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ब्लॉग - समाज के लिए उनका क्या महत्व है?

February 8, 2008 · 2 Comments

पिछले माह, 12 जनवरी 2008 को, हुई दिल्ली ब्लॉग एण्ड न्यू मीडिया सोसायटी (Delhi Blog and New Media Society aka DBNMS) द्वारा आयोजित प्रथम ब्लॉगर भेंटवार्ता काफ़ी सफ़ल रही। बहुत से लोगों ने यह भी हमें बताया कि वह भेंटवार्ता उनके लिए काफ़ी ज्ञानवर्धक रही, उनको कई बातों की जानकारी मिली और अन्य ब्लॉगरों से मिलने का अवसर तो मिला ही। दिल्ली ब्लॉग एण्ड न्यू मीडिया सोसायटी (Delhi Blog and New Media Society) के पीछे एक उद्देश्य यह भी है कि ब्लॉगर भेंट सिर्फ़ चाय-कॉफी और गपशप तक ही न सीमित रहें बल्कि हम ब्लॉगर लोग जब मिलें तो अलग-२ विषयों पर कुछ सार्थक चर्चा भी करें और एक दूसरे से सीखें भी, इसलिए Be Relevant का नारा लगाया गया था। :)

तो इसी प्रयास को आगे बढ़ाते हुए इस माह, 14 फरवरी 2008 को, एक और ब्लॉगर भेंटवार्ता आयोजित की जा रही है। यह पिछली बार की तरह लंबा चौड़ा कार्यक्रम न होगा, मात्र दो घंटे का कार्यकरम सांयकाल में होगा जिस पर ब्लॉगों और समाज के लिए उनके महत्व पर चर्चा की जाएगी। सिलसिलेवार जानकारी निम्न है:

चर्चा का विषय: ब्लॉग और समाज के लिए उनका महत्व
स्थान: गुलमोहर हॉल, इंडिया हैबिटाट सैन्टर (India Habitat Center), लोधी रोड, नई दिल्ली
तिथि: 14 फरवरी 2008
समय: सांयकाल 6:30 से 8:30
रूपरेखा: ब्लॉगर्स/चिट्ठाकारों ने विश्व भर में अपनी एक पहचान कायम की है और भारत में भी यह हो रहा है जैसा कि हालिया पिछले समयकाल में विदित हुआ है। अब इसी पर आगे बढ़ते हुए ब्लॉगर/चिट्ठाकार नागरिक पत्रकार(citizen journalists) की अपनी भूमिका निभाने के लिए क्या कर सकते हैं? इसी पर चर्चा की जाएगी एक संवादात्मक सत्र में जिसको निम्न भागों में विभाजित किया गया है:

  1. उन वाकयों के उदाहरण जहाँ ब्लॉगर्स/चिट्ठाकारों के कारण बदलाव आए हैं
  2. पत्रकारिता के श्रेष्ठ सिद्धांत जिनका ब्लॉगर्स/चिट्ठाकारों पालन कर सकें
  3. कैसे ब्लॉगर/चिट्ठाकार इस सब पर एक साथ कार्य कर सकते हैं

आमंत्रित: इस भेंटवार्ता में सभी आमंत्रित हैं, वे भी जो मौजूदा ब्लॉगर/चिट्ठाकार हैं और वे भी जो ब्लॉगर/चिट्ठाकार बनना चाहते हों और वे भी जो ब्लॉग पाठक हैं।

इस भेंटवार्ता और सभा में भाग लेने का कोई शुल्क नहीं है, केवल आपको समय निकाल इसमें पधारना मात्र है और चर्चा में भाग लेना है क्योंकि यह आपकी अपनी भेंटवार्ता है और अपनी चर्चा है।

यदि अपने आने की पुष्टि/कन्फर्मेशन यहाँ टिप्पणी के रूप में दे देंगे तो हम लोगों को भी अंदाज़ा रहेगा कि कितने साथी लोग शिरकत करने वाले हैं। यदि कन्फर्मेशन नहीं भी देंगे तो भी आपका स्वागत है, इस भेंटवार्ता में शिरकत करने और भाग लेने के लिए कन्फर्मेशन देना अनिवार्य नहीं है। :)

तो मिलेंगे 14 फरवरी 2008 को सांयकाल साढ़े छह बजे लोधी रोड(नई दिल्ली) स्थित इंडिया हैबिटाट सैन्टर (India Habitat Center) के गुलमोहर हॉल में। :)

 
अधिक जानकारी के लिए यहाँ देखें
 

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ब्लॉगर भेंटवार्ता टेलीविजन पर …..

February 7, 2008 · 5 Comments

पिछले माह, 12 जनवरी 2008, हुई दिल्ली ब्लॉग एण्ड न्यू मीडिया सोसायटी (Delhi Blog and New Media Society aka DBNMS) द्वारा आयोजित प्रथम ब्लॉगर भेंटवार्ता काफ़ी सफ़ल रही। बहुत से साथी ब्लॉगरों और ब्लॉग इच्छुकों और उत्सुकों ने इसमें भाग लेकर इस भेंट को सफ़ल बनाया। अपने हिन्दी ब्लॉगजगत से भी कई बंधुओं ने शिरकत कर मेरी इस सोच को मज़बूत किया कि ब्लॉगर चाहे कैसा हो और चाहे किसी भी भाषा में लिखता हो परन्तु होता वह ब्लॉगर ही है इसलिए हम इस ब्लॉगजगत में क्षेत्र अथवा भाषा के मापदंड पर बंटवारा नहीं करेंगे। :)

मीडिया में भी इस ब्लॉगर भेंटवार्ता को काफ़ी कवरेज मिली और ब्लॉगजगत तथा ब्लॉगरों के बारे में खबर दूर-२ तक पहुँची। इससे अपेक्षित है कि ब्लॉगिंग का मर्ज़ बहुतों को अपनी चपेट में लेगा। :)

भेंटवार्ता से एक दिन पहले अंग्रेज़ी के हिन्दुस्तान टाइम्स की अनुपूरक पत्रिका एचटी सिटी(HT City) के मुख्यपृष्ठ पर भेंटवार्ता संबन्धित यह लेख छपा था। हालांकि इसमें पत्रकार/लेखिका से एक त्रुटि हो गई और अंत में वेबसाइट के पते में वो delhi लगाना भूल गई, असल वेबसाइट www.delhibloggers.in है। एनडीटीवी (NDTV) ने इस पूरी भेंटवार्ता को कवर किया था और पत्रकार गरिमा दत्त ने एनडीटीवी (NDTV) की वेबसाइट पर भेंटवार्ता के अगले दिन यह लेख छापा। सिर्फ़ छापे वाले मीडिया में ही नहीं, टेलीविजन पर भी इसकी कवरेज दिखाई गई।

एनडीटीवी 24×7 (NDTV 24×7) पर दिखाई गई न्यूज़ बाइट

यूट्यूब पर इस वीडियो को यहाँ देखें। वीडियो को FLV रूप में यहाँ डाउनलोड करें

एनडीटीवी मेट्रोनेशन (NDTV Metronation) पर दिखाई गई न्यूज़ बाइट

यूट्यूब पर इस वीडियो को यहाँ देखें। वीडियो को FLV रूप में यहाँ डाउनलोड करें

एनडीटीवी मेट्रोनेशन (NDTV Metronation) पर दिखाई गई विस्तृत कवरेज

यूट्यूब पर इस वीडियो को यहाँ देखें। वीडियो को FLV रूप में यहाँ डाउनलोड करें

मीडिया में इस कवरेज का लाभ सीधे ही दिखा। जहाँ कई लोग हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले दिन छपे लेख के कारण भेंटवार्ता में आए वहीं कुछ लोग बाद में एनडीटीवी (NDTV) पर इसकी कवरेज देख कर समूह से जुड़े और अपने ब्लॉग बनाए। भेंटवार्ता के अगले ही दिन एनडीटीवी (NDTV) पर प्रसारित बर्खा दत्त के We The People कार्यक्रम का मुद्दा भी ब्लॉग ही थे। मतलब साफ़ है, मीडिया भी अब खुले रूप से ब्लॉगों पर ध्यान दे रहा है, और यह अच्छा भी है क्योंकि इससे जल्द ही यह भ्रम(जो कि बहुत लोग पाले हुए हैं) टूटेगा कि ब्लॉग मुख्यधारा मीडिया की जगह ले सकते हैं, दोनों एक दूसरे के सहायक/पूरक हो सकते हैं लेकिन दोनों की अपनी-२ पहचान और स्थान है।

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तेरा क्या होगा रे याहू??

February 2, 2008 · 4 Comments

भईये टैम बोत खराब है! हाँ यदि आपने याहू (Yahoo!) के शेयर खरीद रखे हैं या फिर आप याहू के कर्मचारी हैं तो वाकई आपके लिए खराब टैम है। क्यों? अरे भांग खा के कहीं सो रहे थे का भई? याहू अपनी विश्वव्यापी 14300 कर्मचारियों की फौज में से लगभग 1000 कर्मचारियों को सेवा-निवृत्त करने की सोच रिया है ताकि अपने घटते मुनाफ़े में कुछ जोड़ सके। कैसे? अरे इस तरह इतनी बड़ी सेवा-निवृत्ति से याहू के सालाना खर्च में 10 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक की कमी आएगी और इस समय तो एक-एक डॉलर उसके लिए कीमती है क्योंकि मुनाफ़ा लगातार नीचे जाने वाली लिफ्ट पर सवार है। (अंग्रेज़ी में खबर यहाँ पढ़ें)

तो अब ऐसी हालत होने पर अनुमान लगाया जा रहा है कि याहू के पास दो ही रास्ते बचते हैं; या तो बिक जाए या फिर अपनी सर्च सुविधा को किनारे लगा गूगल की सर्च का हाथ थामे और उसके ज़रिए विज्ञापनों द्वारा डॉलर कमाए तथा अपनी हाल ही में खरीदी जायदादों को डॉलर बनाने की मशीनों में कन्वर्ट करे। अब पहले रास्ते को अपनाने से याहू के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स की सिरदर्दी तो खत्म हो जाएगी(खरीदने वाली कंपनी को बतौर बोनस में दे देंगे ना) और यदि दूसरे रास्ते को अपनाता है तो काफ़ी मेहनत करनी होगी, बहुत ज़्यादा मेहनत!!

खैर, ऐसे माहौल में अटकलों का बाज़ार पुनः गर्म हो गया है। यह मान के चला जा रहा है कि याहू तो बिकेगा ही बिकेगा, उसके पास और कोई रास्ता नहीं। ऐसे में अनुमान लगाए जा रहे हैं कि कौन आखिरकार बोलेगा या ऽऽऽऽ हू ऽऽऽऽऽ (शम्मी कपूर साहब नहीं, उनका तो टैम निकल गया, जब बोलना था तब बोल लिए, आजकल तो ईश्वर भजन में लगे रहते हैं, टैम जो आ रहा है मीटिंग का)। माइक्रोसॉफ़्ट को सबसे बड़ा दावेदार माना जा रहा है, बल्कि खबर यहाँ तक है कि माइक्रोसॉफ़्ट की ओर से 44.6 अरब अमेरिकी डॉलर में याहू को खरीदने की पेशकश हुई है। (अंग्रेज़ी में खबर यहाँ पढ़ें)

गौरतलब है कि कुछ समय पहले माइक्रोसॉफ़्ट ने याहू को 40 अरब अमेरिकी डॉलर में खरीदने की पेशकश की थी जिस पर याहू के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने 80 अरब अमेरिकी डॉलर की माँग की थी, यानि कि अन्य शब्दों में बिकने से मना कर दिया था। वैसे कुछ लोग गूगल को भी याहू की खरीद का एक प्रबल दावेदार मान रहे हैं। वैसे भी मुख्य दो खिलाड़ी यही दोनों हैं, तीसरा तो कोई दिखाई नहीं देता जिसकी इतने डॉलर अदा कर खरीदने की औकात हो!! गूगल के हाल भी कोई बहुत ज़्यादा अच्छे नहीं हैं, इसलिए हो सकता है कि वो याहू की खरीद में उस कारण या किसी अन्य कारण रुचि न दिखाए। परन्तु यदि माइक्रोसॉफ़्ट याहू को खरीदने में सफ़ल होता है तो यह माइक्रोसॉफ़्ट के लिए अभी तक का सबसे बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकता है क्योंकि माइक्रोसॉफ़्ट की भी इंटरनेट के बाज़ार में बैन्ड बजी हुई है और वह येन-केन-प्रकारेण अरबों डॉलर के इस केक में अपना बड़ा सा हिस्सा पाने की यथा संभव कोशिश में है। तकनीकी के बाज़ार में भी यह अभी तक की सबसे बड़ी बिक्री होगी, इससे पहले अभी तक की सबसे बड़ी बिक्री सन्‌ 2002 में हुई थी जब हेवलेट्ट पैकर्ड ने कंप्यूटर बनाने वाली कंपनी कॉम्पैक को 25 अरब अमेरिकी डॉलर में खरीदा था।

तो अब देखना यह है कि याहू इस संकट से पहले की भांति येन-केन-प्रकारेण बच निकलता है या इस बार वाकई कोई उसकी गिल्ली खरीद लेगा। ;)

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लीगल डोमेन माफ़िया

January 29, 2008 · 11 Comments

आपने काला-बाज़ार के बारे में तो सुना ही होगा कि कैसे किसी वस्तु की माँग बढ़ती दिखती है तो साहूकार अपने गोदाम भर लेते हैं और जब बाज़ार में माल मिलना बंद हो जाता है तो वे मन-माफ़िक दामों पर बेचते हैं। साथ ही दो नंबर वाले प्रॉपर्टी डीलरों के बारे में भी सुना होगा जो कि उस प्रॉपर्टी पर आपसे पहले कब्ज़ा कर लेते हैं जिस पर आपकी निगाह होती है और फिर आपको ऊँचे दाम पर बेचने की पेशकश करते हैं।

इंटरनेट की वर्चुअल दुनिया में एक ही प्रकार की प्रापर्टी होगी है, डोमेन नाम। यह ठीक वैसे ही है जैसे आपने किसी शहर-गाँव में कोई ज़मीन खरीद ली या लंबी अवधि के लिए किराए पर ले ली। डोमेन नाम को आप खरीदते नहीं हैं वरन्‌ सालाना लीज़(lease) पर लेते हैं जिसके तहत आप प्रति वर्ष उसका भाड़ा चुकाते हैं ताकि वह डोमेन आपके पास बना रहे और आप उसका जैसे चाहें वैसे प्रयोग करते रहें। डोमेन नाम एक भू-खंड की तरह है और जो आप उस पर वेबसाइट बनाते हैं वह किसी इमारत की तरह जिसमें चाहे तो आप स्वयं रहें या उस इमारत को होटल या ऑफिस आदि में बदल उससे नोट कमाएँ।

ज़मीन खरीदने से पहले आप देखते हैं कि आपको कहाँ ज़मीन लेनी है, कौन सी जगह लेना सही रहेगा, कहाँ सस्ती और अच्छी मिलेगी। और फिर आप या तो सीधे ज़मीन के मालिक से खरीदते/किराए पर लेते हैं अथवा किसी दलाल के द्वारा। डोमेन लेने में भी कुछ-२ ऐसा ही होता है, आप ढूँढते हैं कि आपके मनपसंद नाम वाला डोमेन उपलब्ध है कि नहीं; यदि उपलब्ध है तो आप किसी एक दलाल(रजिस्ट्रार - registrar) से उसको किराए पर ले लेते हैं और यदि डोमेन उपलब्ध नहीं तो उसके मौजूदा मालिक से संपर्क कर उसको पाने का प्रयास करते हैं। यहाँ तक तो ठीक है, यह सामान्य प्रक्रिया है। यदि आपका वांछित डोमेन उपलब्ध है तो आप किसी भी रजिस्ट्रार से उसको ले सकते हैं और कोई बंदिश नहीं कि आपने जिस रजिस्ट्रार के द्वारा डोमेन ढूँढा उसी से आपको लेना होगा, परन्तु यदि जिस रजिस्ट्रार के द्वारा आपने डोमेन ढूँढा वह आपके ढूँढते ही उस डोमेन पर कब्ज़ा कर ले तो आपके पास फिर सिर्फ़ उसी रजिस्ट्रार से डोमेन लेने का विकल्प होगा। और इस बात की कोई गारंटी नहीं कि आपने यदि तुरंत डोमेन नहीं लिया और एकाध दिन बाद लेने आए तो वह रजिस्ट्रार उस डोमेन के आपसे ज़्यादा पैसे नहीं माँगेगा।

डोमेन नाम बेचने के धंधे में वैसे भी रजिस्ट्रारों यानि कि दलालों की उतनी कमाई नहीं रह गई है जितनी पहले हुआ करती थी। आज बहुत की कम मार्जिन पर रजिस्ट्रार डोमेन आगे ग्राहकों को दे रहे हैं क्योंकि गला-काट प्रतियोगिता है बाज़ार में। इसी के चलते ऐसे बहुत से रजिस्ट्रार हैं जो पहले बाज़ार के बड़े खिलाड़ी होते थे और आज जिनको पूछने वाला कोई नहीं क्योंकि उन्होंने अपने को बाज़ार में बनाए रखने के लिए अपने दाम कम नहीं करे हैं और पहले जैसे ही ऊँचे दाम बनाए रखे हैं। ऐसे ही गिरते रजिस्ट्रारों में से एक है नेटवर्क सॉल्यूशन्स जो कि शुरुआती दिनों में बहुत बड़ा फन्ने खाँ हुआ करता था लेकिन आज इसको कोई नहीं पूछता। क्यों? अरे जब दुनिया भर के रजिस्ट्रार पाँच-पाँच सौ रूपए में डोमेन दे रहे हैं तो कोई इससे तीन गुणा से अधिक दाम पर क्यों लेगा? आप कहेंगे कि सर्विस क्वालिटी तो जनाब इससे काफ़ी बेहतर सर्विस देने वाले रजिस्ट्रार इसके दाम के एक-तिहाई में डोमेन दे रहे हैं!! यह रजिस्ट्रार बाकी रजिस्ट्रारों की तरह आपको पाँच सौ रूपए प्रति वर्ष का भाव तब देगा जब आप इससे सौ वर्षों का अनुबंध करेंगे और पूरा भुगतान एडवांस में करेंगे। यदि आंकड़े कुछ कहते हैं तो यह देखिए:

निम्न है सूचि जो दर्शाती है अभी तक सबसे अधिक डोमेन बेचने वाले रजिस्ट्रार

इसमें नेटवर्क सॉल्यूशन्स तीसरे नंबर पर सिर्फ़ इसलिए बना हुआ है क्योंकि यह सबसे पुराने रजिस्ट्रारों में से एक है और शुरुआती दिनों में इसके द्वारा बहुतों ने डोमेन लिए थे। लेकिन अन्य कुछ आंकड़े तस्वीर साफ़ करेंगे।

निम्न सूचि दर्शाती है आज के समय के तेज़ी से बढ़ते शीर्ष 15 रजिस्ट्रार और उनके लाभ और हानि को

अब यह सूचि में आपको गोडैडी और इनोम रजिस्ट्रार शीर्ष पर ही दिखेंगे क्योंकि ये बाज़ार के साथ चलते हैं और सेवा की गुणवत्ता के साथ-२ अपने दाम भी बाज़ार के अनुसार रखते हैं इसलिए लोग इनसे लेना पसंद करते हैं। गोडैडी सीधे ग्राहक को बेचने में यकीन रखता है जबकि इनोम से आप सीधे खरीदें तो महँगा पड़ेगा लेकिन इसके विक्रेता दुनिया भर में हैं जिनसे आप काफ़ी सस्ते में खरीद सकते हैं। नेटवर्क सॉल्यूशन्स की खामी यह है कि उससे सीधी खरीद तो महँगी है ही, उसके विक्रेता भी उतने ही महँगे हैं क्योंकि वह विक्रेताओं को इतना मार्जिन नहीं देता कि विक्रेता खुद उसके रेट से कम में बेच सकें। अब यदि नेटवर्क सॉल्यूशन्स का हाल इस सूचि में देखना है तो वह निम्न है।

853वें स्थान पर मौजूद नेटवर्क सॉल्यूशन्स घाटे में है, यानि कि बाज़ार में उसका हिस्सा कम होता जा रहा है और उसके द्वारा रजिस्टर हुए डोमेन संख्या में कम होते जा रहे हैं। अधिक जानकारी हमको निम्न सूचि देती है।

इस आखिरी सूचि से अंदाज़ा होता है इस गिरते हुए रजिस्ट्रार के हाल का।

तो अब आप सोचेंगे कि यहाँ तक तो ठीक है, ऊपर-नीचे तो धंधे में लगा ही रहता है लेकिन इसका काला-बाज़ारी आदि से क्या लेना देना जिसका ज़िक्र मैंने पोस्ट के शुरु में किया था!! है, उसका ही संबन्ध लगता है अपने को तो। हर आईकान(ICANN) द्वारा सर्टिफाईड रजिस्ट्रार किसी भी डोमेन नाम को फोकट में अपने पास 3-4 दिन रख सकता है। वह चाहे तो इस अवधि के पश्चात डोमेन पर अपना हक छोड़ सकता है और इस तरह उसको कोई पैसे नहीं देने होंगे परन्तु यदि इस अवधि के बाद भी वह डोमेन नहीं छोड़ता तो डोमेन रजिस्ट्री को उसे उस डोमेन का शुल्क देना होगा। तो नेटवर्क सॉल्यूशन्स गेम यह खेल रहा है कि यदि आप कोई डोमेन नाम उसके पास ढूँढते हैं तो यदि वह उपलब्ध है तो नेटवर्क सॉल्यूशन्स उसको पकड़ लेता है जिस स्थिति में यदि आपको ढूँढे हुए नामों में से कोई नाम चाहिए तो वह आपको नेटवर्क सॉल्यूशन्स से ही लेना होगा और अन्य किसी रजिस्ट्रार से नहीं ले सकते!! यह नाम नेटवर्क सॉल्यूशन्स पूरे चार दिन तक पकड़ के बैठेगा और उसके बाद छोड़ देगा। और यदि आप एकाध दिन बाद ढूँढे गए नामों में से किसी को रजिस्टर कराने पहुँचते हैं तो यह इस बात का संकेत है कि वह डोमेन आपके लिए महत्वपूर्ण है, इसलिए नेटवर्क सॉल्यूशन्स उसके ऊँचे दाम भी माँग सकता है। साथ ही इस बात की कोई गारंटी नहीं कि वह इस तरह पकड़े गए नामों की सूचि आदि आगे किसी को नहीं बेच रहा।

डोमेन नामों की स्पेक्यूलेशन आदि और पकड़ के खरीद-फरोख्त करोड़ों रुपए सालाना का बाज़ार है। यह ठीक वैसा है जैसे भूमि व्यापार या कह लीजिए शेयर बाज़ार जहाँ आप अंदाज़ा लगाते हैं कि कौन सी जगह पर कौन सा भूमिखंड अथवा कौन सी कंपनी का शेयर ऊँचा उठेगा और कितना उठेगा और उसके अनुसार आप खरीद-फरोख्त करते हैं ताकि दाम ऊँचा होने पर बेच सकें। डोमेन का व्यापार भी कुछ ऐसा ही है, डोमेन व्यापारी दम-खम रखने वाले अच्छे नामों को खोजते हैं और उनको रजिस्टर कर लेते हैं और फिर उनको ऊँचे दामों में बेचते हैं और जब-तक अपने पास रखते हैं तब तक उनसे विज्ञापनों आदि द्वारा कमाई भी करते हैं।

अभी तक नेटवर्क सॉल्यूशन्स पर सिर्फ़ शक जा रहा था कि वह अपने यहाँ ढूँढे गए नामों को पकड़ के बैठ रहा है लेकिन अब साफ़ हो गया है जब वह सीधे ही सीना ठोक के हामी भरता है कि वह ऐसा कर रहा है (अंग्रेज़ी में खबर यहाँ पढ़ें)। इस तरह 4-5 दिन के लिए डोमेन पर कब्ज़ा करने के बारे में आईकान(ICANN) की फिलहाल कोई स्पष्ट नीति नहीं है जो इस रजिस्ट्रार को या ऐसे किसी अन्य रजिस्ट्रार को रोक सके। कहने को तो इस विषय पर नेटवर्क सॉल्यूशन्स के नीति बनाने वाली समिति के उप-अधिपति(Vice President of Policy), जॉनथन नेवेट्ट, ने कहा कि उनका इरादा सिर्फ़ इतना है कि यदि कोई ग्राहक अपने लिए डोमेन खोजता है और एकाध दिन बाद आकर उसको पाने की कोशिश करे तो उसको वह प्राप्त हो सके और कोई अन्य उसको न ले उड़े (अंग्रेज़ी में खबर यहाँ पढ़ें) लेकिन यह महज़ एक बकवास के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। डोमेन रजिस्ट्रेशन पहले आया पहले ले गया (First Come First Served) की तर्ज पर होता है, यदि आपके किसी ट्रेडमार्क का डोमेन नहीं है तो आपके खोजने भर से ही आपका उस पर हक नहीं हो जाता कि कोई और न ले सके। और नेटवर्क सॉलूशन्स की ओर से यह बकवास ही है कि वे अपने ग्राहक के लिए डोमेन सुरक्षित कर रहे हैं ताकि दोबारा आने पर उनको मिल सके, क्योंकि कोई गारंटी नहीं है कि कोई अन्य व्यक्ति आकर उनसे डोमेन नहीं ले जाएगा!! वे सिर्फ़ अनैतिक तरीके से अपनी दलाली सुरक्षित करने का प्रयास कर रहे हैं; डोमेन चाहे कोई ले जाए लेकिन उन्हीं से लेकर जाए और रोकड़ा उनकी जेब में ही आए!!

यह तो सीधे-२ अपनी ताकत का गलत लाभ उठा बाज़ार में अपनी दलाली जबरन हासिल करने का एक टुच्चा तरीका है जो कि एक तरह से इस ओर लोगों का विश्वास मज़बूत ही करता है कि नेटवर्क सॉल्यूशन्स वाकई तेज़ी से नीचे जा रहा है और इसी के चलते तरह-२ के हथकंडे अपनाने से परहेज़ नहीं करेगा। साथ ही वह ग्राहकों पर से अपना विश्वास समाप्त कर रहा है, इस बात की क्या गारंटी रह जाएगी कि कल को वह किसी के डोमेन में घपला नहीं कर देगा? आईकान(ICANN) की नीतियों में बहुत लफ़ड़े हैं बहुत झोल हैं और कोई भी समझदार उनके दाएँ-बाएँ जाकर अपना उल्लू सीधा कर सकता है। और जो एक बार गलत कार्य कर सकता है वह पुनः भी कर सकता है, नेटवर्क सॉल्यूशन्स ने यह तो दिखा ही दिया कि वह एक गलत कार्य कर रहा है और सीना ठोक के कर रहा है क्योंकि कानूनी रूप से उसको फिलहाल कोई रोक नहीं सकता!!

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मेगापिक्सल ही मेगापिक्सल

January 26, 2008 · 5 Comments

कोई अपने 7 मेगापिक्सल (megapixel) के डिजिटल कैमरे से खुश है, कोई 8 मेगापिक्सल (megapixel) के डिजिटल कैमरे से, मैं अपने 10 मेगापिक्सल (megapixel) के डिजिटल कैमरे से खुश हूँ, निकोन (nikon) के नए डीएसएलआर (dslr) 12 मेगापिक्सल (megapixel) के आ रहे हैं। कैनन ने हाल ही में अपना सबसे महंगा डीएसएलआर (dslr), 1डीएस मार्क तीन (1ds-Mark III), निकाला 21 मेगापिक्सल (megapixel) का, जिससे वह हैसलब्लॉड (hasselblad) के बाज़ार में टक्कर ले सके।

लेकिन कोई इस सबसे आगे की सोच बैठा और निकल भी गया!! स्विट्ज़रलैन्ड की एक कंपनी, सीएट्ज़ फोटोटेक्नीक, ने अपना 160 मेगापिक्सल (megapixel) का डिजिटल कैमरा निकाल दिया है!!

जी यह मज़ाक बिलकुल नहीं है, यह कैमरा बाज़ार में उपलब्ध है और 60 बाई 170 मिलिमीटर के आकार की 160 मेगापिक्सल (megapixel) की फोटो ले सकता है, प्रत्येक फोटो का भार 900 मेगाबाइट (megabyte) होगा!! यह कैमरा 48 बिट(rgb) की फोटो लेता है और इसमें आप श्नेडर अथवा रोडेनस्टॉक के लेन्स प्रयोग कर सकते हैं। इसकी फोटो लेने की अधिकतम गति सेकन्ड का दो हज़ारवां भाग प्रति पिक्सल है। :D

यदि आप चाहें तो अपने अड़ोस-पड़ोस में सभी की ईर्ष्या के पात्र बन सकते हैं इस कैमरे को खरीद के, अधिक महँगा भी नहीं है, तकरीबन साढ़े चवालिस हज़ार अमेरिकी डॉलर मात्र का है!! ;) अधिक जानकारी के लिए यहाँ देखें

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समस्या….. विश्लेषण….. समाधान…..

January 3, 2008 · 8 Comments

पिछले तीन दिनों से छप रहे कार्टूनों ने कई लोगों की उत्सुकता बढ़ाई है, कईयों ने पूछा कि आखिर कोई सिर पैर तो हो, पता ही नहीं चल रहा कि बात क्या है!! तो जनाब मामला टू द प्वायंट प्रस्तुत है।

समस्या
समस्या ये है कि ब्लॉग की गाड़ी आगे ही नहीं बढ़ रही। मैं अपनी बात नहीं कर रहा, मैं एक आम बात कर रहा हूँ। ब्लॉग एग्रीगेटरों से सिर्फ़ हम ब्लॉगरों की ही आवश्यकताएँ पूरी हो रही हैं कि हमको दर्जनों ब्लॉगों पर जाकर देखने की बजाय एक जगह ही सूचना मिल जाती है। दरअसल एग्रीगेटरों का यही काम है और अपने काम को वो बखूबी अंजाम दे रहे हैं। लेकिन इसके आगे भी कोई जहान है या यही आखिरी स्टेशन है? मेरा और कई अन्य साथी ब्लॉगरों का मानना है कि आगे जहान और भी है। ब्लॉगों की तादाद तेज़ी से बढ़ रही है, यह एक अच्छी बात है, लेकिन एक समस्या अब जो आ रही है(जिसको कुछ दूरदर्शी साथियों ने काफ़ी पहले देख लिया था) वह यह कि माल की तादाद बढ़ी लेकिन उसको हज़म करने का समय नहीं बढ़ा, सब कुछ हर कोई नहीं डकार सकता तो कैसे मनपसन्द माल चुना जाए? और दूसरे यह कि ब्लॉगरों की जमात के बाहर ब्लॉगों की कितनी पैठ हो रही है? कुछ खास नहीं और मैं समझता हूँ कि कई लोग इस बात से सहमत भी नज़र आएँगे। बहुत से उम्दा लेखक हैं जो एक से बढ़कर एक धांसू आइटम लिखते हैं लेकिन पाठकों तक सही पहुँच न होने के कारण न तो उनको बहुत लोग पढ़ पाते हैं और लोग-बाग भी वंचित रह जाते हैं।

विश्लेषण (analysis)
अब यदि समस्या को समझा जाए, तो एक बात उभर कर सामने आती है - प्रचार(marketing)। जिस ब्लॉग का जितना अच्छा प्रचार हुआ हो उसके पाठक उसके अनुसार ही होते हैं। ध्यान रहे कि बात यहाँ मसौदे की नहीं है; माल की गुणवत्ता पाठक को दोबारा आने को प्रेरित करेगी लेकिन बात यहाँ उसको पहली बार लाने की हो रही है। जब वह पहली बार ही नहीं आएगा, जब उसको पता ही नहीं होगा कि फलां जगह माल मिलता है तो माल अच्छा हो या बुरा इससे क्या फर्क पड़ता है, वह तो आगे सरका ही नहीं। अब हर कोई नाई नहीं होता, कोई बढ़ई भी होता है तो कोई ग्वाला भी; कहने का अर्थ है कि हर किसी को हर काम में महारत हासिल नहीं होती। तो इसी तरह, कुछ लोग जो कि प्रचार के फंडे जानते हैं वे तो अपने माल का प्रचार ठीक-ठाक या बढ़िया तरीके से कर लेते हैं, लेकिन जो लोग इस सब से नावाकिफ़ हैं वे क्या करें? आज के समय का नियम है कि सिर्फ़ माल अच्छा होना ही काफ़ी नहीं है, उसको आगे सही ढंग से सरकाना भी आवश्यक है अन्यथा चाहे लाख टके का माल हो उसकी औकात दो टके की नहीं रह जाती।

दूसरा मुद्दा समय का है और यह भी बहुत बड़ा मुद्दा है। ब्लॉगों की संख्या में तो दिन दुनी रात चौगुनी तरक्की हो रही है लेकिन पाठकों(यदि दूसरों के ब्लॉग पढ़ते हैं तो हम ब्लॉगर भी पाठक गण में आते हैं) के समय में इस तरह इजाफ़ा नहीं हो रहा है, बल्कि बहुत से मामलों में ब्लॉग आदि पढ़ने का समय कम ही हो रहा है। तो ऐसे में सभी को पढ़ना तो दूर, मनपसन्द लेखकों को ही पढ़ने में दिक्कत हो जाती है।

समाधान
अब हम कुछ ब्लॉगरों(दिल्ली ब्लॉगर समूह के सदस्यों) ने इस सबका यह समाधान सोचा कि कुछ ऐसा किया जाए कि ब्लॉगों की समीक्षात्मक नज़रिए से पोस्ट दिखाई जाए। इस बात को लेकर हिन्दी ब्लॉगजगत के कई साथी ब्लॉगरों ने अपने-२ विचार समय-२ पर रखे हैं जिनमें श्रेणियों में ब्लॉग रखने से लेकर समीक्षा तक के उपाय सुझाए गए हैं। कुछ इसी की तर्ज पर चिट्ठाचर्चा भी अनूप जी और अन्य साथी लोग चलाते आए हैं। लेकिन हम लोगों ने सोचा कि ब्लॉग को किसी एक या अन्य श्रेणी में क्यों रखा जाए, एक विषय आधारित ब्लॉग हो तो अलग बात है लेकिन बहुत से साथी एक ही ब्लॉग पर कई विषयों पर लिखते हैं तो इसलिए ब्लॉग को श्रेणियों में रखने के स्थान पर क्यों न प्रत्येक पोस्ट को श्रेणियों में रखा जाए। इससे पाठकों को चुनाव करने में आसानी होगी कि उनको क्या पढ़ना है और क्या नहीं, यानि कि उनके समय का सदुपयोग होगा और वे वही पढ़ेंगे जो वे पढ़ना चाहते हैं। यह कार्य ऑटोमैटिक तरीके से करने की जगह यदि जीते-जागते मनुष्यों द्वारा किया जाए तो गुणवत्ता की दर अधिक होगी ऐसा हम लोगों का मानना है, इसलिए स्वयंसेवकों के दल होंगे जो यह सब कार्य देखेंगे और सिर्फ़ हमारे जैसे ऐरे गैरे नत्थू खैरे ही नहीं बल्कि कई नामी ब्लॉगर भी इस प्रयास से जुड़े रहेंगे और हमारा हाथ बंटाएँगे।

यह तो हुआ समय वाली समस्या का समाधान, लेकिन प्रचार वाली बात का क्या? तो उसके लिए हमारे साथ है एक प्रोफेशनल पब्लिक रिलेशन्स और मार्केटिंग कंपनी जो कि कई बड़ी और नामचीन कंपनियों की मार्केटिंग आदि देखती है। यह प्रोफेशनल मार्केटिंग कंपनी इस प्रयास(वेबसाइट) का प्रचार करने का कार्य करेगी। वेबसाइट का प्रचार होगा तो उम्दा छंटे हुए लेखों तक बढ़ते पाठकों की पहुँच बनेगी और जिस कारण ब्लॉग लेखकों को लाभ मिलेगा, उनके ब्लॉग पर ट्रैफिक बढ़ेगा और यदि उन्होंने अपने ब्लॉग पर विज्ञापन आदि लगा रखे हैं तो आय की संभावना भी बढ़ेगी। जानकार बंधुओं को कदाचित्‌ स्लैशडॉट की याद आ जाए जो कि अंग्रेज़ी के तकनीकी लेखों में एक ऐसी वेबसाइट है जिस पर उम्दा लेखों की जानकारी होती है और लेख के मूल पते का लिंक होता है। स्लैशडॉट के इतने पाठक हैं कि यदि उस पर आपकी वेबसाइट का लिंक आ जाता है तो एक घंटे के अंदर आपका सर्वर ओवरलोड होकर बैठ सकता है, अच्छे अच्छों के सर्वर ऐसे बैठ जाते हैं और इसी लिए इसको स्लैशडॉट इफेक्ट की संज्ञा दी गई।

यह बात बहुतों ने महसूस की होगी कि कई बंधु अच्छा लिखते हैं लेकिन पाठक न मिलने या उत्साहवर्धन न होने के कारण निराश हो लिखना कम कर देते हैं या बंद कर देते हैं; इससे नुकसान लेखक का भी होता है और पाठकों का भी। तो इस सब का एक लाभ यह भी होगा कि गुणवत्ता का आम स्तर बढ़ेगा क्योंकि बहुत से साथी अच्छे से अच्छा लिख ऊपर आने का प्रयत्न करेंगे जिससे पाठकों को भी बढ़िया माल परोसा जाएगा और साथ ही बढ़िया लिख रहे ब्लॉगरों का उत्साहवर्धन भी होगा।

इस तरह का कोई भी प्रयास कितना ही अच्छा क्यों न हो, यदि मौलिक आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए नोट नहीं हैं तो अधिक दिन गाड़ी नहीं चलती। ऐसा मैंने होते हुए भी देखा है और स्वयं भी दो-चार हुआ हूँ। और स्वयंसेवक भी कितने ही उत्साहयुक्त और समर्पित क्यों न हों लेकिन एक समय बाद मामला गड़बड़ाने लगता है। इसलिए इस प्रयास का व्यवस्थित तरीके से आयस्रोत भी होगा ताकि सर्वर आदि के खर्चे तो निकलते ही रहे साथ ही परिश्रमी स्वयंसेवकों को कुछ पारिश्रमिक मिल सके। साथ ही समय-२ पर प्रतियोगिताएँ आयोजित करने एवं अन्य बंधुजनों द्वारा आयोजित प्रतियोगिताओं को सपोर्ट कर योग्य ब्लॉगरों आदि को पारितोषिकों से नवाज़ने की भी गुंजाइश बन सके।

इसी के चलते आपको दे रहा हूँ यह निमन्त्रण

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ऐडसेन्स या नॉनसेन्स? - भाग २

December 3, 2007 · 13 Comments

पिछले भाग से आगे …..

अज्ञानीलाल तो खैर अज्ञानी थे, मृगतृष्णा के पीछे भागे और बहक गए। लेकिन उनके साथ जो हुआ यह कोई आवश्यक नहीं कि हर बहके हुए व्यक्ति के साथ हो, या फिर, सिर्फ़ बहके हुए व्यक्ति के साथ ही हो। एक पुरानी कहावत है:

गेहूँ के साथ घुन भी पिस जाता है

और यह बिलकुल सत्य है, इस संदर्भ में तो बिलकुल से भी बिलकुल सत्य है, अनेकों प्रमाण ढूँढने वाले की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

मस्तलाल एक मस्त व्यक्ति, शौकिया अपना ब्लॉग लिखता और कोई टेन्शन नहीं लेता। गूगल ऐडसेन्स (AdSense) आया तो कौतुहलवश उसने भी अर्ज़ी लगा दी और अर्ज़ी मंज़ूर होकर भी आ गई। फिर कुछ समय बाद न जाने क्या सोच उसने आज़माने की सोची और अपने ब्लॉग पर ऐडसेन्स (AdSense) के विज्ञापन लगा दिए यह सोच कि देखा जाए कितनी कमाई हो सकती है। कुछ दिन बीते, महीना बीता, खाते में सिर्फ़ कुछ सेन्ट ही आए लेकिन मस्तलाल को कोई टेन्शन नहीं। फिर एक दिन ऐडसेन्स (AdSense) वालों की ओर से एक ईमेल आई जिसमें मस्तलाल को सूचित किया गया कि उसकी वेबसाइट पर विज्ञापनों पर खामखा के क्लिक हुए हैं और इसलिए उसका ऐडसेन्स (AdSense) खाता रद्द किया जाता है। मस्तलाल ने कहा भी कि उसने कोई क्लिक नहीं किए हैं और यदि कोई और उसकी वेबसाइट पर आकर एक के बाद एक क्लिक कर देता है तो उसमें उसकी क्या गलती!! लेकिन ऐडसेन्स (AdSense) विभाग में बैठे मूर्ख के पास कदाचित्‌ भाषा का अभाव था इसलिए उसने एक पहले से तैयार झाड़ू छाप उत्तर कॉपी-पेस्ट कर भेज दिया। मस्तलाल तो फिर मस्त बंदा, उसने कहा भाड़ में जाओ और ऐडसेन्स (AdSense) के विज्ञापन ब्लॉग से हटा दिए जो कि खाता रद्द होने के बाद भी उसके ब्लॉग पर आ रहे थे!!!

यानि कि अपना भला स्वयं करना तो बुरा है ही, कोई अन्य भी आपका इसी तरह भला करके जा सकता है!! अज्ञानीलाल और मस्तलाल पात्र बेशक काल्पनिक हैं लेकिन दोनो वाकये काल्पनिक नहीं हैं, ऐसा होता है, हुआ है और होता आ रहा है। यानि कि यदि आपने अपनी वेबसाइट या ब्लॉग आदि पर ऐडसेन्स (AdSense) के विज्ञापन लगा रखे हैं तो कोई व्यक्ति जिसकी आपसे खुन्नस हो वह आकर क्लिकों की झड़ी लगा सकता है और यदि आपकी वेबसाइट औसतन कम क्लिक पैदा करने वाली है तो यह क्लिकों की झड़ी गूगल के अपंग रडार पर तुरंत दिखाई दे जाएगी जिसका सीधा हल उनके पास आपका खाता रद्द करने और आपकी कमाई रकम को जब्त करने के रूप में है। अज्ञानीलाल के वाकये को बेशक मैंने ज़रा अतिश्योक्ति में चित्रित किया लेकिन मस्तलाल(काल्पनिक नाम) वाला वाकया एक वास्तविक व्यक्ति के साथ हुए वाकये का उल्लेख है। और यह सिर्फ़ एक मस्तलाल की कहानी नहीं है, ज़रा गूगल पर ही खोज लीजिए अनेकों ऐसे उदाहरण मिल जाएँगे। अब मैं यह नहीं कह रहा कि ऐडसेन्स से निष्कासित प्रत्येक व्यक्ति सत्य कहता है कि उसने कुछ गलत नहीं किया लेकिन बात यहाँ गेहूँ के साथ पिस रहे घुन की है।

लगता है कि गूगल का मानना है कि जो पकड़ा जाए वह चोर है और हर चोर पैदायशी चोर है

गूगल यहाँ ईश्वर की भूमिका निभा रहा है, जो वह कहे वही सत्य है। उसको कोई प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं है कि आपने कोई गलत कार्य किया, कह देना ही काफ़ी है। आज ऐडसेन्स (AdSense) से अधिक प्रयोग होने वाला शायद ही कोई विज्ञापन नेटवर्क हो। लेकिन कदाचित्‌ ऐडसेन्स (AdSense) विभाग अपने रडार में मौजूद कमियों को सुधारने में न तो यकीन रखता है और न ही कोई रूचि। कदाचित्‌ वह आगे निकल चुके खरगोश की तरह यह सोच बैठा है कि उससे आगे कोई निकल नहीं सकता इसलिए वह आराम कर रहा है, सुस्ता रहा है। हाएपोथेसिस साफ़ है, बड़ी वेबसाइटें जहाँ क्लिकों की भरमार है उनको कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, उनके यहाँ कम-ज़्यादा क्लिक कोई संदेह कदाचित् ही उत्पन्न करें लेकिन छोटी वेबसाइट चलाने वाले पूरे के पूरे खतरे में हैं, उनकी कोई भी वाट लगा सकता है और वाट लगने के बाद अपील तो कर सकते हो लेकिन सुनवाई होगी इसकी संभावना एक प्रतिशत से भी कम है।

और खामखा हुए क्लिकों की तो बात छोड़िए, यदि ईमानदारी वाली कमाई आपके गूगल खाते में है तो तथाकथित बेईमानी वाली कमाई के साथ-२ वह भी छिन जाएगी। क्योंकि लगता है कि गूगल का मानना है कि जो पकड़ा जाए वह चोर है और हर चोर पैदायशी चोर है जिसने चोरी के अतिरिक्त न तो कुछ किया है और न ही कुछ करेगा। कुछ समझ आता है कि इसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ यह है कि इस सिस्टम को बनाने वाले मूढ़ इंजीनियर बहुत अर्से से मशीनों के साथ रहते आए हैं जहाँ ० और १ की ही भाषा चलती है, अन्य कुछ नहीं। कदाचित्‌ मैनेजमेन्ट को चाहिए कि उन बेचारे इंजीनियरों को उनके बाड़े से बाहर निकालें और कुछ समय जीवित मनुष्यों और जानवरों के साथ बिताने दें। साथ ही अपने ज्ञान के दंभ के नीचे दबे उन इंजीनियरों को चाहिए कि सच्चाई का सामना करें, उनका सिस्टम फूलप्रूफ़ नहीं है, इसका कोई भी गेम बजा सकता है। इस बात को न स्वीकारना ठीक वैसा है जैसा पाकिस्तान के हुक्मरानों का यह सोचना कि अमेरिका उसका सगा है और चीन उसके लिए आया खुदाई मददगार!! या फिर शतुरमुर्ग की तरह सोचना कि रेत में मुंडी छुपा लेने के कारण उसको कोई देख नहीं सकता!!

जिन लोगों को इस बात से झटका लगा है उनको यही कहूँगा, साईबरस्पेस में आपका स्वागत है। :) यहाँ पर गूगल एक ऐसा दानव है जिससे पंगा लेकर कोई जीवित नहीं रह सकता। ;)

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ऐडसेन्स या नॉनसेन्स?

December 1, 2007 · 13 Comments

अज्ञानीलाल ने कहीं पढ़ा कि ब्लॉगस्पॉट पर फोकट में ब्लॉग बनाया जा सकता है और उस पर गूगल के ऐडसेन्स (AdSense) वाले विज्ञापन लगा दो और फिर बस बैठकर देखते जाओ, डॉलरों की बरसात हो जाती है। बस फिर क्या था, तुरत-फुरत अज्ञानीलाल ने ब्लॉग बनाया, टशन वाली टेमप्लेट (template) लगाई, थोड़ा इधर से थोड़ा उधर से पोस्ट करने के लिए माल मसाला जुगाड़ा। ऐडसेन्स (AdSense) के खाते की मंजूरी भी थोड़े दिन में आ गई और बस फिर क्या था, अज्ञानीलाल ने पूरे ब्लॉग को विज्ञापनों से सजा दिया और डॉलरों की बरसात की प्रतीक्षा करने लगा। एक दिन बीता, दो दिन बीते, दिन पर दिन बीते, लेकिन एक फूटी कौड़ी भी न आई बेचारे के खाते में। उसने फिर कंप्यूटर के चूहे को दौड़ाया, कुछ क्लिक वगैरह किए और कहीं पढ़ा कि विज्ञापन पर क्लिक होगा तभी कुछ उसका भला होगा। फिर किसी समझदार मित्र ने समझाया कि दूसरे की बाट क्यों देखो कि वह तुम्हारा भला करने आएगा। अज्ञानीलाल को बात जंच गई और उसने अपना भला स्वयं ही करने की सोची। लेकिन पहले उसने इस बात को परखना उचित समझा कि क्या वह अपना भला स्वयं कर सकता था कि नहीं। उसने कुछ क्लिक किए, नतीजा सामने आया, कई डॉलरों की तो नहीं लेकिन कुछ आधे, कुछ पूरे, कुछ चौथाई डॉलरों की एन्ट्री अवश्य हो गई उसके खाते में!!

मामला सैट, अपना भला स्वयं कर सकता था, बस फिर क्या था, लग गया दनादन क्लिक पर क्लिक करने। सुबह उठ दिशा मैदान के बाद थोड़े क्लिक करता, नाश्ता करने के बाद थोड़े क्लिक करता, ऑफिस पहुँच थोड़े क्लिक करता, लंच आननफानन निपटा के क्लिक करता, शाम को बॉस बुलाए तो क्लिक करके जाता, वापस आकर थोड़े क्लिक करता, ऑफिस से निकलने के पहले थोड़े क्लिक, फिर घर पहुँच थोड़े क्लिक, रात्रि भोजन के पश्चात थोड़े क्लिक, लल्लू को होमवर्क कराते समय क्लिक, सोने से पहले थोड़े और क्लिक। समस्या तो उसकी यह थी कि वह नींद में भी क्लिक करता था लेकिन उनकी गिनती नहीं हो पाती थी गूगल के सर्वर पर इसलिए उनसे कुछ हासिल नहीं होता था। खुजली वाला कुत्ता इतनी बार दिन में नहीं खुजाता होगा जितनी बार क्लिकरोग से ग्रसित अज्ञानीलाल एक दिन में क्लिकियाते थे!!

मेहनत का फल मीठा होता है, चाहे देखने में ही मीठा लगे!! अज्ञानीलाल के खाते में सेन्ट दर सेन्ट जुड़ते गए और तकरीबन नब्बे डॉलर जमा हो गए। घर पर क्लिकियाने के बाद अज्ञानीलाल प्रसन्नचित्त मुद्रा में ऑफिस पहुँचे, सोचे कि दिन ढलते-२ गूगल से पहले चेक लायक सौ डॉलर तो बना ही लेंगे, महीने भर का गाड़ी के पेट्रोल का खर्च तो निकल आया समझो। लेकिन ऑफिस पहुँच ईमेल का डिब्बा खोलते ही उनकी कुर्सी के नीचे से मानो ज़मीन निकल गई(अब पैर ज़मीन पर नहीं थे नहीं तो उनके नीचे से भी निकल जाती)!!

काहे? अरे भई ऐडसेन्स (AdSense) विभाग से ईमेलवा आया था और ऊ यह नहीं कह रहा था कि बबुआ अज्ञानीलाल तुहार चेक भेज दिए हैं, ऊ कह रहा था कि बच्चू तुम सेर तो हम सवा सेर, अपना भला स्वयं करने के अपराध में तुहार खाता बंद किया जा रहा है और जमा सभी डॉलर बमय सेन्ट जब्त किए जाते हैं, राम का नाम लो और निकल लो पतली गली से, दोबारा भूल के भी मत झांकना इस गली में!!!

बेचारा अज्ञानीलाल, अपना भला होने के लिए दूसरों की प्रतीक्षा कर लेता तो यह दिन खराब न जाता, दोनो समय का खाना गले से नीचे उतर रहा होता, लल्लू को गणित का प्रश्न हल न कर पाने पर झापड़ का प्रसाद नहीं दिया होता….. हाय कोमल सा लल्लू, अभी बेचारा सिर्फ़ आठ साल का ही तो है!!!

क्या इस भयावह हादसे से अज्ञानीलाल बच जाता यदि वह दूसरे अंजान लोगों की प्रतीक्षा करता अपना भला करने के लिए?

जानने के लिए पढ़िए वेब २.० (Web 2.0) की एक भयावह और अनसुलझी पहेली पर रोशनी डालने वाला सनसनीखेज खुलासा…..

 
फोटो साभार: dullhunk
 

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डिजिटल कैमरे से सीधे इंटरनेट पर…..

November 2, 2007 · 8 Comments

सन्‌ 1899 में संयुक्त राज्य अमेरिका के पेटेन्ट विभाग के कमिशनर चार्ल्स डुएल द्वारा कहा गया एक कथन इतिहास में अमर हो गया। यह कथन था:

Everything that can be invented has been invented.

जिसका अर्थ हुआ

वह हर चीज़ जिसका अविष्कार हो सकता था उसका अविष्कार हो चुका है।

यही नहीं, मैंने कुछेक जगह यह भी पढ़ा कि उन्होंने अमेरिकी पेटेन्ट ऑफिस को बंद करने का प्रस्ताव भी दिया था क्योंकि उनका मानना था कि ऐसी कोई चीज़ बची ही नहीं जिसका अविष्कार हो सकता हो। इतिहास गवाह है कि उसके बाद मानव सभ्यता को बदल देने की ताकत रखने वाले कितने ही अविष्कार हुए!!

मैं भी एक नई चीज़ की ही बात करने जा रहा हूँ। डिजिटल कैमरों में फोटो और वीडियो आदि को स्टोर करने के लिए मेमोरी कार्ड लगते हैं जो कि अलग-२ प्रकार के आते हैं; एसडी कार्ड(sd card), कॉम्पेक्ट फ्लैश कार्ड(cf card), एक्सडी कार्ड(xd card), एमएमसी कार्ड(mmc card), मेमोरी स्टिक(memory stick), आदि। हर कैमरे में एक ही प्रकार का कार्ड लगता है(सोनी ने अभी कदाचित्‌ एक कैमरा निकाला है जिसमें एक से अधिक प्रकार के कार्ड लग सकेंगे), सबसे अधिक प्रचलित एसडी कार्ड(sd card) और कॉम्पेक्ट फ्लैश कार्ड(cf card) हैं। अभी तक डिजिटल कैमरों से फोटो या तो कंप्यूटर पर लोड कर इंटरनेट पर डाली जाती थी या प्रिंट की जाती थी, या फिर कुछ खास प्रकार के प्रिंटर कुछ खास प्रकार के कैमरों से सीधे जुड़ के प्रिंट निकाल सकते थे। फिर कोडैक ने लगभग डेढ़ वर्ष पहले एक डिजिटल कैमरा निकाला, कोडैक वी610 (Kodak V610), जिसमें आई ब्लूटूथ (bluetooth) टेक्नॉलोजी जिससे कैमरा कंप्यूटर या प्रिंटर या मोबाइल फोन से बेतार का संबन्ध बना फोटो भेज सकता था। कोडैक ने इससे लगभग छह महीने पहले एक अन्य कैमरा निकाला था, कोडैक इज़ीशेयर वन (Kodak Easyshare One), जिसमें बेतार इंटरनेट से कनेक्ट होने की सुविधा थी और जिससे आप कैमरे से सीधे इंटरनेट पर अपनी ऑनलाईन एल्बम में फोटो अपलोड कर सकते थे। हालांकि इस सेवा में थोड़ी दिक्कत थी क्योंकि यह सिर्फ़ कोडैक की अपनी ऑनलाईन फोटो गैलरी पर ही अपलोड कर पाता था, लेकिन फिर भी एक शुरुआत थी। परन्तु यहाँ एक समस्या यह थी कि यदि यह बेतार की सुविधा कैमरे में ही होती थी, और ऐसे कैमरे हर कोई नहीं निकाल रहा था।

Eye-Fi Cardलेकिन अब लगता है कि इसका भी जुगाड़ आ गया है। अब हर कैमरा बेतार इंटरनेट से जुड़ सकता है। क्या वाकई?? शायद!! जुगाड़ है आई-फाई कार्ड (Eye-Fi card) नाम का 2 गीगाबाइट (2GB) की मेमोरी वाला एसडी कार्ड(sd card) है जो कि एक साधारण मेमोरी कार्ड होने के साथ-२ आपके साधारण या उच्च-तकनीक डिजिटल कैमरे को बेतार कंप्यूटर और इंटरनेट से भी जोड़ देगा!! ;) तकरीबन डेढ़ वर्ष की टैस्टिंग के बाद रिलीज़ हुए इस कार्ड का वायरलैस सिस्टम 802.11g और 802.11b तथा पुराने 802.11n नैटवर्क के साथ काम करता है। सिर्फ़ एक बार कार्ड को कंप्यूटर से जोड़ इसमें अपनी ऑनलाईन फोटो एल्बम सेवा जैसे फ्लिकर (Flickr), कोडैक गैलरी (Kodak Gallery), डॉट फोटो (dotphoto), फोटोबकेट (photobucket), पिकासा वेब एल्बम (Picasa Web Albums), शटरफ्लाई (shutterfly), स्मगमग (SmugMug), आदि को सैट कीजिए और उसके बाद कैमरे में कार्ड लगा उसको प्रयोग कीजिए। यदि आपका कैमरा आपके बेतार नैटवर्क की रेंज(तीस फीट) में है तो आप सीधे ही इससे अपने कंप्यूटर पर या वाई-फाई (Wi-Fi) वाले प्रिंटर पर या इंटरनेट पर अपनी फोटो भेज सकते हैं।

अभी फिलहाल यह कार्ड पब्लिक वाई-फाई (Wi-Fi) हॉटस्पॉट के साथ सीधे काम नहीं कर सकता क्योंकि अधिकतर पब्लिक वाई-फाई (Wi-Fi) नैटवर्क बिना लॉगिन(login) किए किसी भी व्यक्ति को नैटवर्क/इंटरनेट प्रयोग करने नहीं देते और यहाँ पर समस्या आती है कि यह कार्ड कैसे ऐसे नैटवर्क से संपर्क बनाए एक साधारण कैमरे के ज़रिए!! लेकिन आशा है कि जल्द ही इसका भी हल ढूँढा जाएगा!! :)

फिलहाल सिर्फ़ संयुक्त राज्य अमेरिका में उपलब्ध यह 2 गीगाबाइट (2GB) की मेमोरी वाला एसडी कार्ड(sd card) सौ अमेरिकी डॉलर (US$100) में उपलब्ध है।

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ग्रावतार बिक गया!!

October 19, 2007 · 10 Comments

सर्वव्यापी अवतार यानि कि ग्लोबली रिकोग्नाईज़्ड अवतार उर्फ़ ग्रावतार(gravatar) को वर्डप्रैस सॉफ़्टवेयर बनाने वाली कंपनी ऑटोमैट्टिक ने खरीद लिया है। यह ऑटोमैट्टिक वही कंपनी है जो वर्डप्रैस.कॉम, अकिसमट जैसी वेब सेवाओं के पीछे है।

ग्रावतार एक तीन साल पुरानी वेब सेवा है जिसके तहत आप अपने एक ईमेल के साथ अपना एक अवतार/फोटो जोड़ते थे और फिर जब भी आप किसी ग्रावतार सपोर्ट करने वाले ब्लॉग पर अपने उसी ईमेल को प्रयोग कर टिप्पणी करते थे तो आपका अवतार/फोटो आपके नाम के साथ नज़र आता था। यह ठीक वैसा ही है जैसे ऑनलाईन चर्चा मंचों(जैसे परिचर्चा) में आप अपने खाते के साथ एक अवतार/फोटो जोड़ सकते हैं और वह फिर आपकी प्रत्येक पोस्ट के साथ नज़र आती है। यदि ठीक आकार के हों तो नाम से अधिक अवतार/फोटो से टिप्पणीकर्ता आदि की पहचान जल्दी होती है, वे एक तरह से आपके पहचान पत्र का कार्य करता है।

अब ऑटोमैट्टिक के इस वेब-सेवा को खरीदने से यह तो ज़ाहिर हो ही गया कि वर्डप्रैस.कॉम पर भी ग्रावतार सपोर्ट आ जाएगा, साथ ही यह संभावना भी व्यक्त की जा सकती है कि वर्डप्रैस सॉफ़्टवेयर में भी ग्रावतार के लिए सपोर्ट लगा-लगाया आएगा।

ग्रावतार सेवा में सुधार तो होना आरंभ हो ही गया है, जैसा कि ऑटोमैट्टिक के पहले कदम से ज़ाहिर होता है, क्योंकि उन्होंने ग्रावतार की प्रीमियम सेवा को भी सबके लिए फ्री कर दिया है(और पिछले 60 दिनों में जिन्होंने पैसे दिए हैं उनके पैसे लौटाए जा रहे हैं) जिसके तहत अब आप अपने खाते में एक से अधिक ईमेल जोड़ सकते हैं और प्रत्येक ईमेल के लिए अलग ग्रावतार लगा सकते हैं!! :)

आगे देखते हैं कि ऑटोमैट्टिक इस वेब-सेवा को किस ऊँचाई तक पहुँचाता है!! :)

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