी स्थिति में शायद वो मॉडल भी आपकी जेब में आ जाए जो पहले नहीं आ पा रहा था। और यदि बिलकुल नवीनतम मॉडल लेने की इच्छा नहीं है या कोई जल्दी नहीं है तो किसी भी नए मॉडल के बाज़ार में आने के पश्चात दो-तीन महीने प्रतीक्षा करना समझदारी होगी, इससे आपको पता चल जाएगा कि कैमरा ठीक है या फुस्स है। जल्दबाज़ी में की गई खरीद पर अक्सर पछताना पड़ जाता है और जब बात पंद्रह-बीस हज़ार रूपए या अधिक की हो तो गलती महँगी भी साबित होती है।

अगले भाग में जारी …..

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डोमेन कैसा लें और कहाँ से लें …..

June 23, 2007 · 8 Comments

श्रीश ने कहा कि डोमेन आदि कैसे लें इस पर मैं एक लेख लिखूं तो आज समय मिलने पर मैंने सोचा कि चलो इस काम को भी निपटा दिया जाए। ;) वैसे मैंने इस पर कोई दो वर्ष पहले अंग्रेज़ी में लिखा था - Shopping for a Domain? How to? - तो सोचा कि उसी से माल मसाला लेकर आज के हिसाब से अपडेट कर छाप देते हैं!! ;) तो प्रस्तुत है जो मुझसे बन पाया। :)

क्या आप अपनी निजी या शौकिया या व्यवसायिक वेबसाइट के लिए डोमेन लेने की सोच रहे हैं? यदि हाँ और यदि इससे पहले कभी आपने डोमेन नहीं लिया है तो जेब ढीली करने से पहले इस संबन्ध में जानकारी प्राप्त करना आपके हित में है। पहला कदम सोच-समझ कर उठाना लाभकारी भविष्य की निशानी होता है। :)

आपका डोमेन इंटरनेट पर ठीक उसी तरह है जिस तरह वास्तविक दुनिया में आपके घर/ऑफिस का पता। आप लोगों पर अच्छा प्रभाव डालना चाहते हैं, आप नहीं चाहते कि लोग आपके बारे में गलत राय कायम करें। इसलिए आप यथासंभव किसी अच्छे मोहल्ले या ऑफिस कॉम्पलेक्स में अपना घर/ऑफिस कायम करते हैं। यही बात आपके डोमेन पर भी लागू होती है, वह भी अच्छा होना चाहिए। आपका डोमेन आकर्षक होना चाहिए ताकि लोग उसके प्रति आकर्षित हों। वह