पिछले भाग से जारी…..

( इस फोटो को कंप्यूटर पर सेपिआ [sepia] किया गया है )

( इस फोटो को कंप्यूटर पर श्वेत-श्याम [black & white] किया गया है, मूल फोटो यहाँ है )
इस बाग़ में लिए गए सभी फोटो यहाँ हैं।
पिछले भाग से जारी…..

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अभी हाल ही में मैक्रो(macro) तस्वीरों का विचार मन में समाया, कि मैक्रो(macro) पर हाथ आज़माया जाए। कुछेक मैक्रो तस्वीरें ली, लेकिन वो बात नहीं आ रही थी, अपने कैमरे के मैक्रो ऑटोफोकस में मैं सब्जैक्ट के सिर्फ़ पाँच सेन्टीमीटर निकट जा सकता था और ज़ूम बिलकुल नहीं कर सकता था, यह आम मामलों में बहुत अच्छा है लेकिन यदि आप किसी फूल के मध्य भाग का मैक्रो(macro) लेने का प्रयास कर रहे हैं तो दिक्कत है अथवा थोड़ी दूर से किसी चीज़ का फोटो लेने की सोच रहे हैं तब भी दिक्कत आ सकती है। जैसे यह निम्न फोटो मैंने बिना किसी मैक्रो(macro) लेन्स की सहायता के पिछले माह पालमपुर यात्रा के दौरान ली थी।
इन कामों के लिए होते हैं मैक्रो(macro) लेन्स(lens) जो निकट की वस्तु पर भी फोकस करने देते हैं। हर लेन्स की भांति ये भी एक-एलीमेन्ट और बहु-एलीमेन्ट में आते हैं और बहु-एलीमेन्ट के लेन्स बेहतर और साफ़ फोटो देते हैं। चूंकि मेरा कैमरा डीएसएलआर(dslr) नहीं है इसलिए इसके लिए लेन्स मिलना थोड़ा कठिन, लेकिन आखिरकार क्नॉट प्लेस में स्थिट महाटा एण्ड कंपनी के पास मारूमी(marumi) ब्रांड के (अलग-२ पॉवर के चार)लेन्स का सैट मिला जो कि ढाई हज़ार रूपए का था। लेन्स के हिसाब से देखा जाए तो महंगा नहीं था लेकिन वह एक-एलीमेन्ट के लेन्स का सैट था और मैं उसको सिर्फ़ प्रयोग के लिए लेना चाहता था ताकि यह निश्चय कर सकूं कि कितनी पॉवर का लेन्स मेरे लिए उपयुक्त रहेगा और फिर मैं उतनी पॉवर का बहु-एलीमेन्ट लेन्स अमेरिका से किसी मित्र आदि के हाथ मंगवा सकता हूँ। इससे पहले फोन कर मैंने पता कर लिया था, चांदनी चौक में मदन जी के पास सोनिया ब्रांड का (अलग-२ पॉवर के चार)लेन्स का सैट था जो कि तीन सौ रूपए का था, इसलिए निश्चय किया कि उसी को लिया जाए!!
लगभग एक माह हो गया है मुझे वे लेन्स लाए हुए, उम्मीद से अधिक अच्छे नतीजे मिले हैं इन लेन्सों से। इसी सैट के एक लेन्स की मदद से ली यह निम्न फोटो।
यह फोटो कैमरे से ऐसा नहीं आया था!!
इसको बाद में कंप्यूटर पर ऐसा करा कि ततैये को रंगीन रहने दिया और बाकी उसके चारो ओर की पत्तियों आदि को श्वेत-श्याम कर दिया। इसकी ओरिजिनल फोटो निम्न है।
यह फोटो +4d के मैक्रो(macro) लेन्स की सहायता से ली थी। लेन्स की पॉवर डायोप्टर(diopter) में आंकी जाती है, जितने अधिक डायोप्टर(diopter) उतना अधिक ताकतवर लेन्स, लेकिन इसके साथ यह समस्या भी है कि जितने अधिक डायोप्टर(diopter) का लेन्स होता आपको लेन्स सब्जैक्ट के उतना ही पास रखना होगा। सब्जैक्ट और लेन्स के बीच उचित दूरी क्या हो यह जानने का एक बहुत ही आसान फॉर्मूला है:
दूरी = (1/d * 39.37) इंच
यानि कि यदि आपको लेन्स के डायोप्टर(diopter) पता हैं तो आप एक को डायोप्टर(diopter) से भाग कर 39.37 से उसको गुणा करेंगे तो उचित दूरी इंच में आपको मिल जाएगी जिसको बनाने पर आप कैमरे से आराम से ऑटो-फोकस कर पाएँगे, कम-ज़्यादा होने पर आपको मैनुअल(manual) फोकस का सहारा लेना होगा।
यह एक अन्य फोटो +4d के मैक्रो(macro) लेन्स की सहायता से लिया था।
मैक्रो(macro) फोटोग्राफ़ी के खेल निराले हैं, इससे आपके कैमरे के लिए एक नई दुनिया खुल जाती है। ![]()
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नहीं-२, यह कोई मोमो (momo) जैसा व्यंजन नहीं है जिसको बनाया और खाया।
यह दरअसल नाम है रूस के एक कैमरा निर्माता का जो इसी नाम के कैमरे बाज़ार में लगभग पिछले सत्तर वर्षों से निकाल रहा है। शुरुआती दौर में सरकारी रही और 1993 में पब्लिक हुई यह कंपनी कहने को तो रूस की सबसे बड़ी ऑप्टिक निर्माता है लेकिन इसके कैमरे ज़रा अलग तरह के होते हैं। इसके कैमरे बहुत ही घटिया दर्जे के लेन्स प्रयोग करते हैं जिस कारण उनके द्वारा ली गई तस्वीरों में एक अलग बात होती है। इसके द्वारा ली गई तस्वीरें बहुत अच्छी क्या अच्छी भी नहीं आती, विग्नेटिंग दिखाई पड़ती है (यानि कि तस्वीर के बॉर्डर स्पष्ट नहीं होते, काले से होते हैं) और काफ़ी सैचुरेटिड (saturated) होती हैं यानि कि उनमें रंगों के कुछ शेड बहुत तीव्र होते हैं और तस्वीर बीच में से कुछ अधिक ही शॉर्प (sharp) होती है। लोमोग्राफ़ी के ऑस्ट्रियाई संस्थापक 1991 में चेकोस्लोवाकिया (czechoslovakia) की राजधानी प्राग (prague) के दौरे के दौरान लोमो कैमरे से रूबरू हुए और इस कैमरे से निकली धुंधली सी तस्वीरें उनको बहुत भा गई। उन्होंने इस तरह की तस्वीरों को कला के तौर पर बाज़ार में स्थापित किया और फिर लोमो कंपनी से एक करार किया जिसके तहत रूस के बाहर यह ऑस्ट्रियाई कंपनी लोमो कैमरों की एकलौती वितरक बनी।
डिजिटल कैमरों के दौर से पहले फिल्म पर उतारी गई तस्वीरों में अधिक सैचुरेशन (saturation) पाने के लिए क्रॉस प्रोसेसिंग (cross processing) भी की जाती थी जिसके तहत रंगीन स्लाईड फिल्म को उसके लिए बने रसायन घोल E6 में डेवेलप (develop) करने की जगह साधारण फिल्म के रसायन घोल C41 में डेवेलप किया जाता था। इस तरह की तस्वीरों ने जल्द ही एक पंथ (cult) का रूप ले लिया और डिजिटल कैमरों के आने के बाद तो लोमो फोटो के लिए आपके पास लोमो कैमरा होने की भी आवश्यकता नहीं रह गई, आप अपने किसी भी डिजिटल कैमरे से फोटो लेकर कंप्यूटर पर ही उसको लोमो बना सकते हैं।
जैसे यह देखिए मेरे कैमरे द्वारा ली गई असली तस्वीर:
और डम्पर के लोमो टूल द्वारा बनाया गया इसका लोमो यह है:
स्वयं मैंने पंगेबाज़ी कर यह एक हल्का लोमो बनाया जिसमे सैचुरेशन (saturation) इतना नहीं है:
और इसी फोटो में जब सैचुरेशन (saturation) बढ़ा दिया तो यह नतीजा निकला:
फोटो को लोमो बनाने के बहुत तरीके हैं, यदि सिर्फ़ फोटोशॉप (photoshop) को ही लें तो उसमें भी आप कई अलग-२ तरीकों से लोमो बना सकते हैं। इंटरनेट पर इसके लिए बहुत से ट्यूटोरियल (tutorial) मिल जाएँगे और कोई आवश्यक नहीं कि जैसा उनमें बताया गया है आप बिलकुल वैसा ही करें क्योंकि प्रत्येक फोटो अलग होती है और उसके रंग आदि भी अलग होते हैं। तो आप स्वयं पंगेबाज़ी करके देख सकते हैं और जो नतीजे आपको अच्छे लगें उन्हीं को अपनाएँ, आखिर यह सब सृजनात्मक कार्य है, अपनी क्रिएटिविटी (creativity) को कार्य पर लगाईये और नतीजे देखिए।
जो लोग फोटोशॉप (photoshop) जैसे किसी एडिटर (editor) में पंगेबाज़ी नहीं कर सकते या जिनको तुरंत नतीजे चाहिए वे डम्पर के इस लोमो जुगाड़ का भी प्रयोग कर सकते हैं, बस अपनी फोटो अपलोड करिए और उसका लोमो रूप प्राप्त कीजिए!! लोमोग्राफ़ी पर थोड़ा अधिक विस्तार से अंग्रेज़ी में यहाँ पढ़िए।
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दिल्ली का तीसरा बारकैम्प और कदाचित् पहला ओपन सोर्स सॉफ़्टवेयर कैम्प(open source software camp) यानि कि मुक्त स्रोत सॉफ़्टवेयर का असम्मेलन इस सप्ताहांत, 8 तथा 9 सितंबर 2007, को नोएडा में इंपेटस इन्फोटेक के कार्यालय परिसर में होने जा रहा है। इसमें भिन्न-२ विषयों पर सत्र होंगे जिनको अलग-२ कैम्प का नाम दिया गया है, जैसे माईसीकुअल कैम्प(MySQL Camp), पीएचपी कैम्प(PHP Camp), द्रुपल कैम्प(Drupal Camp), जूमला कैम्प(Joomla Camp), ओपन सोर्स टेक्नॉलोजी कैम्प(Open Source Technologies Camp), ओपन सोर्स टूल्स कैम्प(Open Source Tools Camp), पाईथन कैम्प(Python Camp), वेब 2.0 कैम्प(Web 2.0 Camp), आदि। देश भर से तो प्रोग्रामर, डेवेलपर, डिज़ाईनर आदि आ ही रहे हैं, कुछेक विदेशों से भी आ रहे हैं। यदि आप भी इसमें भाग लेना चाहते हैं तो इसकी विकि(wiki) में यहाँ अपना नाम अवश्य जोड़ दें। इसमें भाग लेने की कोई फीस/शुल्क वगैरह नहीं है, निश्चित स्थान पर पहुँचने और वहाँ से वापस जाने का जुगाड़ आपको स्वयं करना होगा। यदि आप दिल्ली या राजधानी क्षेत्र(नोएडा/गुड़गाँव) के बाहर से आ रहे हैं तो अपने रहने आदि की व्यवस्था आदि भी आपको स्वयं करनी होगी।
बारकैम्प सम्मेलन(conference) की तरह ही होते हैं लेकिन सम्मेलनों की तरह इनमें औपचारिकता नहीं होती, इसलिए इनको असम्मेलन(unconference) कहते हैं। यह एक समुदायिक प्रयास होता है एक दूसरे से सीखने का, कोई भी व्यक्ति संबन्धित विषयों में से किसी पर भी प्रस्तुतिकरण(presentation) दे सकता है तथा भाग लेने वाले सभी व्यक्तियों से अपेक्षा की जाती है कि वे सिर्फ़ हाज़िरी न भर कुछ न कुछ अवश्य करेंगे, चाहे किसी सत्र में प्रस्तुतिकरण करें अथवा असम्मेलन के आयोजन में हाथ बंटाएँ। इस तरह के असम्मेलनों का खर्च प्रायः प्रायोजक(sponsors) उठाते हैं जैसे पिछली बार के दिल्ली बारकैम्प में इंपेटस और ओपरा प्रायोजक थे और इस बार इंपेटस असम्मेलन के लिए स्थान, भाग लेने वाले सभी व्यक्तियों के लिए भोजन आदि और असम्मेलन के लिए वायरलेस इंटरनेट(wi-fi) और अन्य साजोसामान उपलब्ध करवा रहा है।
मेरा इस असम्मेलन में जाना लगभग तय है(सप्ताहांत खराब नहीं जाएगा, मेरी कंपनी मुझे इसके लिए 2 अतिरिक्त छुट्टियाँ दे रही है)।
क्या आप इस असम्मेलन में आ रहे हैं?
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