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मुक्तेश्वर – भाग ४

पिछले भाग से आगे …..

रविवार सुबह जल्द ही आँख खुल गई। लगभग सभी जाग गए थे; बाहर बाल्कनी में आकर देखा तो आज की सुबह आकाश पिछली सुबह के मुकाबले काफ़ी साफ था। इसलिए आज सामने स्थित पर्वत शिखरों की तस्वीरें बेहतर आईं। इतनी दूर होने पर भी नंदा देवी, चौखम्बा, त्रिशूल आदि इतनी पास लग रही थी कि मन कर रहा था कि हनुमान की भांति एक ही छलांग लगा किसी एक के शिखर पर लैंड कर जाओ। 😉

बहरहाल आज समय अधिक नहीं था, हमको जल्द ही निकलना था ताकि मुक्तेश्वर में एकाध जगह देख वापसी की जाए, नौकुछियाताल आदि देख सांय जल्दी हल्द्वानी पहुँच अच्छी डीलक्स बस में सवार हो दिल्ली पहुँचें। तो फटाफट तैयार हो, नाश्ता कर और यात्री निवास का बकाया भुगतान कर हम लोग चौली की जाली की ओर पैदल ही चल पड़े, गाड़ी के ड्राईवर को बोल दिया कि मंदिर के पास पहुँच हमारी प्रतीक्षा करे। चौली की जाली यात्री निवास के पीछे से होकर जाती एक पगडंडी के अंत पर है, एकाध पत्थर की शिलाएँ हैं जिनके आगे गहरी खाई है। मुक्तेश्वर में एक एडवेन्चर कैम्प मौजूद है जिसका नाम “कैम्प पर्पल” है। वे लोग यहाँ चौली की जाली पर रैप्पलिंग(rappelling) करवाते हैं। जब हम लोग वहाँ पहुँचे तो कुछ लोगों का एक फैमिली ग्रुप वहाँ था और जीन्स पहने एक मोहक सी कन्या बैठी थी(जो कि उस फैमिली ग्रुप की सदस्या नहीं थी)। वहाँ एक शिला पर हम भी कुछ मिनट बैठे, तस्वीरें आदि ली गईं। अब सबकी एकसाथ तस्वीर भी चाहिए थी, लेकिन किससे कहते लेने को, इसलिए एक पत्थर पर मैंने अपना कैमरा टिका ऑटो टाईमर ऑन किया जिससे हम सब लोगों की एक साथ वाली तस्वीर आ गई।

धूप बहुत तेज़ी से निकल आई थी, लेकिन अधिक नहीं चुभनी आरम्भ हुई थी। लेकिन धूप निकल आने का एक लाभ यह हुआ कि उस जगह से दूर-२ तक साफ़ दिखाई दे रहा था।

योगेश और मनोज को कुछ और नहीं सूझा तो दोनो पेड़ पर ही चढ़ बैठ गए और मुझसे बोला गया कि लो तस्वीर। अब अपना क्या घिसता था जब दो लंगूर…..अरर….. मेरा मतलब दो मॉडल बैठे बिठाए मिल गए तो!! 😉

लेकिन कदाचित्‌ हितेश को लगा कि पेड़ पर चढ़ना इतना कूल नहीं है, इससे आगे जाना होगा। वहाँ कैम्प पर्पल वाले आ चुके थे अपने अतिथियों के साथ जो रैप्पलिंग करना चाहते थे। उनसे बात की गई और वे हितेश को रैप्पलिंग करवाने को तैयार हो गए। तुरंत ही अपने बांका जवान को सजा दिया गया और एक ओर शिला से नीचे खाई में उतारा गया।

उसको करीब 80 फ़ीट नीचे उतारा गया जहाँ पत्थरीली दीवार का एक हिस्सा बाहर आया हुआ था और एक प्रकार की लैंडिंग बनी हुई थी। अब नीचे उतरना तो आसान था लेकिन वापस ऊपर चढ़ना कठिन। लेकिन कुछ देर के प्रयास के बाद हितेश वापस ऊपर आ गया। उसका मन प्रसन्न था कि मज़े ले लिए, हम प्रसन्न थे कि बिना दुर्घटना के एडवेन्चर पूरा हुआ। 😉 अब इसके बाद शायद योगेश भी जाना चाहता था लेकिन कैम्प पर्पल वालों का अपना समूह तैयार था इसलिए उन्होंने खेद जताते हुए मना किया कि किसी और को नहीं करवा पाएँगे। अब धूप में रूकने का कोई कारण नहीं था, इसलिए सब दूसरे रास्ते पर आगे बढ़ लिए जो कि मंदिर तक जाता था जहाँ हमारी गाड़ी और ड्राईवर हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। मंदिर पहुँच सभी मंदिर में दर्शन करने चले गए और मैं गाड़ी की ओर बढ़ गया। थोड़ी देर बाद बाकी के साथी भी आ गए तो हम लोग गाड़ी में लद नौकुछियाताल की ओर बढ़ लिए। ड्राईवर गाइड का भी काम कर रहा था और कई रोचक बातें बताता जा रहा था।

नौकुछियाताल के पास एक पहाड़ी पर पैरा-ग्लाईडिन्ग होती है, तो सभी का मन था कि वहाँ चल उसका आनंद भी लिया जाए, आखिर केवल हितेश की काहे मजे ले!! 😉 जल्द ही हम लोग उस पहाड़ी पर पहुँच गए जहाँ पैरा-ग्लाईडिन्ग कराई जाती है। एक बड़े और चौड़े पैराशूट से लटककर व्यक्ति उँचाई से नीचे कूदता है और हवाओं के धक्के से आगे ग्लाईड करता लैन्डिन्ग स्थल पर लैन्ड करता है जो कि वहाँ से 2 किलोमीटर दूर था। वहाँ प्रतीक्षारत व्यक्ति उसको जीप में बिठा वापस पहाड़ी पर लाकर छोड़ देते हैं। हमारी गाड़ी एक निश्चित स्थान तक ही गई, उसके बाद ऊपर हमको पैदल ही चढ़ना था जहाँ पैरा-ग्लाईडिन्ग हो रही थी। इस चढ़ाई ने तुन्गनाथ वाली चढ़ाई की याद दिला दी, हालांकि यह चढ़ाई तो बहुत छोटी थी!! 😉 ऊपर पहुँच देखा तो पता चला कि काफ़ी भीड़ है। एक जवान पैराशूट से बंधा अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहा था और उसकी सुन्दर नई नवेली पत्नी उसको निहार रही थी। अब इसको किसी गलत सेन्स में नहीं लिया जाए, वो मोहतरमा सुन्दर थीं तो इसलिए मैंने सुन्दर लिखा है। 🙂 हम लोग पीछे की ओर पत्थर पर बैठ गए। हवा का मन नहीं था इसलिए आराम से चल रही थी बिना वेग के, थककर बेचारा जवान भी बैठ गया। वहाँ उपर से नौकुछियाताल बहुत अच्छा लग रहा था। हमारे ड्राईवर ने बताया कि इस ताल के नौ कोने हैं और सभी एक साथ नहीं दिखते, दंत कथा है कि यदि कोई इसके सारे नौ कोने एक साथ देख ले तो उसकी तुरंत मृत्यु हो जाएगी।

किसी को उस जवान की बारी आती नहीं दिख रही थी, और उसके बाद 7-8 लोग और लाइन में थे, तो हम लोगों ने सोचा कि चला जाए, पैरा-ग्लाईडिन्ग उस रोज़ संभव नहीं। उतर कर नीचे गाड़ी के पास आए तो वहाँ से नौकुछियाताल की एक बढ़िया तस्वीर मिल गई।

कुछ ही देर में हम लोग नौकुछियाताल पहुँच गए। सबने निर्णय लिया कि पहले नौका विहार किया जाए और उसके बाद दोपहर का भोजन। मेरा मन हंस के आकार वाली एक नौका में विहार करने का था, लान्सडौन में हितेश और शोभना ने उस में बैठ पता नहीं क्या आनंद लिया था!! 😉 तो मेरे साथ मनोज हंस वाली नौका में आ गया और बाकी के लोग चार सीट वाली दूसरी नौका में चले गए जिसमें पहले हितेश और दीपक पीछे बैठ पैडल चला रहे थे। मैंने अपनी नौका इन लोगों की नौका के पीछे साईड में लगा ली और पास पहुँच मनोज ने पीछे से इनकी नौका पकड़ ली और मैंने पैडल चलाना बन्द कर दिया। अब उन लोगों की नौका के साथ ही अपनी नौका भी धीरे-२ बढ़ रही थी। 😀 हितेश को एकाएक लगा कि उन लोगों की नौका थोड़ी भारी हो गई है, पैडल चलाने में दिक्कत हो रही थी। दीपक ने पीछे मुड़ के देखा तो पाया कि मनोज उनकी नौका को पकड़े दांत फाड़ रहा था। 😉 तुरंत ही हम लोगों को उन दोनों से सुनने को स्तुति गान मिला और हमने हंसते हुए उनकी नौका छोड़ी और अलग हो फटाफट निकल लिए(क्योंकि हितेश खड़ा हो हमारी नौका में आने की तैयारी कर रहा था)!! 😉 वे लोग अलग निकल लिए और हम उनसे आगे अलग निकल लिए। इस बड़े ताल में बहुत से जोड़े भी विहार कर रहे थे। हम थोड़ा आगे गए तो एक सुनसान किनारे पर एक नौका को खड़े देखा जिसमें तोता-मैना का एक जोड़ा चोंच लड़ाने में व्यस्त था। आगे एक किनारा थोड़ी उँचाई पर था और वहाँ कुछ मकान बने थे, मन यह सोच रहा था कि यदि ऐसे मकान में रहा जाए तो कितना आनंद आएगा। अभी हम लोग मुड़कर दूसरी ओर आए कि आगे एक और नौका दिखी जिसमें एक और तोता-मैना का जोड़ा चोंच लड़ा रहा था। खैर यह तो आम बात है, इसलिए नज़रअंदाज़ कर हम लोग आगे निकल लिए। बाकी के साथी पूरे ताल की परिक्रमा करने का इरादा रखे हुए थे, जबकि हम लोग ताल के बीच में ही टाइमपास कर रहे थे। जब वे लोग वापस हो हमारे पास आए तो हमने अपनी नौका उनके बाजू में लगा ली। उनको लगा कि हम पुनः वही हरकत करने वाले हैं इसलिए हमको चेतावनी दी गई और हमारे सफ़ेद झंडा दिखाने के पश्चात ही हमको उनके बगल में नौका लगाने की अनुमति मिली। तकरीबन 20-25 मिनट के विहार के बाद हम लोग किनारे पर पहुँच बाहर आ गए।

बाहर आते ही एक मज़ेदार वाक्या हुआ। सोनी के एक बेसिक साइबरशॉट डिजिटल कैमरा लिए एक फोटोग्राफ़र ने हमको घेर लिया और फोटो खिंचवाने के लिए बोलने लगा। हमारे मना करने पर भी नहीं टला और जबरन अपनी एल्बम हितेश के हाथ में थमा दी। यार लोग भी अब मूड में आ गए थे कि मजा लिया जाए, इसलिए उसके द्वारा खींची तस्वीरें देखने लगे जो कि कोई खास नहीं थी, ऐसी तो हम ही खींच सकते थे!! 😉 तो जब उन साहब को एल्बम वापस की गई तो वे पुनः बोले। इस बार हम सबने अपने-२ औज़ार निकाल लिए। सबके पास उन साहब के कैमरे से महँगे और बेहतर कैमरे थे, और योगेश के पास तो निकोन का एसएलआर था!! 😉 वो साहब थोड़ा चकित हुए तो हमने आगे उनको और घेरा। हितेश की ओर इशारा कर उनको बताया गया कि इन साहब(हितेश) के दिल्ली में दो फोटो स्टूडियो हैं। अब वो फोटोग्राफ़र नीचे आ गिरा, बोला कि उसको भी नौकरी दे दी जाए, तो हम लोग मुस्कुराते हुए सामने मौजूद ढाबे पर बढ़ लिए और वो फोटोग्राफ़र साहब अपने रास्ते। घोड़े देख हितेश का मन सवारी करने का हुआ, पट्ठा एक ही दिन में पूरी मौज लेना चाहता था!! तो उसने एक नहीं वरन्‌ दो-दो चक्कर काटे सुल्तान नाम के एक बढ़िया श्यामवर्ण घोड़े पर।

इसके बाद आखिरकार भोजन किया गया। सभी को अच्छी खासी भूख लग आई थी और खाना भी स्वादिष्ट था। भोजन उपरांत हम लोग भीमताल की ओर बढ़ लिए। यह ताल नौकुछियाताल से भी बड़ा है और यहाँ भी नौका विहार होता है लेकिन चूंकि हम लोग नौकुछियाताल में विहार कर चुके थे इसलिए यहाँ करने की कोई इच्छा नहीं थी। तो कोई फोन पर व्यस्त था तो कोई हल्का होने चला गया, मैं, दीपक और योगेश ताल के किनारे एक पत्थर की छतरी के नीचे ताश खेलने लगे।

कुछ देर पश्चात एक रेस्तरां में हमने चाय-कॉफ़ी आदि ली और उसके बाद ताज़ादम हो वापस हल्द्वानी की ओर बढ़ लिए। हल्द्वानी पहुँचे तब तक अंधेरा हो गया था। ड्राईवर को बकाया पैसे और अच्छी सी टिप देकर हमने विदा किया और बस स्टैन्ड की ओर बढ़ लिए। एक बात देखकर बहुत खीज हुई, पूछताछ काउंटर पर कोई उपस्थित नहीं था और अन्य किसी को डीलक्स बस की सही जानकारी नहीं थी या सही बताना नहीं चाहता था। जिससे पूछो यही कहता कि सामने जो उत्तरांचल परिवाहन की बस जा रही है वही है दिल्ली के लिए, उसी में निकल लो। अब वह तो हमको भी दिख रहा था लेकिन दो-ढाई सौ किलोमीटर का रात का सफ़र हम उस थकी हुई बस में नहीं करना चाहते थे। डिलक्स बस के दोगुने पैसे देने में हमे कोई ऐतराज़ नहीं था लेकिन सफ़र आराम से करना चाहते थे क्योंकि सभी थके हुए थे और थोड़ी नींद लेना चाहते थे। लेकिन जब डीलक्स बस का कोई पता नहीं चला तो हमने सोचा कि उस थकी हुई बस में ही आराम से जाएँगे, इसलिए तीन वाली बड़ी तीन सीटें ली और बकायदा नंबर लिखवा बुक करा ली। उसके बाद पास ही की एक मिठाई की दुकान में गए जिसमें खान-पीने की व्यवस्था भी थी। मेनू तो लंबा चौड़ा था लेकिन जो भी चीज़ पूछो उसी के लिए उत्तर मिलता कि उपलब्ध नहीं है। आखिर में मैंने पूछा कि भई जो है वही बता दे और इस प्रकार ठीक-ठाक बने वेज फ्राईड चावल से पेट भरा गया, क्या करते, भूख में तो चने भी मेवा लगते हैं!! तो दाना चुगने के बाद हम अपनी बस में आकर बैठ गए, और थोड़ी ही देर में बस चल पड़ी।

हितेश और मैं आगे एक सीट पर बैठे थे और अपने बैग हमने बीच में रखे हुए थे, बाकी लोग पीछे की दो सीटों पर विराज रहे थे। नींद लेने की कोशिश की गई लेकिन आई नहीं। आगे एक स्टैन्ड पर कुछ लोग चढ़े, एक साहब अकड़ के बोले कि बैग उठाकर अपनी गोद में रखूँ और उनको बैठने दूँ, तो मैंने भी अकड़कर उत्तर दे दिया कि पूरी सीट(तीन लोगों) के पैसे दिए हैं, इसलिए आराम से खड़ा रह। उनको यकीन नहीं आया तो कंडक्टर को बुला लिया और जब कंडक्टर ने मुझसे पूछा तो मैंने टिकट दिखा दिए जिसके बाद वो साहब बुरा सा मुँह बना बस के बोनट पर बैठ गए। पता नहीं कितना समय बीत गया, बस ठीक-ठाक रफ़्तार से बढ़ रही थी लेकिन उस कड़ी सीट पर बैठना कष्टदायी हो रहा था, सारा दिन टाटा सूमों में सफ़र किया था जिसकी सीट भी कुछ खास नहीं थी लेकिन बस की सीट से बढ़िया थी, लेकिन बैठे-२ वाट तो लग ही जाती है। एक बड़े से बस अड्डे पर बस रूकी, जहाँ ड्राईवर को चाय वगैरह पीनी थी। तो हम लोग भी टाँग सीधी करने की गरज से नीचे उतर आए। वहीं बाजू में जेबीसीएल की एक उत्तर प्रदेश परिवाहन की वातानुकूलित 2×2 डीलक्स बस देखी जो कि हल्द्वानी से आ रही थी(हमारी बस के पीछे-२ ही चली दिख रही थी) और दिल्ली जा रही थी। हमको उन दोनों बस वालों पर बहुत क्रोध आया जिन्होंने हल्द्वानी बस स्टैन्ड पर हमको कहा था कि रविवार को कोई डीलक्स बस नहीं चलती दिल्ली के लिए। यकीनन उन्होंने इसलिए गलत बताया था क्योंकि डीलक्स बस उत्तरांचल परिवाहन की न होकर उत्तर प्रदेश परिवाहन की थी। पर अब क्या कर सकते थे, जी-भर कर उन दोनों को गालियाँ देने के बाद हम वापस अपनी बस में आकर बैठ गए, अब तो बैठना और भी कष्टदायी हो गया था। थोड़ी देर बाद बस चल पड़ी, आखिरकार थके हुए मस्तिष्क पर नींद हावी हुई और एक झपकी आ गई, कुछ देर बाद आँख गर्मी के कारण खुली और देखा कि अपनी बस लगभग 20-30 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से रेंग रही है। आखिरकार किसी तरह उस नारकीय बस यात्रा का अंत हुआ और हम दिल्ली पहुँच गए। एक बात जो मेरे ध्यान में आई वह यह कि इस यात्रा पर ठीक तरीके से सोना नसीब नहीं हुआ, न जाते समय, न यात्रा के दौरान और न ही आते समय।

इस यात्रा के दौरान ली गई तस्वीरें यहाँ उपलब्ध हैं।