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मुम्बई ले लो….. बंगलूरु ले लो….. कोलकाता ले लो…..
January 25, 2008 · 6 Comments
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क्रिकेटिया रस में डूबे कुछ यादगार पल …..
September 27, 2007 · 7 Comments
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बताया है कि आजकल क्रिकेटिया ज्वर चल रिया है, भारतीय जवान पहला २०-२० वाला अर्द्ध क्रिकेट विश्वकप जीत लाए हैं। अब इस पर भी प्रश्न हो रहे हैं, कोई कह रहा है कि हॉकी वालों को क्यों भूल गए और रईसों पर पैसे की बारिश क्यों तो दूसरी ओर कोई कुछ गरीब क्रिकेटरों के हक़ के लिए लड़ रहा है। इधर जीतू भाई अपने बचपन के बीते क्रिकेटिया दिनों में पहुँच गए तो मेरे को लगा कि क्रिकेट तो मैं भी काफ़ी खेला हूँ बचपन में, काफ़ी क्या जितना खेला हूँ उससे भी मन नहीं भरा!!
दसवीं के बोर्ड की परीक्षाएँ चल रही थीं, अगले दिन परीक्षा होती, पाठ तैयार होता या न होता, क्रिकेट खेलने अवश्य पहुँच जाता और जब वापस आता तो माता जी से अपने लिए स्तुतिगान सुनता और झापड़ों का प्रसाद भी मिलता बकायदा!!
इतना ही नहीं, रात को भी पूरा इंतज़ाम होता अंडर द लाइट्स (under the lights) खेलने का।
अब क्या है, नानी जी की सोसायटी में ही अपने सारे यार दोस्त, साथ के भी, और बड़े (अकड़ू और खड़ूस)भईया लोग भी, और सोसायटी की एक इमारत में नीचे एक बड़ा सा हॉल(चार फ्लैटों के जितने एरिया में), उसी में मरकरी (mercury) लाईटें लगाई, बिजली के मेन्स में तार जोड़ी और एक क्रिकेट वाले नेट का जुगाड़ किया और रात को खेलने के लिए मामाला सेट!! अब क्या है कि इस हॉल के एक मुँह पर सोसायटी का खुला मध्य-भाग है और दूसरे मुँह पर एक मीटर दूर दीवार है, तो खुले मुँह पर नेट लगा दिया जाता ताकि गेंद अंधेरे में खो न जाए।
फिर दो तरीके का क्रिकेट खेला जाता; लाँग पिच (long pitch) और शॉर्ट पिच (short pitch)। लाँग पिच में हॉल के एक मुँहाने पर बल्लेबाज़ होता और दूसरे पर से तेज़ गेन्दबाज़ी होती(गेन्दबाज़ बाहर से भाग के आता), वहीं दूसरी ओर शॉर्ट पिच तब खेलते जब खेलने वाले अधिक हों, तो लंबाई में खेलने की जगह चौड़ाई में खेला जाता, बायीं ओर की दीवार के पास बल्लेबाज़ और दायीं ओर की दीवार पर गेंदबाज़ बिना हाथ घुमाए स्पिन गेन्दबाज़ी करता और लेग साइड पर रन बनाने होते(कभी-२ इसको पलट कर ऑफ़ साइड रन बनाने वाला भी खेला जाता)।
आवश्यकता अविष्कार की जननी होती है, यहाँ भी अविष्कार की कमी नहीं थी। बंदे ज़्यादा हैं तो शॉर्ट पिच खेल का अविष्कार हुआ जो कि २०-२० की तरह सरासर बल्लेबाज़ का खेल था। क्योंकि तेज़ गेन्द फेंकने पर पाबंदी थी, इसलिए रन पड़ने से रोकने के लिए एक से बढ़कर एक स्पिन की ईजाद की गई। इसमें मैं और एक अन्य लड़का सबसे आगे, नए-२ प्रयोग करते रहते थे(जब साथ में छोटे बच्चे खेल रहे हों या सामने कोई ढीला खिलाड़ी हो) और इन्हीं प्रयोगों के चलते हम दोनों ने एक-२ नई ईजाद की; उसने टप्पा खाकर रूक जाने वाली(या वापस गेंदबाज़ की दिशा में सरकने वाली) गेंद की ईज़ाद की और मैंने बल्लेबाज़ के पैर के पास टप्पा डाल अप्रत्याशित रूप से बल्लेबाज़ के चेहरे तक उछल जाने वाली गेंद की ईज़ाद की। ये दोनों गेंदे सही तरीके से अचानक प्रयोग करने पर बहुत मारक सिद्ध होतीं थीं। लेकिन मैंने महसूस किया था कि मेरी तकनीक उतनी कारगर नहीं होती विकेट लेने में जितनी वो रूक जाने वाली गेंद होती थी तो इसलिए प्रतियोगिता में रहने के लिए मैंने जल्द ही समझ लिया कि यह गेंद आखिरकार होती कैसे है(उस लड़के ने नहीं बताया था) और फिर उसको धीरे-२ सुधारा। लेकिन अपनी ईज़ाद की तकनीक को मैं भूला नहीं और उसको लाँग पिच वाले खेल में प्रयोग करने की कोशिश की। गर्मियों की छुट्टियों में भरी दोपहर में, जब कोई कुत्ता भी बाहर नहीं नज़र आता था, मैं उस सोसायटी हॉल में अकेले अपनी गेंदबाज़ी सुधारने का अभ्यास करता था और नए-२ तरीकों को आज़माता था। जितने गेंदबाज़ी के एक्शन मैंने बदले होंगे उतने पूरे मोहल्ले में किसी ने न बदले होंगे, चाह थी सिर्फ़ अधिकतम गति से स्टीक गेंद फेंकने की, हाथ से नहीं वरन् कंधे के बल का प्रयोग करने की!! तो आखिरकार अपनी उस अप्रत्याशित उछाल वाली तकनीक को मैंने लाँग पिच वाले खेल में भी शामिल कर लिया, उस लड़के की रूक सकने वाली गेंद यहाँ नहीं आ सकी क्योंकि हाथ घुमाकर वो गेंद डालना असंभव है।
अब सभी तेज़ गेंदबाज़ प्रायः गुस्सैल क्यों होते हैं यह एक रिसर्च का विषय है, गुस्सैल अपन भी कम नहीं और अपन भी तेज़ गेंदबाज़ ही थे। शुरुआत में बाएँ हाथ से तेज़ गेंदबाज़ी किया करता था लेकिन नौ वर्ष की आयु में स्कूल से वापस आते समय बच्चों से भरे ऑटोरिक्शा के नीचे बायां हाथ आ जाने के कारण दाएँ हाथ से खेलना शुरु किया। बाएँ हाथ को कुछ हुआ नहीं, हड्डी वगैरह भी फ्रैक्चर नहीं हुई लेकिन उस दिन के बाद इससे गेंद नहीं फेंक पाया, कदाचित् कुछ मानसिक असर था। बहरहाल, तो अपनी टोली में एक हुआ करता था सहवाग टाइप लपेड़ा बल्लेबाज़, बल्ले पर जो गेंद चढ़ गई तो समझो छक्का तो लगे ही लगे!! अब उसको गेंदबाज़ी करने का भी शौक हुआ करता था, लेकिन हाथ घुमाकर भी बट्टा ही फेंक पाता, मैंने और अन्य गेंदबाज़ों ने जी भर कोशिश कर ली लेकिन उसको ठीक से हाथ घुमाकर गेंद फेंकना न सिखा पाए। अब उसकी बट्टा गेंद से शुरु में हम लोगों की हवा टाइट होती थी, एक तो तेज़ फेंकता था(मेरे जितनी और मैं अपनी टोली में सबसे अधिक तेज़ फेंकता था, स्वयं मैं अपने जितनी तेज़ खेलने से उस समय घबराता था) और ऊपर से निशाना सही लगता था उसका, गेंद की पिटाई तो दूर विकेट बचाने के लाले पड़ जाते थे!! इसलिए आम सहमति से यही निर्णय लिया जाता था कि बट्टा गेंद प्रतिबंधित है और वो मुँह सुजाकर रह जाता था।
एक बार की बात है कि हम लोग खेल रहे थे, वो अपना बट्टा फेंकने वाला लपेड़ा बल्लेबाज़ दोस्त दूसरी टीम में था और उसका कप्तान पता नहीं काहे हम लोगों से चिढ़ गया कि खेल के बीच में ही(हमारी बल्लेबाज़ी के दौरान) उसको गेंद पकड़ा दी और फिर उसके बाद तो हम लोगों के रनों का सिलसिला थम गया, पाँच ओवर के खेल में हम कुछ खास न बना पाए। अब जब हमारी गेंदबाज़ी आई तो उनकी गिल्लियाँ हम निकाल रहे थे लेकिन पाँचवें ओवर तक आते-२ वही हाल हो गया था जो अभी २०-२० के फाइनल में भारत-पाकिस्तान का था, मतलब रन कम चाहिए थे लेकिन विकेट भी एक ही था। ओवर मेरा था और यदि चार रन पड़ जाते तो मेरे को बहुत भला-बुरा सुनने को मिलता(मत्थे तो मेरे ही मढ़ी जाती हार)। तभी मेरे दिमाग में एक शैतानी विचार आया, दूसरी टीम वालों ने बीच मैच में धोखा कर बट्टा गेंद फिंकवा हमारी वाट लगाई थी तो हम क्यों पीछे रहें, खून का बदला खून वाला जज़्बा वेग से मेरी नसों में दौड़ा, विरोधी टीम का आखिरी बल्लेबाज़ ठुकाई के मूड में था, और अपन दोनों टीमों में सबसे तेज़ गेंदबाज़(सबसे बेहतर नहीं लेकिन सबसे तेज़ अवश्य), इस पर विरोधी टीम का दुर्भाग्य कि मैंने कुछ दिन पहले ही बॉडीलाइन (bodyline) गेंदबाज़ी के बारे में टीवी पर देखा था। तीन गेंद बाकी थी आखिरी ओवर की, चार रन दरकार थे और आखिरी विकेट बचा था। मैंने सोच लिया था कि क्या करना है और अपनी सोच को अंजाम देते हुए पूरा दम लगाकर और निशाना साध बल्लेबाज़ के पेट पर सीधी गेंद फेंकी, वो सीधा हुआ और उसकी जंघा पर गेंद वेग से टकराई, कॉस्को की टेनिस वाली गेंद थी लेकिन फिर भी बहुत ज़ोर से लगी, वो तड़प के नीचे बैठ गया और उसके टीम वालों ने उसे घेर लिया, इधर मेरी टीम वाले प्रसन्न, मेरी ओर शाबाशी वाली निगाहें, ऐसा लग रहा था कि अब ये तो रिटायर्ड हर्ट (retired hurt) हो लिया और अपन जीत गए!!
लेकिन दस मिनट बाद किसी तरह साहस जुटा (और टीम वालों के प्रोत्साहन पर) वो लड़खड़ाता हुआ किसी तरह उठ खड़ा हुआ, इधर मैं भी तैयार था, पुनः पूरा दम लगाकर गेंद फेंकी और वेग से आती हुई गेंद उसको बचने का मौका दिए बिना फिर शरीर के उसी भाग से टकराई और इस बार उसका रहा सहा सारा दम निकल गया, अगले ने हाथ जोड़ दिए और आखिरी गेंद खेलने से मना कर दिया और मैच हम लोगों ने जीत लिया।
उछलने कूदने चिल्लाने के बाद हम लोगों ने हमदर्दी और अफ़सोस जताते हुए उसका हाल भी पूछा और औपचारिकता के नाते मैंने माफ़ी भी माँगी लेकिन इस पूरे प्रकरण में अपने दोस्त(दूसरी टीम के कप्तान) को यह सबक मिल गया कि यदि स्वयं गंदा खेलोगे तो दूसरी तरफ़ से भी गंदे खेल के लिए तैयार रहना चाहिए, यदि तुम सेर हो तो दूसरा सवा सेर हो सकता है!!
रही बात उस बल्लेबाज़ की(अरे उसी की जिसकी सिकाई हुई थी) तो वह तो आने वाले कुछ समय तक मेरी गेंदबाज़ी से आतंकित रहा ही(जो कि गेंदबाज़ के तौर पर मेरे लिए लाभदायक था), साथ ही वह बट्टा फेंकने वाला अपना लपेड़ा मित्र भी यदि विरोधी टीम में होता तो मेरी गेंद को ज़रा इज़्ज़त देकर खेलता था क्योंकि उसको भी आशंका रहती थी कि कहीं मैं उसकी भी आरती न उतार दूँ!!
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फ़ूट डालो, राज करो!!
February 9, 2006 · 3 Comments
अंग्रेज़ चले गए लेकिन अपनी विरासत के रूप में अपनी प्रसिद्ध नीति छोड़ गए, जिसने उन्हें पूरे भारतवर्ष की अलग अलग ६०० से अधिक रियासतों पर राज करवाया। अब पाकिस्तानी मीडिया और पूर्व क्रिकेटर आदि भी शायद इसी नीति का प्रयोग कर भारतीय खेमे में गर्मी पैदा करने के चक्कर में हैं।
कल हुए एक दिवसीय मैच में पाकिस्तान के कप्तान इंज़माम के आऊट होने पर भी एक विवाद सा खड़ा हो गया है, और पाकिस्तान के पूर्व कप्तान और विकेटकीपर बल्लेबाज़ मोईन खान का कहना है कि द्रविड़ को ऐसा नहीं करना चाहिए था। उनका इशारा उस वाक्ये की ओर है जब इंज़माम के एक शॉट को फ़ील्ड करके सुरेश रैना ने इंज़माम को क्रीज़ से बाहर पाकर गेंद विकेट की ओर उन्हें आऊट करने के इरादे से फ़ेंकी और इंज़माम ने क्रीज़ से काफ़ी बाहर होते हुए भी, विकेट की ओर जाती गेंद को अपने बल्ले से रोक दिया। ऐसा करना खेल के नियमों के विरूद्ध है और रैना के साथ साथ कप्तान द्रविड़ ने भी अंपायर से इंज़माम को आऊट देने की अपील की, जिसे कि अंपायर ने मान लिया और इंज़माम को आऊट दे दिया। अब मोईन खान साहब को यह खुजली है कि द्रविड़ जैसे अनुभवी खिलाड़ी को इस मामूली से वाक्ये को अनदेखा कर देना चाहिए था, जैसे कि सौरव गांगुली कर देते यदि वे कप्तान होते!! खान साहब का कहना है कि क्रिकेट सज्जन लोगों का खेल है(gentleman’s game) और द्रविड़ को गांगुली के अनुभवों से सीखना चाहिए। भारतीय टीम को जीतने की ऐसी धुन सवार है कि वे किसी भी कीमत पर जीतना चाहते हैं, या तो सीधे तरीके से या फ़िर टेढ़े तरीके से!! तो मेरा कहना है कि खान साहेब, यदि क्रिकेट सज्जन लोगों का खेल है तो फ़िर इंज़ी ने विकेट पर जाती गेंद को अपने बल्ले से रोक कर अपनी मूर्खता का प्रदर्शन क्यों किया? और नियमों के विरूद्ध होते हुए भी आप कह रहें हैं कि भारतीय खिलाड़ियों को अपील नहीं करनी चाहिए थी? क्या यह पाकिस्तानी कप्तान की मूर्खता पर परदा करने का असफल प्रयास नहीं है? क्योंकि इंज़माम ने बाद में यह स्वीकार किया कि उन्हें इस नियम के बारे में नहीं पता था और वापस पैवेलियन लौटने के बाद ही उन्हें इस बारे में पता चला।
तो अब हमें यह प्रश्न उठाना चाहिए कि क्या ऐसे खिलाड़ी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलने की अनुमति मिलनी चाहिए जिसे खेल के नियम भी नहीं मालूम? कप्तान बनना तो दूर की बात है, ऐसे लोगों का तो चयन करने से पहले कुछ शिक्षा-दीक्षा देनी चाहिए। वरना कल को खान साहब या उनके जैसा ही कोई मूर्ख मसखरी करेगा कि कैच आदि की भी अपील नहीं करनी चाहिए, सज्जनों की तरह खेलना चाहिए, बिलकुल मोईन खान की तरह जिन पर भूतकाल में अत्यधिक अपील करने के कारण जुर्माना ठोका जा चुका है!!
द सौरव कॉन्सपिरेसी!!
February 2, 2006 · 4 Comments
सावधान:- इस पोस्ट में मेरे विचार कई जगहों पर कुछ उग्र भाषा में दिए गए हैं जो कि संभव है कई लोगों को पसंद न आएँ, हालांकि मैंने किसी अश्लील भाषा का प्रयोग नहीं किया है। इसलिए यदि आगे पढ़ना है तो इस बात को स्वीकार कर पढ़ें कि मैं अपनी उग्र भाषा और लहज़े के प्रति कोई बेकार की टिप्पणी नहीं स्वीकार करूँगा, यदि आपको सभ्यता का पाठ पढ़ाने का शौक है तो कहीं और जाईये!!
कहते हैं हर कुत्ते के दिन आते हैं, यदि अच्छे दिन हैं तो बुरे भी आएँगे, पर किसी के इतने भी बुरे दिन आ सकते हैं कि जिस व्यक्ति ने राष्ट्र की प्रतिष्ठा बढ़ाई, आज उसी के साथ गली के कुत्ते की तरह व्यवहार किया जा रहा है?
मैं बात कर रहा हूँ “महाराज” की, भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व और अभी तक के सर्वश्रेष्ठ तथा सर्वाधिक सफ़लता प्राप्त और कपिल देव के अलावा विश्वकप के फ़ाईनल में जाने वाले एकमात्र भारतीय कप्तान, सौरव गांगुली की। पहले बेईज्ज़त कर टीम की कप्तानी छीनी, फिर टीम से निकाला, वापस बुलाया फिर निकाला और फिर वापस रखा, यानि कि बात बात पर एहसास दिलाया कि उनकी औकात अब एक नए रंगरूट से भी गई गुज़री है। और अब जो कसर बाकी थी, वह पूरी कर दी पाकिस्तान में एक दिवसीय मैचों में खेलने वाली टीम से निकाल कर। किस आधार पर सौरव को निकाला गया है, यह अभी तक चयनकर्ताओं ने स्पष्ट नहीं किया है। आम धारणा यही है कि “दादा” को खुंदक के चलते लात मारी गई है, क्योंकि यदि चयनकर्ता अपनी उसी बकवास को दोहराते हैं कि सौरव गांगुली के खराब प्रदर्शन के चलते उन्हें निकाला है, तो उन्हें इतना तो बताना चाहिए कि और किस किस को वे निकाल रहे हैं, क्योंकि अभी तक के तीनों टैस्ट मैचों में एकाध खिलाड़ी को छोड़ किसी ने कोई खास प्रदर्शन नहीं किया है। यहाँ तक की हमारे कप्तान साहब राहुल द्रविड़ की अंबुजा सीमेंट सी मज़बूत दीवार भी पाकिस्तानी गेंदबाज़ों के तूफ़ानी वेग में ढह गई!! तो क्या पुनः एक नए कप्तान के स्वागत के लिए हमें तैयार रहना चाहिए? और यदि चयनकर्ता यह बकवास करने पर आते हैं कि बाकी खिलाड़ियों को उनके पिछले बढ़िया रिकार्ड को देखते हुए मौका दिया जा रहा है तो कोई मुझे बताए कि एक दिवसीय मुकाबलों में दस हज़ार से अधिक रन बनाने वाले, सचिन के बाद सर्वाधिक सैकड़े ठोकने वाले भारतीय और सबसे अधिक सफ़ल भारतीय कप्तान को यह मौका क्यों नहीं दिया गया? दस हज़ार रन बनाना कोई हंसी खेल नहीं है, और यदि है तो हमारे मौजूदा कप्तान ने क्यों नहीं बना लिए?
देखने वाले और जानने वाले जानते हैं कि यह सब विदेशी चमड़ी का काम है। कोच ग्रेग चैपल की तो चप्पलों से पूजा की जानी चाहिए, लगता है कि वह यहाँ भारतीय टीम को सुधारने नहीं आए, बल्कि उसका सत्यानाश करने आए हैं, या फ़िर यह कहा जाए कि भेजे गए हैं। और इसके पीछे किसका हाथ हो सकता है आस्ट्रेलिया के सिवाय? मन में यह शंका तो आती ही है कि कहीं ग्रेग चैपल भारतीय टीम के लिए डिमोलीशन मैन तो नहीं होने वाले जिस तरह दिल्ली में गैरकानूनी निर्माणों के लिए शीला दीक्षित डिमोलीशन वूमन बनीं हुई है!! कहीं यह सौरव के नेतृत्व में आस्ट्रेलिया को चटाई धूल का प्रतिकार तो नहीं?
और “दादा” के पक्ष में बोलने वालों की अब भी कोई कमी नहीं है और अब वे पक्षधर केवल बंगाल तक ही सीमित नहीं हैं। जहाँ एक ओर सिद्धु अपना रोष प्रकट कर रहे हैं, वहीं पूर्व कप्तान और विश्वकप विजेता कपिल देव ने भी अपना असंतोष ज़ाहिर किया है। सौरव को इस तरह नचाया जा रहा है कि जिससे उन्हें अपना अच्छा प्रदर्शन करने का मौका ही न मिले, ताकि खराब प्रदर्शन का जूता उनके सर मारकर उन्हें टीम से आसानी से निकाल दिया जाए। यदि ऐसा नहीं है तो क्यों सौरव को फ़ैसलाबाद में खेले गए दूसरे टैस्ट में नहीं खिलाया गया जहाँ पर पिच बल्लेबाज़ी के लिए एकदम उपयुक्त थी? कदाचित् इसलिए क्योंकि कोच के मन में चोर था कि कहीं सौरव ने फ़ैसलाबाद में रन ठोक दिए तो उसके किए कराए पर पानी फ़िर जाएगा, और फ़िर सौरव को टीम से निकालना दुष्वर हो जाएगा।
साथ ही यह आशंका भी मन को घेरती है कि अगला नंबर किसका लगने वाला है? अफ़वाह है कि सौरव के बाद अब चमगादड़ कोच की निगाह सचिन पर है। सचिन भी पिछले कुछ समय से फ़ार्म में नहीं है, तो क्या अगला नंबर सचिन का है? सौरव के टीम से निकाले जाने पर इतना बवाल उठा है, सचिन के निकाले जाने पर तो मेरा मानना है कि हल्ला ही मच जाएगा, क्योंकि यदि क्रिकेट धर्म है तो सचिन उसका भगवान है, यदि क्रिकेट कोई शरीर है तो सचिन उसमें धड़कता दिल है। ग्रेग चैपल के अनुसार हर व्यक्ति को एक ही लाठी से हांकना चाहिए। उसके अनुसार खराब फ़ार्म में चल रहे सचिन और एक रंगरूट में कोई अंतर नहीं किया जाना चाहिए।
भौंकने वाले तो भौंकते ही हैं और अब तो जैसे उन्हें “लाईसेन्स टू बार्क” मिल गया हो, कुछ गली के आवारा कुत्तों ने पुन: भौंकना चालू कर दिया है कि इतिहास में अभी तक का सबसे अधिक सफ़ल और बढ़िया बल्लेबाज़ सचिन तेन्दुलकर अब किसी काम का नहीं रहा, उसे क्रिकेट खेलना छोड़ देना चाहिए!!
तो हम कहेंगे कि जब हमने “लाईसेन्स टू किल” वाले को कोई भाव नहीं दिया तो “लाईसेन्स टू बार्क” वालों की क्या औकात है!!
कुछ समझदार लोगों का यह भी मानना है कि हाल ही में क्रिकेट बोर्ड में हुए तख़्ता पलट और शरद पवार के माफ़िया शासन के आने से भी सौरव की कुन्डली में शनि का प्रवेश हो गया है। जो लोग जंगल में न रह रहे हों और क्रिकेट के बारे में रूचि रखते हों, वे जानते होंगे कि सौरव पर भिखमंगी अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट काउंसिल को सोने से नहला देने वाले पूर्व अध्यक्ष जगमोहन डालमिया की कृपा थी, और शरद पवार लंबे अरसे से डालमिया के प्रतिद्वंद्वी रहे हैं, तो इसलिए सौरव के लिए तो मानों यह “कोढ़ में खाज” वाली स्थिती हो गई है।
क्रिकेट बोर्ड को अब आम जनता के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए, यह कोई प्राईवेट कंपनी नहीं कि जिसका हर फ़ैसला लोगों पर थोपा जा सके। इन लोगों का धंधा जनता की बदौलत चलता है, यदि लोग मैचों की टिकट खरीदना बंद कर दें और क्रिकेट का बॉयकाट करें तो इनकी दुकान बंद हो जाएगी, स्पॉन्सर इनको लात मार देंगे, इनके नवाबी शौक तबाह हो जाएँगे और ये लोग फ़िर पाँच-सात सितारा होटलों के वातानुकूलित कॉन्फ़रेंस हॉलों में बैठ गप्पें न मार सकेंगे। इस खेल पर पूरा राष्ट्र मरता है, तो इसको नियंत्रित करने वाली मशीनरी को जनता को जवाबदेह होना चाहिए।
गई भैंस पानी में!!
February 1, 2006 · 2 Comments
दो मैच बेजान पिचों पर खेलने के बाद जब आखिरी टैस्ट मैच में कुछ जानदार हरी पिच मिली, तो लोगों को कुछ आशा बंधी कि आखिरकार मैच में हार-जीत का निर्णय होगा। कप्तान साहब राहुल “दीवार” द्रविड़ ने जब टॉस जीत क्षेत्ररक्षण का निर्णय लिया तो भंवे तो उठी पर यह सोच मन को तसल्ली दी कि अच्छा है, वरना रावलपिंडी एक्सप्रैस इस हरी पट्टी पर भारतीय बल्लेबाज़ी को उड़ा ले जाती। जब इरफ़ान पठान ने हैट-ट्रिक ली, तो मन में अनार-फ़ुलझड़ियाँ फ़ूटने-जलने लगे, पाकिस्तानी बल्लेबाज़ों को झटपट गिरते देख ऐसा लगा कि मानो दीपावली आ गई हो। पर अपने बल्लेबाज़ भी कहाँ कम हैं, प्रतियोगिता की भावना तो उनमें सदैव से ही रहती है, पैविलियन में फ़टाफ़ट वापस लौट आराम करने की तो उन्हें भी जल्दी थी, इसलिए पाकिस्तानी गेन्दबाज़ों को अपने विकेट उपहार स्वरूप प्रदान कर वे भी वापस लौटने लगे। दूसरे दिन के अंत तक सभी निपट लिए थे। तो यानि कि तीन दिन बचे रहे और दो पारियाँ, यानि कि यदि कुछ असाधारण न हो तो खेल का निर्णय पक्का था।
दूसरी पारी में पाकिस्तानी न जाने कौन सी घुट्टी पी आए कि आऊट होने का नाम ही नहीं ले रहे। सब के सब पचास पचास रन ठोक कर जा रहे थे। और यह तो कमाल ही हो गया, सात बल्लेबाज़ों ने अर्धशतक बना एक नया कीर्तीमान खड़ा कर दिया और ६०७ रन का लक्ष्य भारत के सामने रखा। कोच साहब, श्रीमान ग्रेग चैपल को कदाचित् मैं कभी न समझ पाऊँ, वे ऐसे क्षण में भी मसखरी करने से बाज़ नही आए और कहते फ़िर रहे थे कि मैच अभी भी भारत की पकड़ में है।
उन्हें कितना समय हो गया भारतीय टीम के साथ, फ़िर भी उन्हें समझ नहीं आया कि भारतीय टीम से ऐसी आशा करना कि वे दो दिन तक बल्लेबाज़ी करके मैच ड्रॉ करा लेगी, एक तरह से यूँ आशा करना है कि केन्या अगला विश्वकप जीत लेगी!!
आप भारतीय बल्लेबाज़ों से अति आशावादी रूप में यह आशा तो कर सकते हैं कि वे ५०० से ज्यादा या फ़िर ६०७ रन का ही लक्ष्य प्राप्त कर लेंगे, परन्तु यह आशा करना बेकार है कि वे दो दिन तक डटे रहेंगे।
बहरहाल, यहाँ तक तो सभी अटकलें थीं, पर जो हो रहा है उसकी मुझे कतई आशा नहीं थी, जब पाकिस्तानी बल्लेबाज़ों को खेलते देखा तो सोचा कि अपने रणबाँकुरे भी कुछ न कुछ कमाल तो दिखा ही देंगे, पर वे तो चढ़ आई नदी के वेग में तिनकों की तरह बहते जा रहे हैं। यदि युवराज ने एक ओर से मामला न संभाला होता तो अब तक तो २०० से कम में ही काम निपट लिया होता!!
और लो, आखिरकार काम हो गया, भैंस गई पानी में, भारतीय डंडियाँ गिर ही गई। युवराज अकेले ही लड़ाई की कमान संभाले हुए रन ठोके जा रहा था पर आखिरकार रज़ाक ने उसे भी अपने लपेटे में ले ही लिया!! पाकिस्तानी शिविर में हर्ष की लहर दौड़ ही गई, भई केवल मैच थोड़े ही जीता है, पूरी कि पूरी शृंखला जीत ली है, वह भी १९ साल बाद!! और मैच भी ऐसे वैसे नहीं जीता है, पूरी तरह कालिख पोत कर ३४१ रनों से जीता है। हाँ तो कोच साहब, आप कुछ कह रहे थे मैच भारत की जेब में होने के बारे में? अब आप क्या दिखाने वाले हैं, उँगली दिखाईएगा या फ़िर कुछ और?
मेरी माने तो पाकिस्तान में पाकिस्तानियों को कुछ मत दिखाईएगा, भारत में जितना बवाल मचा था उसका स्वाद तो आप जानते ही हैं, यहाँ उससे भी गर्म शोरबा आपकी भेंट हो लेगा!!
इधर उधर विचरण करते हुए मुझे मिली यह कड़ी जहाँ पर कोलकाता और कराची के बीच सामान्यताएँ बताई गईं हैं। जिस तरह कोलकाता में क्रिकेट के प्रति दीवानापन है, वही हाल कराची में है, परन्तु दोनो टीमों का इतिहास इन जगहों पर अलग अलग है। जहाँ भारत ने कोलकाता में ३४ मैच खेल ८ जीते और ८ हारे हैं, वहीं पाकिस्तान ने कराची में ३७ मैच खेल १९ जीते और केवल १ मैच हारा है!! आखिरी बार कोलकाता में जब भारत पाकिस्तान का आमना सामना हुआ था तो भारतीय गेंदबाज़ों ने पहली पारी में पाकिस्तान के ६ विकेट २६ रनों के योग पर उड़ा कर पानी पिला दिया था, परन्तु मैच पर काबिज़ होने की बजाय उसे हार गए थे। अब इस संयोग को क्या कहें कि यहाँ कराची में भी पहली पारी में अपने गेंदबाज़ों ने पाकिस्तान के ६ विकेट ३९ रनों पर गिरा हालत पतली कर दी थी, पर अंत-पंत धोती तो अपनी ही ढीली हो गई!!
और अभी अभी रमीज़ राजा ने घोषणा की कि कल कराची में इस बड़ी जीत की खुशी में आतिशबाज़ियाँ की जाएँगी, अपनी भाषा में कहा जाए तो दीवाली मनाई जाएगी भई!!
अब देखें कि एक दिवसीय खेलों में कितनी बुरी तरह से हारते हैं!!
रंणबाँकुरों की वापसी!!
November 28, 2005 · No Comments
टीम इंडिया, भई वाह!! आज तो कमाल ही हो गया, जिस तरह से भारतीय रंणबाँकुरों ने पाँचवें और आख़िरी मुकाबले को जीत कर श्रृंख़ला को बराबर कर भारतीय भूमि पर दक्षिण अफ़्रीका की पहली एक दिवसीय श्रृंख़ला विजय का सपना चूर किया, वह वाकई प्रशंसा के योग्य है। कोलकाता में मिली क़रारी हार के बाद बहुत से लोगों को(यहाँ तक कि मुझे भी) यही आशा थी कि आज के अन्तिम मैच में भी भारतीय टीम कुछ ख़ास न कर पाएगी और दक्षिण अफ़्रीका आख़िरकार श्रृंख़ला ले ही जाएगी। पर टीम इंडिया ने जबरदस्त वापसी करते हुए मुम्बई के वानख़ेड़े स्टेडियम में हज़ारों की तदाद में आए दर्शकों को निराश न किया और मैच 5 विकटों से जीत लिया।
पहले क्षेत्ररक्ष्ण का निर्णय लेते हुए कप्तान द्रविड़ ने दक्षिण अफ़्रीका को पहले बल्लेबाज़ी करने के लिए आमंत्रित किया। चाल कामयाब रही और पठान तथा हरभजन ने दक्षिण अफ़्रीकी बल्लेबाज़ों का जीना हराम कर दिया। उनका भरपूर साथ दिया मुरली कार्थिक, सहवाग और युवराज ने। भज्जी ने सिर्फ़ गेंद से ही नहीं बल्कि अपने क्षेत्ररक्ष्ण से भी कमाल दिखलाया। दक्षिण अफ़्रीका के हाल इतने बुरे थे कि पंद्रहवें ओवर के बाद, लगभग बीस ओवर तक उनसे कोई चौका या छक्का ही न लगा और वे बेचारे पिच पर ही पसीना बहते हुए रन बटोरते रहे। वह तो जैक़ कॉलिस और विकेट कीपर मार्क बाउचर ने 81 रन के योगदान से पारी को संभाल लिया वरना दक्षिण अफ़्रीका ने मुँह के बल गिरना था। आख़िरकार दक्षिण अफ़्रीका ने नोच खसोट कर 6 विकेट ख़ो कर 221 रन बनाए।
भारतीय पारी की शुरुआत गौतम गंभीर और तेंदुलकर ने की। गंभीर को न जाने क्या जल्दी थी कि वह दूसरे ओवर में ही चलते बने। तीसरे क्रमांक पर आए वीरेन्द्र सहवाग ने आते ही अपना रंग दिख़ाया और नजफ़गढ के कसाई ने ऐसे पॉलक एण्ड कंपनी की जमकर ठुकाई की कि देख़ने वाले भी वाह वाह कर उठे। अपने घरेलू मैदान पर ख़ेल रहे तेंदुलकर भी कहाँ पीछे रहने वाले थे, उन्होने भी ख़ूब आतिशबाज़ियाँ की। पर सहवाग की सुलगती पारी का जल्द ही अन्त हुआ और ” द वॉल ” का आगमन हुआ। तेंदुलकर पूरी लय में थे परन्तु एक जबरदस्त कैच ने उनके बढते कदम रोक दिए। तीन विकेट लिकल गए थे और दिल्ली अभी दूर थी, इसलिए युवराज और द्रविड़ ने संभल कर ख़ेलना शुरु किया और युवराज के वापस लौटने तक मामला काफ़ी हद तक अपने हक में आ चुका था। आज ” द वॉल ” सीना ताने ख़ड़ी रही और आख़िर में भारत 5 विकेट से विजयी हुआ, और द्रविड़ को अपने अविजीत 78 रन की वजह से मैन-ऑफ़-द-मैच के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
अब भारतीय रंणबाँकुरे श्रीलंका में टेस्ट श्रृंख़ला के लिए जाएँगे और दक्षिण अफ़्रीका जाएगी आस्ट्रेलिया। उम्मीद है कि भारतीय टीम के प्रर्दशन में कोई कमी न आएगी और श्रीलंका से भी वे विजयी लौटेंगे।
टीम इंडिया, वाह भई वाह - भाग 2!!
November 25, 2005 · No Comments
टीम इंडिया ने आख़िर वह कर दिख़ाया जिसकी मुझे पूरी उम्मीद थी, वो आख़िरकार दक्षिण अफ़्रीका से हार गई। और हारी भी तो कैसे? 10 विकेट से!! पहले तो स्कोर नहीं बनाया, केवल 188 रन पर सिमट गए और उसके बाद तो कमाल ही हो गया, दक्षिण अफ़्रीका ने बिना एक भी विकेट गंवाए भारतीय रणबाँकुरों का मुँह काला कर दिया!! यानि कि बल्लेबाज़ नाकाम, गेंदबाज़ नाकाम और क्षेत्ररक्षण में तो टीम इंडिया की कोई सानी है ही नहीं!!
तो अब तक जो जिह्वाएँ स्टार कोच और अँबुजा सीमेंट के मज़बूत जोड़ से बने ” द वॉल ” की मज़बूत कप्तानी पर पुष्प वर्षा करते नहीं थक रहीं थी, क्या अब इस शर्मनाक हार के बाद उन्हीं जिह्वाओं से प्रतिवाद का स्वर निकलेगा?
नहीं, मैं नहीं समझता कि ऐसा होगा, होना भी नहीं चाहिए, पर लोगों में कम से कम इतनी अक्ल तो आनी चाहिए कि कोई एक ही रात में तोप नहीं हो जाता और हमारे विश्व-कप विजेता कप्तान कपिल देव भी यही कहते हैं, कि नए कोच और नए कप्तान की योग्यता को परख़नें में जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए, वे कितने काबिल हैं यह कुछ समय बाद ही पता चल पाएगा।
मेरे अनुसार भारतीय ख़िलाड़ियों को अब अपना ध्यान अठ्ठाईस(2
तारीख़ को मुम्बई में होने वाले आख़िरी मुकाबले पर देते हुए कमर कस लेनी चाहिए, श्रृंख़ला तो अब जीत नहीं सकते, कम से कम हारना तो नहीं चाहिए। जहाँ तक मेरा अनुमान है, मुम्बई की पिच बल्लेबाज़ों के पक्ष में होगी, तो इस लिए आवश्यक हो जाता है कि टीम इंडिया जमकर अफ़्रीकी गेंदबाज़ों की पिटाई करे और एक अच्छा स्कोर खड़ा करे जिसका हमारे गेंदबाज़ ठीक से बचाव कर सकें और श्रृंख़ला को बराबर कर दें। जाहिर सी बात है कि मेरे कहने का अर्थ है कि भारतीय रणबाँकुरों को पहले बल्लेबाज़ी करनी चाहिए और जहाँ तक मैं समझता हूँ, दक्षिण अफ़्रीकी कप्तान स्मिथ कोई मूर्ख़ नहीं है, तो आवश्यक है कि द्रविड़ टॉस भी जीतें, लेकिन इस पर उनका कोई ज़ोर नहीं, तो इस लिए अपनी किस्मत पर भरोसा रख़ें और जहाँ ज़ोर चल सकता है(बल्लेबाज़ी, गेंदबाज़ी और क्षेत्ररक्षण) वहाँ ज़ोर चलाएँ।
टीम इंडिया, वाह भई वाह!!
November 25, 2005 · 3 Comments
टीम इंडिया के क्या कहने, स्टार कोच के क्या कहने, और दक्षिण अफ़्रीका के बारे में तो पूछो ही मत!! पिछला मैच जीतने पर लोग वाह-वाह करते नहीं थक रहे थे कि क्या कोच है और टीम इंडिया तो फ़िर टीम इंडिया है। पर अब क्या हुआ? स्टार कोच को जुकाम हो गया और टीम इंडिया को नज़र लग गई क्या? 20 ओवर से पहले ही 71 रन और 5 आउट!! अगर ऐसा ही चलता रहा तो बल्ले-बल्ले हो जाएगी। कहने का मतलब है कि गांगुली को नीचा दिख़ाने के लिए कुछ लोग किसी भी हद तक जा सकते हैं, नए आए कोच को इतना कारगर दिख़ा सकते हैं जैसे कि वो कोच न हुआ ख़ुदा हो गया!! अरे भई, कोच नया है और वो रातों रात कोई चमत्कार नहीं दिख़ा सकता, कोई इतना बड़ा तीसमारख़ां नहीं होता। नया कोच है, उसे जमने में समय लगेगा और कुछ समय बाद ही उसके योगदान का मूल्यांकन हो सकेगा कि वह अच्छा है कि नहीं।
और हमारे नए नवेले कप्तान साहब के क्या हाल हैं? ” द वॉल ” का सीमेंट तो लगता है कि झड़ ही गया है जिसके कारण वह ढहने लगी है!! गांगुली की ख़राब फ़ार्म का डंका पीटने वालों को क्या नए कप्तान का रनों का सरोवर सूख़ा हुआ नहीं दिख़ा? क्या हमारे सूरदास चयनकर्ता यह न देख़ पाए कि ज्यादातर बल्लेबाज़ों की बल्लेबाज़ी को कप्तान बनने के बाद ग्रहण लग जाता है? क्या तेंदुलकर के साथ दो बार ऐसा नहीं हुआ? जब तेंदुलकर जैसे विख़्यात और कुशल बल्लेबाज़ के साथ ऐसा हो सकता है तो फ़िर गांगुली क्या चीज़ है? लेकिन क्या कह सकते हैं, भारतीय क्रिकेट बोर्ड तो एक मज़ाक है जिनका पाँच सितारा होटलों के वातानुकूलित कमरों में बैठ कर घंटों वाद-विवाद करने के सिवाय कोई काम नहीं है!! चयनकर्ता समीति और बाकी समीतियों में ऐसे पूर्व ख़िलाड़ी भरे हुए हैं जो कि अपने समय में तो कुछ ख़ास कर नहीं पाए(मेरा ईशारा जाहिर है कि सूरदासों के अध्यक्ष की ओर है) और अब बेहतरीन ख़िलाड़ियों से उन्हें जलन होती है कि उनके पास बोलने और जवाब देने के लिए जुबान क्यों है।
ख़ैर फ़िलहाल यदि मैच की स्थिति पर ध्यान दिया जाए तो हालत अच्छी नहीं है, 36 वें ओवर की 3 गेंदें हुई हैं और युवराज के अभी अभी आउट होने से स्कोर 152 रन पर 6 विकेट हो गया है। अच्छी ख़ासी साझेदारी चल रही थी कि उसका भी बैंड बज गया!! अब धूनी और कैफ़ पर ही उम्मीद कायम है कि ये दोनों स्कोर को 250 के आस पास पहुँचा दें तो जीतने की कुछ आशा है वरना स्थिति निराशाजनक तो है ही!!
अफ़्रीकी विजय यात्रा की समाप्ती!!
November 20, 2005 · 4 Comments
बंगलूर में ख़ेले गए दिन-रात्री के एक-दिवसीय मुकाबले में भारतीय रणबाँकुरों ने 6 विकिटों से जीत हासिल करके आख़िरकार दक्षिण-अफ़्रीका के विजय रथ को रोक ही दिया और इस श्रृंख़ला में 1-1 से अपनी पकड़ बराबर कर ली। दक्षिण-अफ़्रीका अब तक 20 एक-दिवसीय मुकाबलों में लगातार विजयी होती हुई आस्ट्रेलिया के 21 लगातार जीतों के कीर्तीमान की ओर बढ रही थी, लेकिन भारत आकर उसकी विजय यात्रा उसी प्रकार समाप्त हो गई जिस प्रकार आस्ट्रेलिया की 16 टेस्ट मैचों की हुई थी।
घरेलू मैदान पर पहली बार कप्तानी कर रहे राहुल द्रविड़ ने टॉस जीत कर दक्षिण-अफ़्रीका को टर्न लेती हुई पिच पर पहले बल्लेबाज़ी करने के लिए आमन्त्रित किया। चाल कामयाब रही और पठान की बेहतरीन गेंदबाज़ी की बदौलत दक्षिण-अफ़्रीकी टीम 20 रन के स्कोर पर 3 विकेट खो कर पानी मांग रही थी। 100 रन के स्कोर तक पहुँचते-पहुँचते उनकी आधी से ज्यादा टीम वापस पैविलियन लौट चुकी थी। मुरली कार्तिक ने अपने 10 ओवरों में केवल 16 रन देकर दिख़ाया कि स्पिन गेंन्दबाज़ी कैसे की जाती है, हांलाकि कार्तिक को कोई विकेट नहीं मिला। हरभजन और सहवाग ने 2-2 विकेट झटके जबकि आगरकर और युवराज ने 1-1 विकेट लेकर अपना योगदान दिया। दक्षिण-अफ़्रीका अपने 50 ओवरों में केवल 169 का स्कोर ही बना पाई।
भारतीय बल्लेबाज़ी की शुरुआत गौतम गम्भीर और सचिन तेंदुलकर ने की। दक्षिण-अफ़्रीकी बल्लेबाज़ों की असफ़लता के बावजूद उनके गेंदबाज़ों ने हार नहीं मानी, भारत का ख़ाता 22 गेंदों बाद ख़ुला और 13 के स्कोर पर ही उन्होंने सचिन तेंदुलकर को 2 रन के निजी स्कोर पर वापस भेज दिया। गौतम गम्भीर ने पारी सम्भालनी चाही पर सत्रहवें ओवर में वे जस्टिन ओन्टोंग द्वारा 38 के निजी स्कोर पर रन आउट कर दिये गए। पठान को पुनः तीसरे नंबर पर भेजा गया और सहवाग को ईस बार चौथे नंबर पर भेजा गया। पठान और सहवाग ने 53 रनों की साझेदारी निभाई और 105 के स्कोर पर पठान के आउट होने पर कप्तान राहुल द्रविड़ ने आकर बल्लेबाज़ी की कमान सम्भाली और सहवाग के साथ 49 रन बनाए। 154 के स्कोर पर जब कप्तान साहब 10 रन बनाकर आउट हुए तब भारत को जीत के लीए केवल 16 रनों की आवश्यकता थी जो कि सहवाग और युवराज ने बना लिए। ईस मैच में सहवाग ने अविजीत 77 रन बना कर फ़ार्म में वापसी की, मेरे अनुसार यह अभी कहना अभी ठीक नहीं होगा। यह तो आने वाले अगले मैच और उनमें सहवाग का प्रदर्शन ही साबित करेगा कि फ़ार्म में वापसी हुई कि नहीं!! पठान को गेंद और बल्ले से बेहतरीन प्रदर्शन के लिए मैन-आफ़-द-मैच चुना गया।
बहुत से लोग भारत की विजय पर अत्यधिक प्रसन्न हो रहे होंगे, जबकि मेरा यह मानना है कि श्री-लंका की टीम जब यहाँ आई थी तो उनमें एक तरह से जंग लगा हुआ था क्योंकि उन्होने कुछ समय से कोई मैच नहीं खेला था। लेकिन दक्षिण-अफ़्रीका की टीम यहाँ विजय रथ पर सवार होकर आई है और रैंकिंग कुछ भी कहे, मैं दक्षिण-अफ़्रीका को श्री-लंका से बेहतर टीम मानता हूँ। ईसलिए जब भारतीय टीम यह श्रृंख़ला जीत लेगी, तभी मैं मानूँगा कि वाकई टीम के प्रदर्शन में सुधार हुआ है।
अब इस श्रृंख़ला में तीन मैच रह गए हैं जो कि चेन्नई(22 नवंबर), कोलकाता(25 नवंबर) और मुम्बई(28 नवंबर) में ख़ेले जाने हैं और तीनों ही दिन-रात्री के मुकाबलें हैं।
क्या कल भारत जीतेगा?
November 18, 2005 · No Comments
क्या कल बंगलूर में होने वाले क्रिकेट के एक दिवसीय खेल में भारत दक्षिण-अफ्रीका को हरा पाएगा? पिछले मुकाबले में भारत को 5 विकटों से हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन विचारणीय बात यह है कि पहले बल्लेबाज़ी करते हुए भारत ने 5 विकट केवल 35 के योग पर खो दिए थे। उसके बाद खेल में वापसी करते हुए भारत ने 250 रन का लक्ष्य दक्षिण-अफ्रीका के सामने रखा था और दक्षिण-अफ्रीका उस को आखरी ओवर में ही पार कर पाई थी। यानि कि भारतीय टीम ने कड़ी चुनौती दी थी। तो क्या कल दिन-रात के मुकाबले में भारतीय टीम वापसी करते हुए मैच जीत पाएगी?
अगर सटोरियों पर विश्वास किया जाए तो वे लोग नहीं समझते कि भारत की जीत की कोई उम्मीद है। बाज़ार में 4-1 का भाव मिल रहा है!! अब देख़ना तो यह है कि हमारे स्टार कोच श्री ग़्रेग चेपल अपनी कौन सी तोप चला के दक्षिण-अफ्रीका की मज़बूत टीम और उसके तेज़ ग़ेन्दबाज़ों की तिगड़ी(पोलाक, एंटीनी, नेल) को ध्वस्त कर पाते हैं क्योंकि यदि कल भी भारतीय रणबाँकुरे हार गए तो उनकी इस 5 एक दिवसीय मैचों की श्रिंख़ला में वापसी लगभग असंभव हो जाएगी, आख़िर दक्षिण-अफ्रीका के ख़िलाड़ी कोई बच्चे तो हैं नहीं कि जीती जिताई सीरीज़ हाथ से निकल जाने देंगे!!
और फ़िर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इज्ज़त कमाने के लिए अपने आपको साबित करना पड़ता है, और हमारे स्टार कोच ने अभी तक ऐसा कोई तीर नहीं मारा। वे तो सोचते हैं कि हम लोग बस खड़े-खड़े ही उनको पहुँची हुई शख़्सीयत मान लें। श्री लंका को 6-1 से हराना कोई बड़ा काम नहीं था क्योंकि उनका तो समय एवं फ़ार्म दोनो ही ख़राब चल रहे थे, लेकिन दक्षिण-अफ्रीका ज़रा टेड़ी ख़ीर साबित होगी। श्री ग़्रेग चैपल को ये जान लेना चाहिए कि इज्ज़त कमाई जाती है, वो मन्दिर का प्रसाद नहीं है कि हर एरे गेरे को मिल जाए। तो इसलिए उन्हें चाहिए कि बेकार की चीज़ो से सनसनी फ़ैलना बन्द करें और अपने काम की ओर ध्यान दें जो कि टीम और उनके हित में है, वरना कहीं ऐसा न हो कि जैसे उन्होंने सॉरव गांगुली को टीम से बाहर करवाया है, वैसे ही उन्हें भी भारतीय क्रिकेट र्बोड कहीं लात न मार दे!! ![]()


