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गुलाबी शहर

October 23, 2007 · 14 Comments

तकरीबन चार दिन से घर में ही था, मन बेचैन था तो पिछले से पिछले बृहसपति-वार की शाम को मन हुआ कि कहीं लम्बी ड्राईव पर चला जाए। आशीष को फोन कर पूछा कि क्या एक लम्बी ड्राईव पर साथ चलना चाहेगा तो उसने कहा कि उस दिन जाने की जगह अगले दिन(शुक्रवार) को शाम को जल्दी निकल लेते हैं जयपुर की तरफ़ और वहाँ चोखी ढाणी में खाना खा के वापस आ जाएँगे देर रात तक। आईडिया मुझे जंचा तो मैंने हाँ कर दी और फिर योगेश को फोन लगाया। चलने को योगेश भी तैयार लेकिन उसने सुझाव दिया कि रात को वापस न आकर रात वहीं बिताते हैं और अगले दिन एकाध किला वगैरह देख वापस आते हैं। अपने को ये बात बेहतर लगी, इसलिए आशीष को फाईनल प्रोग्राम बता दिया और उसने भी सहमति जता दी। अगले दिन यानि कि शुक्रवार को दोपहर में मैं और योगेश मेरी मोटरसाइकिल पर लद के गुड़गाँव पहुँचे और वहाँ से आशीष की गाड़ी में हम तीनों लद के जयपुर की ओर रवाना हो गए। पिछले ही दिन गाड़ी में लगाए सोनी(sony) के नए सीडी प्लेयर(CD Player) और जेबीएल(JBL) के स्पीकरों से मस्त संगीत बज रहा था और गति से हम जयपुर की ओर चल पड़े।

शाम घिर आई, अंधेरा हो गया, मैंने घड़ी में समय देखा तो कोई खास नहीं हुआ था, मैंने सोचा कि कुछ जल्दी ही अंधेरा हो गया, लगता है वाकई सर्दियाँ आ गई हैं और दिन छोटे हो गए हैं। लेकिन फिर आशीष ने कहा कि अब तो चश्मा उतार दूँ, तो तब एहसास हुआ कि आँखों पर धूप का चश्मा चढ़ा हुआ था और इस कारण मुझे लगा कि अंधेरा हो गया है, वैसे असल में अंधेरा होने में समय था!! ;) बहरहाल, मैंने धूप का चश्मा उतार अपना रेगुलर वाला लगा लिया और इधर असली में अंधेरा हुआ उधर पीछे की सीट पर आराम फ़रमा रहे योगेश बाबू को बीयर (beer) की तलब लग आई और वे बोले कि बीयर लेनी है। रास्ते में जो भी छोटा कस्बा आदि पड़ता, और कुछ हो या ना हो लेकिन उनको अंग्रेज़ी का ठेका अवश्य दिख जाता!! ;) काफ़ी देर तक तो हमने उनको कंट्रोल करवाए रखा लेकिन आखिर कब तक करवाते, आखिरकार एक पेट्रोल पंप पर हल्का होने की गरज़ से गाड़ी रोकी और योगेश बाबू काम निपटा बीयर की बोतलें भी ले आए अपने लिए!! ;)

तकरीबन साढ़े पाँच घंटे में हमने जयपुर में प्रवेश किया, लेकिन यातायात की बड़ी समस्या थी, बहुत से मार्ग इसलिए बंद थे क्योंकि कोई रैली निकल रही थी, पहले हम रेलवे स्टेशन का रास्ता पूछ भटकते रहे, जिस सरकारी होटल में हमने रात गुजारनी थी वह रेलवे स्टेशन के पास ही है यह जानकारी राजस्थान टूरिज़म की वेबसाईट मोबाइल पर खोल हासिल की थी!! पर जब हमको आधा घंटा हो गया छोटी गलियों से निकलते और इधर-उधर भटकते तो हमने निश्चय किया कि पहले चोखीढाणी चलते हैं वापसी पर रात हो जाएगी और तब तक सड़कें खाली हो जाएँगी, तो हमने एक-दो ट्रैफ़िक पुलिस वालों से रास्ता पूछा और चोखीढाणी पहुँच गए। पिछली बार चोखीढाणी मैं पिछले वर्ष जुलाई में आया था। एक वर्ष के अरसे में चोखीढाणी में काफ़ी बदलाव आए ऐसा महसूस हुआ,काफ़ी कुछ नया सा लगा।

एक लालटेन

कुछ दुकान

वैसे इस एक वर्ष के अरसे में मुझमें भी कुछ सुधार हुए हैं, पिछली बार जब वहाँ एक स्टॉल पर तीर-कमान से निशाने लगाए थे तो एकाध ही निशाने वाले गोल बोर्ड पर लगा था बाकी तो दाँए-बाँए निकल गए थे!! ;) इस बार लगता है कि तरकश वाले संजय भाई का आशीर्वाद साथ था, एक ही तीर बस निशाने से पहले गिर गया बाकी चारों बोर्ड पर लगे और उनमें से तीन सम्मानजनक थे। :D

तीरांदाज़ी अठ??यास

योगेश बाबू ने भी अपना हाथ तीरांदाज़ी पर आज़माया और वह मुझसे अधिक सफ़ल रहे!! वहीं लगी दुकानों में से एक में सुंदर रंगी गई तस्वीरें भी दिखी।

एक सुंदर हस्त रंगित चित्र

भोजन के स्तर में भी काफ़ी अंतर आ गया था, पिछले वर्ष किए गए भोजन को यदि मैं अति लज़ीज़ की संज्ञा दूँगा तो इस बार के भोजन को साधारण की श्रेणी में ही रखूँगा। हम सभी को काफ़ी भूख लगी थी लेकिन फिर भी भोजन में वो बात नहीं आई जिसकी अपेक्षा थी, यहाँ तक कि अंत में परोसे गए मालपुए भी उतने बढ़िया नहीं थे!! खैर, हम लोग भोजन उपरांत थोड़ा और घूमे और उसके बाद वापस जयपुर की ओर चल दिए। सड़के हर तरह की भीड़ से रिक्त हो चुकीं थी और हम आराम से सदर थाने के निकट स्थित होटल स्वागतम पहुँच गए।

अगले दिन थोड़ा जल्दी निकलने का प्रोग्राम था क्योंकि योगेश को शाम पाँच बजे तक घर पहुँचना था, लेकिन आशीष बिस्तर पर पड़ा सोता रहा और हम लोग होटल से लेट निकले। खैर, सबसे पहले हम लोग पहुँचे बस अड्डे के निकट स्थित मशहूर रावत कचौड़ी वाले के जहाँ कुछ हल्का फुल्का नाश्ता किया गया। तत्पश्चात हम लोग निकल चले किलों की ओर, समय कम था इसलिए तय किया गया कि एक ही किला देखेंगे और नाहरगढ़ किले के रास्ते पर निकल चले(पिछली बार जयगढ़ और आम्बेर के किले देखे थे, नाहरगढ़ छूट गया था)। इस बार एक बदलाव यह देखा कि पिछली बार सूखी भूमि पर स्थित जल-महल के चारों ओर इस बार काफ़ी जल था!! ;) खैर, हम लोगों के साथ पंगा हो गया और हम नाहरगढ़ की जगह जयगढ़ पहुँच गए। अब पहुँच गए तो पहुँच गए, शराफ़त से तीन प्रवेश टिकट लिए और तीन कैमरों के, लेकिन टिकट खिड़की में मौजूद साहब का या तो गणित कमज़ोर था या वो कुछ अधिक ही स्याने थे, हर किसी से फालतू पैसे ले रहे थे। मैंने और योगेश ने गेट के अंदर जाते ही पैसों का हिसाब लगाया तो पाया कि उन साहब ने हमसे चालीस रूपए अधिक वसूल लिए थे, तो इसलिए मैं वापस गया और उनसे वो चालीस रूपए वापस ले आया। लेकिन बाकी लोगों में कुछ तो विचार करते दिखे कि टिकट वाले बाबू ने पैसे अधिक लिए लेकिन वापस लेने कोई नहीं गया(हमारे सामने तो कोई नहीं गया, बाद में गया तो पता नहीं)!! ;)

अरावली की पहाड़ियों का सुंदर नज़ारा

जयगढ़ किले में जब हम लोग घूम रहे थे तो एक मौसी जी भी अपने दो छोटे भाँजों और बहन के साथ हमारे पीछे ही थीं। ये मौसी जी फिल्म शोले जैसी नहीं थीं, ये तो जवान भी थीं और सुंदर भी और अविवाहित भी!! ;) बहरहाल, मौसी जी की कुछ ज्ञान भरी बातें हम लोगों के कान में भी पड़ रही थीं, जैसे कि वे अपने भाँजों और बहन को बता रहीं थी कि जयगढ़ किला कोई तीन-चार सौ वर्ष पहले बना था(थोड़ी कन्फ्यूज़िया गई थीं मौसी जी क्योंकि जयगढ़ किला तकरीबन हज़ार वर्ष पहले बना था और उसके नीचे स्थित आम्बेर किला लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व बना था)। मौसी जी अपनी बहन जी को फोटोग्राफ़ी भी सिखा रहीं थी, भरी धूप में छोटी फ्लैश वाले छोटे डिजिटल कैमरे से फोटो खींचती अपनी बहन को सलाह दे रही थीं कि फ्लैश का प्रयोग करें!! ;)

बहरहाल हम लोग मौसी जी और उनके ग्रुप को पीछे छोड़ आगे निकल लिए। हम लोगों के पास समय का अभाव था इसलिए जल्दी ही सब निपटा वापसी की राह पकड़नी थी।

Watchtower

तो सारा मामला निपटा हम गुड़गाँव की राह पकड़ लिए, देर तो हो ही गई थी, तकरीबन सवा छह बजे गुड़गाँव पहुँचे और फिर मोटरसाइकिल पर सवार हो सात बजे तक योगेश को घर पहुँचाया!!

इस यात्रा में लिए गए सभी फोटो यहाँ हैं

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वीर योद्धाओं के देश में - भाग ४

March 10, 2007 · 4 Comments

पिछले अंक से आगे …..

सावित्री मंदिर से नीचे आकर हम प्रसिद्ध ब्रह्मा मंदिर की ओर बढ़ चले। वैसे प्रचलित मान्यताओं के अनुसार रचियता ब्रह्मा का संसार में एक ही मंदिर है और वह पुष्कर में है, लेकिन बाद में एन्सी ने खोज करके बताया कि यह सत्य नहीं है, ब्रह्मा के और भी मंदिर हैं। बहरहाल, हम मंदिर हो आए और वहाँ तस्वीरें भी लीं।

हर जगह की भांति यहाँ भी हमने पढ़े लिखे गंवारों के अस्तित्व के साक्षात प्रमाण मिले जो हर जगह जाकर ऐतिहासिक धरोहरों और जन संपदा का सत्यानाश करने के पुण्य कार्य में जी और जान से जुटे हुए हैं!! :roll:

ब्रह्मा मंदिर से बाहर आकर हम पास सामने ही मौजूद बाज़ार की ओर बढ़ गए। अब हम अलग-२ गुटों में बंट गए थे, जिसका सींग जिधर समाया वह उधर ही निकल लिया। योगेश के ऑफ़िस में काम करने वाली एक सहकर्मी भी अपनी माताजी के साथ पुष्कर आई हुई थी, तो योगेश ने बाज़ार में उनसे भेंट कर अच्छे रेस्तरां आदि की जानकारी ली। इधर तीनों लड़कियाँ एक कपड़ों की दुकान पर पहुँच गई और अपने लिए कपड़े देखने लगीं। उस दुकान से आगे बढ़े, हितेश को अपनी माताजी के लिए एक साड़ी लेनी थी, तो एक साड़ियों की दुकान में गए। वहाँ हितेश और शोभना साड़ियाँ देखने लगे, मुझे वहाँ अच्छे प्रिंट वाली चादरें दिखाई दी तो मैं और योगेश चादरें देखने लगे, स्निग्धा और एन्सी बगल वाली एक चूड़ियों की दुकान में व्यस्त थीं। कई चादरें देखने के बाद मुझे एक पसन्द आई, उसे लेने ही वाला था कि योगेश को उसमें डिफ़ेक्ट दिखाई दिया, दुकानदार के पास वैसा दूसरा पीस नहीं था तो मैंने एक दूसरे प्रिंट की चादर पसंद की, जाँच-परख की, मोल-भाव किया और भुगतान कर चादर खरीद ली। तब तक एन्सी और स्निग्धा भी अपनी खरीददारी कर वापस आ चुकीं थी। अब हम सब लोग सनसेट प्वायंट रेस्तरां की ओर चल पड़े(वापस जाकर ड्राईवर को उस रेस्तरां पर पहुँचने को बोल आए थे)।

रात्रि के तकरीबन नौ बज रहे थे, तो अब दुकानें बंद हो रही थीं। आखिरकार हम पूछते-२ रेस्तरां तक पहुँच ही गए। योगेश की सहकर्मी ने बताया था कि यह पुष्कर में खाना खाने के लिए सबसे बढ़िया जगह है। रेस्तरां में हल्की रोशनी थी, तीले की कुर्सियाँ थी और लगभग सभी मेहमान विदेशी पर्यटक थे। बहरहाल, खाना खाने से पहले और बाद कोई खास घटना नहीं घटी, सभी कुछ लगभग शांतिपूर्वक हो गया। जब वापस होटल पहुँचे तो थकान के मारे बुरा हाल था, मैं सोने जा रहा था लेकिन बाकियों ने जाने नहीं दिया, स्निग्धा-एन्सी के कमरे में महफ़िल जमनी थी सो जबरन मुझे वहाँ रोका गया। खैर अब क्या कर सकते थे, ओखल में सिर दिया तो मूसल से क्या डरना!! ;) बाकी सभी बिस्तर पर लद गए थे, अब जगह शेष नहीं थी तो अपन पास ही पड़ी एक कुर्सी पर पसर गए और गप्पों और बातों का दौर चालू हो गया। बातें कब तक चली यह पता नहीं लेकिन बहुत देर हो गई थी, अब सभी सोना चाहते थे, तो इसलिए अपन अपने कमरे में आ बिस्तर पर लंबे हो गए।

अगली सुबह मोबाईल में अलार्म बजने पर नींद खुली। रविवार की सुबह बहुत सुहावनी थी, जबरदस्त थी!! आराम से उठे और तैयार हुए, कोई जल्दी नहीं, कोई भागम-भाग नहीं। नाश्ते और दोपहर के भोजन का सम्मिलित रूप यानि कि ब्रंच लिया गया, होटल से चेकऑऊट कर सामान गाड़ी में लादा और हम लोग निकल पड़े पैदल ही बाज़ार में, ड्राईवर को ताकीद कर दिया कि वह ब्रह्मा मंदिर पर पहुँच हम लोगों की प्रतीक्षा करे। लड़कियों का शॉपिंग का बुखार अभी उतरा नहीं था, तो हम बेचारे भी उनका साथ देने उनके साथ-२ चले जा रहे थे, अब आखिर वे हम लोगों को थोड़ा-बहुत झेलती हैं तो हमारा भी फ़र्ज़ बनता है कि उनको काफ़ी-कुछ झेलें। ;) लेकिन बीच में कहीं पुनः गुट अलग हो गए, मैं और योगेश साथ-२ आगे बढ़े जा रहे थे। कई जगह पूछने के बाद आखिरकार प्रसिद्ध राधे हलवाई की दुकान पर पहुँचे और वहाँ से स्वादिष्ट मालपुए लिए। थोड़ा आगे जाकर प्रसिद्ध नटराज गुलकंद की दुकान भी मिल गई, तो मैंने और योगेश ने गुलकंद भी लिया। थोड़ा आगे जाकर बाकी के लोग भी मिल गए। जगह-२ चित्रकारी की हुई टीशर्ट दिखाई दे रही थीं जो देखने में काफी सुंदर लग रही थी।

मुझे एक बहुत सही से चित्र वाली एक टीशर्ट पसंद आई लेकिन वह केवल छोटे साईज़ में उपलब्ध थी, वही चित्र बड़े साईज़ की टीशर्ट में भी था लेकिन दूसरे रंग में जिसमें मुझे वह जंचा नहीं। तो आखिरकार कई चित्रों को देखने के बाद मुझे एक ऐल्फ़ के चित्र वाली टीशर्ट पसंद आई जो मैंने खरीद ली।

काफी देर बाद आखिरकार सभी की खरीददारी समाप्त हुई तो हम सभी गाड़ी में लद लिए और वापसी की राह पकड़ी।

यह यात्रा अभी तक की मेरी यात्राओं में सबसे अधिक थकान भरी थी, क्योंकि देखने के लिए बहुत कुछ था जो कि हमने बहुत कम समय में देखा। इस यात्रा के सभी चित्र यहाँ उपलब्ध हैं।

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वीर योद्धाओं के देश में - भाग ३

February 26, 2007 · 7 Comments

पिछले अंक से आगे …..

सुबह उठ सभी जल्दी तैयार हुए और होटल में ही तुरन्त नाश्ता निपटा के दरगाह शरीफ़ की ओर निकल पड़े। पार्किंग में गाड़ी खड़ी कर हम लोग दरगाह की ओर चल पड़े। बाज़ार में हितेश और योगेश ने सुन्दर सी टोपियाँ खरीदीं।

हितेश तो लाल रंग की जैकेट, अपनी टोपी और धूप के चश्में के कारण किसी फिल्म का हीरो टाईप ऑटो ड्राईवर लग रिया था!! ;) हमको बाज़ार में ही एक साहब मिले जो हमारा मार्गदर्शन करते हुए हमें दरगाह तक ले गए। दरगाह पर चढ़ाने के लिए चादर आदि ले कर हमने दरगाह में प्रवेश किया, वे साहब निरंतर हमारे साथ मार्गदर्शन करते हुए चल रहे थे। फ़िर एक जगह अंदर अंदर प्रवेशद्वार पर वे रूके, वहाँ बैठे मुल्ला जी ने हमें अपने सामने बिठा हमसे अजमेर शरीफ़ के दरबार में दुआ मंगवाई।

अन्य श्रद्धालु जन भी वहाँ पास ही दुआ में हाथ उठाए खड़े थे।

तीन दिन बाद मोहर्रम होने के कारण दरगाह पर कुछ अधिक ही भीड़ थी। बहरहाल हमारे मार्गदर्शक महोदय ने हमें अंदर प्रवेश करवा ही दिया, अंदर जाते ही पता चला कि बाहर की भीड़ तो कुछ भी नहीं थी, वास्तव भीड़ का एहसास तो अंदर हुआ जहाँ पाँव रखने की भी जगह नहीं थी। बड़ी कठिनाई से एक मुल्ला जी को चादर दी गई और फ़िर हम सभी बाहर की ओर निकल लिए। निकास द्वार के कुछ पहले एक मुल्ला जी ने मेरे को पकड़ लिया और मेरे गले में धागा बाँध कर कुछ बुदबुदा के फ़ूँका और फ़िर अपनी दक्षिणा माँगी। अब दिक्कत की बात यह थी कि मेरे पास पैसे नहीं थे क्योंकि मेरे ट्रैक सूट में सही जेब न होने के कारण मैंने अपना मोबाईल तथा बटुवा हितेश को दे दिए थे जो कि मेरे से काफ़ी पीछे था। मैंने मुल्ला जी से कहा कि मेरे पास पैसे नहीं मेरे साथी के पास हैं जो कि पीछे आ रहा है पर कदाचित्‌ उन्होंने समझा कि मैं उनसे कह रहा हूँ कि वे मेरे साथी से पैसे ले लें तो वे बोले कि देने तो मुझे अपने हाथ से ही होंगे, जितने चाहे उतने दे दूँ। फ़िर मैंने उनको पुनः कहा कि मेरे पास एक रूपया भी नहीं है, तो तब उन्होंने मेरे को छोड़ा। छूटते ही मैं तुरंत गोली की तरह बाहर निकल आया तथा मैं और एन्सी(जो मेरे आगे ही थी और मुल्ला जी की गिरफ़्त में नहीं आई थी) बाकी मित्रों की प्रतीक्षा करने लगे। जल्द ही बाकी लोग भी आ गए तो फ़िर जिसकी श्रद्धा था उन्होंने मन्नत माँगते हुए पास ही की दीवार की जाली में धागे बाँधे।

तत्पश्चात हमने आसपास की कुछ तस्वीरें लीं, थोड़ी देर एक जगह बैठ विश्राम किया। हमारे मार्गदर्शक महोदय हमारे पास आए और अपना कार्ड हमें दिया। हम सभी अभी तक सोचे बैठे थे कि वे अन्य गाईडों की भांति अंत में हमने पैसे माँगेंगे परन्तु उन्होंने बताया कि वे दरगाह समीति की ओर से नियुक्त किए गए पुजारियों में से एक हैं जिनका कार्य पर्यटकों को गरगाह के दर्शन करवाना है ताकि वे किसी गलत व्यक्ति(जैसे कि किसी दुकानदार, पेशेवर गाईड आदि) के चक्कर में न पड़ जाएँ और वे इसके लिए पर्यटकों से कोई पैसा नहीं लेते। कुछ देर दरगाह प्रांगण में बिता हमने बाहर की राह पकड़ी। बाहर निकलने से पहले हमने मुग़ल बादशाह अकबर द्वारा दान में दी गई बड़ी देग़ और जहाँगीर द्वारा दी गई छोटी देग देखी जिनमें कभी सैकड़ों लोगों के लिए खाना बनता था।

सीढ़ियाँ चढ़ के ऊपर पहुँच देखा कि देग में अब पैसे आदि पड़े हैं, अन्धविश्वासी लोगों ने इसको भी नहीं छोड़ा और इसे भी मन्नत माँगने का स्थान बना दिया। उस समय कैसे भाव मन में आए यह मैं व्यक्त नहीं कर सकता!!

दरगाह से बाहर आ मैंने दो प्रकार के इत्र लिए। बाज़ार से वापसी के दौरान हितेश का मन अढ़ाई दिन का झोंपड़ा देखने का हुआ तो वह और स्निग्धा उसे देखने चले गए और हम बाज़ार में प्रतीक्षा करने लगे। कुछ समय बाद दोनों लौटे और हम लोग गाड़ी में बैठ पुष्कर की ओर निकल गए।

कुछ ही समय में हम पुष्कर पहुँच गए और हमें अपना होटल, राजस्थान पर्यटन विभाग का होटल सरोवर(जो कि पुष्कर के सरोवर के बाजू में ही स्थित है), ढूँढने में भी कोई दिक्कत नहीं आई। होटल पहुँच हमने रिसेप्शन पर बताया कि हम लोगों की रिज़र्वेशन है तो उत्तर मिला कि कमरे दोपहर 12 बजे के बाद ही मिलेंगे क्योंकि उस समय कोई भी कमरा खाली नहीं था। बारह बजने में लगभग आधा घंटा था इसलिए हम होटल के लॉन में आकर बैठ गए। वहाँ कुछ प्यारे से कुत्ते के पिल्ले आपस में खेल रहे थे। मैंने उनकी तस्वीर लेने के लिए कैमरा चालू किया तो वे तुरंत तस्वीर खिंचवाने के लिए पोज़ में आ गए। ;)

लेकिन स्निग्धा जब उनको पुचकारने के लिए गई तो उसके हाथ में न कोई खाने का सामान था और न ही कैमरा। तो कदाचित्‌ खतरा भाँप के सारे पिल्ले भाग के पास ही एक झाड़ी के पीछे चले गए!! ;)

आसपास नज़र दौड़ाने से पता चला कि आसपास बहुत ही अच्छे नज़ारे थे।

जल्द ही हमें हमारे कमरे मिल गए तो उनमें अपना सामान रख हमने तुरंत दोपहर का भोजन निपटाया और गाड़ी में ब्रह्मा मंदिर की ओर निकल पड़े। ब्रह्मा मंदिर से पहले एक मार्ग सावित्री मंदिर की ओर जाता है जो कि एक पहाड़ी के शिखर पर स्थित है।

सभी ने पहले वहीं जाने का निर्णय किया। गाड़ी चढ़ाई के आरंभ में ही खड़ी कर हम पैदल आगे बढ़ चले। मंदिर में चढ़ाने के लिए हमने प्रसाद लिया। योगेश और स्निग्धा सामान्य पथ से ऊपर जाने के इच्छुक नहीं थे, उन पर ट्रेकिंग तथा पर्वतारोहण का भूत जमकर नृत्य कर रहा था इसलिए उन्होंने रेतीले और पथरीले मार्ग से ऊपर वहाँ तक चढ़ने की सोची जहाँ तक सुगमता से चल के जाया जा सकता था। हितेश और शोभना भी उनके साथ हो लिए। एन्सी उस तरीके से ऊपर जाने के लिए तैयार नहीं थी तो उसका साथ देने के लिए मैं उसके साथ हो लिया। हम लोग आराम से ऊपर चढ़े जा रहे थे, बीच बीच में एकाध जगह रूक कर तस्वीरें आदि ले रहे थे। थोड़ा ऊपर पहुँच पीछे देखा तो पूरा पुष्कर और पुष्कर की दूसरी ओर पहाड़ी पर स्थित पाप मोचिनी मंदिर दिखाई पड़ रहा था।

आधे रास्ते से थोड़ा और ऊपर पहुँचने पर मार्ग के एक ओर से एक बहुत अच्छा नज़ारा दिखा जिसने एक रोमांच की सी अनुभूति करवाई।

अन्य साथियों की आवाज़ें सुनाई पड़ रही थी, उनकी ओर से अब ऊपर आने का मार्ग दुर्गम था क्योंकि पहाड़ी सीधी हो रही थी, इसलिए उनको आम-मार्ग पर आने को बोल दिया। कुछ ही मिनट में वे ऊपर आते दिखाई पड़ गए!!

इस पहाड़ी पर लंगूरों की भरमार थी और सभी लंगूर दिलेर इतने थे कि हाथों से सामान छीन के भाग जाते थे। ऐसा ही एक लंगूर रास्ते में शोभना के हाथों से प्रसाद छीन के भाग गया था। मैंने और एन्सी ने अपना अपना प्रसाद एन्सी के बैग में रख दिया था इसलिए वह बचा रह गया।

आखिरकार हम सभी ऊपर शिखर पर पहुँच ही गए। ऊपर आते समय अन्य लोगों को कोई दिक्कत महसूस हुई या नहीं यह मैं नहीं जानता लेकिन पिछले अगस्त में तुन्गनाथ की कठिन चढ़ाई के बाद यह चढ़ाई तो बहुत मामूली सी लगी। ;)

पुष्कर में विदेशी पर्यटक बहुत आते हैं, इज़राईल से तो बहुत बड़ी संख्या में आते हैं, यहाँ सावित्री मंदिर में भी कई विदेशी पर्यटक आए हुए थे। मंदिर परिसर में तस्वीर लेना वर्जित था इसलिए हम केवल दर्शन कर और प्रसाद चढ़ा के बाहर आ गए। बाजू में ही एक हिल टॉप कैफ़े यानि कि एक चाय की दुकान थी जिसने अन्य सामान जैसे चॉकलेट, बिस्कुट, शीतल पेय आदि भी रख रखे थे। दुकान के सामने छोटी सी समतल भूमि थी जिसके आगे खाई थी और एक ओर से सूर्यास्त होता दिख रहा था। नज़ारा बहुत ही मनमोहक था इसलिए (मेरे अतिरिक्त)सभी ने वहीं (कुर्सियों पर)बैठ चाय पीने का निर्णय लिया।

सूर्यास्त हो रहा था, इसलिए इस समय श्वेत-श्याम तस्वीरें बहुत सुंदर आईं।

जब चाय आदि पी जा रही थी तो सभी लंगूर ताक में आसपास ही बैठे थे। शोभना एक बिस्कुट का पैकेट लेकर आई और तुरंत ही एक लंगूर उसे छीन के भाग गया!! इसलिए दूसरा पैकेट खोलते समय सभी सतर्क थे, जैसे ही लगा कि कोई लंगूर झपटने वाला है वैसे ही उसे छुपा के लंगूर को डरा के भगाया गया। अंधेरा हो आया था, वापसी का मार्ग कोई आसान नहीं था और वह भी अंधेरे में, तो इसलिए हमने वापसी की राह पकड़ी। ऊपर आते समय जगह-२ सूचनापट देखे थे जो कि सूर्यास्त से पहले नीचे उतर आने पर ज़ोर दे रहे थे, फ़िर भी हमारा सूर्यास्त से पहले नीचे उतरना हुआ ही नहीं, क्योंकि हम ऊपर सूर्यास्त से कुछ पहले ही गए थे। मार्ग में कुछ बल्ब आदि लगे थोड़ी रोशनी प्रदान कर रहे थे परन्तु वह पर्याप्त नहीं थी, इसलिए सावधानीवश हम एक दूसरे का हाथ पकड़ नीचे उतरे।

नीचे आकर सभी ने चैन की सांस ली और फ़िर ब्रह्मा मंदिर की ओर बढ़ चले।

अगले अंक में जारी …..

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वीर योद्धाओं के देश में - भाग २

February 11, 2007 · 6 Comments

पिछले अंक से आगे …..

तारागढ़ में मैंने कुछ अच्छी तस्वीरें ली थीं परन्तु फिर भी मन थोड़ा खिन्न था, कदाचित्‌ किले की अनुपस्थिती देख। बहरहाल अब हम तारागढ़ से नीचे वापस अजमेर में आ गए और पता पूछते हुए अना सागर के नाम से प्रसिद्ध कृत्रिम तालाब की ओर बढ़ चले। वहाँ पहुँच के लगा कि पहले भोजन कर लिया जाए, लगभग सभी क्षुधा पीड़ित थे, तो पास ही मौजूद “पंडित भोजनालय” में जाने की सोची। लेकिन वहाँ अंदर जाकर कुछ का मन बदल गया, वहाँ खाने का उनका मन नहीं था, लेकिन हमारे ड्राईवर साहब अपने भोजन का ऑर्डर दे चुके थे, तो इसलिए हम लोग भी बैठ गए कि जैसे ही वे अपना भोजन समाप्त करेंगे तो हम चल के किसी अन्य रेस्तरां में भोजन लेंगे।

कुछ देर बाद हम किसी अन्य रेस्तरां को खोज रहे थे, कई जगह पूछा, हर जगह अलग उत्तर मिला। अभी बाज़ार से गुज़र रहे थे कि एक जगह “होटल, रेस्तरां एण्ड बार” का बोर्ड दिखा तो गाड़ी रूकवा वहाँ पता करने गए कि रेस्तरां खुला है कि नहीं। रिसेप्शन पर उपस्थित महोदय ने बताया कि अभी उनका रेस्तरां चालू नहीं हुआ है। उनसे किसी अच्छे रेस्तरां के बारे में पूछा तो उन्होंने दिशा निर्देश देते हुए बताया कि पास ही में “मैंगो मसाला” नाम का रेस्तरां है जो कि अजमेर में सबसे बढ़िया है। तो हम लोग चल पड़े उनके दिए दिशा निर्देशों के अनुसार और रास्ते में भी एकाध जगह पूछ लिया उस रेस्तरां के बारे में। आखिरकार कुछ देर भटकने के बाद हम पहुँच ही गए “मैंगो मसाला” पर। सभी की तबियत उसको देख प्रसन्न हो गई। ऑर्डर देने के बाद उन्होंने खाना भी जल्द ही परोस दिया, अधिक समय नहीं लगाया। भरपेट भोजन के बाद हम पुनः पहुँच गए अना सागर नामक तालाब पर। सांयकाल और छुट्टी(26 जनवरी) होने के कारण कदाचित्‌ कुछ अधिक ही भीड़ थी, अंदर बाग़ में भी बहुत लोग अपने अपने परिवारों और मित्रों के साथ आए हुए थे, विदेशी पर्यटक भी थे।

हमने सबसे पहले तालाब में नौका विहार करने की सोची, तालाब काफी बड़ा था और बीच में एक टापू भी था। नौकाविहार के लिए टिकट लेने पहुँचे तो वहाँ भी बहुत भीड़ थी और फिर पता चला कि सभी नौकाएँ व्यस्त हैं, तकरीबन आधे घंटे बाद नंबर आएगा। यह देख हमने नौकाविहार का विचार त्याग दिया और ऐसे ही बाग़ में टहलने की सोची। तालाब के किनारे पर हर तरह का कूड़ा पड़ा था, किनारे का पानी भी बहुत गंदा हरे रंग का था और बहुत तीव्र दुर्गन्ध आ रही थी।

बाग़ में नशेड़ी भरे हुए थे जो कि नशे में धुत घास पर बेसुध पड़े थे। एन्सी और शोभना से माहौल बर्दाश्त नहीं हो रहा था तो वे लोग बाहर गाड़ी में जाकर बैठ गए। मैं और योगेश बाग़ में ही थे, योगेश को तस्वीर लेने के लिए कुछ अच्छा मिल नहीं रहा था तो उसी की तलाश थी। तभी मैंने देखा कि सूर्य पश्चिम में पहुँच चुका है और शीघ्र ही अस्त हो जाएगा। लेकिन मौजूदा स्थिति में तालाब के जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब बहुत सही लग रहा था, तो मैंने उसकी तुरंत तस्वीर ले डाली।

आखिरकार योगेश को लेने लायक एक फ्रेम दिखाई पड़ गया तो उसकी तस्वीर ले ली गई और फिर हम दोनों भी वापस बाहर ही ओर हो लिए।

अब लिस्ट में अगला नंबर था “अढाई दिन के झोंपड़े” का, तो उसका पता पूछते-पूछते हम बढ़े चले जा रहे थे। किसी महानुभाव के बताए गलत रास्ते पर बढ़ते हुए हम दरगाह के एक मार्ग पर पहुँच गए जहाँ से अढाई दिन के झोंपड़े पर पहुँचने के लिए काफी चलना पड़ता। तो फिर किसी साहब ने दूसरा मार्ग बताया जहाँ से गाड़ी जा सकती है तो हम उस मार्ग पर बढ़ चले। बढ़ते-२ एक पहाड़ी सड़क पर पहुँचे जहाँ अत्यधिक तीव्र दुर्गन्ध आ रही थी क्योंकि आसपास बहुत से कुत्ते और कुत्ते के बच्चे मरे पड़े थे और उनके शव सड़ रहे थे(ये सब गाड़ियों के नीचे आकर मरे थे क्योंकि एकदम से ये गाड़ियों के सामने आ जाते हैं)। वहाँ सड़क के एक ओर एक खंडहर सी दीवार का एक भाग ही दिख रहा था। सबने सोचा कि यही अढाई दिन का झोंपड़ा है इसलिए अपने को कोसने से लगे कि क्या इसी के लिए इतनी दूर आए। वापस पलट के जा रहे थे कि मार्ग में एक पर्यटन वालों की टवेरा को देख रूक गए कि ताकी उसके ड्राईवर से पूछ लिया जाए। ड्राईवर से पता चला कि जिस दीवार के खंडहर को हम अढ़ाई दिन का झोंपड़ा समझ रहे थे दरअसल वह एक पुरानी दीवार का भाग ही था, अढाई दिन का झोंपड़ा तो आगे था जिस पर जाने का रास्ता सड़क से नीचे उतर बाज़ार से था। तो गाड़ी वापस घुमा हम चल दिए। चूँकि अभी दो और मित्रों ने रात तक अजमेर पहुँचना था इसलिए सर्वसम्मती से निर्णय लिया गया कि हम लोग दरगाह अगले दिन सुबह जाएँगे, आज नहीं जाएँगे!! बाज़ार में एक दुकानदार से पूछा तो उसने कहा कि उसकी दुकान के पीछे जो सीढ़ियाँ जा रही हैं वहीं से रास्ता है। हम लोग वहाँ से आगे बढ़े कि एकाएक एक बावला सा लगने वाला फटेहाल व्यक्ति सामने आ गया और बोला कि वहाँ से आगे नहीं जा सकते, अढाई दिन के झोंपड़े पर जाने के लिए आगे से रास्ता है, वह नहीं है। हम उसकी बात पलटे और सीढ़ियाँ उतर दूसरे रास्ते की ओर बाज़ार में बढ़ चले। तभी शोभना घबराई सी पास आई, मैंने पूछा क्या हुआ तो बोली कि उसी व्यक्ति ने उसे पीछे से पकड़ने की कोशिश की थी। उसके बाद मैंने एन्सी और शोभना को हिदायत दी कि मेरे और योगेश के साथ रहें, अलग न विचर जाएँ।

कुछ ही पल बाद हम अढाई दिन के झोंपड़े पर पहुँच गए।

कुछ खास नहीं वहाँ, एक मस्जिद बनी हुई है। लेकिन मुख्य इमारत पर अच्छी शिल्पकारी की गई है, यह आपको दिन में ही अच्छे से दिखाई देगी, जिस समय हम पहुँचे उस समय सूर्यास्त हो चुका था। इतिहासकारों के अनुसार यहाँ हज़ार वर्ष पहले तक जैन मन्दिर होते थे। पृथ्वीराज चौहान को हरा चुकने के बाद हाकिम बने मोहम्मद गोरी ने इनको मस्जिद में तब्दील करने का फ़रमान जारी किया था जिसको उसके हुक्मबरदारों ने ढाई दिन में बजा के दिखाया था जिस कारण इसका नाम “अढाई दिन का झोंपड़ा” पड़ा।

अंधेरा घिर आया था इसलिए हम सभी ने वापस जाने की सोची।

बाज़ार में रंगीनियाँ और रोशनी बहुत थी, चहलपहल भी खूब थी। बहुत से नग वगैरह बेचने वाले बैठे थे जो कि वास्तव में सिर्फ़ काँच के टुकड़े थे। एक दुकान पर पहुँच मैंने तस्वीर ली और दुकानदार से दर्याफ़्त करने पर पता चला कि साहब अमेरिकन डायमण्ड बेच रहे थे!! ;)

बहरहाल, हम आगे बढ़ते गए, वापस अपनी गाड़ी में बैठे और अपने होटल पहुँच गए। अब सभी थकान के कारण खस्ताहाल थे। इधर हितेश को फोन लगाया तो पता चला कि वह और स्निग्धा बस पहुँच ही गए हैं और होटल की ओर आ रहे हैं। हम भी नीचे उतर आए और अपने ड्राईवर को जगाया जो कि बेचारा यह सोच गाड़ी में सो गया था कि हमारा आज का कोटा पूरा हो गया था और अब कहीं नहीं जाएँगे। हम होटल के प्रवेशद्वार पर खड़े दोनों की प्रतीक्षा कर रहे थे कि जैसे ही आएँगे उनको गाड़ी में अगवा कर रात्रिभोज के लिए चलेंगे क्योंकि तकरीबन साढ़े नौ बज रहे थे और पता नहीं था कि कब तक रेस्तरां खुलेंगे क्योंकि दुकानें आदि बंद होना शुरू हो गई थीं। तभी हमको हितेश और स्निग्धा आते नज़र आए, सभी उनसे बलगीर हो मिले। आननफ़ानन उनका सामान गाड़ी में लादा गया और गाड़ी “मैंगो मसाला” की ओर चल पड़ी। अब वही रेस्तरां इस कारण सूझा क्योंकि किसी और रेस्तरां को जाँचने का समय नहीं था। ;)

रेस्तरां पहुँच उसके बाहर गाड़ियों की ठीक-ठाक तादाद देख सबकी जान में जान आई, रेस्तरां अभी खुला था। अंदर पहुँच सभी एक टेबल पर काबिज़ हुए और तुरंत खाने का ऑर्डर दिया गया जो कि जल्द ही सर्व हुआ। पेटभर खा चुकने के बाद तीनों लड़कियों का सिन(sin) यानि कि पाप करने का मन हुआ। अब ऐसा वैसा मत सोचिए, यहाँ सिन करने का अर्थ है डेज़र्ट(dessert) से है जिसे खाना पाप इसलिए समझा जाता है ताकि उसे कम किया(खाया) जाए क्योंकि कैलोरी(calorie) से भरपूर होता है। मैंने और हितेश ने सिन करने में लड़कियों का साथ देना कबूल किया, योगेश ने बिना चॉकलेट के सभी पापों में थोड़ा हिस्सा बंटाना स्वीकारा। बहरहाल सभी ने तगड़े पाप किए और फिर वापस होटल की राह पकड़ी!! ;) होटल पहुँच सभी ने तरोताज़ा हो लड़कियों के कमरे में एकत्र हो महफ़िल जमाने की सोची और थोड़ी देर बाद सभी अपनी-२ उपस्थिति लगा रहे थे। लेकिन बोतल खोलने और खाली करने लायक कोई नहीं था, जहाँ हम चार लोग सारा दिन अजमेर में घूम ऐसी-कि-तैसी करवा चुके थे, वहीं हितेश और स्निग्धा आठ घंटे के बस के सफ़र से खस्ताहाल थे। अगले दिन सुबह जल्दी उठना भी था क्योंकि दरगाह भी जाना था और उसके बाद पुष्कर की राह पकड़नी थी, इसलिए थोड़ी देर की गपशप के बाद सभी ने शुभरात्रि बोल अपने-२ बिस्तर पकड़ लिए।

अगले अंक में जारी …..

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वीर योद्धाओं के देश में - भाग १

February 3, 2007 · 4 Comments

अभी हाल ही में, यानि कि कुछ दिन पहले ही, पर्वतों में नव-वर्ष का स्वागत किया परन्तु घूमने फ़िरने का कीड़ा पुनः कुलबुला रहा था, इसलिए फिर कहीं घूम आने की सोची। इस बार किसी पर्वतीय स्थल की ओर न जाने का निर्णय लिया, सर्दियों का मौसम है इसलिए धूप से नहाया राजस्थान हमें आवाज़ दे बुला रहा था। पिछले वर्ष नवंबर के अंत में उर्स के दौरान जहाँ हम न जा पाए, उस वीरों के देश अजमेर घूम आने का हमने मन और प्रोग्राम बनाया। जैसे कि अब आदत हो गई है और जैसा कि अब अपेक्षित रहता है, इस यात्रा के आरम्भ में भी वही पुरानी नौटंकियाँ हुई, कलाकार लोगों की आदत आराम से थोड़े ही छूटती है!! ;) बहरहाल, हमेशा की तरह अपना इरादा पक्का था, साथ देने वालों की कमी नहीं थी, तो अपना रायता नहीं बिखरा। 26 जनवरी का शुक्रवार था, इसलिए तीन दिन की सप्ताहांत की छुट्टी थी, तो मैं, योगेश, एन्सी और शोभना 25 जनवरी की रात को अजमेर की ओर निकल पड़े। साथ में एन्सी के मित्र मनीष भी थे जो अपने घर जयपुर जा रहे थे, अब चूँकि जयपुर अजमेर के रास्ते में ही पड़ता है इसलिए हमने उनको जयपुर तक लिफ़्ट देना सहर्ष स्वीकार लिया। स्निग्धा और हितेश 26 की शाम तक अजमेर पहुँचने वाले थे क्योंकि स्निग्धा की बंगलूरू से दिल्ली की उड़ान 26 तारीख़ की सुबह की थी।

तो अपना अपना सामान लाद(गाड़ी में) हम लोग निकल पड़े दिल्ली-जयपुर राजमार्ग पर, आहा, सड़क ऐसी जैसे मक्खन, गाड़ी अपनी गति से उड़ी जा रही थी। टैक्सी वाले ने इस बार जो गाड़ी भेजी थी उसमें सीडी-एमपी३ प्लेयर था, तो गानों की मस्त धुनें एक के बाद एक बजे जा रही थी, नींद भी आ रही थी, बीच-बीच में कब आँख लग जाती पता ही नहीं चलता था। एक जगह रूक चाय आदि पी गई और मैं आगे ड्राईवर के बगल वाली सीट से हट सबसे पीछे की एक सीट पर सामान के साथ अकेला जा बैठा। इसी कारण मुझे शेवरलेट की टवेरा टोयोटा की क्वालिस से अधिक पसंद है, क्योंकि टवेरा की पीछे की सीटें क्वालिस के मुकाबले अधिक आरामदायक हैं। तो अपन तो पूरा लाभ लेते हुए पीछे की एक सीट पर पसर गए, पूरे नहीं तो कुछ ही सही!! ;) कुछ घंटों बाद पता चला कि जयपुर आ गया है, वहाँ हमने मनीष को अलविदा कहा और अजमेर के रास्ते पर बढ़ गए। आबादी पुनः पीछे छूट गई और हम सुनसान सी सड़क पर आगे बढ़े जा रहे थे। थोड़ा आगे जाकर हमने किशनगढ़ को पार किया। सारी रात अधलेटी अवस्था में उचटती सी निद्रा लेने के कारण बदन दुख सा रहा था, सबसे आगे बैठे योगेश ने आवाज़ लगा कर बताया कि पौ फटने वाली है और यदि कोई तस्वीर आदि लेनी है तो बढ़िया समय है। थोड़ा आगे रिलायंस का एक पेट्रोल पंप दिखा तो गाड़ी वहाँ रोक दी गई ताकी सभी अपनी टाँगे सीधी कर सकें, किसी को हल्का होना है तो वह काम भी निपटा लिया जाए!! ;) सूर्योदय होने वाला था, इसलिए अपना कैमरा निकाल मैं तैयार था और नतीजे से मुझे निराश नहीं होना पड़ा!! :)

बहुत कम ऐसा हुआ है कि कोई तस्वीर लेकर संतुष्टि हुई है, यह तस्वीर उन कुछ तस्वीरों में से एक जिसे लेकर संतुष्टि का एहसास हुआ। :) बहरहाल, एकाध तस्वीर लेकर हम पुनः अपने रास्ते लग लिए, मंज़िल अब कोई अधिक दूर नहीं थी। सवेरा हो आया था और हम बिना भटके अपने पहले पड़ाव यानि कि होटल खादिम तक पहुँच गए। अंदर रिसेप्शन पर पता चला कि मैंने जो फोन पर कमरे बुक करवाए थे वे हमे मिल जाएँगे, बुकिंग को उन्होंने मज़ाक में नहीं लिया था!! तो हम लोगों ने अपने कमरों में पहुँच सामान पटका, कमरे तक छोड़ने आया बैरा आदतानुसार सलाम बजाता खड़ा रहा जब तक उसे टिप नहीं दी गई!! नाश्ते के लिए हमे नीचे होटल के रेस्तरां में जाना पड़ा, फोन पर उन्होंने साफ़ बता दिया कि रूम सर्विस उपलब्ध नहीं है। नीचे रेस्तरां में नाश्ते की प्रतीक्षा करते हमने एक बैरे को कुछ खाने-पीने के सामान को ले जाते देखा तो हमें अजीब लगा क्योंकि उन्होंने मना कर दिया था कि रूम सर्विस नहीं है। पूछने पर पता चला कि किसी बीमार व्यक्ति के लिए ले जाया जा रहा है जो स्वयं रेस्तरां में नहीं आ सकता। लेकिन कुछ समय बाद और भी नाश्ते की प्लेटें आदि जाती देखी और उसके बाद और भी, तो हम सोचने पर मजबूर हो गए कि क्या अजमेर में मौजूद सभी बीमार पर्यटक होटल खादिम में रूके हुए हैं!! वैसे दिमाग को अधिक कसरत करवाने की आवश्यकता नहीं थी, हम समझ गए कि नाश्ते क्यों और किन लोगों के लिए जा रहे हैं!! खैर, हम अपने नाश्ते आदि से निपटने के बाद अपने कमरों में आ गए दो घंटे की नींद ले थकान दूर करने के लिए। कहीं जाने की कोई जल्दी नहीं थी और वैसे भी उस समय सुबह के सिर्फ़ नौ बजे थे, इसलिए सवा ग्यारह का अलार्म लगा मैं भी सो गया।

थोड़ी देर बाद योगेश ने मुझे जगा दिया यह कहकर कि बहुत नींद ले ली!! मुझे लगा कि अभी तो सोया था और फ़िर अपने को कोसने लगा कि मैं आदतानुसार पुनः अलार्म बंद कर सो क्यों गया। लेकिन आश्चर्य भी हुआ क्योंकि अलार्म बंद कर सोने की आदत तो घर पर है, बाहर कहीं, खासतौर पर किसी यात्रा के दौरान, तो मैं अलार्म बजते ही तुरंत उठ जाता हूँ। मोबाईल में समय देखा तो पता चला कि ग्यारह बजने में पंद्रह मिनट थे, यानि कि योगेश ने मुझे आधा घंटा पहले ही उठा दिया था। मन तो ऐसा हुआ कि पता नहीं क्या कर दूँ, लेकिन अब क्या कर सकता था, इसलिए निद्रा रानी को फ़िर मिलने का वायदा कह अलविदा किया और नहा-धोकर तैयार हो गए। लड़कियों के कमरे में गए तो जैसा कि अपेक्षित था, वे अभी तैयार नहीं हुई थी जबकि मैं और योगेश पूरी तरह तैयार थे। खैर, थोड़ी देर बाद हम सभी तैयार थे, इसलिए नीचे गाड़ी के पास पहुँच ड्राईवर साहब को उठाया। रिसेप्शन पर बैठे अंकल से पूछा कि अजमेर में देखने को क्या है तो वे बोले कि अजमेर में देखने को कुछ नहीं है। तारागढ़ के किले का कुछ नहीं बचा है और वहाँ मुस्लिम बस्ती बसी हुई है, अना-सागर तालाब बेकार है, बस प्रसिद्ध सूफ़ी मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है जहाँ दर्शन करने लोग आते हैं। अब जब ऐसा सुनने को मिला तो मैंने कुछ ना बोलना ही ठीक समझा, अंकल को धन्यवाद कहा और अपनी आऊटलुक ट्रैवलर की गाईडबुक पर भरोसा कर चल दिए तारागढ़ के किले की ओर। 26 जनवरी होने के कारण सड़कें खाली सी पड़ी थीं, तारागढ़ के लिए चढ़ाई आरम्भ होने से पहले सड़क पर एक जगह तस्वीरें लेने के लिए सही लगी तो वहाँ सभी तस्वीर लेने और खिंचवाने के लिए उतर गए।

बहरहाल, तस्वीरें ले हम आगे बढ़ चले और तारागढ़ जाने के पहाड़ी रास्ते को पकड़ा। मार्ग में एक जगह राजस्थान पर्यटन विभाग ने पर्यटन स्थल जैसा कुछ बना रखा है जिसे “सम्राट पृथ्वीराज चौहान स्मारक” का नाम दे रखा है और जहाँ घोड़े पर सवार पृथ्वीराज चौहान की काले पत्थर की बड़ी प्रतिमा लगा रखी है। कुछ देर बाद हम तारागढ़ पहुँच गए, किला वहाँ अब नहीं है, सिर्फ़ दीवारों के कुछ छोटे-मोटे भाग ही बचे हुए हैं। जैसा कि होटल के रिसेप्शन पर बताया गया था, तारगढ़ में अब मस्जिद और दरगाह है और मुस्लिम बस्ती है। कभी यहाँ एक किला हुआ करता था जो कि लगभग नौ शताब्दियों पहले तक चौहान साम्राज्य का गढ़ था। तारागढ़ के बारे में कहा जाता है कि किसी पर्वत पर बना यह एशिया का पहला किला था, तो इस आधार पर यह विश्व के उन गिने चुने किलों में आ जाता है जो पहले पहल बनें। इस किले से चौहान राजा अजमेर और अपने राज्य पर सात-आठ शताब्दी पहले तक शासन किया करते थे। गाड़ी पार्किंग में लगाते ही एक साहब पास आए और हमें वहाँ मौजूद “बाबा” की दरगाह के बारे में बताने लगे। हमने कहा कि आसपास देखने के बाद दरगाह के बारे में देखा जाएगा तो वह फट से बोल पड़े कि लोग वहाँ “बाबा” की दरगाह के लिए ही आते हैं और वह कोई घूमने-फिरने का स्थान नहीं है। किसी तरह उन साहब से पीछा छुड़ा हम आगे बढ़े और एक जगह पहाड़ी के किनारे के पास पहुँचे। ऊपर पहाड़ी से नीचे अजमेर शहर विस्तृत रूप से फ़ैला हुआ और बहुत छोटा दिखाई पड़ रहा था।

धूप अब थोड़ी चुभ रही थी, मैं और योगेश तो मौसम के अनुरूप हल्के फुल्के कपड़े पहने थे लेकिन एन्सी और शोभना ने हल्की ठंड की अपेक्षा में कपड़े पहने हुए थे, इसलिए अब उनको गर्मी लग रही थी। पास ही हमें एक पुराना खंडहर सा दिखा तो हमने वहाँ जाकर छाँव में थोड़ा समय बिताने की सोची। उस खंडहर से नीचे अजमेर का नज़ारा और भी अच्छा दिख रहा था और वहाँ कहीं धूप के कारण रोशनी थी तो कहीं अंधेरा था, इसलिए वहाँ श्याम-श्वेत तस्वीरें लेने का विचार मन में आया।

हमने तो खैर ली ही, औरों ने हमारी भी ले डाली!! ;)

तस्वीरें आदि लेने और शांत माहौल में बढ़िया समय बिताने के बाद हमने वापस जाने का निर्णय लिया। वापस अपनी गाड़ी की ओर बढ़ रहे थे कि मस्जिद की दीवार पर किसी प्रकार के तेल का विज्ञापन देखा। आप भी देख लीजिए और समझ लीजिए!! ;)

अब वहाँ और कुछ देखने की इच्छा नहीं थी, तो गाड़ी निकलवा उसमें सवार हुए। हमें गाड़ी में सवार होता देख वो “बाबा” की दरगाह वाले साहब पुनः आ गए और कहने लगे कि “बाबा” के दर्शन तो अवश्य करने होंगे। मैंने कहा कि भई अब साथी लोग जाना चाहते हैं देर हो रही है तो साहब गले ही पड़ गए, बोले कि दर्शन किए बिना नहीं जा सकते। किसी तरह उनसे पुनः पीछा छुड़वाया और गाड़ी में सवार हो वापसी की राह पकड़ी, वो साहब देखते रहने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर पाए।

अगले अंक में जारी …..

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जयपुर ब्लॉगर भेंटवार्ता - भाग २

July 25, 2006 · 6 Comments

गतांक से आगे …..

तो हम गाईड लिए किराए की जीप में आगे बढ़ चले। पर थोड़ा रूकें, एक बात तो बताना भूल ही गए!! गाईड और जीप लेकर चलने से पहले नीरज भाई तथा प्रतीक बाबू ने टशन में आ एक एक बीयर की बोतल पकड़ फ़ोटो खिंचवाने की फ़रमाईश की, तो हमने उन्हें निराश नहीं किया, आप भी मत करें और यह फ़ोटो देखें। ;)

किन्गफ़िशर ज़िन्दाबाद - अन्य छायाचित्रों के लिए क्लिक करें

हाँ तो अब आगे बढ़ते हैं। मिश्रा जी दबादब फ़ोटो लिए जा रहे थे, तो उनको जबरन पकड़ साथ लिया और हम बमय जीप तथा गाईड आम्बेर किले की ओर चल दिए। अंदर का नज़ारा बहुत ही बढ़िया था। गाईड ने बताया कि आम्बेर किला लगभग 350 वर्ष पुराना है तथा जयपुर बसने से पहले शाही परिवार यहीं रहता था। अब यह भारत सरकार की संपत्ति है। आम्बेर किले के भीतर राजस्थानी तथा मुग़ल, दोनों ही तरह की शिल्प-कला के नमूने मौजूद हैं, दीवारों आदि पर दोनों कलाओं का समावेश है।

आम्बेर के किले के ठ??तर मुग़ल कला को दर्शाता द्वार - अन्य छायाचित्रों के लिए क्लिक करें

मार्बल के बने और शानदार हस्तकला के नमूने ये स्तंठ- अन्य छायाचित्रों के लिए क्लिक करें

वहाँ हमने केसर बाग़ का ऊपर से ही नज़ारा किया। गाईड ने बताया कि यहाँ राजा ने कश्मीर से मँगा कर केसर उगाया गया था पर राजस्थान के गर्म मौसम के कारण वह उग नहीं पाया, परन्तु नाम उसका अवश्य टिक गया।

केसर बाग़ जहाँ केसर तो नहीं टिका पर नाम टिक गया - अन्य छायाचित्रों के लिए क्लिक करें

किले के अंदर बने कमरे आदि देखते हम राजा के रात्रि के कमरे पर पहुँचे जो कि तीन दिशाओं से बंद था और चौथी ओर एक बड़ा सा काले चिकने पत्थर का बरामदा था जहाँ गायन और नृत्य की महफ़िलें लगती थी। पर यहाँ की दीवारों को अंदर से देख बहुत ही कोफ़्त हुई, क्योंकि उन पर यथावत भारतीय लोगों की मोहर लगी थी जो हर जगह देखने को मिल जाती है, आप भी देख लें।

आधुनिक ठ??रत का शिलालेख - अन्य छायाचित्रों के लिए क्लिक करें

आम्बेर किले में घूम फ़िर कर हमने खूब फ़ोटो आदि लिए, एक दूसरे के भी तथा औरों के भी!! ;) किला देख दाख के जब हम लोग फ़ारिग हुए तो गाईड से पता चला कि लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर जयगढ़ किला है जो कि 1000 वर्ष से भी पुराना है। लगभग ढाई बजे का समय हो रहा था, जीतू भाई को टेन्शन हो रही थी कि समय से दिल्ली पहुँच पाएँगे कि नहीं, पर अपन जिद पर अड़े रहे कि जयगढ़ का किला भी देखना है। आखिरकार बालहठ हमेशा की तरह विजयी हुई। वापस पार्किंग में पहुँच हमने किराए की जीप को विदा दी पर गाईड को पकड़े रखा और अपनी गाड़ी में जयगढ़ की ओर बढ़ चले।

गाईड ने बताया कि यह किला करीब 1000 वर्ष पूर्व दोसा नामक गाँव में रहने वाले राजपूतों ने बनाया था। उस समय यहाँ मीणा जाति के लोग रहते थे जिन्हें मार भगाया और यह किला बनाया। आम्बेर किले के बनने तक जयपुर का शाही परिवार इसी जयगढ़ के किले में रहता था। यह किला अभी भी शाही परिवार की निजि संपत्ति है। गाईड के कहे अनुसार हम लोगों ने अपने साथ साथ अपनी गाड़ी का भी टिकट कटाया और गाड़ी अंदर ले चले। इसी किले के सबसे ऊँचे बुर्ज पर दुनिया की सबसे बड़ी पहियों वाली तोप “जयवाण” रखी है, तो सबसे पहले हम उसी को देखने पहुँचे। गाईड ने बताया कि इस तोप की नली अष्ट धातु की बनी है जिसका वज़न लगभग 40 टन है!! इसमें 50 किलो का गोला डलता था और इसे केवल एक बार जाँचने के लिए चलाया गया था तो इसका गोला लगभग 35 किलोमीटर दूर जाकर गिरा था। उस जगह पर आज एक गाँव है और लगभग 300 वर्ष पहले चली इस तोप के गोले से बना गड्ढा आज भी मौजूद है।

पहियों पर मौजूद दुनिया की सबसे बड़ी तोप "जयवाण" - अन्य छायाचित्रों के लिए क्लिक करें

गाईड ने आगे बताया कि इस तोप को हिलाने और घुमाने के लिए दो हाथियों का प्रयोग किया जाता था, तोपची को इसे अग्नि दिखाते ही पानी के एक कुन्ड में डुबकी लगानी होती थी क्योंकि इसके चलने की ध्वनि इतनी तीव्र होती थी कि वह बहरा हो सकता था या कदाचित्‌ हृदयाघात भी हो सकता था। गाईड ने बताया कि जब इसे परीक्षण के लिए चलाया गया था तब इसकी अति-तीव्र ध्वनि के कारण किले में उपस्थित सभी गर्भवती महिलाओं का गर्भपात हो गया था!! इस तोप का नक्शा आदि मुग़ल बादशाह अक़बर के सिपहसालार राजा मानसिंह अफ़गान लड़ाई से लौटते समय अफ़गानिस्तान से लाए थे परन्तु इसे लगभग 350 वर्ष पूर्व सवाई राजा जयसिंह ने बनाया था, वही जिन्होंने जंतर-मंतर बनवाया, जयपुर बसाया। इसी कारण इस तोप का नाम उनके नाम पर पड़ा। वाकई, यह राजा जयसिंह बड़े कारीगर बन्दे थे!! ;)

एक बात जिस पर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ वह यह कि यहाँ इस तोप के बाजू में भी कोका-कोला और पेप्सी पहुँच गई, यकीनन जिस समय तोप बनी उस समय तो यह उपलब्ध नहीं थी!! ;) :P

यकीनन कोका कोला किले के प्रयोग के समयकाल में नहीं थी - अन्य छायाचित्रों के लिए क्लिक करें

इसके बाद गाईड ने हमें किले की पानी की टंकियाँ दिखाई जिनमें बारिश के पानी को एकत्र कर पीने और अन्य कार्यों के लिए प्रयोग किया जाता था। यहाँ तीन टंकिया उपस्थित थी, दो छोटी तथा एक बड़ी। छोटी टंकियों में पानी सीधे जाता था तथा उससे साफ़ हो बड़ी टंकी में जाता था जो कि काफ़ी बड़ी थी। ऊपर तो उसकी छत का ही भाग दिख रहा था, बाकी ज़मीन के भीतर था। उसकी छत लगभग 85 स्तंभों पर टिकी हुई थी और गाईड ने बताया कि सन्‌ 1975 में जब इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री थीं, उस समय यहाँ इसी टंकी के फ़र्श के नीचे से कई सदियों पुराना खज़ाना निकला था। गाईड ने खुलासा करते हुए बताया कि इस टंकी में मौजूद हज़ारों लाखों गैलन पानी को निकाल लगभग डेढ़ महीने तक खुदाई चली थी जिस दौरान जयपुर में फ़ौज का घेरा था जिस कारण न कोई आ सकता था और न जा सकता था। बाद में खबर को दबा दिया गया और सरकार ने इस बात से इन्कार किया कि कोई खज़ाना मिला है। गाईड के अनुसार कांग्रेस सरकार और इंदिरा गाँधी सब डकार गए। वैसे इस बात से तो मैं भी इन्कार करना पसन्द नहीं करूँगा, पर वह फ़िर कभी, अभी जयपुर यात्रा का हाल-ए-बयान ज़ारी रखते हैं। ;)

इसके पश्चात किले में मौजूद जयगढ़ रेस्तरां से ले (मेरे अतिरिक्त)सभी ने चाय सुड़की। बहरहाल हम लोग आगे बढ़े और किले में मौजूद राम-हरि के मंदिर पहुँचे जिसकी स्थापना करीब सन्‌ 1225 में हुई थी।

लगठ?? 900 वर्ष पुराना "राम हरि" का मंदिर - अन्य छायाचित्रों के लिए क्लिक करें

तत्पश्चात लगे हाथों इस मंदिर के बाजू में मौजूद भैरव के मंदिर को भी देखा जो कि इस किले जितना ही पुराना है, यानि कि 1000 वर्ष पुराना।

1000 वर्ष से ठ?? पुराना ठ??रव का मंदिर - अन्य छायाचित्रों के लिए क्लिक करें

तत्पश्चात हमने किले की सबसे ऊपर की मंज़िल से किले के पीछे मौजूद सरोवर आदि देखा, राजा मानसिंह द्वारा बादशाह अक़बर की शान में बनवाई गई अक़बरी मस्जिद के दूर से दर्शन किए, भिन्न भिन्न मुद्राओं में अपने फ़ोटो खिंचवाए, औरों के खींचे। अब हमें देर भी हो रही थी, इसलिए वापस लौटने का निर्णय लिया। गाईड को नीचे आकर जहाँ से लिया था वहीं छोड़ दिया और अपने रास्ते लग लिए। प्रतीक बाबू हमारे साथ ही दिल्ली चल रहे थे। जयपुर से बाहर निकल सड़क किनारे सभी भाई लोगों ने भोजन किया और हमने केवल वेजिटेबल रायते का भोग लगाया, दही एकदम ताज़ा, मीठा और ठंडा था, भई फ़ुल मज़ा आया!! :D