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ब्लॉग - समाज के लिए उनका क्या महत्व है?

February 8, 2008 · 2 Comments

पिछले माह, 12 जनवरी 2008 को, हुई दिल्ली ब्लॉग एण्ड न्यू मीडिया सोसायटी (Delhi Blog and New Media Society aka DBNMS) द्वारा आयोजित प्रथम ब्लॉगर भेंटवार्ता काफ़ी सफ़ल रही। बहुत से लोगों ने यह भी हमें बताया कि वह भेंटवार्ता उनके लिए काफ़ी ज्ञानवर्धक रही, उनको कई बातों की जानकारी मिली और अन्य ब्लॉगरों से मिलने का अवसर तो मिला ही। दिल्ली ब्लॉग एण्ड न्यू मीडिया सोसायटी (Delhi Blog and New Media Society) के पीछे एक उद्देश्य यह भी है कि ब्लॉगर भेंट सिर्फ़ चाय-कॉफी और गपशप तक ही न सीमित रहें बल्कि हम ब्लॉगर लोग जब मिलें तो अलग-२ विषयों पर कुछ सार्थक चर्चा भी करें और एक दूसरे से सीखें भी, इसलिए Be Relevant का नारा लगाया गया था। :)

तो इसी प्रयास को आगे बढ़ाते हुए इस माह, 14 फरवरी 2008 को, एक और ब्लॉगर भेंटवार्ता आयोजित की जा रही है। यह पिछली बार की तरह लंबा चौड़ा कार्यक्रम न होगा, मात्र दो घंटे का कार्यकरम सांयकाल में होगा जिस पर ब्लॉगों और समाज के लिए उनके महत्व पर चर्चा की जाएगी। सिलसिलेवार जानकारी निम्न है:

चर्चा का विषय: ब्लॉग और समाज के लिए उनका महत्व
स्थान: गुलमोहर हॉल, इंडिया हैबिटाट सैन्टर (India Habitat Center), लोधी रोड, नई दिल्ली
तिथि: 14 फरवरी 2008
समय: सांयकाल 6:30 से 8:30
रूपरेखा: ब्लॉगर्स/चिट्ठाकारों ने विश्व भर में अपनी एक पहचान कायम की है और भारत में भी यह हो रहा है जैसा कि हालिया पिछले समयकाल में विदित हुआ है। अब इसी पर आगे बढ़ते हुए ब्लॉगर/चिट्ठाकार नागरिक पत्रकार(citizen journalists) की अपनी भूमिका निभाने के लिए क्या कर सकते हैं? इसी पर चर्चा की जाएगी एक संवादात्मक सत्र में जिसको निम्न भागों में विभाजित किया गया है:

  1. उन वाकयों के उदाहरण जहाँ ब्लॉगर्स/चिट्ठाकारों के कारण बदलाव आए हैं
  2. पत्रकारिता के श्रेष्ठ सिद्धांत जिनका ब्लॉगर्स/चिट्ठाकारों पालन कर सकें
  3. कैसे ब्लॉगर/चिट्ठाकार इस सब पर एक साथ कार्य कर सकते हैं

आमंत्रित: इस भेंटवार्ता में सभी आमंत्रित हैं, वे भी जो मौजूदा ब्लॉगर/चिट्ठाकार हैं और वे भी जो ब्लॉगर/चिट्ठाकार बनना चाहते हों और वे भी जो ब्लॉग पाठक हैं।

इस भेंटवार्ता और सभा में भाग लेने का कोई शुल्क नहीं है, केवल आपको समय निकाल इसमें पधारना मात्र है और चर्चा में भाग लेना है क्योंकि यह आपकी अपनी भेंटवार्ता है और अपनी चर्चा है।

यदि अपने आने की पुष्टि/कन्फर्मेशन यहाँ टिप्पणी के रूप में दे देंगे तो हम लोगों को भी अंदाज़ा रहेगा कि कितने साथी लोग शिरकत करने वाले हैं। यदि कन्फर्मेशन नहीं भी देंगे तो भी आपका स्वागत है, इस भेंटवार्ता में शिरकत करने और भाग लेने के लिए कन्फर्मेशन देना अनिवार्य नहीं है। :)

तो मिलेंगे 14 फरवरी 2008 को सांयकाल साढ़े छह बजे लोधी रोड(नई दिल्ली) स्थित इंडिया हैबिटाट सैन्टर (India Habitat Center) के गुलमोहर हॉल में। :)

 
अधिक जानकारी के लिए यहाँ देखें
 

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ब्लॉगर भेंटवार्ता टेलीविजन पर …..

February 7, 2008 · 5 Comments

पिछले माह, 12 जनवरी 2008, हुई दिल्ली ब्लॉग एण्ड न्यू मीडिया सोसायटी (Delhi Blog and New Media Society aka DBNMS) द्वारा आयोजित प्रथम ब्लॉगर भेंटवार्ता काफ़ी सफ़ल रही। बहुत से साथी ब्लॉगरों और ब्लॉग इच्छुकों और उत्सुकों ने इसमें भाग लेकर इस भेंट को सफ़ल बनाया। अपने हिन्दी ब्लॉगजगत से भी कई बंधुओं ने शिरकत कर मेरी इस सोच को मज़बूत किया कि ब्लॉगर चाहे कैसा हो और चाहे किसी भी भाषा में लिखता हो परन्तु होता वह ब्लॉगर ही है इसलिए हम इस ब्लॉगजगत में क्षेत्र अथवा भाषा के मापदंड पर बंटवारा नहीं करेंगे। :)

मीडिया में भी इस ब्लॉगर भेंटवार्ता को काफ़ी कवरेज मिली और ब्लॉगजगत तथा ब्लॉगरों के बारे में खबर दूर-२ तक पहुँची। इससे अपेक्षित है कि ब्लॉगिंग का मर्ज़ बहुतों को अपनी चपेट में लेगा। :)

भेंटवार्ता से एक दिन पहले अंग्रेज़ी के हिन्दुस्तान टाइम्स की अनुपूरक पत्रिका एचटी सिटी(HT City) के मुख्यपृष्ठ पर भेंटवार्ता संबन्धित यह लेख छपा था। हालांकि इसमें पत्रकार/लेखिका से एक त्रुटि हो गई और अंत में वेबसाइट के पते में वो delhi लगाना भूल गई, असल वेबसाइट www.delhibloggers.in है। एनडीटीवी (NDTV) ने इस पूरी भेंटवार्ता को कवर किया था और पत्रकार गरिमा दत्त ने एनडीटीवी (NDTV) की वेबसाइट पर भेंटवार्ता के अगले दिन यह लेख छापा। सिर्फ़ छापे वाले मीडिया में ही नहीं, टेलीविजन पर भी इसकी कवरेज दिखाई गई।

एनडीटीवी 24×7 (NDTV 24×7) पर दिखाई गई न्यूज़ बाइट

यूट्यूब पर इस वीडियो को यहाँ देखें। वीडियो को FLV रूप में यहाँ डाउनलोड करें

एनडीटीवी मेट्रोनेशन (NDTV Metronation) पर दिखाई गई न्यूज़ बाइट

यूट्यूब पर इस वीडियो को यहाँ देखें। वीडियो को FLV रूप में यहाँ डाउनलोड करें

एनडीटीवी मेट्रोनेशन (NDTV Metronation) पर दिखाई गई विस्तृत कवरेज

यूट्यूब पर इस वीडियो को यहाँ देखें। वीडियो को FLV रूप में यहाँ डाउनलोड करें

मीडिया में इस कवरेज का लाभ सीधे ही दिखा। जहाँ कई लोग हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले दिन छपे लेख के कारण भेंटवार्ता में आए वहीं कुछ लोग बाद में एनडीटीवी (NDTV) पर इसकी कवरेज देख कर समूह से जुड़े और अपने ब्लॉग बनाए। भेंटवार्ता के अगले ही दिन एनडीटीवी (NDTV) पर प्रसारित बर्खा दत्त के We The People कार्यक्रम का मुद्दा भी ब्लॉग ही थे। मतलब साफ़ है, मीडिया भी अब खुले रूप से ब्लॉगों पर ध्यान दे रहा है, और यह अच्छा भी है क्योंकि इससे जल्द ही यह भ्रम(जो कि बहुत लोग पाले हुए हैं) टूटेगा कि ब्लॉग मुख्यधारा मीडिया की जगह ले सकते हैं, दोनों एक दूसरे के सहायक/पूरक हो सकते हैं लेकिन दोनों की अपनी-२ पहचान और स्थान है।

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मुम्बई ले लो….. बंगलूरु ले लो….. कोलकाता ले लो…..

January 25, 2008 · 6 Comments

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ये मौसम….. ये नज़ारे…..

October 25, 2007 · 16 Comments

कई बार प्रयास रहता है कि हर सप्ताहांत कम से कम एक बार दिल्ली या उसके आसपास कहीं सुबह जाया जाए घूमने, फोटोग्राफ़ी करने और उस जगह को जानने के लिए। दिल्ली में और आसपास बहुत सी ऐतिहासिक जगह हैं जो कि मशहूर नहीं हैं और जिनके बारे में कम लोग जानते हैं, ऐसी जगहों पर जाना और इनके बारे में जानना काफ़ी ज्ञानवर्धक रहता है। अन्य भी कई जगह हैं जैसे कि कोई पक्षी विहार या वाइल्ड लाइफ़ सैंक्चुअरी (wild life sactuary) आदि जहाँ जाया जा सकता है और वन्य जीवों पर भी ज्ञान पाया जा सकता है, साथ ही अच्छे फोटो भी मिल जाते हैं।

तो ऐसे ही बीते शनिवार सुबह सवेरे मैं और संतोष पहुँच गए ओखला पक्षी विहार जहाँ कई तरह के पक्षी मैंने पहली बार अपनी आँखों से सजीव देखे।

Black winged Stilt

एक तोता

रंग बिरंगे फूल

a Hoopoe

यमुना के किनारे पर बंधी एक नाव

ओखला पक्षी विहार में ली अन्य तस्वीरें यहाँ देखें

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गुलाबी शहर

October 23, 2007 · 14 Comments

तकरीबन चार दिन से घर में ही था, मन बेचैन था तो पिछले से पिछले बृहसपति-वार की शाम को मन हुआ कि कहीं लम्बी ड्राईव पर चला जाए। आशीष को फोन कर पूछा कि क्या एक लम्बी ड्राईव पर साथ चलना चाहेगा तो उसने कहा कि उस दिन जाने की जगह अगले दिन(शुक्रवार) को शाम को जल्दी निकल लेते हैं जयपुर की तरफ़ और वहाँ चोखी ढाणी में खाना खा के वापस आ जाएँगे देर रात तक। आईडिया मुझे जंचा तो मैंने हाँ कर दी और फिर योगेश को फोन लगाया। चलने को योगेश भी तैयार लेकिन उसने सुझाव दिया कि रात को वापस न आकर रात वहीं बिताते हैं और अगले दिन एकाध किला वगैरह देख वापस आते हैं। अपने को ये बात बेहतर लगी, इसलिए आशीष को फाईनल प्रोग्राम बता दिया और उसने भी सहमति जता दी। अगले दिन यानि कि शुक्रवार को दोपहर में मैं और योगेश मेरी मोटरसाइकिल पर लद के गुड़गाँव पहुँचे और वहाँ से आशीष की गाड़ी में हम तीनों लद के जयपुर की ओर रवाना हो गए। पिछले ही दिन गाड़ी में लगाए सोनी(sony) के नए सीडी प्लेयर(CD Player) और जेबीएल(JBL) के स्पीकरों से मस्त संगीत बज रहा था और गति से हम जयपुर की ओर चल पड़े।

शाम घिर आई, अंधेरा हो गया, मैंने घड़ी में समय देखा तो कोई खास नहीं हुआ था, मैंने सोचा कि कुछ जल्दी ही अंधेरा हो गया, लगता है वाकई सर्दियाँ आ गई हैं और दिन छोटे हो गए हैं। लेकिन फिर आशीष ने कहा कि अब तो चश्मा उतार दूँ, तो तब एहसास हुआ कि आँखों पर धूप का चश्मा चढ़ा हुआ था और इस कारण मुझे लगा कि अंधेरा हो गया है, वैसे असल में अंधेरा होने में समय था!! ;) बहरहाल, मैंने धूप का चश्मा उतार अपना रेगुलर वाला लगा लिया और इधर असली में अंधेरा हुआ उधर पीछे की सीट पर आराम फ़रमा रहे योगेश बाबू को बीयर (beer) की तलब लग आई और वे बोले कि बीयर लेनी है। रास्ते में जो भी छोटा कस्बा आदि पड़ता, और कुछ हो या ना हो लेकिन उनको अंग्रेज़ी का ठेका अवश्य दिख जाता!! ;) काफ़ी देर तक तो हमने उनको कंट्रोल करवाए रखा लेकिन आखिर कब तक करवाते, आखिरकार एक पेट्रोल पंप पर हल्का होने की गरज़ से गाड़ी रोकी और योगेश बाबू काम निपटा बीयर की बोतलें भी ले आए अपने लिए!! ;)

तकरीबन साढ़े पाँच घंटे में हमने जयपुर में प्रवेश किया, लेकिन यातायात की बड़ी समस्या थी, बहुत से मार्ग इसलिए बंद थे क्योंकि कोई रैली निकल रही थी, पहले हम रेलवे स्टेशन का रास्ता पूछ भटकते रहे, जिस सरकारी होटल में हमने रात गुजारनी थी वह रेलवे स्टेशन के पास ही है यह जानकारी राजस्थान टूरिज़म की वेबसाईट मोबाइल पर खोल हासिल की थी!! पर जब हमको आधा घंटा हो गया छोटी गलियों से निकलते और इधर-उधर भटकते तो हमने निश्चय किया कि पहले चोखीढाणी चलते हैं वापसी पर रात हो जाएगी और तब तक सड़कें खाली हो जाएँगी, तो हमने एक-दो ट्रैफ़िक पुलिस वालों से रास्ता पूछा और चोखीढाणी पहुँच गए। पिछली बार चोखीढाणी मैं पिछले वर्ष जुलाई में आया था। एक वर्ष के अरसे में चोखीढाणी में काफ़ी बदलाव आए ऐसा महसूस हुआ,काफ़ी कुछ नया सा लगा।

एक लालटेन

कुछ दुकान

वैसे इस एक वर्ष के अरसे में मुझमें भी कुछ सुधार हुए हैं, पिछली बार जब वहाँ एक स्टॉल पर तीर-कमान से निशाने लगाए थे तो एकाध ही निशाने वाले गोल बोर्ड पर लगा था बाकी तो दाँए-बाँए निकल गए थे!! ;) इस बार लगता है कि तरकश वाले संजय भाई का आशीर्वाद साथ था, एक ही तीर बस निशाने से पहले गिर गया बाकी चारों बोर्ड पर लगे और उनमें से तीन सम्मानजनक थे। :D

तीरांदाज़ी अठ??यास

योगेश बाबू ने भी अपना हाथ तीरांदाज़ी पर आज़माया और वह मुझसे अधिक सफ़ल रहे!! वहीं लगी दुकानों में से एक में सुंदर रंगी गई तस्वीरें भी दिखी।

एक सुंदर हस्त रंगित चित्र

भोजन के स्तर में भी काफ़ी अंतर आ गया था, पिछले वर्ष किए गए भोजन को यदि मैं अति लज़ीज़ की संज्ञा दूँगा तो इस बार के भोजन को साधारण की श्रेणी में ही रखूँगा। हम सभी को काफ़ी भूख लगी थी लेकिन फिर भी भोजन में वो बात नहीं आई जिसकी अपेक्षा थी, यहाँ तक कि अंत में परोसे गए मालपुए भी उतने बढ़िया नहीं थे!! खैर, हम लोग भोजन उपरांत थोड़ा और घूमे और उसके बाद वापस जयपुर की ओर चल दिए। सड़के हर तरह की भीड़ से रिक्त हो चुकीं थी और हम आराम से सदर थाने के निकट स्थित होटल स्वागतम पहुँच गए।

अगले दिन थोड़ा जल्दी निकलने का प्रोग्राम था क्योंकि योगेश को शाम पाँच बजे तक घर पहुँचना था, लेकिन आशीष बिस्तर पर पड़ा सोता रहा और हम लोग होटल से लेट निकले। खैर, सबसे पहले हम लोग पहुँचे बस अड्डे के निकट स्थित मशहूर रावत कचौड़ी वाले के जहाँ कुछ हल्का फुल्का नाश्ता किया गया। तत्पश्चात हम लोग निकल चले किलों की ओर, समय कम था इसलिए तय किया गया कि एक ही किला देखेंगे और नाहरगढ़ किले के रास्ते पर निकल चले(पिछली बार जयगढ़ और आम्बेर के किले देखे थे, नाहरगढ़ छूट गया था)। इस बार एक बदलाव यह देखा कि पिछली बार सूखी भूमि पर स्थित जल-महल के चारों ओर इस बार काफ़ी जल था!! ;) खैर, हम लोगों के साथ पंगा हो गया और हम नाहरगढ़ की जगह जयगढ़ पहुँच गए। अब पहुँच गए तो पहुँच गए, शराफ़त से तीन प्रवेश टिकट लिए और तीन कैमरों के, लेकिन टिकट खिड़की में मौजूद साहब का या तो गणित कमज़ोर था या वो कुछ अधिक ही स्याने थे, हर किसी से फालतू पैसे ले रहे थे। मैंने और योगेश ने गेट के अंदर जाते ही पैसों का हिसाब लगाया तो पाया कि उन साहब ने हमसे चालीस रूपए अधिक वसूल लिए थे, तो इसलिए मैं वापस गया और उनसे वो चालीस रूपए वापस ले आया। लेकिन बाकी लोगों में कुछ तो विचार करते दिखे कि टिकट वाले बाबू ने पैसे अधिक लिए लेकिन वापस लेने कोई नहीं गया(हमारे सामने तो कोई नहीं गया, बाद में गया तो पता नहीं)!! ;)

अरावली की पहाड़ियों का सुंदर नज़ारा

जयगढ़ किले में जब हम लोग घूम रहे थे तो एक मौसी जी भी अपने दो छोटे भाँजों और बहन के साथ हमारे पीछे ही थीं। ये मौसी जी फिल्म शोले जैसी नहीं थीं, ये तो जवान भी थीं और सुंदर भी और अविवाहित भी!! ;) बहरहाल, मौसी जी की कुछ ज्ञान भरी बातें हम लोगों के कान में भी पड़ रही थीं, जैसे कि वे अपने भाँजों और बहन को बता रहीं थी कि जयगढ़ किला कोई तीन-चार सौ वर्ष पहले बना था(थोड़ी कन्फ्यूज़िया गई थीं मौसी जी क्योंकि जयगढ़ किला तकरीबन हज़ार वर्ष पहले बना था और उसके नीचे स्थित आम्बेर किला लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व बना था)। मौसी जी अपनी बहन जी को फोटोग्राफ़ी भी सिखा रहीं थी, भरी धूप में छोटी फ्लैश वाले छोटे डिजिटल कैमरे से फोटो खींचती अपनी बहन को सलाह दे रही थीं कि फ्लैश का प्रयोग करें!! ;)

बहरहाल हम लोग मौसी जी और उनके ग्रुप को पीछे छोड़ आगे निकल लिए। हम लोगों के पास समय का अभाव था इसलिए जल्दी ही सब निपटा वापसी की राह पकड़नी थी।

Watchtower

तो सारा मामला निपटा हम गुड़गाँव की राह पकड़ लिए, देर तो हो ही गई थी, तकरीबन सवा छह बजे गुड़गाँव पहुँचे और फिर मोटरसाइकिल पर सवार हो सात बजे तक योगेश को घर पहुँचाया!!

इस यात्रा में लिए गए सभी फोटो यहाँ हैं

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पाँच इंद्रियों का बाग़ - भाग २

October 16, 2007 · 7 Comments

पिछले भाग से जारी…..

खिलेगा एक दिन यह फूल

तैयार गमले
( इस फोटो को कंप्यूटर पर सेपिआ [sepia] किया गया है )

एक नन्हीं तितली


( इस फोटो को कंप्यूटर पर श्वेत-श्याम [black & white] किया गया है, मूल फोटो यहाँ है )

एक फूल का मैक्रो

इस बाग़ में लिए गए सभी फोटो यहाँ हैं

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पाँच इंद्रियों का बाग़ - भाग १

October 15, 2007 · 8 Comments

बीते दिनों में एक रविवार सुबह संतोष के साथ कुतुब मीनार के पास स्थित पाँच इंद्रियों के बाग़ यानि कि गॉर्डन ऑफ़ फाईव सेन्सेस (garden of five senses) जाना हुआ और वहाँ रंग-बिरंगे फूलों और तितलियों के साथ ही देखने को मिले अमूर्त कला (abstract art) के बढ़िया नमूने।

एक फूल के मध्य का मैक्रो

एक नन्ही तितली

एक टूटा झूला
( इस फोटो को कंप्यूटर पर सेपिआ [sepia] किया गया है, मूल फोटो यहाँ है )

एक ततैया
( इस फोटो को कंप्यूटर पर श्वेत-श्याम किया गया है, मूल फोटो यहाँ है )

एम्फीथियेटर
( बढ़िया सैटिंग में बना हुआ एक एम्फीथियेटर [amphitheater] )

अगले भाग में जारी…..

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पंद्रहवां कुतुब उत्सव …..

October 4, 2007 · 7 Comments

पिछले सप्ताहांत, 29 और 30 सितंबर 2007, पर दिल्ली पर्यटन विभाग ने पंद्रहवें वार्षिक कुतुब उत्सव का आयोजन दिल्ली में कुतुब मीनार के पीछे मौजूद रामलीला मैदान में किया था। दो शाम के इस उत्सव में कुल पाँच संगीतमयी कार्यक्रम हुए और इसके पास (pass) सभी के लिए मुफ़्त में उपलब्ध थे। समय से इसके पास (pass) न प्राप्त कर पाने बावजूद भी मैं, योगेश और मदन इस आशा में शनिवार सांय तकरीबन छह बजे कुतुब मीनार पहुँच गए कि कदाचित्‌ द्वार पर ही कुछ जुगाड़ हो जाए। किस्मत ज़ोरों पर थी, द्वार पर दिल्ली पर्यटन के स्टॉल पर से एक पास (pass) मिल गया और उसी पर हम तीनों को अंदर जाने दिया गया, अंदर कोई खास जनता नहीं पहुँची थी(कदाचित्‌ भारत और ऑस्ट्रेलिया के क्रिकेट मैच के कारण) और हमको प्रैस वालों के लिए आरक्षित बीचो-बीच स्टेज के सामने मौजूद बढ़िया सीटें मिल गई। हमने सोचा था कि कदाचित्‌ कैमरे अंदर नहीं ले जाने दिए जाएँगे, इसलिए चांस नहीं लिया और कैमरे नहीं लाए, लेकिन वहाँ पहुँच दिल्ली पर्यटन विभाग के एक अधिकारी से पता चला कि कैमरे वर्जित नहीं हैं।

पहला कार्यक्रम प्रसिद्ध संगीत समूह सिल्करूट (silkroute) के मोहित चौहान का था। अब मोहित ने गाया तो ठीक लेकिन उसने यह ध्यान नहीं दिया कि माइक ठीक से सैट नहीं है और इसी कारण बास (bass) अधिक है जिससे उसकी आवाज़ उतनी अच्छी नहीं लग रही थी। खैर किसी तरह उसका कार्यक्रम समाप्त हुआ तो उस शाम के दूसरे और अंतिम कव्वाली कार्यक्रम को प्रस्तुत करने आए एहसान भारती घुंघरूवाला। एहसान साहब का परिचय देते हुए परिचारिका ने बताया कि उनका नाम गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड (Guiness Book of World Records) में दर्ज है क्योंकि वे अपने मुँह से घुंघरुओं की आवाज़ निकाल सकते हैं। तकरीबन आधा घंटा एहसान साहब और उनके साथियों ने माइक को सैट करवाने में लगाया, उनको पता था कि माइक ठीक से सैट नहीं हैं और इस कारण कार्यक्रम का आनंद लोग नहीं उठा पाएँगे। बहरहाल, अब भीड़ थोड़ी अधिक हो गई थी, चौथाई सीटें जो खाली थीं वे तो भर ही गई थी, कुछेक लोग कुर्सियों के पीछे मौजूद घास पर भी बैठे थे। एक बार एहसान साहब का कार्यक्रम आरंभ हुआ तो बस मज़ा ही आ गया। थोड़ी देर बाद उन्होंने अपने मुँह से एक घुंघरू से लेकर चौरासी घुंघरूओं तक की आवाज़ निकाल के दिखाई, लोगों की फरमाइश के गानों पर (मुँह से) घुंघरू बजा के सुनाए। फिर अंत में उन्होंने सूफ़ी गायन का रस भी दिलवाया और प्रसिद्ध “दमा दम मस्त कलंदर” को भी गाकर सुनाया। मन झूम उठा, यह कार्यक्रम इस शाम का एकलौता बढ़िया कार्यक्रम था जिसने पास (pass) न होने के बावजूद पैंतीस किलोमीटर आने और इतना ही वापस जाने के कष्ट को सार्थक बनाया। :)

इधर एक मज़ेदार बात यह हुई कि परिचारिका कई बार घोषणा कर चुकी थी कि मैदान के दूसरे भाग में विभिन्न राज्यों के पकवानों के स्टॉल लगे हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं लेकिन जब योगेश ने जाकर देखा तो वहाँ सिर्फ़ पैटीज़ और नेसकैफ़े की चाय मिल रही थी!! कदाचित्‌ परिचारिका के लिए यही पकवान होंगे या फिर हो सकता है कि सरकारी बाबुओं ने पकवान गलती से वहाँ भिजवाने के स्थान पर अपने घरों में भिजवा दिए होंगे!! ;) इधर कुछ लड़कों पर बारंबार क्रोध भी आया जो कि हमारे पीछे की पंक्ति में बैठे खामखा बीच-२ में बेकार का हल्ला (cat calling, booing) मचा रहे थे, मोहित चौहान के कार्यक्रम के दौरान मचा लिए तो ठीक लेकिन एहसान साहब के कव्वाली गायन के दौरान भी हल्ला कर रहे थे। या तो ये कुछ और ही अपेक्षा के साथ आए थे कि कुछ रंगारंग कार्यक्रम होगा या फिर टाइमपास के लिए आए थे, कुछ भी हो, मन कर रहा था कि उन सबका सिर फोड़ दिया जाए, खामखा दूसरों के रंग में भंग कर रहे थे!! उस समय दिल्ली पर्यटन विभाग वालों को कोसा कि उनको प्रवेश निशुल्क रखने की जगह कुछ मामूली सा शुल्क लगा देना चाहिए था, जैसे कि पचास रूपए प्रति पास (pass), एक पास (pass) पर चार-पाँच लोगों का प्रवेश, जिससे यह लाभ होता कि ऐरे गैरे लोग जिनको कार्यक्रम नहीं देखने थे वे नहीं आते, क्योंकि इंसानी फितरत है फ्री का माल देख ऐरे गैरे भी आ ही जाते हैं!! वैसे भी इस तरह के कार्यक्रम देखने आने वाले लगभग सभी लोग इनको देखने के लिए चालीस-पचास रूपए प्रति पास (pass) दे ही देते क्योंकि पैसे देकर इनको देखने वही जाते हैं जिनको वास्तव में रूचि है।

अगले दिन के लिए हमारे पास कोई पास (pass) न होने के बावजूद हमने फिर अपनी किस्मत आज़माने की सोची, उसी पास (pass) को अपने पास रख लिया और अगले दिन तो वैसे भी कैमरे और ट्रायपॉड (tripod) वगैरह के साथ आना था!! ;)

अगले दिन कदरन अधिक भीड़ थी क्योंकि रविवार था, आखिरी दिन था, तीन कार्यक्रम थे और मैच भी नहीं था। हम लोग सवा छह बजे तक पहुँचे तब तक काफ़ी भीड़ हो चुकी थी। ट्रायपॉड तो हाथ में लिए ही थे, योगेश ने कहा कि मैं अपना कैमरा भी बाहर निकाल गले में टाँग लूँ ताकि द्वार पर मौजूद गार्ड को भ्रम हो जाए, लेकिन उसकी आवश्यकता ही नहीं पड़ी, उसने पास (pass) माँगा नहीं हमने दिखाया नहीं!! ;) अंदर पहुँचे तो देखा कि लगभग सभी सीट भर चुकी थी, हम पुनः प्रैस के लिए आरक्षित स्थान पर पहुँच गए, पीछे की एक पंक्ति में कुछ सीटें खाली दिखी तो वहाँ जम गए, ट्रायपॉड को उसके कवर से बाहर निकाल सैट किया और कैमरा निकाल उसपर लगाया। टीवी चैनल वाले हमारे आगे वाली पंक्ति में ही मौजूद थे, उन्होंने हमको भी प्रैस वाला ही समझा और एक कैमरामैन ने मुझे सुझाव दिया कि मैं उसके बाजू में ही ट्रायपॉड लगा लूँ क्योंकि थोड़ी देर बाद मेरे आगे कोई अन्य चैनल वाला आ गया तो मेरे को फोटो नहीं मिलेंगे। लेकिन उसके बगल में बैठी महिला को मैंने उनकी जगह से प्रैस के नाम की हूल देकर उठाना उचित न समझा, योगेश को कुछ पंक्तियाँ आगे दो कुर्सियाँ खाली दिखाई दीं तो अपन ने वो लपक लीं। पीछे बैठे लोगों को मेरे ट्रायपॉड से देखने में कष्ट न हो इसलिए मैंने थोड़ा साइड में ट्रायपॉड लगाया, कोने की सीट होने का फायदा मिल गया।

रविवार सांय पहला कार्यक्रम सुगातो भादुड़ी का था जिन्होंने तबले के साथ संगत कर मैन्डोलिन का संगीत सुनाया। स्टेज के आगे और कुर्सियों की सीमारेखा तक की पूरी कि पूरी भूमि हरे कालीन से ढकी हुई थी, मैं प्रथम पंक्ति के आगे अपना ट्रायपॉड लेकर स्टेज के सामने पहुँच गया ताकि एकाध अच्छा फोटो मिल जाए, वैसे तो जहाँ हम लोगों की सीट थी वहाँ से भी कैमरे के पूरे ज़ूम पर मैं आराम से फोटो ले सकता था लेकिन पास की फोटो फिर पास की होती है!! ;)

मैन्डोलिन बजाते हुए सुगातो ठ??दुड़ी
( मैन्डोलिन बजाते हुए सुगातो भादुड़ी )

इधर मैंने अभी कुछ तस्वीरें ही ली थीं कि योगेश का फोन आ गया कि जल्दी वापस आऊँ। तो अपना ट्रायपॉड और कैमरा ले मैं वापस पहुँचा तो योगेश ने बताया कि अभी कुछ मिनट पहले पंगा हो गया था, कुछ पीछे की लगभग पूरी पंक्ति में चैनल वालों ने अपने-२ ट्रायपॉड खोल उनपर वीडियो कैमरे लगा रखे थे जिस कारण उनके पीछे बैठे लोगों को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था और इसी बात को लेकर एक दर्शक एक कैमरामैन से उलझ पड़ा था। दर्शक सही थे कि उनको कुछ दिखाई नहीं दे रहा था लेकिन गलती चैनल वालों की भी नहीं थी, उन्होंने तो उसी स्थान पर कैमरे लगाए थे जो उनके लिए आरक्षित था, यह तो दर्शक खामखा वहाँ बैठे हुए थे। देखा जाए तो गलती दिल्ली पर्यटन वालों की थी, उनको सबसे पीछे एक कदरन उँचा सा स्टेज बना देना चाहिए था मीडिया के लिए ताकि वे किसी दर्शक के आगे न आएँ।

खैर सुगातो जी का कार्यक्रम समाप्त हुआ और बोर करने के लिए ज़ी टीवी पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम हीरो होन्डा सा रे गा मा पा के 2005 के फाइनलिस्ट अर्पिता मुखर्जी और हेमचंद्र स्टेज पर पधारे। इधर अर्पिता से सुर नहीं खींचा जा रहा था, बारंबार कोशिश करती लेकिन आवाज़ फटती महसूस कर छोड़ देती थी तो दूसरी ओर हेमचंद्र गायकी पर कम और टशन मारने पर अधिक ध्यान दे रहा था जिस कारण दोनों में से कोई काम ठीक से नहीं कर पा रहा था। ;) पूरे डेढ़ घंटे दोनों ने, एक-२ करके भी और साथ में भी, वाहियात गायन से पका दिया, उठकर जाने की बहुत बार सोची कि कहीं टहल आते हैं जब तक ये बेसुरे अपना आइटम समाप्त करते हैं, लेकिन नेता और सरकारी बाबू की तरह हमको भी कुर्सी छिन जाने का खतरा था इसलिए कहीं नहीं गए, यदि ओबीसी की तरह आरक्षण मिला हुआ होता तो आराम से कहीं टहल आते!! ;) मुझे यह सोच बार-२ आश्चर्य हो रहा था कि ये दोनों फाइनल राउंड में कैसे पहुँचे थे। मुझे अच्छी तरह याद है कि दो-ढ़ाई वर्ष पहले तक जब सा रे गा मा पा मेरे पिताजी देखते थे तो मैं भी देख लेता था और फाइनल क्या आखिर के सभी राउंडों में पहुँचने वाले प्रतियोगी एक से बढ़कर एक गायक हुआ करते थे!! लगता है कि या तो इनकी किस्मत तेज़ थी या फिर सा रे गा मा पा भी इंडियन आईडल आदि की भांति फटीचर प्रतियोगिता हो गई है जिसमें कोई भी ऐरा-गैरा नत्थू खैरा फाइनल राउंड तक पहुँच जाता है!!

बहरहाल, किसी तरह इन दोनों द्वारा किया जा रहा टॉर्चर समाप्त हुआ तो इस वर्ष के कुतुब उत्सव का अंतिम कार्यक्रम आरंभ हुआ जिसका हमें ही नहीं वरन्‌ उपस्थित जनता को भी बड़ी बेसब्री से इंतज़ार था, भीड़ अब काफ़ी बढ़ गई थी, जितने लोग बैठे थे उससे अधिक सीट न मिल पाने के कारण खड़े थे और किस्मत वाले थे वे जो थोड़ा पहले आकर स्टेज और कुर्सियों की प्रथम पंक्ति के दरमयान खाली जगह पर कालीन पर ही आराम से बैठ गए थे। उत्सव के इस कार्यक्रम को पेश करने पाकिस्तान से तशरीफ़ लाए थे अपने भाई उस्ताद शराफ़त अली खान और अपने भतीजे शुजौत अली खान के साथ उस्ताद शफ़कत अली खान। उस्ताद शफ़कत अली खान का परिचय देते हुए (पिछले दिन से भिन्न) परिचारिका ने बताया कि उस्ताद शफ़कत अली खान के पुर्खे सम्राट अक़बर के दरबार में संगीतज्ञ थे और उस्ताद शफ़कत अली खान उनकी ग्यारवीं पीढ़ी के हैं तथा अधिकतर ख्याल और ठुमरी ही बजाते हैं।

बाएँ - उस्ताद शफ़कत अली खान, दाएँ - उस्ताद शराफ़त अली खान
( उस्ताद शफ़कत अली खान [बाएँ] और उस्ताद शराफ़त अली खान [दाएँ] )

उस्ताद शफ़कत अली खान ने शुरुआत सुर लगा के की, फिर अलग-२ गायकी बताई, कि भारत और पाकिस्तान में कैसे गाया जाता है, अफ़्गानिस्तान में कैसे गाया जाता है और ईरान तथा मध्य-पूर्व में कैसे झोल देकर गाया जाता है। उन्होंने अपना कार्यक्रम शुरु होने से पहले ही दर्शकों से गुज़ारिश कर दी थी कि एकाग्रता की आवश्यकता है इसलिए लोग-बाग़ खामोश रह गायन का आनंद लें और कोई हैरानी नहीं थी कि उनके गायन के दौरान लगभग खामोशी ही थी, बस बीच-२ में किसी अच्छे शेर के गायन पर तालियाँ बज उठती थीं। उस्ताद शफ़कत अली खान आदि द्वारा गाए गये एक गीत का लगभग संपूर्ण वीडियो यहाँ देखा जा सकता है

उस्ताद शफ़कत अली खान के कार्यक्रम के दौरान ही मुझे पीछे दिखाई देती कुतुब मीनार के साथ एक पैनोरमा (panorama) लेने का विचार आया तो ट्रायपॉड पर लगे कैमरे को दाएँ से बाएँ घुमाते हुए पाँच फोटो ले डाली जिनसे यह निम्न पैनोरमा बना।


( इस फोटो को बड़े रूप में देखने के लिए यहाँ क्लिक करें )

पहले पैनोरमा के हिसाब से तो ठीक-ठाक ही बन गया, वैसे ये पैनोरमा कम और किसी एसएलआर (SLR) कैमरे से लिया गया वाइड एंगल फोटो अधिक लगता है!! ;)

बहरहाल, उस्ताद शफ़कत अली खान का कार्यक्रम भी समाप्त हुआ और अपन अगले वर्ष के कुतुब उत्सव के बारे में सोचते हुए वापस लौट लिए। कुतुब उत्सव के अन्य फोटो यहाँ देखिए

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ओ ऽऽ राम तेरा ऽऽ सेतु

September 19, 2007 · 13 Comments

….. बना वोट पाने का माल ऽऽ,
कांग्रेस भी चाहे पाना इसको करुणा के साथ ऽऽ ॥

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हमरी फोटू लगी गैलरी मा

September 18, 2007 · 12 Comments

ईयहाँ वहाँ सुनत रहे एकठौ जगह पढ़े भी रहे कि फलां की फोटुओं की फलां गैलरी मा प्रदर्शनी हो रही है, फलां जगह डिसप्ले पर लगी है!! कई बार फोटू बहुत अच्छे होते तो कई बार ऐवईं चलती फिरती चवन्नी छाप फोटू होती कि सोच मा पड़ जाते कि ऐसन लोग जब प्रदर्शनी लगा सकत हैं और लोग-बाग़ देखन भी जात है, एकाध फोटू बिक भी जात(जिस मा प्रदर्शनी वगैरह की लागत लगभग सारी निकल आत है) हैं, तो हम काहे नाही अपनी भी लगा लें!! कोई रोके थोड़े ही है, ठीक ठाक तो हम भी खींच लेत हैं कभी कभार, तो आखिरकार हम भी अपनी प्रदर्शनी लगा लिए। अभी का है कि लगा लिए, लेकिन ऊ का प्रमाण का है? उधर नीरज दद्दा के ब्लॉग पर पढ़े रहे कि परभू राम को भी प्रमाण दे की जरूरत है, हम ठहरे मामूली गरीब आदमी, तो हमार को प्रमाण देई की जरूरत पड़े ही पड़ेगी!! तो प्रमाण हम तैयार कर लिए, प्रदर्शनी को हटाई दिए, ई है ऊ प्रमाण का फोटू जो साबित करे कि हम प्रदर्शनी लगाए थे!!

Gallery Exhibit!

ई फोटू हमहू लिए रहे, ऊ का प्रमाण है ई फोटू:

तो अब तो माने ही पड़ेगा कि हमार फोटू का भी प्रदर्शनी लगा था। ई का लगाए के हमार एकठौ तमन्ना भी पूरी हुई गवा, अब बाकियों का नंबर लगाएँगे!! ;)

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अरे चौंकिए मत, टेन्शन भी मत लीजिए, लेकिन यदि प्रदर्शनी लगाने की मुबारकबाद देना चाहते हैं तो अग्रिम रूप से ले लेंगे, बाद में कभी प्रदर्शनी लगाई तो तब वाले खाते में डाल दी जाएँगी!! कोई प्रदर्शनी वगैरह नहीं लगी मेरी किसी फोटो की, यह सिर्फ़ मज़ाक है। वह तितली की फोटो(दूसरे नंबर वाली) मैंने ही परसों रविवार(16 सितम्बर 2007) को ली है लेकिन वो गैलरी वाली फोटो(पहले नंबर वाली) सरासर नकली है। ;) तितली की इस फोटो को गैलरी में स्थित फ्रेम में एक मुफ़्त ऑनलाईन जुगाड़ के ज़रिए चढ़ाया है। इस जुगाड़ का नाम है डंपर (dumpr) और इस पर ऐसे कई फोकटी जुगाड़ हैं। अपनी पिछली पोस्ट में मैंने हिन्दी ब्लॉगजगत के चार महारथियों का स्कैच बना के दिखाया था, जो कि जुलाई में ली उनकी एक फोटो में कुछ पंगेबाज़ी करके बनाया था, तो कुछ लोगों ने पूछा था कि कैसे बनाया। अब मैंने तो पंगे लेकर उँगली करके किसी तरह बनाया था, इंटरनेट पर ढूँढेंगे तो बहुत ट्यूटोरियल (tutorial) भी मिल जाएँगे, लेकिन हर कोई कदाचित्‌ ऐसे पंगे समयाभाव आदि के कारण न ले पाए इसलिए एक तुरत-फुरत वाला जुगाड़ इस डंपर (dumpr) पर यहाँ उपलब्ध है। इस पर बिलकुल ही स्कैच जैसी बन जाती है फोटो, हर फोटो में शायद वो बात न आए लेकिन फ्री के जुगाड़ के रूप में यह अच्छा है। तो बस इंतज़ार किस बात का, इस पर फोटो अपलोड (upload) करिए या अपने फ़्लिकर (flickr), पिकासा (picasa), माईस्पेस (myspace) अथवा ज़ूमर (zoomr) पर मौजूद फोटो वाले पन्ने का लिंक या फोटो का सीधा लिंक डालिए और फोटो का एक क्लिक में स्कैच बनाईये, डाउनलोड कर अपनी ऑनलाईन फोटो एल्बम/गैलरी पर चढ़ाईये और सबको दिखाईये!! :)

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