दुनिया मेरी नज़र से - world from my eyes!!

Entries categorized as 'व्यंग्य'

ऐडसेन्स या नॉनसेन्स? - भाग २

December 3, 2007 · 13 Comments

पिछले भाग से आगे …..

अज्ञानीलाल तो खैर अज्ञानी थे, मृगतृष्णा के पीछे भागे और बहक गए। लेकिन उनके साथ जो हुआ यह कोई आवश्यक नहीं कि हर बहके हुए व्यक्ति के साथ हो, या फिर, सिर्फ़ बहके हुए व्यक्ति के साथ ही हो। एक पुरानी कहावत है:

गेहूँ के साथ घुन भी पिस जाता है

और यह बिलकुल सत्य है, इस संदर्भ में तो बिलकुल से भी बिलकुल सत्य है, अनेकों प्रमाण ढूँढने वाले की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

मस्तलाल एक मस्त व्यक्ति, शौकिया अपना ब्लॉग लिखता और कोई टेन्शन नहीं लेता। गूगल ऐडसेन्स (AdSense) आया तो कौतुहलवश उसने भी अर्ज़ी लगा दी और अर्ज़ी मंज़ूर होकर भी आ गई। फिर कुछ समय बाद न जाने क्या सोच उसने आज़माने की सोची और अपने ब्लॉग पर ऐडसेन्स (AdSense) के विज्ञापन लगा दिए यह सोच कि देखा जाए कितनी कमाई हो सकती है। कुछ दिन बीते, महीना बीता, खाते में सिर्फ़ कुछ सेन्ट ही आए लेकिन मस्तलाल को कोई टेन्शन नहीं। फिर एक दिन ऐडसेन्स (AdSense) वालों की ओर से एक ईमेल आई जिसमें मस्तलाल को सूचित किया गया कि उसकी वेबसाइट पर विज्ञापनों पर खामखा के क्लिक हुए हैं और इसलिए उसका ऐडसेन्स (AdSense) खाता रद्द किया जाता है। मस्तलाल ने कहा भी कि उसने कोई क्लिक नहीं किए हैं और यदि कोई और उसकी वेबसाइट पर आकर एक के बाद एक क्लिक कर देता है तो उसमें उसकी क्या गलती!! लेकिन ऐडसेन्स (AdSense) विभाग में बैठे मूर्ख के पास कदाचित्‌ भाषा का अभाव था इसलिए उसने एक पहले से तैयार झाड़ू छाप उत्तर कॉपी-पेस्ट कर भेज दिया। मस्तलाल तो फिर मस्त बंदा, उसने कहा भाड़ में जाओ और ऐडसेन्स (AdSense) के विज्ञापन ब्लॉग से हटा दिए जो कि खाता रद्द होने के बाद भी उसके ब्लॉग पर आ रहे थे!!!

यानि कि अपना भला स्वयं करना तो बुरा है ही, कोई अन्य भी आपका इसी तरह भला करके जा सकता है!! अज्ञानीलाल और मस्तलाल पात्र बेशक काल्पनिक हैं लेकिन दोनो वाकये काल्पनिक नहीं हैं, ऐसा होता है, हुआ है और होता आ रहा है। यानि कि यदि आपने अपनी वेबसाइट या ब्लॉग आदि पर ऐडसेन्स (AdSense) के विज्ञापन लगा रखे हैं तो कोई व्यक्ति जिसकी आपसे खुन्नस हो वह आकर क्लिकों की झड़ी लगा सकता है और यदि आपकी वेबसाइट औसतन कम क्लिक पैदा करने वाली है तो यह क्लिकों की झड़ी गूगल के अपंग रडार पर तुरंत दिखाई दे जाएगी जिसका सीधा हल उनके पास आपका खाता रद्द करने और आपकी कमाई रकम को जब्त करने के रूप में है। अज्ञानीलाल के वाकये को बेशक मैंने ज़रा अतिश्योक्ति में चित्रित किया लेकिन मस्तलाल(काल्पनिक नाम) वाला वाकया एक वास्तविक व्यक्ति के साथ हुए वाकये का उल्लेख है। और यह सिर्फ़ एक मस्तलाल की कहानी नहीं है, ज़रा गूगल पर ही खोज लीजिए अनेकों ऐसे उदाहरण मिल जाएँगे। अब मैं यह नहीं कह रहा कि ऐडसेन्स से निष्कासित प्रत्येक व्यक्ति सत्य कहता है कि उसने कुछ गलत नहीं किया लेकिन बात यहाँ गेहूँ के साथ पिस रहे घुन की है।

लगता है कि गूगल का मानना है कि जो पकड़ा जाए वह चोर है और हर चोर पैदायशी चोर है

गूगल यहाँ ईश्वर की भूमिका निभा रहा है, जो वह कहे वही सत्य है। उसको कोई प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं है कि आपने कोई गलत कार्य किया, कह देना ही काफ़ी है। आज ऐडसेन्स (AdSense) से अधिक प्रयोग होने वाला शायद ही कोई विज्ञापन नेटवर्क हो। लेकिन कदाचित्‌ ऐडसेन्स (AdSense) विभाग अपने रडार में मौजूद कमियों को सुधारने में न तो यकीन रखता है और न ही कोई रूचि। कदाचित्‌ वह आगे निकल चुके खरगोश की तरह यह सोच बैठा है कि उससे आगे कोई निकल नहीं सकता इसलिए वह आराम कर रहा है, सुस्ता रहा है। हाएपोथेसिस साफ़ है, बड़ी वेबसाइटें जहाँ क्लिकों की भरमार है उनको कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, उनके यहाँ कम-ज़्यादा क्लिक कोई संदेह कदाचित् ही उत्पन्न करें लेकिन छोटी वेबसाइट चलाने वाले पूरे के पूरे खतरे में हैं, उनकी कोई भी वाट लगा सकता है और वाट लगने के बाद अपील तो कर सकते हो लेकिन सुनवाई होगी इसकी संभावना एक प्रतिशत से भी कम है।

और खामखा हुए क्लिकों की तो बात छोड़िए, यदि ईमानदारी वाली कमाई आपके गूगल खाते में है तो तथाकथित बेईमानी वाली कमाई के साथ-२ वह भी छिन जाएगी। क्योंकि लगता है कि गूगल का मानना है कि जो पकड़ा जाए वह चोर है और हर चोर पैदायशी चोर है जिसने चोरी के अतिरिक्त न तो कुछ किया है और न ही कुछ करेगा। कुछ समझ आता है कि इसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ यह है कि इस सिस्टम को बनाने वाले मूढ़ इंजीनियर बहुत अर्से से मशीनों के साथ रहते आए हैं जहाँ ० और १ की ही भाषा चलती है, अन्य कुछ नहीं। कदाचित्‌ मैनेजमेन्ट को चाहिए कि उन बेचारे इंजीनियरों को उनके बाड़े से बाहर निकालें और कुछ समय जीवित मनुष्यों और जानवरों के साथ बिताने दें। साथ ही अपने ज्ञान के दंभ के नीचे दबे उन इंजीनियरों को चाहिए कि सच्चाई का सामना करें, उनका सिस्टम फूलप्रूफ़ नहीं है, इसका कोई भी गेम बजा सकता है। इस बात को न स्वीकारना ठीक वैसा है जैसा पाकिस्तान के हुक्मरानों का यह सोचना कि अमेरिका उसका सगा है और चीन उसके लिए आया खुदाई मददगार!! या फिर शतुरमुर्ग की तरह सोचना कि रेत में मुंडी छुपा लेने के कारण उसको कोई देख नहीं सकता!!

जिन लोगों को इस बात से झटका लगा है उनको यही कहूँगा, साईबरस्पेस में आपका स्वागत है। :) यहाँ पर गूगल एक ऐसा दानव है जिससे पंगा लेकर कोई जीवित नहीं रह सकता। ;)

Categories: blogging · internet · mindless rants · sarcasm · इंटरनेट · ब्लॉगिंग · व्यंग्य · फ़ालतू बड़बड़
Tagged: , , ,

ऐडसेन्स या नॉनसेन्स?

December 1, 2007 · 13 Comments

अज्ञानीलाल ने कहीं पढ़ा कि ब्लॉगस्पॉट पर फोकट में ब्लॉग बनाया जा सकता है और उस पर गूगल के ऐडसेन्स (AdSense) वाले विज्ञापन लगा दो और फिर बस बैठकर देखते जाओ, डॉलरों की बरसात हो जाती है। बस फिर क्या था, तुरत-फुरत अज्ञानीलाल ने ब्लॉग बनाया, टशन वाली टेमप्लेट (template) लगाई, थोड़ा इधर से थोड़ा उधर से पोस्ट करने के लिए माल मसाला जुगाड़ा। ऐडसेन्स (AdSense) के खाते की मंजूरी भी थोड़े दिन में आ गई और बस फिर क्या था, अज्ञानीलाल ने पूरे ब्लॉग को विज्ञापनों से सजा दिया और डॉलरों की बरसात की प्रतीक्षा करने लगा। एक दिन बीता, दो दिन बीते, दिन पर दिन बीते, लेकिन एक फूटी कौड़ी भी न आई बेचारे के खाते में। उसने फिर कंप्यूटर के चूहे को दौड़ाया, कुछ क्लिक वगैरह किए और कहीं पढ़ा कि विज्ञापन पर क्लिक होगा तभी कुछ उसका भला होगा। फिर किसी समझदार मित्र ने समझाया कि दूसरे की बाट क्यों देखो कि वह तुम्हारा भला करने आएगा। अज्ञानीलाल को बात जंच गई और उसने अपना भला स्वयं ही करने की सोची। लेकिन पहले उसने इस बात को परखना उचित समझा कि क्या वह अपना भला स्वयं कर सकता था कि नहीं। उसने कुछ क्लिक किए, नतीजा सामने आया, कई डॉलरों की तो नहीं लेकिन कुछ आधे, कुछ पूरे, कुछ चौथाई डॉलरों की एन्ट्री अवश्य हो गई उसके खाते में!!

मामला सैट, अपना भला स्वयं कर सकता था, बस फिर क्या था, लग गया दनादन क्लिक पर क्लिक करने। सुबह उठ दिशा मैदान के बाद थोड़े क्लिक करता, नाश्ता करने के बाद थोड़े क्लिक करता, ऑफिस पहुँच थोड़े क्लिक करता, लंच आननफानन निपटा के क्लिक करता, शाम को बॉस बुलाए तो क्लिक करके जाता, वापस आकर थोड़े क्लिक करता, ऑफिस से निकलने के पहले थोड़े क्लिक, फिर घर पहुँच थोड़े क्लिक, रात्रि भोजन के पश्चात थोड़े क्लिक, लल्लू को होमवर्क कराते समय क्लिक, सोने से पहले थोड़े और क्लिक। समस्या तो उसकी यह थी कि वह नींद में भी क्लिक करता था लेकिन उनकी गिनती नहीं हो पाती थी गूगल के सर्वर पर इसलिए उनसे कुछ हासिल नहीं होता था। खुजली वाला कुत्ता इतनी बार दिन में नहीं खुजाता होगा जितनी बार क्लिकरोग से ग्रसित अज्ञानीलाल एक दिन में क्लिकियाते थे!!

मेहनत का फल मीठा होता है, चाहे देखने में ही मीठा लगे!! अज्ञानीलाल के खाते में सेन्ट दर सेन्ट जुड़ते गए और तकरीबन नब्बे डॉलर जमा हो गए। घर पर क्लिकियाने के बाद अज्ञानीलाल प्रसन्नचित्त मुद्रा में ऑफिस पहुँचे, सोचे कि दिन ढलते-२ गूगल से पहले चेक लायक सौ डॉलर तो बना ही लेंगे, महीने भर का गाड़ी के पेट्रोल का खर्च तो निकल आया समझो। लेकिन ऑफिस पहुँच ईमेल का डिब्बा खोलते ही उनकी कुर्सी के नीचे से मानो ज़मीन निकल गई(अब पैर ज़मीन पर नहीं थे नहीं तो उनके नीचे से भी निकल जाती)!!

काहे? अरे भई ऐडसेन्स (AdSense) विभाग से ईमेलवा आया था और ऊ यह नहीं कह रहा था कि बबुआ अज्ञानीलाल तुहार चेक भेज दिए हैं, ऊ कह रहा था कि बच्चू तुम सेर तो हम सवा सेर, अपना भला स्वयं करने के अपराध में तुहार खाता बंद किया जा रहा है और जमा सभी डॉलर बमय सेन्ट जब्त किए जाते हैं, राम का नाम लो और निकल लो पतली गली से, दोबारा भूल के भी मत झांकना इस गली में!!!

बेचारा अज्ञानीलाल, अपना भला होने के लिए दूसरों की प्रतीक्षा कर लेता तो यह दिन खराब न जाता, दोनो समय का खाना गले से नीचे उतर रहा होता, लल्लू को गणित का प्रश्न हल न कर पाने पर झापड़ का प्रसाद नहीं दिया होता….. हाय कोमल सा लल्लू, अभी बेचारा सिर्फ़ आठ साल का ही तो है!!!

क्या इस भयावह हादसे से अज्ञानीलाल बच जाता यदि वह दूसरे अंजान लोगों की प्रतीक्षा करता अपना भला करने के लिए?

जानने के लिए पढ़िए वेब २.० (Web 2.0) की एक भयावह और अनसुलझी पहेली पर रोशनी डालने वाला सनसनीखेज खुलासा…..

 
फोटो साभार: dullhunk
 

Categories: blogging · internet · mindless rants · sarcasm · इंटरनेट · ब्लॉगिंग · व्यंग्य · फ़ालतू बड़बड़
Tagged: , , ,

अंडरग्राउंड …..

September 29, 2007 · 3 Comments

Categories: cartoon · sarcasm · कार्टून · व्यंग्य

ओ ऽऽ राम तेरा ऽऽ सेतु

September 19, 2007 · 13 Comments

….. बना वोट पाने का माल ऽऽ,
कांग्रेस भी चाहे पाना इसको करुणा के साथ ऽऽ ॥

Categories: asia · cartoon · india · politics · sarcasm · एशिया · कार्टून · भारत · राजनीति · व्यंग्य

अथ श्री घिसा पिटा प्रलाप आरंभम्‌ भवति

September 7, 2007 · 8 Comments

लो जी, फिर वही घिसा पिटा बदहज़मी युक्त प्रलाप शुरु हो गया कुछ लोगों का। किसी ने बताया कि दिल्ली में फैशन सप्ताह(fashion week) शुरु हो गया है और कई नामी देशी डिज़ाईनर भाग ले रहे हैं, अपनी कृतियाँ दिखा रहे हैं। वहीं किसी ने बताया कि फलां लोगों ने पुराना नग्नता और अश्लीलता का फटा बाँस फूँकना शुरु कर दिया है। अब भई अपने पल्ले ये नहीं पड़ता कि क्यों लोग कला और अश्लीलता में अंतर नहीं समझते!! किसी ने कहा कि पारंपरिक परिधानों को दर-किनार किया जा रहा है तो कोई बोला कि इस तरह के फैशन शो में प्रदर्शित होने वाले परिधान आम जनता के लिए नहीं होते। परिवर्तन प्रकृति का नियम है अन्यथा एक कोशिका वाले जीव से लेकर आज लाखों कोशिकाओं वाले जीवों का सफ़र कभी न हुआ होता। तो कोई आवश्यक नहीं है कि परंपरा को पकड़े हुए बाबा आदम के स्टाईल के परिधान ही पहने जाएँ। ऐसा नहीं है कि पारंपरिक परिधानों को त्यागा जा रहा है, लेकिन उनमें डिज़ाईनर अपनी रचनात्मक्ता और समझ के अनुसार बदलाव लाकर उनको बाज़ार में उतार रहे हैं। रीना ढाका, रितु बेरी, मनीष मल्होत्रा, रोहित बल जैसे नामी डिज़ाईनर औरतों के लिए साड़ियाँ और मर्दों के लिए कुर्ते, शेरवानी आदि भी डिज़ाईन करते हैं, तो इसलिए यह नहीं कह सकते कि परंपरागत परिधानों को त्याग दिया गया है। लेकिन इनके द्वारा डिज़ाईन किए गए परिधान आम जनता के लिए नहीं होते यह बात सत्य है। अब जब पचास हज़ार से लेकर लाख रूपए से उपर कीमत की साड़ियों और शेरवानियों की बात करेंगे तो आम जनता कहाँ से लेगी?? लेकिन इस तरह के परिधानों को डिज़ाईन करते समय ये लोग आम जनता को टार्गेट करते ही नहीं!! और यह कहाँ लिखा है कि फैशन शो आदि में सिर्फ़ आम जनता के पहनने लायक ही परिधान प्रदर्शित किए जाएँ? यदि किसी नामी चित्रकार की कलाकृतियों की प्रदर्शनी लगती है तो ये लोग वहाँ कला की तारीफ़ करने लगते हैं कि क्या कलाकार है और क्या कला का नमूना है। क्या उसके सभी चित्र आदि इतने सस्ते होते हैं कि आम जनता खरीद सके? लाखों रूपयों में बिकने वाले चित्रों के एक अलग दर्जे के ग्राहक होते हैं; प्रशंसक बहुत हो सकते हैं लेकिन सभी खरीददार नहीं हो सकते। अमां कोई समाजवादी कम्यूनिस्ट राष्ट्र में रह रहे हो क्या जहाँ जो कार्य हो समस्त जनता-जनार्दन के भले के लिए हो? यदि आपके सामाजिक वृत्त (social circle) में कोई ऐसे परिधान नहीं पहनता तो इसका अर्थ यह नहीं कि कोई पहनता ही नहीं, आखिर समाज आपकी या मेरी या कल्लू की सामाजिक परिधि (social circle) तक ही तो सीमित नहीं है!!

अब यदि आम जनता इतने महंगे डिज़ाईनर परिधान नहीं खरीद सकती तो क्या करे? दो ही रास्ते होते हैं; या तो मन मसोस चुप बैठे या पड़ोस के बुटीक के दर्ज़ी को उस डिज़ाईन की तस्वीर वगैरह दिखा अपने लिए भी वैसा कुर्ता, सलवार-सूट आदि बनवा लें। पाईरेसी(piracy) वगैरह हर जगह है, यहाँ भी है!! ;)

वैसे कोई पूछे तो यह पूछना चाहिए कि ये “परंपरा” का रोना रोने वालों में कितने लोग धोती-कुर्ते में घूमते हैं? अपने दफ़्तर आदि धोती-कुर्ता पहन और पाँव में चप्पल डाल के बैलगाड़ी या घोड़ागाड़ी में जाते हैं? और मोहतरमाओं में कितनी लैक्में, लोरियाल आदि से लेकर देशी ब्रांडों की लिप्सटिक, पाउडर आदि सौन्दर्य प्रसाधनों की जगह परंपरागत सौन्दर्य प्रसाधन प्रयोग करती हैं? चेहरे के लिए एवर यूथ वगैरह का संतरे अखरोठ वाला फेस स्क्रब(face scrub) प्रयोग हो सकता है, परंपरागत नुस्खा नहीं!! अब इन लोगों से ऐसे प्रश्न कर लो तो ये लोग या तो बगलें झांकने लगेंगे अथवा बेतुका सा उत्तर देंगे - “आप तो अति में चले गए जी”!! कारण? भई इनका विरोध बेतुका है, जिसका न कोई सिर है न पैर, जबरदस्ती वाले विरोध की हवा निकलते देख और क्या कहेंगे!! वैसे अंग्रेज़ी स्टाईल की कमीज़ पैन्ट पहने अंकल तथा अंग्रेज़ी स्टाईल की कमीज़ और अमेरिकी स्टाईल की जीन्स पहने आंटियाँ जब परंपरा की वकालत करते हैं तो मामला मुझे बहुत हास्यप्रद लगता है, चक्कर में पड़ जाता हूँ कि कहाँ की परंपरा की बात हो रही है!! ;)

जहाँ तक अश्लीलता का प्रश्न है,

सिमटे तो दिल-ए-आशिक़, फैले तो ज़माना है

स्वयं जो पहनों वह श्लील और परंपरागत, दूसरा पहने तो अश्लील और अपरंपरागत!!

इन संस्कृति के दारोगाओं को यह बात समझ नहीं आती कि वस्त्र आदि श्लील-अश्लील नहीं होते, श्लील अथवा अश्लील व्यक्ति के विचार, उसकी सोच, मानसिकता और नज़रें होती हैं। कोई लड़की यदि तंग लो-कट टॉप(low cut top) और छोटी स्कर्ट पहन सामने बैठी है तो यदि आप वासनायुक्त नज़र/विचार के साथ उसकी गर्दन से नीचे उसको देखते हैं या उसकी टॉगों पर नज़र फिराते हैं तो वह लड़की या उसके वस्त्र अश्लील नहीं हैं वरन्‌ आपके विचार और आपकी सोच अश्लील है। वहीं दूसरी ओर यदि आप उसके सौन्दर्य को निहारते हैं तो वह अश्लील नहीं है, प्रकृति ने उसको शारीरिक सौन्दर्य से नवाज़ा है तथा उस लड़की को इस बात का गर्व है, आपको अपने पर काबू नहीं है या कॉम्पलेक्स हो रहा है तो मुँह फेर लीजिए, खामखां हल्ला क्यों मचाते हैं!! प्रकृति ने सबको एक जैसा नहीं बनाया है, किसी के पास शारीरिक सौन्दर्य है तो किसी के पास आंतरिक तो किसी के पास दोनों। तो जब आप अपने भीतर के सौन्दर्य, अपने विचारों के सौन्दर्य के प्रदर्शन को अश्लील नहीं मानते तो किसी के शारीरिक सौन्दर्य के प्रदर्शन को क्यों मानते हैं? अब अगला व्यक्ति नग्न तो नहीं घूम रहा, कपड़े पहन रखे हैं जो उस पर फबते हैं(डिज़ाईनर लोग ऐरे-गैरे को अपने परिधान पहना प्रदर्शित नहीं करते), आपको किस बात की टेन्शन है?

ये गूढ़ ज्ञान की बातें नहीं हैं, लेकिन संकुचित मानसिकता वाले छोटे से दिमाग में फिर भी नहीं समाने वाली। इनको प्राप्त करने हेतु विचारों की आवाजाही के लिए मस्तिष्क के द्वार पर लगे अलीगढ़ी ताले हटाकर कपाट खोलने होंगे, दिल को भी बड़ा करना होगा।

Categories: mindless rants · sarcasm · व्यंग्य · फ़ालतू बड़बड़

अमरीका जो बन जाए …..

August 3, 2007 · 12 Comments

अमेरिका….. अमेरिका….. ओऽऽ अमेरिका ऽऽऽऽ

जीतू भाई ने इस बार की अनुगूँज में हिस्सा लेते हुए पाँच बातें लिखी हैं कि यदि हिन्दुस्तान अमेरिका बन जाए तो कैसा होगा। कुछ बातें जो उजागर होती हैं:

Americanised India - 1

तो क्या बच्चे आज ऐसे नहीं हैं? बिलकुल हैं, महानगरों में उच्च-मध्यमवर्गीय और उच्च वर्गीय परिवारों में तो क्या, छोटे शहरों में भी ऐसे बच्चे मिल जाएँगे। पहचाना नहीं? ये राज-दुलारे हैं, लाड़ले, ज़रूरत से अधिक लाड़ किए हुए लाड़ले!!

Americanised India - 2

क्या ऐसे बालक आज नहीं हैं? कुछ वर्ष पहले अपने कॉलेज के समय में वहाँ तो ऐसे लोग देखे थे, प्रगति के दर को यदि मद्देनज़र रखा जाए तो क्या इस सब की आज स्कूलों में आशा करना ज़रूरत से अधिक पॉजिटिव थिंकिन्ग है? अब याद आ रहा है कि अपने स्कूल के आखिरी के 2 वर्षों में भी ऐसे उन्नत और मॉडर्न छात्र देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था मुझे, तो आज तो उनके पद-चिन्हों पर चलने वाले कई होंगे!!

Americanised India - 3

अपनी माताजी से पता करने पर यह तो पक्का हो गया है कि अभी रेट तो इतने ऊपर नहीं पहुँचे हैं, लेकिन अपने सामान्य ज्ञान की बदौलत यह भी पता है कि ऐसे तकनीकी उपकरण भी पीछे नहीं हैं, आज बहुतया घरों में इनकी घुसपैठ हो चुकी है; डिश-वॉशर और वैक्यूम क्लीनर न सही लेकिन वॉशिंग मशीन तो टीवी-फ्रिज की भांति आम बात होती जा रही है।

तो क्या अमेरिका में सिर्फ़ बुराईयाँ ही हैं? अगर नहीं तो लोगों को अच्छाई दिखाई क्यों नहीं दे रही? वैसे ऐसी बात नहीं है कि अच्छाई दिखाई नहीं देती। कुछ समझदार लोगों को दिखाई देती है, जिनके लिए अमेरिका सपनों का देश होता है। क्यों सपनों का देश होता है? वह इसलिए क्योंकि लगभग 3 करोड़ की आबादी वाला संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व में तीसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है, हर तरह का मौसम है, विश्व में सबसे अधिक जीडीपी(GDP) वाला देश है, उच्च कोटि के विश्वविद्यालय हैं जैसे हारवर्ड, स्टैनफोर्ड, एमाआईटी(MIT) आदि। इतना ही नहीं, न्यू यार्क अमेरिका में है, एम्पायर स्टेट बिल्डिंग न्यू यार्क में है, हॉलीवुड अमेरिका में है, सबसे अधिक टीवी देखने वाले अमेरिकी होते हैं। इन सब खूबियों के कारण अमेरिका एक ड्रीम डेस्टिनेशन है!! :roll: अब ऐसे लेख देख और ऐसे ड्रीम पढ़ तरस आता है अमेरिका पर, पहले ही बुद्धिजीवियों की कमी नहीं है वहाँ, यहाँ से और चले जाएँगे तो क्या होगा?? लेकिन फिर मन स्वार्थी हो जाता है, सोचता है कि चलो अच्छा है, इसी बहाने अपने देश की सफाई तो होगी, हालात सुधरेंगे!! ;)

मैं कभी अमेरिका नहीं गया हूँ, अभी तक जाने का सौभाग्य नहीं प्राप्त हुआ है, लेकिन दोस्तों आदि से इस बात का एहसास मिला है कि अमेरिका में मशीनी मानव बसते हैं, आपस में आत्मीयता नहीं है, रिश्तों में वो गर्माहट नहीं है जो एशियाई देशों में मिलेगी, चाहे वो भाई-बंधुत्व में हो या दुश्मनी में। सुना है कि वहाँ की आबो-हवा ऐसी है कि यदि यहाँ से भी कोई व्यक्ति वहाँ जाए तो एक सप्ताह में ही उसके व्यवहार में अंतर आने लगता है जिसको पीछे रह गए उसके घर वाले और मित्र आदि महसूस कर सकते हैं। होता होगा जी, अपन कभी गए तो फर्स्ट हैन्ड एक्सपीरियंस(first hand experience) बता देंगे। अनुगूँज में इसी के तहत भाग नहीं लिए हैं कि जब जिस जगह के बारे में जानना ही नहीं हुआ है उस बारे में अपने विचार व्यक्त कर काहे खामखा विद्वान बनें!! :)

Categories: anugoonj · cartoon · mindless rants · sarcasm · अनुगूँज · कार्टून · व्यंग्य · फ़ालतू बड़बड़

फ़ास्सिस्ट या इम्पीरियलिस्ट …..

August 1, 2007 · 9 Comments

Fascists or Imperialists

मेरे ख्याल से तो दोनो एक जैसे ही थे, अमानुष!

Categories: cartoon · politics · sarcasm · कार्टून · राजनीति · व्यंग्य

मुहिम….. नारद के खिलाफ़…..

July 24, 2007 · 14 Comments

Categories: cartoon · sarcasm · कार्टून · व्यंग्य

नारद का बजा दें बैन्ड …..

July 18, 2007 · 8 Comments

Categories: cartoon · sarcasm · कार्टून · व्यंग्य

नारद के खिलाफ़ युद्ध …..

July 17, 2007 · 13 Comments

Categories: cartoon · sarcasm · कार्टून · व्यंग्य