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अमरीका जो बन जाए …..

August 3, 2007 · 12 Comments

अमेरिका….. अमेरिका….. ओऽऽ अमेरिका ऽऽऽऽ

जीतू भाई ने इस बार की अनुगूँज में हिस्सा लेते हुए पाँच बातें लिखी हैं कि यदि हिन्दुस्तान अमेरिका बन जाए तो कैसा होगा। कुछ बातें जो उजागर होती हैं:

Americanised India - 1

तो क्या बच्चे आज ऐसे नहीं हैं? बिलकुल हैं, महानगरों में उच्च-मध्यमवर्गीय और उच्च वर्गीय परिवारों में तो क्या, छोटे शहरों में भी ऐसे बच्चे मिल जाएँगे। पहचाना नहीं? ये राज-दुलारे हैं, लाड़ले, ज़रूरत से अधिक लाड़ किए हुए लाड़ले!!

Americanised India - 2

क्या ऐसे बालक आज नहीं हैं? कुछ वर्ष पहले अपने कॉलेज के समय में वहाँ तो ऐसे लोग देखे थे, प्रगति के दर को यदि मद्देनज़र रखा जाए तो क्या इस सब की आज स्कूलों में आशा करना ज़रूरत से अधिक पॉजिटिव थिंकिन्ग है? अब याद आ रहा है कि अपने स्कूल के आखिरी के 2 वर्षों में भी ऐसे उन्नत और मॉडर्न छात्र देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था मुझे, तो आज तो उनके पद-चिन्हों पर चलने वाले कई होंगे!!

Americanised India - 3

अपनी माताजी से पता करने पर यह तो पक्का हो गया है कि अभी रेट तो इतने ऊपर नहीं पहुँचे हैं, लेकिन अपने सामान्य ज्ञान की बदौलत यह भी पता है कि ऐसे तकनीकी उपकरण भी पीछे नहीं हैं, आज बहुतया घरों में इनकी घुसपैठ हो चुकी है; डिश-वॉशर और वैक्यूम क्लीनर न सही लेकिन वॉशिंग मशीन तो टीवी-फ्रिज की भांति आम बात होती जा रही है।

तो क्या अमेरिका में सिर्फ़ बुराईयाँ ही हैं? अगर नहीं तो लोगों को अच्छाई दिखाई क्यों नहीं दे रही? वैसे ऐसी बात नहीं है कि अच्छाई दिखाई नहीं देती। कुछ समझदार लोगों को दिखाई देती है, जिनके लिए अमेरिका सपनों का देश होता है। क्यों सपनों का देश होता है? वह इसलिए क्योंकि लगभग 3 करोड़ की आबादी वाला संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व में तीसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है, हर तरह का मौसम है, विश्व में सबसे अधिक जीडीपी(GDP) वाला देश है, उच्च कोटि के विश्वविद्यालय हैं जैसे हारवर्ड, स्टैनफोर्ड, एमाआईटी(MIT) आदि। इतना ही नहीं, न्यू यार्क अमेरिका में है, एम्पायर स्टेट बिल्डिंग न्यू यार्क में है, हॉलीवुड अमेरिका में है, सबसे अधिक टीवी देखने वाले अमेरिकी होते हैं। इन सब खूबियों के कारण अमेरिका एक ड्रीम डेस्टिनेशन है!! :roll: अब ऐसे लेख देख और ऐसे ड्रीम पढ़ तरस आता है अमेरिका पर, पहले ही बुद्धिजीवियों की कमी नहीं है वहाँ, यहाँ से और चले जाएँगे तो क्या होगा?? लेकिन फिर मन स्वार्थी हो जाता है, सोचता है कि चलो अच्छा है, इसी बहाने अपने देश की सफाई तो होगी, हालात सुधरेंगे!! ;)

मैं कभी अमेरिका नहीं गया हूँ, अभी तक जाने का सौभाग्य नहीं प्राप्त हुआ है, लेकिन दोस्तों आदि से इस बात का एहसास मिला है कि अमेरिका में मशीनी मानव बसते हैं, आपस में आत्मीयता नहीं है, रिश्तों में वो गर्माहट नहीं है जो एशियाई देशों में मिलेगी, चाहे वो भाई-बंधुत्व में हो या दुश्मनी में। सुना है कि वहाँ की आबो-हवा ऐसी है कि यदि यहाँ से भी कोई व्यक्ति वहाँ जाए तो एक सप्ताह में ही उसके व्यवहार में अंतर आने लगता है जिसको पीछे रह गए उसके घर वाले और मित्र आदि महसूस कर सकते हैं। होता होगा जी, अपन कभी गए तो फर्स्ट हैन्ड एक्सपीरियंस(first hand experience) बता देंगे। अनुगूँज में इसी के तहत भाग नहीं लिए हैं कि जब जिस जगह के बारे में जानना ही नहीं हुआ है उस बारे में अपने विचार व्यक्त कर काहे खामखा विद्वान बनें!! :)

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धर्म या ढ़ोंग?

March 30, 2006 · 28 Comments

अस्वीकरण:-

इस लेख में आलोचना भी है और एकाध जगह पर कुछ अधिक ही हो गई है, पर वे वही भाव हैं जो मेरे हृदय से अंकुरित हुए हैं। इसलिए सावधान, आपको इसे पढ़ने के लिए कोई बाध्य नहीं कर रहा है, पढ़ना हो तो पढ़ें वरना राम नाम जपें(और मुझे माफ़ करें)। मैं एक बेवकूफ़ हूँ, यह मुझे पता है, इसलिए यह बताने का कष्ट करने की बजाय यहाँ से कट लें!!

अक्षरग्राम अनुगूँजतो इस बार की अनुगूँज(क्रमांक १८) का आयोजन तीर-कमान की छाया में हो रहा है, मेरा मतबल कि तरकश के बड़े तीर जोगलिखी वाले संजय भाई ने किया है। विषय भी कोई ऐसा वैसा नहीं, बल्कि रामबाण सा अचूक लाए हैं, “मेरे जीवन में धर्म का महत्व“, और ऐसा हो भी क्यों न, भई आखिर तीर-कमान वाले हैं!! ;)

हाँ तो बच्चों, बताओ धर्म क्या है? धर्म जी तो बॉलीवुड के रैम्बो धर्मेन्द्र को कहा जाता है, या यूँ कहें कि उन्हें “धर्म पाजी” के नाम से सम्बोधित किया जाता है। तो क्या धर्म वे हैं? नहीं, यह कोई आवश्यक नहीं कि धर्मेन्द्र नाम होने से कोई धर्म का इन्द्र हो जाता है, भई कलयुग है, धोखाधड़ी का ज़माना है!! ;)

पर भई, जीवन में धर्म के महत्व को जानने या बताने से पहले यह तो बतलाओ कि धर्म है क्या? वास्तव में बात यह है कि धर्म की परिभाषा कोई नहीं जानता, जानता होता तो इतना भ्रमित न होता वह सामाजिक पशु जो मनुष्य के नाम से जाना जाता है। यही कारण है कि प्रत्येक व्यक्ति, समुदाय आदि ने धर्म की अपनी अपनी परिभाषाएँ रच ली हैं, और इस प्रकार उन अनेकों समुदायों की उत्पत्ति हुई जिन्हें मुसीबत से बचने के लिए हम धर्म कहे देते हैं। पर इतने सारे धर्म? कौन सा सही है? क्या हिन्दु धर्म या इस्लाम? सिख धर्म या ईसाई धर्म? जैन धर्म या बौद्ध धर्म? कहाँ जाएँ? किसे मानें, किसे न मानें? तौबा!!

मेरा मानना है कि यह व्यक्ति का अपना स्वतंत्र निर्णय होना चाहिए कि वह किसे मानता है। मनुष्य का कर्म ही उसका धर्म है, यह मेरा मानना है। धर्म इसके अतिरिक्त कुछ नहीं है। मेरा जन्म एक हिन्दु अग्रवाल परिवार में हुआ है। अन्य बालकों की तरह मैं भी हिन्दु धर्म की महानता का बखान और रामायण आदि सुनते हुए बड़ा हुआ, पर जैसे जैसे मेरी बुद्धि ने सोचना समझना आरम्भ किया और जैसे जैसे मैं हिन्दु धर्म के ग्रन्थ आदि पढ़ता गया, ज्ञान का प्रकाश उज्जवल होता गया और मैं तथाकथित धर्म की काली छाया से दूर होता गया। मेरी आरम्भिक शिक्षा दीक्षा आर्य-समाजी स्कूल में हुई पर १२-१३ वर्ष की आयु तक पहुँचते पहुँचते मुझे काफ़ी अधिक ज्ञान मिल चुका था, उतना नहीं जितना गौतम बुद्ध को बोधी वृक्ष के नीचे मिला था(अब भई मैं उस वृक्ष के नीचे नहीं बैठा था इसलिए मुझे उतना नहीं मिला), परन्तु फ़िर भी उस समय के लिए काम चलाऊ था, इसलिए मैंने हिन्दु धर्म को तथा किसी भी तथाकथित अन्य धर्म को मानना छोड़ दिया। आमतौर पर मैं प्रत्यक्ष में किसी धर्म की आलोचना नहीं करता, भई जिसको मानना है माने, जिसको नहीं मानना वह न माने, कोई गुण्डागर्दी थोड़े ही है, पर जब कोई किसी धर्म का प्रचार अपना उल्लू सीधा करने के लिए या लोगों को बरगलाने के लिए करता है तो खून खौल जाता है।

प्रवचन - पर सुन कौन रहा है?अब ऐसा ही वाक्या कल सांय काल हुआ। विक्रमी संवत् के नव वर्ष के आरम्भ के उपलक्ष्य में हमारे घर के पास हिन्दु सभा का आयोजन हुआ था, हमें भी निमंत्रण मिला आने का। मेरा तो मन नहीं था जाने का, परन्तु माताश्री बोलीं कि चले चलो तो मैं उनको लेकर चल दिया। जब हम पहुँचे तो कार्यक्रम ज़रा गर्मी पर था, आरम्भ हुए समय हो गया था, और एक साहब(जो कदाचित् विश्व हिन्दु परिशद के अखिल भारतीय सचिव थे) प्रवचन दे रहे थे। प्रवचन क्या, वे भारत और हिन्दु धर्म की महानता का बखान कर रहे थे। महाशय की बात पर थोड़ा ध्यान दिया तो पता चला कि वे सभासदों से प्रश्न कर रहे थे कि भारत को, जिसकी सभ्यता का इतिहास सबसे पुराना है, उसे आज क्या हो गया है? फ़िर वे बात करने लगे उस समय की जब अलेक्ज़ान्डर(यानि सिकन्दर महान) ने भारत पर हमला किया था। अफ़ग़ानिस्तान और खैबर पास के रास्ते भारत में घुसे सिकन्दर को उन साहब के अनुसार वीर भारतीय सेनानियों ने मार भगाया था, और मारा भी ऐसा था कि २५ वर्ष की अल्प आयु का वह विश्व विजेता वापस अपने देश यूनान जीवित न पहुँच पाया था। अब उन महाशय को मैंने सही तथ्य बताना अपने समय की बर्बादी समझा वरना उन्हें मैं बताता कि सिकन्दर को भारतीय सेनानियों ने नहीं मार भगाया था, बल्कि उसके बीमार पड़ जाने और सेना में विद्रोह हो जाने के कारण उसे वापसी करनी पड़ी थी और उसकी (जहाँ तक मैंने पढ़ा है) पीलिया के कारण मृत्यु हो गई थी। दूसरी बात, उस समय यूनान एक देश न था बल्कि अलग अलग राज्यों में बँटा हुआ था(ठीक हमारे भारत की तरह) और सिकन्दर का देश इसलिए मेसेडोनिया था जो कि आज मेसेडोनिया गणराज्य है!!

हिन्दु बिरादरी - ऊब गए ठ??, अब बन्द ठ?? करो, और खाना-वाना लगवाओ!!परन्तु तथ्यों से अन्जान वे साहब अपना प्रवचन ज़ारी रखे हुए थे कि उस समय भारत अजेय था क्योंकि वीर हिन्दु बसते थे और हिन्दु धर्म का प्रकाश फ़ैला हुआ था। पर आज़ादी के बाद धर्मनिर्पेक्षता के नाम पर वोट बटोरने की खातिर हिन्दु धर्म को कुचला गया, उसकी महिमा कम करने की कोशिश की गई। अरे, मैं उन साहबान से पूछना भूल गया कि ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से वे सीधे ही ढाई हज़ार वर्ष बाद के समय में क्यों आ गए, बीच के हज़ार-डेढ़ हज़ार वर्ष के मुस्लिम और अंग्रेजी शासन को क्यों कर अनदेखा कर गए। कुतुबुद्दीन-ऐबक से लेकर महारानी ऐलिज़ाबेथ तक, वीर हिन्दु सेनानी काहे नींद मारते रहे भाई, क्या हिन्दुत्व उस समय सो गया था!! :roll: जिन्होंने उस सिकन्दर को मार भगाया था जिसने अपने कुछ चालीस हज़ार की सेना से पर्सिया की दो-ढाई लाख़ की सेना को मार भगाया था और लगभग पूरा ज्ञात विश्व जीत लिया था, उन लोगों का हज़ार वर्ष तक ग़ुलामी में रहना, और अन्त में मात्र कुछ मुट्ठीभर अंग्रेज़ों के ज़ुल्म सहना, बात कुछ हज़म नहीं होती भई, शायद हाजमोला ले जानी चाहिए थी(अब वे ही तो अपने विज्ञापन में कहते हैं, हज़म सब चाहो जब)!! ;)

अभी नीन्द आने ही लगी थी मुझे कि एहसास हुआ कि जो लोग बोर से कुर्सियों पर बैठे थे अचानक उठ कर बाहर जाने लगे थे। अब भई उन साहब का प्रवचन इतना भी बोर नहीं था कि लोग उठ कर जाने लगें। सो कारण जानने के लिए मैं भी बाहर ही लपक लिया। बाहर जाकर पता चला कि भोजन लगना आरम्भ हो गया था इसलिए सभी भुक्कड़ बाहर भागे जा रहे थे, भई फ़ोकट का खाना खाने ही तो सभी आए थे। ;) पर प्लेट लेने की मारामारी देख मैं सकते में आ गया। अभी तक संभ्रात से दिखने वाले लोग असभ्य भुक्कड़ों की तरह प्लेटें लेने के लिए मरे जा रहे थे, क्योंकि वे आयोजन समिति के समझदार लोगों के सुरक्षित हाथों में थी। और तो और, पास ही मन्दिर के बाहर बैठे भिखारी आदि भी फ़ोकट के खाने का मज़ा लेने आ गए थे। इतनी मारा-मारी थी कि बस पूछो ही मत!! और अन्दर वो साहब पूछ रहे थे कि हमारे भारत को क्या हो गया है। मन तो किया कि उनको बाहर लाऊँ और दिखाऊँ कि भारत को क्या हो गया है, पर पुनः मन की इच्छा मन ही में दबी रह गई!! ;) माताश्री आईं और बोली कि हमे भी खा पी लेना चाहिए, तो मैंने पूछा कि कहाँ खाएँ पिएँ, यहाँ तो मारा मारी मची हुई है!! तो अन्त में फ़िर एक रेस्तरां में गए और वहाँ पेट पूजा की!!

तो भई जिस तरह यह एक उदाहरण था एक धर्म का, उसी तरह सभी धर्मों के सैकड़ों अन्य उदाहरण हैं। ये तथाकथित धर्म मेरी नज़र में मात्र एक बकवास हैं, ये तभी अच्छे थे जब अपने आरम्भिक समय में ये मानवता तथा कर्म की शिक्षा देते थे। परन्तु अपने सदियों के सफ़र के दौरान ये बिगड़ते गए हैं और आज जो हम देखते हैं वह उनका अति विकृत रूप है।

मेरे अनुसार, मनुष्य का कर्म ही उसका धर्म है, उसे ही ईमानदारी से निभाते रहो, वही धर्म पालन है। आलस्य, कर्म न करना ही अधर्म है, और यदि मेरी स्मरणशक्ति धोखा नहीं दे रही है तो महाभारत में युधिष्ठिर ने यक्ष को भी यही उत्तर दिया था, तथा गीता में भी यही लिखा है कि मनुष्य को कर्म करना चाहिए, बाकी सबकी चिन्ता छोड़ देनी चाहिए।

लोगों की सबसे बड़ी मूर्खता का परिचय यही है कि वे धर्म ग्रन्थों में लिखी बातों का व्यवहारिक अर्थ लेने की बजाय आक्षरिक अर्थ ले लेते हैं। तो किसी भी धर्म से अधिक दोष उसे मानने वालों का है। जहाँ तक मेरा ज्ञान कहता है, किसी धर्म में नहीं लिखा कि भक्तजनों को आँख मूँद कर हर बात मान लेनी चाहिए, प्रश्न करना मनुष्य का स्वभाव है और उसे नहीं बदलना चाहिए, क्योंकि जिस मनुष्य में प्रश्न करने की क्षमता नहीं होती उसका ज्ञान भी सीमित ही होता है। परन्तु आमतौर पर लोग करते यही हैं, धर्म के प्रवचनों का आँख मूँद पालन करते हैं।

अब जैसे कि गीता में लिखा है:

यदा यदा हि धर्मस्य, ग्लानिर् भवती भारत:
अभ्युथानम् अधर्मस्य, तदातमानम् सृजाम्यहम्,
परित्राणाय साधूनाम्, विनाशाए च् दुष्कृत:,
धर्म संस्थापनार्थाय, सम्भवामी युगे युगे।

अब इसका लोग व्यवहारिक भाव नहीं लेते, वरन् इसका आक्षरिक अर्थ ले लेते हैं और वहीं से सारी समस्या आरम्भ हो जाती है, क्योंकि इसे पढ़ने या सुनने के बाद लोग श्रीकृष्ण की मूर्ति के सामने माथा टेकते हैं और धूप बत्ती जला देते हैं, ज्यादा हुआ तो मन्दिर में जाकर पैसे आदि चढ़ा आते हैं!!

कुछ वर्ष पहले अफ़वाह उड़ी थी कि गणेश जी की मूर्तियाँ दूध पी रही हैं, मेरी माताश्री, जो कि एक बड़ी भक्तिन हैं, दूध लेकर मन्दिर चल दी गणेश जी को पिलाने। कौतुहूलवश मैं भी चल दिया तमाशा देखने। वहाँ जाकर देखा कि ढेरों भक्त दूध पिलाने में लगे हुए हैं। अब कौन उन्हें समझाए कि एक ही दिन में इतना दूध नहीं पिलाना चाहिए, भगवन् को बदहज़मी हो जाएगी, बीमार भी हो सकते हैं। तभी मन्दिर में शोर मचा कि बाकि मूर्तियाँ भी दूध ग्रहण कर रही हैं, कदाचित उन्हें भी भूख लग आई होगी या फ़िर गणेशजी की दुर्दशा उनसे देखी न जा रही होगी। तो जो गणेशजी के पास न जा पा रहे थे, वे दूसरे देवों की मूर्तियों से ही काम चलाने लगे। परन्तु जो मैंने देखा वह किसी और भक्त ने न देखा, क्योंकि सभी अन्धे जो थे(अक्ल से, आँखों से नहीं, वरना दूध कैसे पिलाते)!! और जो मैंने देखा वह वाकई हास्यप्रद था, क्योंकि जिस दूध को भक्त जन समझ रहे थे कि देव पी रहे हैं, वह तो उनकी मूर्तियों से बहता पास बनी मोरी में जा रहा था। उस समय मुझे सभी की मूर्खता पर क्रोध आ रहा था, पर क्रोध से अधिक हँसी आ रही थी(अब अधिक क्रोध तो दिखा नहीं सकता था न, बच्चा था और माताश्री ने मेरी पिटाई कर देनी थी)। तो क्या हमारा धर्म यह कहता है? पुनः, जहाँ तक मेरा ज्ञान कहता है, नहीं, धर्म यह नहीं कहता।

वो कहावत सुनी है न, करता कोई है और भरता कोई है। ठीक वैसा यहाँ है, धर्म इतना भी बुरा नहीं है, पर लोगों के आचरण और धर्म की उनकी विक्षिप्त व्याख्या ने उसे बुरा बना दिया है। और दोषियों में सबसे आगे हैं पंडे पुरोहित आदि। पूरे मानव इतिहास में इनसे बड़ा कमीना कदाचित् ही कोई हुआ होगा। अपना उल्लू सीधा करने के लिए हर जायज़-नाजायज़ बात को धर्म का कपड़ा ओढ़ा देना इनका सदियों से कार्य रहा है, हराम की खाने के लिए इन्होंने तरह तरह के दानों की व्याख्या कर दी जो कि इनको दिया जाना चाहिए, सबसे बड़े अधर्मी तो ये ही लोग होते हैं क्योंकि ये कर्म नहीं करते, क्योंकि चौबीसों घंटे माला फ़ेरते रहने को कर्म नहीं कहते। इस पर कबीर जी का एक दोहा भी है जो कि कुछ ऐसा ही कहता है कि माला फ़ेरते युग बीते पर मन का मनका नहीं फ़िरा, मन का मनका फ़ेरना ही सच्ची अराधना है।

इस विषय पर बकबक करने के लिए बहुत सामग्री है, पर मैं और अधिक बकवास कर अपना और आपका समय व्यर्थ नहीं करना चाहता, पहले ही तीन घंटे से ऊपर का समय लग चुका है इसमें!!

तो अन्त में यही कहूँगा कि मेरे अनुसार

कर्म ही धर्म है, कर्मभूमि है धर्मक्षेत्र,
कर्मयोगी ही सच्चा भक्त है, और कर्म करना ही है मोक्ष का मार्ग।
जो कर्म न करे वही अधर्मी है, अन्धकार का प्रतीक है, इसलिए करो उसका नाश।

इसी सोच पर अब तक चलता आया हूँ और आगे भी इसी पर चलूँगा। कोई पूछे तो उसको अपने विचार अवश्य बता सकता हूँ, पर उन्हें ग्रहण करने के लिए बाध्य नहीं करता, जो माने उसका भला, जो न माने उसका(यदि मेरे कहने से हो सकता है तो उसका) भी भला। :)

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नई मुद्रा, नया भारत?

January 2, 2006 · No Comments

अक्षरग्राम अनुगूँजरजनीश ने सत्रहवीं अनुगूँज की और विषय है, “क्या भारतीय मुद्रा बदल जानी चाहिए?“। उनका कहना है कि जैसे 2001 में यूरोप में नई मुद्रा यूरो का प्रयोग चालू हुआ था और कई बदलाव आए थे, उसी प्रकार भारत में यदि एक नई मुद्रा चालू की जाए जिसका एक रूपया पुराने पचास रूपयों के बराबर हो, तो यहाँ पर भी क्राँति आ सकती है। उदाहरण वे दे रहे हैं जर्मनी का जिसके मार्क की कीमत से दोगुनी कीमत यूरो की रखी गई और जिसके कारण वहाँ की अर्थव्यवस्था में कई बदलाव आए। रजनीश ने सोच विचार करते हुए कुछ परिणामों को अंकित किया है जो कि सार्थक हो सकते हैं यदि भारतीय मुद्रा का पुनर्मूल्यांकन किया गया तो।

परन्तु बहुत सी अहम बातें हैं जिन पर मैं रजनीश से सहमत नहीं हूँ। पहली और सबसे अहम बात तो यह है कि बेशक मार्क से दोगुनी कीमत होने के कारण यूरो ने जर्मनी की अर्थव्यवस्था पर अपना सद्प्रभाव नहीं छोड़ा है, परन्तु रजनीश एक बात भूल गए कि यूरो केवल जर्मनी में ही नहीं बल्कि लगभग पूरे यूरोप में चलता है, और यूरोप एक देश नहीं बल्कि कई देशों से बना एक महाद्वीप है। हर देश की अपनी एक मुद्रा है और सबकी कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में समान नहीं है। हालांकि मैं इस विषय में ज्यादा ज्ञान नहीं रखता हूँ परन्तु जहाँ तक मैं जानता हूँ, यूरो का दाम देश के स्वर्ण कोष और उसकी मुद्रा के डॉलर के अनुपात भाव की तर्ज पर रखा गया था। यूरो का प्रस्ताव यूरोप की एकीकृत मुद्रा के तौर पर रखा गया था जोकि यूरोप को संगठित करने के प्रयास का एक महत्वपूर्ण अंश है। तो इसलिए जर्मनी के मार्क और वहाँ की अर्थव्यवस्था का उदाहरण देना उचित नहीं है। दूसरी बात यह है कि चूंकि यूरो का जन्म किसी एक देश की मुद्रा के पुनर्मूल्यांकन के तौर पर नहीं हुआ था, इसलिए उसका उदाहरण यहाँ इस मुद्दे पर अहम रूप से देना पूर्णतया अनुचित है। तीसरी बात यह है कि यूरोपीय संघ के सभी सदस्य देशों ने यूरो को पूर्णतया नहीं अपनाया है। जहाँ जर्मनी जैसे देश हैं जिन्होने यूरो के चलते अपनी मुद्रा रद्द कर दी, वहीं अभी कई देशों में यूरो घरेलू मुद्रा के साथ साथ प्रयोग की जा रही है, परन्तु प्राथमिकता घरेलू मुद्रा को ही दी जाती है।

जहाँ तक मेरा विचार है, अभी ऐसी कोई आफ़त नहीं आन पड़ी है कि भारतीय मुद्रा का पुनर्मूल्यांकन हो और एक नई मुद्रा को स्थापित किया जाए। और वैसे भी किसी भी मुद्रा का मूल्य देश के स्वर्ण भंण्डार के अनुरूप कम अथवा ज्यादा होता है। तो नई भारतीय मुद्रा को पुनर्मूल्यांकित करके उसकी एकाई को पुरानी मुद्रा की पचास(अथवा कम या ज्यादा) एकाईयों के बराबर नहीं मूल्यांकित किया जा सकता।

तो यदि रजनीश के दिए हुए परिणामों का अवलोकन करें तो वे और उनके विरूद्ध मेरी टिप्पणियाँ इस प्रकार हैं।

रजनीश द्वारा कथित फ़ायदे:

  1. नई मुद्रा को इस्तेमाल करने वाली आटोमैटिक मशीनें बनाईं जा सकती हैं जिनसे लोग टिकटें आदि ख़रीदें। क्या यह काम अब वर्तमान मुद्रा के चलते नहीं हो सकता?
  2. नेताओं के दबाये हुये ब्लैक के करोड़ों रुपये बाहर आएंगे। किस विश्वास के साथ यह बात कही जा सकती है? और यदि मान भी लिया जाए कि ऐसा हो जाता है, तो क्या हो जाएगा? क्या उन नेताओं का कोई कुछ बिगाड़ लेगा? कोई आजतक यह प्रश्न तो उठा नहीं पाया कि लालू ने अपनी बेटी के विवाह में जो 52 करोड़ रूपये खर्च किए वे कहाँ से आए, और फ़िर यहाँ तो लगभग सभी नेताओं की काली कमाई की बात हो रही है जिसका कुल योग कई हज़ार करोड़ रूपये होगा। यदि हम इस संभावना पर भी विचार कर लें कि हर नेता की काली कमाई का योग पता लग भी जाता है, तो क्या होगा? यह तो ज़ाहिर है कि वह संपत्ति देश में तो गाड़ नहीं रखी होगी, वह तो किसी स्विस बैंक या किसी केयमैन द्वीप के बैंक में सड़ रही होगी और वे लोग तो खातेदार के अतिरिक्त किसी और कि एक भी दमड़ी देने से रहे। स्वयंमेव जयते…
  3. बाहर जाने की लालसा कम होगी। रुपयों डॉलरों में फ़र्क कम रह जाएगा। डॉलर की तरफ़ आकर्षण कम हो सकता है। यह क्या तर्क हुआ भई? क्या जिन देशों की मुद्रा डॉलर से अधिक कीमती होती है, वहाँ के निवासी विदेश भ्रमण के लिए नहीं जाते? यदि ऐसा है तो अधिकतर यूरोपीय देश इस श्रेणी में आ जाएँगे क्योकि यूरो की कीमत डॉलर से अधिक है। साथ ही गिनती में आ जाएँगे मिड्डल-ईस्ट के कुछ देश जैसे सऊदी अरब जहाँ का दीनार डॉलर के अनुपात में काफ़ी कीमती है!! और रूपये तथा डॉलर की कीमत लगभग समानांतर हो जाने से डॉलर की ओर आकर्षण कम क्यों हो जाएगा? डॉलर एक तरह से विश्वीय मुद्रा है तथा अधिकतर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार डॉलर में ही होता है, इसलिए इसकी ओर आकर्षण तो तभी समाप्त हो सकता है जब इसका स्थान लेने के लिए कोई दूसरी मुद्रा आ जाए। यूरो की रचना का एक मुख्य कारण यह भी था कि वह डॉलर को हटा कर स्वयं विश्वीय मुद्रा बन जाए पर ऐसा हो न पाया!!

रजनीश द्वारा कथित नुकसान:

  1. महंगाई बढ़ेगी। कौन से तथ्य यह सिद्ध करते हैं? क्या अभी महंगाई नही बढ़ रही?
  2. गरीबी बढ़ सकती है। पुनः तथ्यों का अभाव।
  3. ज़्यादा तनख़्वाह की माँग हो सकती है। यह तो महंगाई के अनुपात में चलता है। यदि महंगाई बढ़ती है तो अधिक वेतन की माँग तो होगी ही, फ़िर भी मैं यही कहूँगा, “तथ्यों का अभाव”!!
  4. शायद अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां भारत में निवेश से हिचकें। मेरे अनुसार ऐसा होने की आधी आधी संभावना है। क्योंकि भारतीय बाज़ार अभी बढ़ रहा है, इसलिए यहाँ पर कमाई के अवसर अधिक हैं परन्तु यदि भारतीय मुद्रा का भाव डॉलर के बराबर या उससे अधिक हो जाता है तो कदाचित निवेश में कमी हो सकती है क्योंकि अभी तो अधिक निवेश का एक कारण भारतीय मुद्रा का डॉलर के अनुपात में कम होना भी है।

यदि मेरी स्मरण शक्ति धोख़ा नहीं खा रही, तो जहाँ तक मुझे याद है, पिछले से पिछले सार्क सम्मेलन में भारत ने सार्क देशों के लिए एक संयुक्त मुद्रा का प्रस्ताव रखा था(ऐसा मैंने अख़बार में पढ़ा था), जैसे कि यूरोप में यूरो है। इस बारे में बात अधिक आगे नहीं बढ़ी थी लेकिन फ़िर भी एक सम्भावना है, शायद यह कभी यथार्थ हो जाए!! ;)

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