दुनिया मेरी नज़र से - world from my eyes!!

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उड़नतश्तरी से मुलाकात …..

November 22, 2007 · 18 Comments

उड़नतश्तरी, यानि कि समीर जी, दिल्ली में लैन्ड हुए और 13 नवंबर की शाम नीरज दादा के दौलतखाने पर मिलना तय हुआ। आने वालों में कुछ और लोग भी अपेक्षित थे लेकिन व्यस्तताओं और अन्य कारणों से वे नहीं आ पाए। बहरहाल, दादा ने हुक्म दनदनाया कि मैं समय से थोड़ा पहले पहुँच जाऊँ तो बेहतर रहेगा, कुछ इंतज़ामात जो करने थे वो हो जाएँगे। तो समय से पहले तो मैं पहुँच गया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ, दादा ने इंडिया टीवी दिखा झिलाने की सोची!! ;) लेकिन अपन भी तैयार होकर निकलते हैं, साथ में एक उपन्यास था जो कि पिछले 4-5 महीनों से मेरे बैग में रह मेरे साथ जगह-२ का सफ़र कर रहा है, अभी आधा ही पढ़ा गया है, तो मैं उसको निकाल पढ़ने लगा और इस तरह समय व्यतीत किया। तत्पश्चात निकले ठेके पर जाने के लिए, आखिर समीर जी आ रहे थे और महफ़िल जमानी थी, तो बिना शराब और कबाब के क्या मज़ा!! लेकिन रास्ते में मेरी मोटरसाइकल नाराज़ हो गई, इग्नीशन चालू न होकर दे। आखिरकार तुक्का लगाया और सेन्ट्रल लॉकिंग वाले रिमोट से चालू हो गई, किसी तरह राम का नाम भजते(दादा ही भज रहे थे, अपन नहीं) ठेके पर पहुँचे, वहाँ समीर जी और दादा के लिए तो व्हिस्की ले ली गई, लेकिन अपने लिए क्या लें यह सोच में पड़ गया क्योंकि ब्रीज़र तो थी नहीं उसके पास। खैर, मैंने सोचा कि खाने के साथ रेड वाइन (red wine) चल जाएगी तो काउंटर पर बैठे व्यक्ति से पूछा कि कौन सी ब्रांड की पोर्ट वाइन (port wine) होगी उनके पास। पहले तो वह मेरी शक्ल देख हैरानी में बैठा रहा कि पता नहीं क्या माँग रहा हूँ उससे, फिर उसके साथ बैठे एक समझदार व्यक्ति ने बताया और वह फिगुएरा की एक बोतल लेकर आया। तत्पश्चात हम लोग दादा के घर आ गए, तो मैंने बोतल देखी और सिर पीट लिया, उसको रेड वाइन (red wine) बोली थी लेकिन उसने व्हाईट वाइन (white wine) दे दी थी। फिर ध्यान आया कि मैंने तो सिर्फ़ “पोर्ट वाइन” देने को कहा था तो उसने पोर्ट वाइन (port wine) दे दी, रेड या व्हाईट तो मैंने बोला ही नहीं था। खैर, अब वापस जाने का मन नहीं था, इसलिए उसी से काम चलाने का निर्णय लिया और उसको ठंडा होने के लिए फ्रीज़र में रख दिया।

कुछ समय बाद समीर जी पधारे। और उसके कुछ समय बाद ही दादा के साथ ऑफिस में काम करने वाला उनका एक मित्र भी आ गया। समीर जी के बारे में जितना अनुमान लगाया था(उनके ब्लॉग आदि को पढ़कर) उससे कहीं अधिक हंसमुख वे निकले। जाम पर जाम और कबाब पर कबाब चलते रहे, और गपशप में समय बीतता रहा। उनके किससे सुनते और हंसी मज़ाक में कई घंटे बीत गए और पता ही नहीं चला। रात्रि के तकरीबन डेढ़-दो बजे समीर जी ने पुनः मिलने का वायदा कर विदा ली।

उड़नतश्तरी वाले समीर लाल

समीर जी की एक बढ़िया सी फोटो खींचने का उनसे वायदा किया था, अब उस समय यही फोटो खींच सका, अच्छी है कि नहीं यह समीर जी स्वयं निर्णय करें। दोबारा मिलेंगे तो इससे अच्छा पोर्ट्रेट उनका लेने का पूरा प्रयास होगा। :)

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ये मौसम….. ये नज़ारे…..

October 25, 2007 · 16 Comments

कई बार प्रयास रहता है कि हर सप्ताहांत कम से कम एक बार दिल्ली या उसके आसपास कहीं सुबह जाया जाए घूमने, फोटोग्राफ़ी करने और उस जगह को जानने के लिए। दिल्ली में और आसपास बहुत सी ऐतिहासिक जगह हैं जो कि मशहूर नहीं हैं और जिनके बारे में कम लोग जानते हैं, ऐसी जगहों पर जाना और इनके बारे में जानना काफ़ी ज्ञानवर्धक रहता है। अन्य भी कई जगह हैं जैसे कि कोई पक्षी विहार या वाइल्ड लाइफ़ सैंक्चुअरी (wild life sactuary) आदि जहाँ जाया जा सकता है और वन्य जीवों पर भी ज्ञान पाया जा सकता है, साथ ही अच्छे फोटो भी मिल जाते हैं।

तो ऐसे ही बीते शनिवार सुबह सवेरे मैं और संतोष पहुँच गए ओखला पक्षी विहार जहाँ कई तरह के पक्षी मैंने पहली बार अपनी आँखों से सजीव देखे।

Black winged Stilt

एक तोता

रंग बिरंगे फूल

a Hoopoe

यमुना के किनारे पर बंधी एक नाव

ओखला पक्षी विहार में ली अन्य तस्वीरें यहाँ देखें

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गुलाबी शहर

October 23, 2007 · 14 Comments

तकरीबन चार दिन से घर में ही था, मन बेचैन था तो पिछले से पिछले बृहसपति-वार की शाम को मन हुआ कि कहीं लम्बी ड्राईव पर चला जाए। आशीष को फोन कर पूछा कि क्या एक लम्बी ड्राईव पर साथ चलना चाहेगा तो उसने कहा कि उस दिन जाने की जगह अगले दिन(शुक्रवार) को शाम को जल्दी निकल लेते हैं जयपुर की तरफ़ और वहाँ चोखी ढाणी में खाना खा के वापस आ जाएँगे देर रात तक। आईडिया मुझे जंचा तो मैंने हाँ कर दी और फिर योगेश को फोन लगाया। चलने को योगेश भी तैयार लेकिन उसने सुझाव दिया कि रात को वापस न आकर रात वहीं बिताते हैं और अगले दिन एकाध किला वगैरह देख वापस आते हैं। अपने को ये बात बेहतर लगी, इसलिए आशीष को फाईनल प्रोग्राम बता दिया और उसने भी सहमति जता दी। अगले दिन यानि कि शुक्रवार को दोपहर में मैं और योगेश मेरी मोटरसाइकिल पर लद के गुड़गाँव पहुँचे और वहाँ से आशीष की गाड़ी में हम तीनों लद के जयपुर की ओर रवाना हो गए। पिछले ही दिन गाड़ी में लगाए सोनी(sony) के नए सीडी प्लेयर(CD Player) और जेबीएल(JBL) के स्पीकरों से मस्त संगीत बज रहा था और गति से हम जयपुर की ओर चल पड़े।

शाम घिर आई, अंधेरा हो गया, मैंने घड़ी में समय देखा तो कोई खास नहीं हुआ था, मैंने सोचा कि कुछ जल्दी ही अंधेरा हो गया, लगता है वाकई सर्दियाँ आ गई हैं और दिन छोटे हो गए हैं। लेकिन फिर आशीष ने कहा कि अब तो चश्मा उतार दूँ, तो तब एहसास हुआ कि आँखों पर धूप का चश्मा चढ़ा हुआ था और इस कारण मुझे लगा कि अंधेरा हो गया है, वैसे असल में अंधेरा होने में समय था!! ;) बहरहाल, मैंने धूप का चश्मा उतार अपना रेगुलर वाला लगा लिया और इधर असली में अंधेरा हुआ उधर पीछे की सीट पर आराम फ़रमा रहे योगेश बाबू को बीयर (beer) की तलब लग आई और वे बोले कि बीयर लेनी है। रास्ते में जो भी छोटा कस्बा आदि पड़ता, और कुछ हो या ना हो लेकिन उनको अंग्रेज़ी का ठेका अवश्य दिख जाता!! ;) काफ़ी देर तक तो हमने उनको कंट्रोल करवाए रखा लेकिन आखिर कब तक करवाते, आखिरकार एक पेट्रोल पंप पर हल्का होने की गरज़ से गाड़ी रोकी और योगेश बाबू काम निपटा बीयर की बोतलें भी ले आए अपने लिए!! ;)

तकरीबन साढ़े पाँच घंटे में हमने जयपुर में प्रवेश किया, लेकिन यातायात की बड़ी समस्या थी, बहुत से मार्ग इसलिए बंद थे क्योंकि कोई रैली निकल रही थी, पहले हम रेलवे स्टेशन का रास्ता पूछ भटकते रहे, जिस सरकारी होटल में हमने रात गुजारनी थी वह रेलवे स्टेशन के पास ही है यह जानकारी राजस्थान टूरिज़म की वेबसाईट मोबाइल पर खोल हासिल की थी!! पर जब हमको आधा घंटा हो गया छोटी गलियों से निकलते और इधर-उधर भटकते तो हमने निश्चय किया कि पहले चोखीढाणी चलते हैं वापसी पर रात हो जाएगी और तब तक सड़कें खाली हो जाएँगी, तो हमने एक-दो ट्रैफ़िक पुलिस वालों से रास्ता पूछा और चोखीढाणी पहुँच गए। पिछली बार चोखीढाणी मैं पिछले वर्ष जुलाई में आया था। एक वर्ष के अरसे में चोखीढाणी में काफ़ी बदलाव आए ऐसा महसूस हुआ,काफ़ी कुछ नया सा लगा।

एक लालटेन

कुछ दुकान

वैसे इस एक वर्ष के अरसे में मुझमें भी कुछ सुधार हुए हैं, पिछली बार जब वहाँ एक स्टॉल पर तीर-कमान से निशाने लगाए थे तो एकाध ही निशाने वाले गोल बोर्ड पर लगा था बाकी तो दाँए-बाँए निकल गए थे!! ;) इस बार लगता है कि तरकश वाले संजय भाई का आशीर्वाद साथ था, एक ही तीर बस निशाने से पहले गिर गया बाकी चारों बोर्ड पर लगे और उनमें से तीन सम्मानजनक थे। :D

तीरांदाज़ी अठ??यास

योगेश बाबू ने भी अपना हाथ तीरांदाज़ी पर आज़माया और वह मुझसे अधिक सफ़ल रहे!! वहीं लगी दुकानों में से एक में सुंदर रंगी गई तस्वीरें भी दिखी।

एक सुंदर हस्त रंगित चित्र

भोजन के स्तर में भी काफ़ी अंतर आ गया था, पिछले वर्ष किए गए भोजन को यदि मैं अति लज़ीज़ की संज्ञा दूँगा तो इस बार के भोजन को साधारण की श्रेणी में ही रखूँगा। हम सभी को काफ़ी भूख लगी थी लेकिन फिर भी भोजन में वो बात नहीं आई जिसकी अपेक्षा थी, यहाँ तक कि अंत में परोसे गए मालपुए भी उतने बढ़िया नहीं थे!! खैर, हम लोग भोजन उपरांत थोड़ा और घूमे और उसके बाद वापस जयपुर की ओर चल दिए। सड़के हर तरह की भीड़ से रिक्त हो चुकीं थी और हम आराम से सदर थाने के निकट स्थित होटल स्वागतम पहुँच गए।

अगले दिन थोड़ा जल्दी निकलने का प्रोग्राम था क्योंकि योगेश को शाम पाँच बजे तक घर पहुँचना था, लेकिन आशीष बिस्तर पर पड़ा सोता रहा और हम लोग होटल से लेट निकले। खैर, सबसे पहले हम लोग पहुँचे बस अड्डे के निकट स्थित मशहूर रावत कचौड़ी वाले के जहाँ कुछ हल्का फुल्का नाश्ता किया गया। तत्पश्चात हम लोग निकल चले किलों की ओर, समय कम था इसलिए तय किया गया कि एक ही किला देखेंगे और नाहरगढ़ किले के रास्ते पर निकल चले(पिछली बार जयगढ़ और आम्बेर के किले देखे थे, नाहरगढ़ छूट गया था)। इस बार एक बदलाव यह देखा कि पिछली बार सूखी भूमि पर स्थित जल-महल के चारों ओर इस बार काफ़ी जल था!! ;) खैर, हम लोगों के साथ पंगा हो गया और हम नाहरगढ़ की जगह जयगढ़ पहुँच गए। अब पहुँच गए तो पहुँच गए, शराफ़त से तीन प्रवेश टिकट लिए और तीन कैमरों के, लेकिन टिकट खिड़की में मौजूद साहब का या तो गणित कमज़ोर था या वो कुछ अधिक ही स्याने थे, हर किसी से फालतू पैसे ले रहे थे। मैंने और योगेश ने गेट के अंदर जाते ही पैसों का हिसाब लगाया तो पाया कि उन साहब ने हमसे चालीस रूपए अधिक वसूल लिए थे, तो इसलिए मैं वापस गया और उनसे वो चालीस रूपए वापस ले आया। लेकिन बाकी लोगों में कुछ तो विचार करते दिखे कि टिकट वाले बाबू ने पैसे अधिक लिए लेकिन वापस लेने कोई नहीं गया(हमारे सामने तो कोई नहीं गया, बाद में गया तो पता नहीं)!! ;)

अरावली की पहाड़ियों का सुंदर नज़ारा

जयगढ़ किले में जब हम लोग घूम रहे थे तो एक मौसी जी भी अपने दो छोटे भाँजों और बहन के साथ हमारे पीछे ही थीं। ये मौसी जी फिल्म शोले जैसी नहीं थीं, ये तो जवान भी थीं और सुंदर भी और अविवाहित भी!! ;) बहरहाल, मौसी जी की कुछ ज्ञान भरी बातें हम लोगों के कान में भी पड़ रही थीं, जैसे कि वे अपने भाँजों और बहन को बता रहीं थी कि जयगढ़ किला कोई तीन-चार सौ वर्ष पहले बना था(थोड़ी कन्फ्यूज़िया गई थीं मौसी जी क्योंकि जयगढ़ किला तकरीबन हज़ार वर्ष पहले बना था और उसके नीचे स्थित आम्बेर किला लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व बना था)। मौसी जी अपनी बहन जी को फोटोग्राफ़ी भी सिखा रहीं थी, भरी धूप में छोटी फ्लैश वाले छोटे डिजिटल कैमरे से फोटो खींचती अपनी बहन को सलाह दे रही थीं कि फ्लैश का प्रयोग करें!! ;)

बहरहाल हम लोग मौसी जी और उनके ग्रुप को पीछे छोड़ आगे निकल लिए। हम लोगों के पास समय का अभाव था इसलिए जल्दी ही सब निपटा वापसी की राह पकड़नी थी।

Watchtower

तो सारा मामला निपटा हम गुड़गाँव की राह पकड़ लिए, देर तो हो ही गई थी, तकरीबन सवा छह बजे गुड़गाँव पहुँचे और फिर मोटरसाइकिल पर सवार हो सात बजे तक योगेश को घर पहुँचाया!!

इस यात्रा में लिए गए सभी फोटो यहाँ हैं

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पाँच इंद्रियों का बाग़ - भाग २

October 16, 2007 · 7 Comments

पिछले भाग से जारी…..

खिलेगा एक दिन यह फूल

तैयार गमले
( इस फोटो को कंप्यूटर पर सेपिआ [sepia] किया गया है )

एक नन्हीं तितली


( इस फोटो को कंप्यूटर पर श्वेत-श्याम [black & white] किया गया है, मूल फोटो यहाँ है )

एक फूल का मैक्रो

इस बाग़ में लिए गए सभी फोटो यहाँ हैं

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पाँच इंद्रियों का बाग़ - भाग १

October 15, 2007 · 8 Comments

बीते दिनों में एक रविवार सुबह संतोष के साथ कुतुब मीनार के पास स्थित पाँच इंद्रियों के बाग़ यानि कि गॉर्डन ऑफ़ फाईव सेन्सेस (garden of five senses) जाना हुआ और वहाँ रंग-बिरंगे फूलों और तितलियों के साथ ही देखने को मिले अमूर्त कला (abstract art) के बढ़िया नमूने।

एक फूल के मध्य का मैक्रो

एक नन्ही तितली

एक टूटा झूला
( इस फोटो को कंप्यूटर पर सेपिआ [sepia] किया गया है, मूल फोटो यहाँ है )

एक ततैया
( इस फोटो को कंप्यूटर पर श्वेत-श्याम किया गया है, मूल फोटो यहाँ है )

एम्फीथियेटर
( बढ़िया सैटिंग में बना हुआ एक एम्फीथियेटर [amphitheater] )

अगले भाग में जारी…..

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मैक्रो के खेल निराले …..

October 10, 2007 · 3 Comments

अभी हाल ही में मैक्रो(macro) तस्वीरों का विचार मन में समाया, कि मैक्रो(macro) पर हाथ आज़माया जाए। कुछेक मैक्रो तस्वीरें ली, लेकिन वो बात नहीं आ रही थी, अपने कैमरे के मैक्रो ऑटोफोकस में मैं सब्जैक्ट के सिर्फ़ पाँच सेन्टीमीटर निकट जा सकता था और ज़ूम बिलकुल नहीं कर सकता था, यह आम मामलों में बहुत अच्छा है लेकिन यदि आप किसी फूल के मध्य भाग का मैक्रो(macro) लेने का प्रयास कर रहे हैं तो दिक्कत है अथवा थोड़ी दूर से किसी चीज़ का फोटो लेने की सोच रहे हैं तब भी दिक्कत आ सकती है। जैसे यह निम्न फोटो मैंने बिना किसी मैक्रो(macro) लेन्स की सहायता के पिछले माह पालमपुर यात्रा के दौरान ली थी।

फूल

इन कामों के लिए होते हैं मैक्रो(macro) लेन्स(lens) जो निकट की वस्तु पर भी फोकस करने देते हैं। हर लेन्स की भांति ये भी एक-एलीमेन्ट और बहु-एलीमेन्ट में आते हैं और बहु-एलीमेन्ट के लेन्स बेहतर और साफ़ फोटो देते हैं। चूंकि मेरा कैमरा डीएसएलआर(dslr) नहीं है इसलिए इसके लिए लेन्स मिलना थोड़ा कठिन, लेकिन आखिरकार क्नॉट प्लेस में स्थिट महाटा एण्ड कंपनी के पास मारूमी(marumi) ब्रांड के (अलग-२ पॉवर के चार)लेन्स का सैट मिला जो कि ढाई हज़ार रूपए का था। लेन्स के हिसाब से देखा जाए तो महंगा नहीं था लेकिन वह एक-एलीमेन्ट के लेन्स का सैट था और मैं उसको सिर्फ़ प्रयोग के लिए लेना चाहता था ताकि यह निश्चय कर सकूं कि कितनी पॉवर का लेन्स मेरे लिए उपयुक्त रहेगा और फिर मैं उतनी पॉवर का बहु-एलीमेन्ट लेन्स अमेरिका से किसी मित्र आदि के हाथ मंगवा सकता हूँ। इससे पहले फोन कर मैंने पता कर लिया था, चांदनी चौक में मदन जी के पास सोनिया ब्रांड का (अलग-२ पॉवर के चार)लेन्स का सैट था जो कि तीन सौ रूपए का था, इसलिए निश्चय किया कि उसी को लिया जाए!! ;)

लगभग एक माह हो गया है मुझे वे लेन्स लाए हुए, उम्मीद से अधिक अच्छे नतीजे मिले हैं इन लेन्सों से। इसी सैट के एक लेन्स की मदद से ली यह निम्न फोटो।

ततैया

यह फोटो कैमरे से ऐसा नहीं आया था!! ;) इसको बाद में कंप्यूटर पर ऐसा करा कि ततैये को रंगीन रहने दिया और बाकी उसके चारो ओर की पत्तियों आदि को श्वेत-श्याम कर दिया। इसकी ओरिजिनल फोटो निम्न है।

ततैया

यह फोटो +4d के मैक्रो(macro) लेन्स की सहायता से ली थी। लेन्स की पॉवर डायोप्टर(diopter) में आंकी जाती है, जितने अधिक डायोप्टर(diopter) उतना अधिक ताकतवर लेन्स, लेकिन इसके साथ यह समस्या भी है कि जितने अधिक डायोप्टर(diopter) का लेन्स होता आपको लेन्स सब्जैक्ट के उतना ही पास रखना होगा। सब्जैक्ट और लेन्स के बीच उचित दूरी क्या हो यह जानने का एक बहुत ही आसान फॉर्मूला है:

दूरी = (1/d * 39.37) इंच

यानि कि यदि आपको लेन्स के डायोप्टर(diopter) पता हैं तो आप एक को डायोप्टर(diopter) से भाग कर 39.37 से उसको गुणा करेंगे तो उचित दूरी इंच में आपको मिल जाएगी जिसको बनाने पर आप कैमरे से आराम से ऑटो-फोकस कर पाएँगे, कम-ज़्यादा होने पर आपको मैनुअल(manual) फोकस का सहारा लेना होगा।

यह एक अन्य फोटो +4d के मैक्रो(macro) लेन्स की सहायता से लिया था।

फूल

मैक्रो(macro) फोटोग्राफ़ी के खेल निराले हैं, इससे आपके कैमरे के लिए एक नई दुनिया खुल जाती है। :)

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